यू.जी.सी. NTA नेट /जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2020 जून-2021 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) (Shift – 1)

Total Questions: 100

91. वैशेषिक दर्शन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन से आत्मा के गुणों में शामिल हैं?

A. प्रयास
B. उदात्त प्रभाव
C. इच्छा
D. उदासीनता
नीचे दिए गए विकल्पों में सही उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (b) केवल A, B और C
Solution:

वैशेषिक दर्शन में आत्मा उस सत्ता को कहा गया है जो चैतन्य का आधार है। ज्ञान को आत्मा का आकस्मिक गुण माना गया है। वैशेषिक दो प्रकार की आत्मा मानते हैं-
(1) जीवात्मा, (2) परमात्मा। वैशेषिकों के अनुसार ज्ञान, सुख, दुख, इच्छा, द्वेष, प्रयास, भावना धर्म, अधर्म इत्यादि आत्मा के विशेष गुण हैं। उसके ये गुण भी आगन्तुक हैं। जीवात्माएँ अनेक है। जितने शरीर हैं उतनी ही जीवात्मा होती है। वैशेषिक आत्मा को अमर मानते हैं। इनके अनुसार यह अनादि और अनंत है।

92. नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) कहा गया है।

अभिकथन (A): बर्कले के सन्दर्भ में हैं, विचारों (प्रत्ययों) का ही अस्तित्व है।
तर्क (R) : बर्कले की दृष्टि में ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जो विचारों (प्रत्ययों) के रूप में न हो ।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में निम्नांकित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (c) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
Solution:

बर्कले केवल विचारों का ही अस्तित्व मानते हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि सभी ज्ञान विचारों के रूप में अस्तित्ववान है। आत्मा और उसके प्रत्ययों के अतिरिक्त किसी की सत्ता नहीं है। प्रत्यय आत्मनिष्ठ हैं न कि वस्तुनिष्ठ । अतः स्पष्ट है कि कथन (A) सत्य है तथा तर्क (R)द्वारा उसकी स्पष्ट व्याख्या हो रही है।

93. सेंट अगस्टाइन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

A. तर्क प्रकटन का प्रतिपक्ष है।
B. ईश्वर को तर्क से जाना जा सकता है।
C. तर्क की परिणति प्रकटन में होती है।
D. ईश्वर को प्रकटन द्वारा जाना जा सकता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (c) C और D सही हैं
Solution:

सेंट अगस्टाइन अफ्रीकी दार्शनिक थे। इनका मानना था कि तर्क की परिणति प्रकटन में होती है और ईश्वर को प्रकटन के द्वारा जाना जा सकता है। अगस्टाइन ने चिंतन का केन्द्र जगत के स्थान पर आत्मा और ईश्वर को बनाया। इन्होंने आत्मा के अमरत्व, स्वतः सिद्धत्व, ज्ञानस्वरूपत्व और संकल्प स्वातंत्र्य का समर्थन किया। अगस्टाइन आत्मा की सत्ता स्वतः सिद्ध मानते हैं। आत्मा में बुद्धि, स्मृति तथा संकल्प नाम की शक्तियाँ विद्यमान हैं।

94. निम्नलिखित में से कौन सा व्याप्तिग्रह का साधन नहीं है?

Correct Answer: (c) उपमान
Solution:

न्याय दर्शन के अनुसार व्याप्तिग्रह के कुल छः साधनों में 'उपमान' नहीं है। व्याप्तिग्रह के छः साधन इस प्रकार है- (1) अन्वय, (2) व्यतिरेक, (3) व्यभिचाराग्रह, (4) उपाधिनिरास, (5) तर्क, (6) सामान्य लक्षण प्रत्यक्ष 'उपमान' न्याय दर्शन के चार प्रमाणों में से एक है। यह चार प्रमाण इस प्रकार हैं- (1) प्रत्यक्ष, (2) अनुमान, (3) शब्द, (4) उपमान । उपमान ज्ञान का एक साधन है जिससे वस्तु का स्वभावबोध (Denotation) सूचित होता है।

95. निम्नलिखित में से कौन सा अरविंदो के अनुसार मन से परा मन की ओर सही क्रम को दर्शाता है?

Correct Answer: (a) उच्चतर मन, प्रबुद्ध मन, अंतः प्रज्ञा और अति मन
Solution:

श्री अरविन्दो के अनुसार मन से परामन का सही क्रम इस प्रकार है-
उच्चतर मन → प्रबुद्ध मन → अंतः प्रज्ञा → अति मन।
अरविन्द विश्व के क्रमबद्ध विकास में विश्वास करते हैं। यह विकास सोद्देश्य है। अरविन्द के दर्शन में विश्व का विकास आध्यात्मिक स्वरूप का होकर उसका परम लक्ष्य अनन्त पूर्णत्व की प्राप्ति है। अरविन्द कहते हैं कि विकास का प्रारम्भ जड़ पुदगल (Matter) से होकर उसमें चैतन्य (प्राण) आया तथा चैतन्य से मनस आविर्भूत हुआ। अब मनस के बाद अति मनस आने वाला है यही सच्चिदानंद स्वरूप है।

96. बौद्धों के अनुसार स्वलक्षण क्या है:

A. शाश्वत
B. यथार्थ
C. क्षणिक
D. अयथार्थ
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनें:

Correct Answer: (c) केवल B और C
Solution:

'विज्ञप्तिमात्रता' को आचार्य दिग्नांग ने 'स्वलक्षण' नाम दिया। उनके अनुसार स्वलक्षण ही परमार्थ सत् (यथार्थ) है। यह प्रपंचातीत, सर्वलक्षण शून्य, अभिलाप्य एवं अनिर्वचनीय है। उनके अनुसार 'विज्ञप्तिमात्रता अथवा 'स्वलक्षण' क्षणिक एवं सतत प्रवाहशील विज्ञान सन्तान रूप है। आचार्य दिग्नांग 'स्वलक्षण' के आधार पर अपोहवाद की स्थापना करते हैं और सामान्यों की सत्ता का खण्डन करते हैं।

97. योग दर्शन के अनुसार ईश्वर प्रणिधान किसका प्रकार है :

Correct Answer: (b) नियम
Solution:

योग दर्शन के अनुसार 'ईश्वर प्राणिधान' योग के अष्टांग मार्गों में से एक 'नियम' का प्रकार है। योग के अष्टांग मार्ग इस प्रकार है- (1) यम, (2) नियम, (3) आसन, (4) प्राणायम, (5) प्रत्याहार, (6) धारणा, (7) ध्यान, (8) समाधि ।
'नियम' के पांच प्रकारों में से एक ईश्वर प्राणिधान का अर्थ है ईश्वर के प्रति श्रद्धाभाव रखना। योग दर्शन में ईश्वर के ध्यान को योग का सर्वश्रेष्ठ विषय माना गया है। नियम के अन्तर्गत क्रमशः शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान आते हैं।

98. हाइडेगर के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :

A. मनुष्य की आंतरिक प्रकृति दूसरों का ध्यान रखने की है।
B. मनुष्य अनिवार्यतः कालिक होते हैं।
C. 'मानव सोच की कालिकता 'भावातिरेकी' होती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (c) केवल A, B और C
Solution:

हाइडेगर ने अपने विश्लेषणात्मक दर्शन में 'अपनी दुनिया में एक व्यक्ति के रूप में और उनके सामाजिक संदर्भ में मनुष्य के अस्तित्व पर ध्यान केन्द्रित किया। इस दृष्टिकोण में संसार और प्रणी दोनों को अविभाज्य रूप में देखा जाता है। हाइडेगर के संदर्भ में प्रश्नगत तीनों कथन-
(1) मनुष्य की आंतरिक प्रकृति दूसरों का ध्यान रखने की है।
(2) मनुष्य अनिवार्यतः कालिक होते हैं।
(3) मानव सोच की कालिकता 'भावातिरेकी' होती है। सत्य है।

99. गाँधी द्वारा सत्याग्रह के किन रूपों का समर्थन किया गया है?

Correct Answer: (a) अवज्ञा, प्रत्यक्ष कार्रवाई और असहयोग
Solution:

गाँधी जी सत्याग्रह के संदर्भ में अवज्ञा, प्रत्यक्ष कार्यवाई और असहयोग का समर्थन करते थे। सत्याग्रह का अर्थ है सत्य का आग्रह। इसका अहिंसा या प्रेम से घनिष्ठ सम्बन्ध है। सत्याग्रह में किसी को पीड़ा अथवा कष्ट नहीं पहुँचाते तथा सत्य के लिए ही सब कुछ किया जाता है। सत्याग्रह में स्वयं सब कुछ सहा जाता है इसमें शत्रुता का भाव नहीं रहता है। सत्याग्रह सदैव साधना का फल है। सत्याग्रह की पद्धति के रूप में उपवास या अनशन को उसका सहायक माना जाता है। इससे चित्त की शांति होती है।

100. जब अद्वैत वेदान्त कहता है कि जगत मिथ्या है, तब इसका क्या निहितार्थ है?

Correct Answer: (d) जगत न सत्य है और न मिथ्या है, बल्कि दोनों से भिन्न है
Solution:

उपर्युक्त प्रश्न की अंग्रेजी NTA ने सही दिया है लेकिन हिन्दी अर्थ गलत है। जहां 'सत्य' की जगह 'सत्' और 'मिथ्या' की जगह 'असत्' होना चाहिए। इस हिसाब से शंकर के दर्शन में न जगत न तो सत है और न असत है। बल्कि सदसत विलक्षण है। जगत की व्यावहारिक सत्ता तो है परन्तु पारमार्थिक रूप से असत है। अर्थात् शंकराचार्य के अनुसार, 'ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या जीवो ब्रह्मव नापरः” (ब्रह्म ही एक मात्र सत्य है, जगत मिथ्या है तथा जीव और ब्रह्म अभिन्न है)। यद्यपि जगत मिथ्या है फिर भी जगत का कुछ न कुछ आधार है जिस प्रकार रस्सी में दिखाई देने वाले सांप का आधार रस्सी है उसी प्रकार जगत का आधार ब्रह्म है। शंकर कहते हैं कि संपूर्ण जगत ब्रह्म का विवर्त मात्र है।