विवाह के व्यवसाय में स्त्री की विद्या पासंग बने हुए ढेले के समान है, जो तुला को दोनों ओर समान रूप से गुरु कर देता है, कुछ उसके मानसिक विकास के लिए नहीं। उसकी योग्यता, उसकी कला पति के प्रदर्शन तथा गर्व की वस्तु है, उसे सत्यं शिवं सुन्दरं तक पहुँचने का साधन नहींः उसके कोमलता, करुणा, आज्ञाकारिता, पवित्रता आदि गुण उसे पुरुष की इच्छानुकूल बनाने के लिए आवश्यक हैं, संसार पर कल्याण वर्षा के लिए नहीं।
न स्त्री को अपने जीवन का कोई लक्ष्य बनाने का अधिकार है और न समाज द्वारा निर्धारित विधान के विरुद्ध कुछ कहने का। उसका जीवन पुरुष के मनोरंजन तथा उसकी वंशवृदृद्धि के लिए इस प्रकार चिरनिवेदित हो चुका है कि उसकी सम्मति पुछने की आवश्यकता का अनुभव भी किसी ने नहीं किया।
वातावरण भी धीरे-धीरे उसे ऐसे ही मूक आज्ञा- पालन के लिए प्रस्तुत करता रहता है। गृहिणी का कर्तव्य कम महत्वपूर्ण नहीं यदि वह साधिकार और स्वेच्छा से स्वीकृत हो। जिस गृह को बचपन से उसका लक्ष्य बनाया जाता है यदि उस पर उसे अन्न-वस्त्र पाने के अतिरिक्त कोई और अधिकार भी होता, जिस पुरुष के लिए उसका जीवन एकान्त रूप से निवेदित है, यदि उसके जीवन पर उसका भी कोई स्वत्व होता तो वह दासता स्पृहणीय प्रभुत बन जाती।
उपर्युक्त अवतरण के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौनसा कथन सही है?
Correct Answer: (b) विवाह प्रथा में पढ़ी-लिखी लड़की अपने मायके और ससुराल का गौरव तो बढ़ा देती है, लेकिन अपने व्यक्तित्व के भीतरी विकास में उसका उपयोग कर नहीं पाती है।
Solution:उपर्युक्त अवतरण के सन्दर्भ में सही कथन यह है कि विवाह प्रथा में पढ़ी-लिखी लड़की अपने मायके और ससुराल का गौरव तो बढ़ा देती है, लेकिन अपनी व्यक्तित्व के भीतरी विकास में उसका उपयोग कर नहीं पाती हैं।