यू.जी.सी. NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2020 जून 2021 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) (Shift – II)

Total Questions: 100

91. गद्यांश को पढ़ें और निम्नलिखित प्रश्न का उत्तर दें :-

दर्शन शास्त्र का महत्व मुख्यतः उसकी अनिश्चितता में खोजा जाना चाहिए। कोई व्यक्ति जिसे दर्शन शास्त्र का ज्ञान नहीं ऐसे पूर्वाग्रहों की कैद में अपना जीवन व्यतीत करता है जिनका निर्माण, किसी व्यक्ति के राष्ट्र तथा समान्य परिवेश से जुड़ी आदतगत मान्यताओं तथा ऐसे विश्वासों से जनित लोकमान्यताओं से होता है जो उसके विचारशील तर्क स्वीकृति अथवा सहयोग के बिना ही उत्पन्न हो गए होते हैं।
ऐसे व्यक्ति के लिए संसार निश्चित, सीमित तथा सुस्पष्ट हो जाता है, सामान्य विषय पर उसके लिए कोई प्रश्न नहीं उठते, अन्जानी संभाव्यताएं उसके द्वारा पूर्वाग्रहों द्वारा अस्वीकृति कर दी जाती है, उसके विपरीत हम जैसे ही दार्शनिक चिंतन आरम्भ करते हैं, हम पाते हैं कि प्रतिदिन वस्तुएँ भी ऐसे प्रश्नों से पूर्ण हो जाती हैं, जिसके केवल अपूर्ण उत्तर ही दिये जा सकते हैं।
दार्शनशास्त्र हालांकि अपने द्वारा उठाये गए संशयों का निश्चित उत्तर नहीं दे पाता, परन्तु वह हमें बहुत सी संभावनायें जरूर दर्शा देता है जिससे हमारी सोच का दायरा बढ़ता है तथा हमारी सोच को परम्पराओं के बंधन से मुक्ति मिलती है। इससे ऐसे लोगों की हठी रूढ़ीवादिता का वरण होता है, जिन्होंने स्वतन्त्रतादायी संशय के क्षेत्र में कभी प्रवेश ही नहीं किया तथा यह जानी-पहचानी वस्तुओं को अनजाने परिपेक्षों में प्रस्तुत कर हमारे अश्चार्यबोध को भी सजीव रखता है।
दर्शन-शास्त्र को निश्चित उत्तरों के लिए नहीं पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि किन्हीं भी उत्तरों को कभी भी निश्चितता के साथ सही नहीं जाना जा सकता, बल्कि इसे प्रश्नों के महत्व के लिए ही पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि प्रश्न संभावनाओं की हमारी समझ को बढ़ाते हैं, हमारी बोधिक कल्पना को संवर्धित करते हैं, तथा ऐसी रूढ़िगत सुनिश्चितता का वरण करते हैं, जो हमारी बुद्धि की विचारशीलता को सीमित करती है;
किन्तु सर्वोपरि इसे इसलिए पढ़ा जाना चाहिए, क्योंकि दर्शन शास्त्र विश्व की जिस विशालता का मनन करता है जिससे बुद्धि भी उसी विशालता को प्राप्त करती है तथा उस ब्रह्माण्ड से तादात्म्य स्थापित करती है जिससे परमाशुभ का निर्माण होता है,
"उसके विपरीत हम जैसे ही दार्शनिक चिंतन आरम्भ करते हैं, हम पाते हैं कि प्रतिदिन वस्तुएं भी ऐसे प्रश्नों से पूर्ण हो जाती है जिसके केवल अपूर्ण उत्तर ही दिए जा सकते है". गद्यांश के अभिप्राय के सन्दर्भ में, इस कथन में संभवतः क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है?

Correct Answer: (c) हम कुछ प्रश्नों के निश्चित उत्तर को कभी नहीं पा सकते लेकिन दर्शनशास्त्रियों को उनके मुक्तिदायक मूल्यों के लिए प्रश्नों को करते रहना चाहिए।
Solution:

दर्शनशास्त्र एक ऐसी विधा है, जहां जीवन व जगत, ज्ञान और व्यवहार आदि से सम्बन्धित कई अनसुलझे प्रश्नों का समाधान खोजने का प्रयास चिंतन के माध्यम से किया जाता है। यह जरूरी नहीं है कि कोई निश्चित उत्तर मिले लेकिन दार्शनिकों का काम है कि उनके मुक्तिदायक मूल्यों को पाने के लिए निरन्तर चिन्तन और प्रश्न करते रहना चाहिए। एक अच्छा दार्शनिक वही है जिसे प्रश्न की समझ हो और लोगों में उस प्रश्न की समझ विकसित कर सके।

92. उपरोक्त गद्यांश के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों में किस को सही माना जा सकता है?

(A) यह रूढ़िवादिता के विरोध में तर्क प्रस्तुत करता है।
(B) यह संशयवाद के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करता है
(C) यह दर्शन शास्त्र के आलोचनात्मक स्वरूप के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करता है
(D) यह दर्शन शास्त्र के परिकल्पनात्मक स्वरूप के विरोध में तर्क प्रस्तुत करता है
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर को चुने

Correct Answer: (b) केवल A और C
Solution:

प्रस्तुत गद्यांश में पूर्वाग्रहों एवं रूढ़िवादिता के विरोध में तर्क प्रस्तुत किया गया है। प्रश्न करने की और निश्चित उत्तर न खोजने के कारण हम रूढ़िवादिता से बच सकते हैं। इसके अतिरिक्त यह गद्यांश दर्शनशास्त्र के आलोचनात्मक स्वरूप को भी उदघाटित करता है।

93. उपरोक्त गद्यांश में दर्शनशास्त्र के स्वतंत्र करने वाली प्रकृति के रूप में क्या व्याख्यायित हो रहा है?

Correct Answer: (a) दर्शनशास्त्र का लक्ष्य सोचने के हमारे प्रचलित तरीकों की सीमाओं को सुस्पष्ट करना है
Solution:

दर्शनशास्त्र का लक्ष्य हमारी सोच के दायरे को बढ़ाना है ताकि हम पूर्वाग्रहों से मुक्त हो सकें। और यह तभी सम्भव है जब सोचने के हमारे प्रचलित तरीकों की सीमाएं सुस्पष्ट हो। और यह कार्य दर्शनशास्त्र का है।

94. गद्यांश के अनुसार वाक्यांश- "वस्तुएं क्या हैं इस विषय में निश्चितता" - निम्नलिखित में से किस विषय से जुड़ा है?

Correct Answer: (b) मताग्रह/ रूढ़िवादिता
Solution:

दर्शनशास्त्र को निश्चितता के अर्थ मे नहीं पढ़ा जाना चाहिए बल्कि अनिश्चितता के अर्थ में। वस्तुएं क्या हैं इस विषय में निश्चितता की भावना मतान्धता या पूर्वाग्रह है। निश्चतता की भावना रूढ़िगत सुनिश्चितता का वरण करती है। जो हमारी बौद्धिक विशालता को सीमित करती है।

95. गद्यांश के लेखक के अनुसार निम्नलिखित में से कोन - दर्शनशास्त्र के मूल्य में योगदान देने वाला एक महत्वपूर्ण घटक है?

Correct Answer: (d) प्रश्न जिन्हें हम दर्शनशास्त्री के रूप में पूछते हैं।
Solution:

प्रश्न वह जो हम एक दर्शनशास्त्री के रुप में पूछते हैं, दर्शनशास्त्र के मूल्य मे योगदान देने वाला एक महत्त्वपूर्ण घटक है। निश्चितता किसी भी प्रकार की हो उसकी तथा अपरीक्षित अश्वासन की आलोचना यहां की गयी है।

96. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए तथा उसके बाद दिए गए प्रश्न का उत्तर दीजिये

नैयायिको के अनुसार शब्दाबद्ध प्रत्यक्ष को दो अवयवों में विश्लेषित किया जा सकता है (1) उसका ज्ञान-अवयव तथा (2) उसका शब्द अवयव ज्ञान अवयव प्रत्यक्ष को दर्शाता है तथा इन्द्रियों द्वारा जनित होता है। यदि वह अपने विषय को सही प्रकार से प्रकाशमान कर रहा है तो वह वैध प्रत्यक्ष ज्ञान का अंश है। यदि उसके शब्द अवयव जैसे की रंग, स्वाद का बोध के नाम को अधिक महत्व दिया जाये तब वह अपने अवबोध के कार्य का निष्पादन नहीं कर पायेगा (रंग से जुड़ा शब्द रंग का बोध तो कराता है किन्तु रंग की प्रस्तुति नहीं करता वरन केवल उसके विषय के रूप में इंगित करता हैं।) अतः 'बोध' शब्द यहाँ विषय की भूमिका निभाता है।
इसलिए शब्द की भूमिका में वह किसी भी रूप में ज्ञान का अंश नहीं है। इसलिए इसकी, पाँचवे प्रकार के ज्ञान यदि वैध ज्ञान की नयी प्रजाति कहलाने, की कोई संभावना नहीं होती। हालाँकि कुछ परिस्थितियों में वस्तु के नाम का संस्मरण सविकल्पक प्रत्यक्ष की शर्तों में से एक है, तब भी उसे शब्द के ज्ञान से जनित नहीं माना जा सकता क्योंकि इन्द्रियां वहां कारण की विशेष भूमिका निभाती हैं किन्तु संस्मरण यहाँ आँखों के देखने के लिए प्रकाश स्रोत के सहायक भूमिका की तरह एक गौण भूमिका निभाता है।
अब यदि इस प्राक्कल्पना कि सविकल्पक प्रत्यक्ष इन्द्रिय प्रत्यक्ष है को प्रमाणित मान भी लिया जाये तब एक नयी समस्या सामने आ जाती है कि निर्विकल्पक प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष की परिधि से बाहर चला जाता है। दूसरी ओर कुछ समीक्षकों के अनुसार तथाकथित सविकल्पक प्रत्यक्ष शब्द-प्रमाण से ही जनित होता है क्योंकि वह शब्दिकृत ज्ञान का ही अंश है,
इसका परिहार करने के लिए निम्नलिखित आलोचनात्मक टिप्पणी है: यदि शब्दाबद्ध ज्ञान का इन्द्रिय प्रत्यक्ष होना प्रमाणित मान भी लिया जाये तब यह निःसंशय कहा जा सकता है कि वह अवबोध जो शब्दबद्धता से बिल्कुल स्वतन्त्र है इन्द्रिय प्रत्यक्ष होता है।
"कुछ परिस्थितियों में वस्तु के नाम का संस्मरण सविकल्पक प्रत्यक्ष की शर्तों में से एक है, तब भी उसे शब्द के ज्ञान से जनित नहीं माना जा सकता" इस तर्क का उद्देश्य संज्ञान के निम्नलिखित दो प्रकारों में से किनके बीच अनेकार्थता का निवारण करना है?

Correct Answer: (c) शब्द का सविकल्पक प्रत्यक्ष के साथ
Solution:

हालांकि कुछ परिस्थितियों में वस्तु के नाम का संस्मरण सविकल्प प्रत्यक्ष की शर्तों में से एक है, परन्तु उसे शब्द के ज्ञान से जनित नहीं माना जा सकता है। ऐसा इसलिए है कि इन्द्रियां वहां कारण की विशेष भूमिका निभाती हैं। किन्तु संस्मरण यहां आंखों को देखने के लिए प्रकाश स्त्रोत के सहायक की भूमिका की तरह एक गौण भूमिका निभाता है। ज्ञात हो नैयायिकों के अनुसार, अर्थपूर्ण शब्दों के संयोग से वाक्य बनता है। वाक्यों की सार्थकता के लिए निम्न शर्तों का होना जरूरी है- (1) आकांक्षा (2) योग्यता (3) सन्निधि (4) तात्पर्य

97. निम्नलिखित में से कौन से कथन दिए गए गद्यांश के समग्र मूल विषय के भाग है?

(A) प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञान के क्षेत्र का वर्णन
(B) क्या प्रत्यक्ष केवल 'विशुद्ध शब्द-रहित अवलोकन' है,
(C) क्या प्रत्यक्ष का हमेशा एक निर्धारित स्वरूप होना चाहिए।
(D) क्या प्रत्यक्ष ज्ञान का वैध स्रोत है

Correct Answer: (b) केवल A, B और C
Solution:

प्रस्तुत गद्यांश में शब्दाबद्ध प्रत्यक्ष की बात नैयायिकों के सन्दर्भ में की गयी है। शब्दाबद्ध प्रत्यक्ष को दो तरह से विश्लेषित किया जा सकता है- (1) उसका ज्ञान अवयव (2) उसका शब्दअवयव । प्रस्तुत गद्यांश में प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञान के क्षेत्र, निर्धारित स्वरूप तथा प्रत्यक्ष का विशुद्ध शब्द रहित अवलोकन का विश्लेषण किया गया है।

98. गद्यांश के लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष ज्ञान को वैध मानेजाने के लिए उपयुक्त शर्त क्या है?

Correct Answer: (b) वह तदप्रकाशित वस्तु के वास्तविक रूप के अनुरूप होता है।
Solution:

प्रत्यक्ष ज्ञान को वैध माने जाने के लिए, वह ज्ञान तदप्रकाशित वस्तु के वास्तविक रूप के अनुरूप होना चाहिए। न्याय दर्शन के अनुसार, 'प्रत्यक्ष ज्ञान, ज्ञानेन्द्रयों के माध्यम से प्राप्त होता है।'

99. गद्यांश के अनुसार ज्ञान में स्मृति /संस्मरण की भूमिका के सम्बन्ध में निम्नलिखित में से कौन स कथन सही है?

Correct Answer: (b) नाम की स्मृति प्रत्यक्ष को एक सविकल्पक रूप प्रदान करता है।
Solution:

नाम की स्मृति प्रत्यक्ष को एक सविकल्पक रूप प्रदान करती है। न्याय दर्शन में ज्ञान दो प्रकार का होता है- स्मृति और अनुभव । संस्कार मात्र से उत्पन्न होने वाला ज्ञान स्मृति कहलाता है।स्मृति से भिन्न ज्ञान को अनुभव कहते हैं।

100. प्रत्यक्ष ज्ञान के सम्बन्ध के निम्नलिखित में से कौन सा कथन गद्यांश के लेखक के मत को सर्वाधिक उपयुक्त रूप में प्रस्तुत करता है?

Correct Answer: (c) लेखक केवल निर्विकल्पक और सविकल्पक संज्ञान दोनों को प्रत्यक्ष के रूप में स्वीकार करता है।
Solution:

लेखक निर्विकल्पक तथा सविकल्पक संज्ञान दोनों को प्रत्यक्ष के रूप में स्वीकार करता है। सुपरिभाषित होना सविकल्पक संज्ञान है, हालांकि सभी ज्ञान सविकल्प ही होते हैं। किन्तु सविकल्प होने के पूर्व उन्हें निर्विकल्प अवस्था से होकर गुजरना पड़ता है।