अंतरराष्ट्रीय विधि को विधि के रूप में स्वीकार किया जाना इसकी बाध्यकारिक शक्तियों को स्पष्ट करने में समस्या उत्पन्न करता है और इसके फलस्वरूप सभी विधियों की प्राधिकारिता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है।
कुछ लेखकों ने, अंतरराष्ट्रीय विधि की बाध्यकारी प्रवृत्ति प्राकृतिक विधि से व्युत्पत्तित होती है, के द्वारा इस दर्शाने का प्रयास किया है। किन्तु हमने देखा है कि प्राकृतिक विधि नैतिकता से अधिक कुछ भी नहीं है
और नैतिक नियमों की विद्यमानता सदृश विधिक नियमों की विद्यमानता की कोई गारंटी नहीं है। इस प्रकार का तर्क अधिक से अधिक यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय विधि के नियम नैतिक रूप से बाध्यकारी हैं,
न कि विधिक रूप से बाध्यकारी । तथापि बहुत से विधिक नियम नैतिक रूप से विरक्त है, नैतिकता में कतिपय नियम आदर्शवादिता से परे भी हो सकते हैं। इसी प्रकार का मामला वसीयत, संविदा और हस्तातरण पत्र इत्यादि राष्ट्रीय विधियों संबंधी औपचारिकताओं के मामले में है,
और अंतरराष्ट्रीय विधि में सीमाक्षेत्र का टाइटल और कार्यक्षेत्र की सीमा संबंधी कतिपय नियमों में भी है। इस प्रकार के नियमों की बाध्यकारिता का शायद ही किसी नैतिक 647 मानदण्ड पर गुणारोपित किया जा सकता है।
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
Correct Answer: (d) अंतरराष्ट्रीय विधि में बहुत से नियम संधि पर आधारित होते हैं, न कि प्रथा पर।
Solution:प्रत्यक्षवादियों (Positivistis) के अनुसार, उपयुक्त विधायी प्राधिकरण द्वारा अधिनियमित कानून बाध्यकारी है। प्रत्यक्षवादी अपने विचारों को राज्यों के वास्तविक व्यवहार पर आधारित करते हैं, उनके विचार में संधियाँ (Treaty) और रीति- रिवाज (Custom) अन्तर्राष्ट्रीय कानून के मुख्य स्रोत है।