यू.जी.सी. NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2021 जून-2022 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY)

Total Questions: 100

11. मर्लिन पॉन्टी के अनुसार, प्रत्यक्ष बोध

Correct Answer: (e) *
Solution:

(*) : इस प्रश्न को आयोग द्वारा ड्राप (Drop) कर दिया गया है।

12. सही क्रम का यचन करें:

A. अवग्रह
B. धारणा
C. इहा
D.अवाय
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (a) A, C, D और B
Solution:

सही क्रम इस प्रकार है- 1 - AC DE
अवग्रह → इहा → अवाय → धारणा।

13. घटः की उत्पत्ति में कौन-सा कपालसंयोग हेतु है?

Correct Answer: (b) असमवायि
Solution:

घट की उत्पत्ति में 'असमवायि' नामक कपाल संयोग हेतु के रूप में कार्य करता है। असमवायि कारण वह है जो 'समवायि' कारण में समवाय संबंध से रहकर कार्य की उत्पत्ति में सहायक होती है। जैसे 'तागे का रंग' तागे में, जो कपड़े का समवायि कारण है अतः तागे का रंग कपड़े का असमवायि कारण है।

14. निम्नलिखित में से किस दार्शनिक ने ईश्वर को वैयक्तिा सत् अथवा सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में विचार दिया?

Correct Answer: (d) टैगोर
Solution:

रविन्द्रनाथ टैगोर के धार्मिक विचार उपनिषद दर्शन से प्रभावित थे। ईश्वर के सम्बन्ध में इनका विचार है कि "ईश्वर वैयक्तिक सत अथवा सर्वोच्च व्यक्ति के रूप में है।"

15. डोर्किन द्वारा प्रस्तावित अधिकारों को किस प्रकार मानना चाहिए:

Correct Answer: (a) "विजय" जो अपनी विशिष्ट शक्ति प्रदर्शित करती है
Solution:

डोर्किन के अनुसार 'अधिकार' उस 'विजय' के रूप में हैं जो अपनी विशिष्ट शक्ति प्रदर्शित करते हैं।

16. सावेगात्मक सिद्धान्त के बारे में निम्नलिखित मत किसका है:

"केवल गणित एवं अनुभवाश्रित विज्ञानों के तर्कवाक्य में संवेदना होती है, और सभी अन्य तर्क वाक्य बिना संवेदना के होते हैं"
A. ए.जे. अय्यर एअर
B. आर. कारनैप
C. जी.इ.मूरे
D. बी. रसेल
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (c) केवल B
Solution:

"केवल गणित और अनुभवाश्रित तर्कवाक्यों मे संवेदना होती है, और सभी अन्य तर्कवाक्य बिना संवदेना के होते हैं।" यह कथन आर. कार्नेप का है। कार्नेप तार्किक भाववादी हैं। इन्होंने दर्शन का भावात्मक विश्लेषण किया है।
कार्नेप के अनुसार दर्शन का भावात्मक कार्य (Positive function) है- अर्थपूर्ण कथनों का विश्लेषण तथा स्पष्टीकरण करना है। क्योंकि विज्ञान प्रथम स्तर का अध्ययन है जबकि दर्शन द्वितीय स्तर का।

17. निम्नलिखित में से कौन जीवनमुक्ति और विदेहमुक्ति दोनों को मानते हैं-

A. शंकर
B. बुद्ध
C. रामनुज
D. मध्व
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (c) केवल A और A
Solution:

जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति दोनों को मानने वाले दार्शनिकों मे मुख्य रूप से शंकर और बुद्ध दोनों हैं। शंकर का मानना है कि मुक्ति प्राप्ति के बाद भी मानव का शरीर कायम रह सकता है। मुक्ति का अर्थ शरीर का अंत नहीं है। शरीर तो प्रारब्ध कर्मों का फल है जब तक यह फल समाप्त नहीं हो जाता है शरीर विद्यमान रहता है।
यही जीवन मुक्ति है। शंकर के जीवन मुक्ति की तरह, सांख्य, योग, जैन बौद्ध ने भी जीवन मुक्ति को अपनाया है। जीवन मुक्त व्यक्ति संसार के कर्मों में भाग लेता है। परन्तु फिर भी बंधन ग्रस्त नहीं होता है इसका कारण यह है कि उसके कर्म अनासक्त भाव से किए जाते है। जो कर्म आसक्त भाव से किए जाते हैं उससे फल की प्राप्ति होती है परन्तु निष्काम कर्म भुजे हुए बीज की तरह हैं जिससे फल की प्राप्ति नहीं होती हैं
जब जीवन मुक्त व्यक्ति के स्थूल और सूक्ष्म शरीर का अंत हो जाता है तब 'बिदेह मुक्ति' की प्राप्ति होती है। विदेह मुक्ति मृत्यु के उपरांत प्राप्त होती है।

18. निम्नलिखित में से कौन सा डेविड ह्यूम को अस्वीकारयोग्य है?

Correct Answer: (d) आत्मा, विश्व और ईश्वर का ज्ञान संभव है
Solution:

डेविड के अनुसार आत्मा, ईश्वर और विश्व का ज्ञान संभव नहीं है। ह्यूम विशुद्ध अनुभववादी हैं उन्होंने पाया की अनुभववाद के आधार पर आत्मा की तात्विक सत्ता को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। उनके अनुसार यदि आत्मा है तो उसका ज्ञान होना चाहिए बुद्धि से या अनुभव से । वास्तव में ह्यूम ने ज्ञान के दो प्रकार मानें-
(i) प्रत्ययों के संबंधों का ज्ञान
(ii) तथ्य के विषय के रूप में ज्ञान । इसके अतिरिक्त ह्यूम ने हेतुक संबंध का खण्डन भी किया। ह्यूम ने कहा कि प्रत्ययों के संबंधों का ज्ञान प्रागनुभविक व आकारिक ज्ञान है जिसकी सत्यता का निर्धारण अनुभव के आधार पर नहीं बल्कि उसे व्यक्त करने वाली प्रतिज्ञप्ति की विश्लेषणात्मकता के आधार पर होता है। यह ज्ञान अनिवार्य तथा निश्चयात्मक होता है।
इसलिए ह्यूम ने इसे प्रथम कोटि का ज्ञान माना है। गणित तथा तर्कशास्त्र में इस प्रकार का ज्ञान उपलब्ध होता है। इसके बावजूद ह्यूम ने कहा की यह ज्ञान कोरी कल्पना मात्र है क्योंकि इससे हमें अपने जगत के संबंध में कोई नई जानकारी प्राप्त नहीं होती है।
तथ्यों का ज्ञान द्वितीयक कोटि का ज्ञान है क्योंकि यह अनिवार्य नहीं, मात्र संभाव्य होता है। इसका कारण है की यह अनुभव पर आधारित व संश्लेषणात्मक प्रतिज्ञप्तियों में व्यक्त होता है। प्राकृतिक विज्ञानों में तथा हमारे सामान्य जीवन में इस प्रकार का ज्ञान बहुतायत में पाया जाता है।

19. "ज्ञान संभावना है, इसका संबंध सामान्य और प्रारूपिक से है न कि विशिष्ट और घटना से है" ये किसके विचार हैं?

Correct Answer: (c) सुकरात
Solution:

"ज्ञान संभावना है इसका संबंध सामान्य और प्रारुप से है न की विशिष्ट और घटना से है।” यह विचार ग्रीक दार्शनिक सुकरात के हैं। सुकरात ने ज्ञान को बुद्धि पर आधारित किया और सत्य की वस्तुनिष्ठता फिर से स्थापित की। सुकरात के अनुसार समस्त ज्ञान संप्रत्यय पर आधारित है। सुकरात कहते हैं की हमें प्रत्यक्ष अथवा कल्पना द्वारा प्राप्त विशेष वस्तुओं के प्रत्ययों के अतिरिक्त सामान्य प्रत्ययों का भी बोध होता है जो विशेष वस्तुओं के विषय में नहीं बल्कि वस्तुओं के वर्ग के विषय में होते हैं। यही हमारा सामान्य विचार है, इसी को संप्रत्यय कहते हैं। इस प्रकार सुकरात ने समस्त ज्ञान का आधार संप्रत्यय को बताया है।

20. निम्नलिखित में से किसका झुकाव अतीन्द्रिय प्रत्ययवाद को स्वीकारने की ओर है?

Correct Answer: (b) कांट
Solution:

काण्ट के अनुसार प्रज्ञा के प्रत्यय (जगत या प्रकृति का प्रत्यय, आत्मा का प्रत्यय, ईश्वर का प्रत्यय), ज्ञान नहीं अतीन्द्रिय भ्रम हैं यह आनुभविक भ्रम नहीं हैं। आनुभविक भ्रम तब होता है जब प्रत्यक्ष की प्रक्रिया में कल्पना अवैध निष्कर्ष निकाल लेती है। अतीन्द्रिय भ्रम का प्रत्यक्ष से कोई संबंध नहीं है ये तब होते हैं जब प्रज्ञा संवेदन के अभाव में विचारों का बुद्धि विकल्पों का अवैध प्रयोग करती है।
आनुभविक भ्रम अगले अनुभव से खण्डित हो जाते हैं किन्तु अतीन्द्रिय भ्रम खण्डित नहीं किए जा सकते। काण्ट यह भी मानता है कि अतीन्द्रिय भ्रम ज्ञान के विषय तो नही हैं किन्तु आस्था के विषय अवश्य हैं।