Solution:'दोनों का हठ था दुर्निवार, दोनों ही थे विश्वासहीन' 'कामायनी' की उपर्युक्त पंक्ति से आशय है- 'देव और दानव दोनों हठी और विश्वासहीन थे।' 'कामायनी' छायावाद के पुरस्कर्ता जयशंकर प्रसाद का भाव प्रधान महाकाव्य है। कामायनी (1935) मंगला प्रसाद पारितोषक से पुरस्कृत रचना है। कामायनी में 15 सर्ग हैं जिनका विवरण इस प्रकार है- (1) चिन्ता, (2) आशा, (3) श्रद्धा, (4) काम, (5) वासना, (6) लज्जा, (7) कर्म, (8) ईर्ष्या, (9) इड़ा, (10) स्वप्न, (11) संघर्ष, (12) निर्वेद, (13) दर्शन, (14) रहस्य, (15) आनन्द । आचार्य शांतिप्रिय द्विवेदी ने कामायनी को छायावाद का उपनिषद कहा है।