Solution:भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 2(J) शून्य संविदा अधिनियम को परिभाषित करती है, इसके अनुसार-
"जो संविदा विधि द्वारा प्रवर्तनीय नही रह जाती है, वह तब शून्य हो जाती है जब वह विधि द्वारा प्रवर्तनीय नहीं रह जाती है।" भारतीय संविदा अधिनियम में बहुत से ऐसे करार है, जो नैतिकता या लोकनीति के विरुद्ध होने के कारण शून्य किए गए है, कुछ संविदाएं सृजन के समय ही शून्य हो जाती है, जबकि कुछ संविदाएं |
सृजन के समय तो विद्यमान रहती है, परन्तु बाद में किन्ही कारणों से उनका पालन असंभव हो जाने के कारण वे शून्य हो जाती है। धारा 65 के अनुसार जब संविदा शून्य हो जाती है तो प्रभावरहित हो जाती है और पक्षकारों के अधिकार एवं दायित्व भी समाप्त हो जाते है। अतः संविदा के किसी पक्षकार के द्वारा इसे प्रवर्तनीय नहीं किया जा सकता।