भूगोल के अध्ययन का प्रारम्भ मानवीय विद्वत्ता के आरम्भ से ही हुआ है। बौद्धिक प्रगति का पहला महत्वपूर्ण काल,जो पाश्चात्य जगत की लिखित परम्परा का भाग प्राचीन यूनान में मिलता है, जो ईसा पूर्व तीसरा तथा चौथी शताब्दी में पराकाष्ठा पर पहुँचा। यूनानियों ने कार्यप्रणालियाँ विकसित की, जिन्हें हम वैज्ञानिक विधियों के रूप में जानते हैं।
जो लोग सिद्धान्त को मुख्य महत्व का स्थान देना पसन्द करते हैं, वे प्रायः प्लेटो को सबसे अधिक उद्धृत करते हैं, जिसने निगमनात्मक पद्धति को विकसित किया। अरस्तू, जिसने आगमनात्मक पद्धति को विकसित किया, ने अवलोकित तथ्यों के सामान्यीकरण के रूप में अपनी अवधारणाओं को सूत्रबद्ध करने की वरीयता दी।
अरस्तू ने सिद्धान्त से तार्किक निगमन करने के स्थान पर प्रत्यक्ष प्रेक्षण/अवलोकन करने के महत्व पर जोर दिया। प्राचीन यूनानी दार्शनिकों में, भौगोलिक अध्ययन को लेकर दो मूल परम्पराएँ मिलती हैं। पहली परम्परा थेल्स से शुरू होने वाली गणितीय परम्परा है,
जिसमें विषयों को सही स्थान पर अवस्थित करने वाले हिप्पार्कस सम्मिलित है और जिसका सार-संक्षेप टोलेमी ने किया। दूसरी परम्परा होमर से शुरू होने वाली साहित्यिक परम्परा है, जिसमें हैकेटियस आते हैं तथा जिसका सार-संक्षेप स्ट्राबो ने किया। मध्य-युग में पतन का एक लम्बाकाल आया,
जब भौगोलिक ज्ञान के क्षितिज संकुचित हो गए और ईसाई मठ का केन्द्र बने। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अन्वेषण युग प्रारम्भ हुआ जब भौगोलिक ज्ञान के क्षितिज को पुनः विस्तारित किया गया। यूरोप में इन सभी नए नवाचारों और पर्यवेक्षणों का आविर्भाव अत्यन्त प्रेरक था
और इसने घटनाओं की ऐसी श्रृंखला को जन्म दिया, जिसकी निरन्तरता आज भी विद्यमान है। सबसे पहले तो धर्मग्रन्थों के शाब्दिक पाठ से उत्पन्न अवधारणाओं को चुनौती दी गई और अकादमिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों को स्थापित करने का संघर्ष शुरू हुआ।
सुयोग्य पेशेवर विद्वानों का यह अधिकार है कि वे प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ें, अपने निष्कर्षों को प्रकाशित करें, और उनके विश्वास के अनुसार जो सत्य है वह सिखलाएँ और, ऐसा करते समय सिवाय उनके अपने पेशे में स्थापित विद्धत प्रक्रियाओं के मानदंडों के, अन्य किसी भी नियंत्रण से मुक्त रहें।
भूगोल-सम्बन्धी प्रश्नों का सबसे प्रारम्भिक अन्वेषण किससे शुरू हुआ ?