Solution:जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति दोनों को मानने वाले दार्शनिकों मे मुख्य रूप से शंकर और बुद्ध दोनों हैं। शंकर का मानना है कि मुक्ति प्राप्ति के बाद भी मानव का शरीर कायम रह सकता है। मुक्ति का अर्थ शरीर का अंत नहीं है। शरीर तो प्रारब्ध कर्मों का फल है जब तक यह फल समाप्त नहीं हो जाता है शरीर विद्यमान रहता है।
यही जीवन मुक्ति है। शंकर के जीवन मुक्ति की तरह, सांख्य, योग, जैन बौद्ध ने भी जीवन मुक्ति को अपनाया है। जीवन मुक्त व्यक्ति संसार के कर्मों में भाग लेता है। परन्तु फिर भी बंधन ग्रस्त नहीं होता है इसका कारण यह है कि उसके कर्म अनासक्त भाव से किए जाते है। जो कर्म आसक्त भाव से किए जाते हैं उससे फल की प्राप्ति होती है परन्तु निष्काम कर्म भुजे हुए बीज की तरह हैं जिससे फल की प्राप्ति नहीं होती हैं
जब जीवन मुक्त व्यक्ति के स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अंत हो जाता है तब 'बिदेह मुक्ति' की प्राप्ति होती है। विदेह मुक्ति मृत्यु के उपरांत प्राप्त होती है।