दर्शन शास्त्र का महत्व मुख्यतः उसकी अनिश्चितता में खोजा जाना चाहिए। कोई व्यक्ति जिसे दर्शन शास्त्र का ज्ञान नहीं ऐसे पूर्वाग्रहों की कैद में अपना जीवन व्यतीत करता है जिनका निर्माण, किसी व्यक्ति के राष्ट्र तथा समान्य परिवेश से जुड़ी आदतगत मान्यताओं तथा ऐसे विश्वासों से जनित लोकमान्यताओं से होता है जो उसके विचारशील तर्क स्वीकृति अथवा सहयोग के बिना ही उत्पन्न हो गए होते हैं।
ऐसे व्यक्ति के लिए संसार निश्चित, सीमित तथा सुस्पष्ट हो जाता है, सामान्य विषय पर उसके लिए कोई प्रश्न नहीं उठते, अन्जानी संभाव्यताएं उसके द्वारा पूर्वाग्रहों द्वारा अस्वीकृति कर दी जाती है, उसके विपरीत हम जैसे ही दार्शनिक चिंतन आरम्भ करते हैं, हम पाते हैं कि प्रतिदिन वस्तुएँ भी ऐसे प्रश्नों से पूर्ण हो जाती हैं, जिसके केवल अपूर्ण उत्तर ही दिये जा सकते हैं।
दार्शनशास्त्र हालांकि अपने द्वारा उठाये गए संशयों का निश्चित उत्तर नहीं दे पाता, परन्तु वह हमें बहुत सी संभावनायें जरूर दर्शा देता है जिससे हमारी सोच का दायरा बढ़ता है तथा हमारी सोच को परम्पराओं के बंधन से मुक्ति मिलती है। इससे ऐसे लोगों की हठी रूढ़ीवादिता का वरण होता है, जिन्होंने स्वतन्त्रतादायी संशय के क्षेत्र में कभी प्रवेश ही नहीं किया तथा यह जानी-पहचानी वस्तुओं को अनजाने परिपेक्षों में प्रस्तुत कर हमारे अश्चार्यबोध को भी सजीव रखता है।
दर्शन-शास्त्र को निश्चित उत्तरों के लिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि किन्हीं भी उत्तरों को कभी भी निश्चितता के साथ सही नहीं जाना जा सकता, बल्कि इसे प्रश्नों के महत्व के लिए ही पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि प्रश्न संभावनाओं की हमारी समझ को बढ़ाते हैं, हमारी बोधिक कल्पना को संवर्धित करते हैं, तथा ऐसी रूढ़िगत सुनिश्चितता का वरण करते हैं, जो हमारी बुद्धि की विचारशीलता को सीमित करती है;
किन्तु सर्वोपरि इसे इसलिए पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि दर्शन शास्त्र विश्व की जिस विशालता का मनन करता है जिससे बुद्धि भी उसी विशालता को प्राप्त करती है तथा उस ब्रह्माण्ड से तादात्म्य स्थापित करती है जिससे परमाशुभ का निर्माण होता है,
"उसके विपरीत हम जैसे ही दार्शनिक चिंतन आरम्भ करते हैं, हम पाते हैं कि प्रतिदिन वस्तुएं भी ऐसे प्रश्नों से पूर्ण हो जाती है जिसके केवल अपूर्ण उत्तर ही दिए जा सकते है". गद्यांश के अभिप्राय के सन्दर्भ में, इस कथन में संभवतः क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?
Correct Answer: (c) हम कुछ प्रश्नों के निश्चित उत्तर को कभी नहीं पा सकते लेकिन दर्शनशास्त्रियों को उनके मुक्तिदायक मूल्यों के लिए प्रश्नों को करते रहना चाहिए।
Solution:दर्शनशास्त्र एक ऐसी विधा है, जहां जीवन व जगत, ज्ञान और व्यवहार आदि से सम्बन्धित कई अनसुलझे प्रश्नों का समाधान खोजने का प्रयास चिंतन के माध्यम से किया जाता है। यह जरूरी नहीं है कि कोई निश्चित उत्तर मिले लेकिन दार्शनिकों का काम है कि उनके मुक्तिदायक मूल्यों को पाने के लिए निरन्तर चिन्तन और प्रश्न करते रहना चाहिए। एक अच्छा दार्शनिक वही है जिसे प्रश्न की समझ हो और लोगों में उस प्रश्न की समझ विकसित कर सके।