अर्थिक सर्वेक्षण में ऋण बकाया की बढ़ाई गई कालावधि के बारे में वर्ष 2007-08 में आए वैश्विक वित्तीय संकट जिसके परिणामस्वरूप अशोध्य ऋण की स्थिति उत्पन्न हुई और निवेश की दरों और आर्थिक विकास में गिरावट आई थी, से सबक लेते हुए सावधानी बरतने का संदेश प्रेषित किया गया है।
यदि इसका अनुसरण किया गया तो इसका अभिप्राय यह है कि कंपनी की वित्त व्यवस्था बहुत अधिक अधिसंकुचित हो जाएगी क्योंकि कंपनियाँ दिवालियापन की स्थिति के परिहार के लिए ऋण देने हेतु संसाधनों की जुगत में रहती हैं और अशोध्य ऋण की मान्यता देने तथा इसके निमित्त प्रावधान करने के बाद सरकारी स्वामित्व वाली बैंको को पुनः पूंजी देने के लिए सरकार पर दबाव बढ़ जाएगा।
विनियामक सहिष्णुता अनिवार्य आहार न होकर आपातकालिक औषधि के रूप में अपनाई जानी चाहिए। यह प्रबल सलाह है। कर्जदारों द्वारा ऋण की संदायगी पर अधिस्थगन कोविड महामारी के दौरान कॉरपोरेट जगत के लिए समोपयोगी रहा है।
अधिस्थगन अवधि बीत जाने के बाद इनमें से बहुत से प्रतिष्ठानों में सरलता की घोर समस्या उत्पन्न होगी। सभी व्यवसायों में तेजी से विकास होने के फलस्वरूप संकट का परिहार होगा। यथार्थ जगत में इस तरह के स्वर्णिम स्वप्न शायद ही कभी साकार होते हैं।
बहुत सी कंपनियां जो तरलता के अभिगम से अस्तित्व में बने रह सकती थी उस समय घाटे में चली जाएंगी जब बैंको को ऐसा प्रतीत होगा कि अब उन्हें अपनी परिसंपत्ति की गुणवत्ता की समीक्षा करनी है। इसका समाधान इस तरह की कंपनियों को पूंजी उपलब्ध करना है। जिसका उपयोग उन्हें इक्विटी पर लाभ नहीं अर्जित करने की दशा में ऋण उपलब्ध कराने के लिए करने की आवश्यकता नहीं है। कंपनियों को विद्यमान ऋण सेवा प्रदान करने तथा नए उत्पादन में निवेश करने, आर्थिक पुनरुज्जीवन के परिणामस्वरूप उद्भुत मांग को पूरा करने के लिए बहुत अधिक पूंजी की आवश्यकता होगी। सरकार ने बहुत सी निधियों के कोष का वचन दिया था।
जिसके अन्तर्गत सक्षम, लघु और मध्यम उद्यमों में निवेश करने के लिए बड़े पैमाने पर पूंजी जुटाई जाएगी। अब कथन को कृत्य में निष्पादित करने का समय है। इक्विटी हितो के बाद में संभवतः मुनाफा में बेचा जा सकता अपेक्षित पूंजी के लिए विशेष स्थिति तक निधियों, निजी इक्विटी और सेवानिवृत्ति के पश्चात् की गई बचत से किए गए आवंटन का उपयोग किया जा सकता है। निवेश का प्रबंधन करने की चुनौती है।
नीचे दो कथन दिए गए हैं:
कथन- I : ऋण अदायगी में चूक भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सामान्य परिघटना है।
कथन - II: वैश्विक वित्तीय संकट का प्रभाव भारत में अशोध्य ऋण के परिमाण पर पड़ता है।
उपरोक्त कथनों के आलोक में, नीचे दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए: