हॉबहाउस के शब्दों में, संपत्ति को वस्तुओं पर मनुष्य के नियंत्रण के रूप में समझा जा सकता है ऐसा नियंत्रण जिसे समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होती है, जो ज्यादातर स्थायी और विशिष्ट है। संपत्ति निजी (व्यक्तिगत या सामूहिक) या सामूहिक हो सकती है। संपत्ति के विकास के वर्णन में हॉबहाउस ने अवलोक किया कि सभी समाज में कुछ व्यक्तिगत निजी संपत्ति होती है लेकिन अनेक आदिम समाज में प्रमुख आर्थिक संसाधनों का सामुदायिक स्वामित्व होता है (उदाहरण के लिए शिकार के लिए भूमि, चराने के लिए भूमि, चरागाह)। अधिक विकसित कृषि समाज में निजी स्वामित्व की प्रधानता होती है। परन्तु हॉबहाउस ने बताया कि यद्यपि जनजातिगत साझा स्वामित्व लुप्त हो गया है, संयुक्त परिवार के लिए सामूहिक स्वामित्व बनाए रखा जा सकता है। आर.एच. लौवी ने भी, सम्पत्ति के बारे में अपने एक उत्कृष्ट लघु वर्णन, जिसमें आदिम और सभ्य समाज की तुलनात्मक आलोचना की गई है, यही विचार प्रस्तुत किया है। सभी आदिम मानव की व्यक्तिगत निजी संपत्ति है जिसमें नाम, नृत्य, गाने, मिथक, उत्सव संबंधी राजसी वस्तुएं, उपहार, हथियार, घरेलू उपकरण शामिल हैं। जहां तक उत्पादन के उपकरणों का संबंध है, शिकारियों और भोजन एकत्र करने वालों में, जहां भूमि जनजातीय संपत्ति (हमेशा परिभावेत नहीं) है और कृषकों और पशुपालनकर्ताओं में अंतर है। कृषकों में बहुधा भूमि व्यक्तिगत निजी संपत्ति होती है, यद्यपि वंश या जनजाति का नियंत्रण भूमि के उपयोग या स्वत्व अंतरण पर हो सकता है। पशु पालन करने वालों में भूमि पर समुदाय का अधिकार हो सकता है, लेकिन पशुधन पर नहीं; पशुधन का स्वामित्व व्यक्तिगत संपत्ति का भाव दृढतापूर्वक विकसित करता है।
अधिक विकसित कृषि समाज में-
Correct Answer: (c) निजी स्वामित्व की प्रधानता होती है
Solution:अधिक विकसित कृषि समाज में निजी स्वामित्व की प्रधानता होती है।