यू.जी.सी. NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2020 जून 2021 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) (Shift – II)

Total Questions: 100

21. वैदिक दर्शन के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन से सही हैं? नीचे दिए कूट का चयन करें:

(A) ऋत ईश्वर की उत्पत्ति है
(B) ईश्वर ऋत की उत्पत्ति है
(C) ऋत दिव्य काय का नियंत्रित करता है
(D) ऋत प्राकृतिक परिघटनाओं को नियंत्रित करता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनें :

Correct Answer: (c) केवल B, C और D
Solution:

ऋत की संकल्पना वैदिक दर्शन में मिलती है। यह एक नैतिक अवधारणा भी है और वरूण देव को 'ऋतस्य गोप्ता' (ऋत के गोप्ता) के रूप में देखा गया। यह विश्व-व्यवस्था के भौतिक पक्ष के साथ नैतिक पक्ष का नियमन और नियंत्रण करते हैं। 'ऋत' की अवधारणा में निम्न विशेषताएं हैं-
(1) ऋत् सभी प्राकृतिक तथा समस्त खगोलीय घटनाओं का नियमन और नियंत्रण करता है। (2) ऋत् 'विश्व-व्यवस्था' का भी प्रतीक है जिसमें उषस का आगमन, सूर्य का चमकना, तारों, नक्षत्रों और चंद्र की नियमित गति और क्रम सब आ जाते हैं।
(3) ऋत् का मार्ग सदाचार का मार्ग है। उत्तरवर्ती दार्शनिकों ने बाद में 'कर्म-सिद्धान्त' का आधार 'ऋत्' की अवधारणा से जोड़ दिया
(4) ऋत् दिव्य 'कार्य को' भी नियंत्रित करता है और वरूण इसके अभिरक्षक हैं जिससे सारे देव जुड़े हैं।
(5) 'ऋत' को वैदिक दर्शन के सन्दर्भ में सर्वोच्च सत्ता माना गया है। तथा ईश्वर को ऋतु की उत्पत्ति माना गया है।
(6) ऋत् को धार्मिक व्यवस्था से भी सम्बन्धित माना जाता था।

22. निम्नलिखित में से कौन वेदों की अपौरुषेयता के पक्षधर रहे हैं?

(a) जैमिनी
(b) कुमारिल
(c) प्रभाकर
(d) वसबंधु
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनें :

Correct Answer: (b) केवल A, B और C
Solution:

जैमिनी, कुमारिल और प्रभाकर वेदों के 'अपौरुषेयता' के समर्थक हैं। वसुबंधु बौद्ध दर्शन के समर्थक हैं जहाँ 'वेदों की मान्यताओं का निषेध मिलता है। 'जैमिनी' को मीमांसा दर्शन का प्रणेता माना जाता है और कुमारिल एवं प्रभाकर इससे सम्बन्धित दार्शनिक हैं। मीमांसा दर्शन वेद की प्रामाणिकता में विश्वास करता है। मीमांसक शब्द के दो भेद पौरुषेय एवं अपौरुषेय मानते हैं। इसी आधार पर मीमांसा दर्शन में वेदों की अपौरुषेयता की बात करते हैं। तथा वेद वाक्यों को स्वतः प्रमाण मानते हैं।

23. द्वैत वेदान्त में साक्षी की भूमिका क्या है?

(a) ज्ञान के उत्पत्ति में
(b) ज्ञान की प्रतीति और वैधता में
(c) ज्ञानेन्द्रिय होने के रूप में
(d) संदेहपूर्ण अनुभूति की रचना करने में
नीचे दिए गए विकलपों में से सही उत्तर चुनें :

Correct Answer: (c) केवल C
Solution:

द्वैत वेदान्त का प्रतिपादक माध्वाचार्य हैं। साक्षी की अवधारणा इस दर्शन की विशिष्टता है। आत्मा के स्वरुपभूत चैतेन्द्रिय को साक्षी कहते हैं। साक्षी की भूमिका ज्ञानेन्द्रिय होने के रुप में है। 'साक्षी' का कार्य है 'वृत्ति ज्ञान' को प्रमाणित एवं प्रकाशित करना। क्योंकि 'वृत्ति ज्ञान' मन, इन्द्रिय आदि से जन्य अन्तःकरण के परिणाम रूप अचेतन होने के कारण स्वयं को प्रमाणित नहीं कर सकता। ध्यातव्य है कि द्वैत वेदान्ती दो प्रकार के ज्ञान को मानते हैं यथा वृत्ति ज्ञान और साक्षी ज्ञान।

24. सूची । को सूची II से सुमेलित कीजिए:

 सूची–I सूची–II
A. केवलI. भूतकाल, सूक्ष्म और दूरस्थ वस्तु (OBJECT) का प्रत्यक्ष ज्ञान
B. मनः पर्यायII. दूसरे के विचारों का प्रत्यक्ष ज्ञान
C. अवधिIII. व्यवहित बोधात्मक ज्ञान
D. मतिIV. अंतः प्रज्ञात्मक पूर्ण और निरपेक्ष ज्ञान

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिएः

Correct Answer: (b) A-IV, B-II, C-I, D-III
Solution:
सूची–Iसूची–II
(A) केवल(IV) अंतः प्रज्ञात्मक, निरपेक्ष तथा पूर्ण ज्ञान
(B) मनःपर्याय(II) दूसरे के विचारों का प्रत्यक्ष ज्ञान
(C) अवधि(I) भूतकाल, सूक्ष्म और दूरस्थ वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान
(D) मति(III) व्यवहित बोधात्मक ज्ञान

25. सूची । को सूची II से सुमेलित कीजिए :

सूची–Iसूची–II
A. सत्ताI. परसामान्य
B. पृथ्वीत्वII. अपरसामान्य
C. गुणत्वIII. परापरसामान्य
D. उद्भूतत्वIV. उपाधि

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए

Correct Answer: (a) A-I, B-II, C-III, D-IV
Solution:
सूची–Iसूची–II
(A) सत्ता(I) परसामान्य
(B) पृथ्वीत्व(II) अपरसामान्य
(C) गुणत्व(III) परापरसामान्य
(D) उद्भूतत्व(IV) उपाधि

26. विवेकानन्द की यथार्थता का संप्रत्यय है:

Correct Answer: (b) अद्वैतात्मक
Solution:

स्वामी विवेकानन्द का दर्शन वेदान्त के अद्वैत मत से प्रभावित है। उन्होंने शंकर के अद्वैत वेदान्त का सरल तथा वैज्ञानिक भाषा में प्रस्तुतिकरण किया है। इनका दर्शन व्यावहारिक वेदान्त के रुप में जाना जाता है। विवेकानन्द के अनुसार जगत् यथार्थ एवं आभास का, निश्चय और भ्रम का आपरिभाषेय मेल है। स्वामी विवेकानन्द के दर्शन में सत् (यर्थाथ Reality) की अवधारणा (प्रत्यय) अद्वैतात्मक है। 'सत्' को ही 'ब्रह्म' कहा गया है, जो निराकार, सर्वव्यापी चेतना है।

27. गाँधी जी द्वारा पालन किए गए सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध के बीच विभेद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

A. निष्क्रिय प्रतिरोध के विपरीत सत्याग्रह में बल निहित होता है।
B. निष्क्रिय प्रतिरोध के विपरीत सत्याग्रही कानूनों का पालन करता है।
C. सत्याग्रह प्रेम की अनुभूति पर आधारित होता है
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (d) केवल B और C
Solution:

सत्याग्रह का अर्थ है 'सत्य के प्रति आग्रह । गांधी जी सत्ता एवं मूल्य को सत्य का पर्याय मानते थे। सत्याग्रह इसी से सम्बद्ध चिन्तन है। जबकि निष्क्रिय प्रतिरोध, सत्याग्रह के विरोधी पक्ष को सूचित करता है, जिसका अर्थ है- 'प्रत्याक्रमण न करना । निष्क्रिय प्रतिरोध कहीं न कहीं बदले की भावना से प्रेरित होता है। जबकि गांधी जी सत्याग्रह के आग्रह के माध्यम से 'जैसे को तैसा करने की भावना का परित्याग करने की बात करते हैं। सत्याग्रह में प्रेम एवं शान्ति का भाव होना अनिवार्य है। सत्याग्रही कानून पालन करता है इसके विपरीत निष्क्रिय प्रतिरोध में ऐसा अनिवार्य नहीं है। सत्याग्रह सकारात्मक पहलू से सम्बन्धित है।

28. नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) कहा गया है।

अभिकथन (A): मनस और परम मनस के बीच अंतर यथार्थ को समझने के तरीके में अंतर है।
तर्क (R): परम मनस में यथार्थता का एकात्मक मित्र आवश्यक रूप से प्राप्त होता है। जबकि मनस विभेद उत्पन्न करता है।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में निम्नांकित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेः

Correct Answer: (d) सही नहीं है परन्तु (R) सही है।
Solution:

सृष्टि प्रक्रिया को समझाने के लिए श्री अरविन्द सत् (Reality-यथार्थ) के आठ स्तरों की बात करते हैं। जो क्रमशः सत्, चित्-शक्ति, आनन्द, अतिमन, मनस्, आत्मा, जीवन, भौतिक वस्तु (जड़ पदार्थ) हैं। श्री अरविन्द के अनुसार, विकास प्रक्रिया में 'मनस्' मानव मन से सम्बन्धित है जो अपने निचले स्तरों से तो ऊपर है लेकिन अभी भी वह सत् (यथार्थ) को भेद दृष्टि से ही देखता है। जबकि परम मनस् (अतिमन) सत् को एकात्म रुप में प्रस्तुत करता है। सत् या यथार्थ को समझने की दृष्टि से मनस् और परम मनस में अन्तर है।

29. के.सी. भट्टाचार्य के अनुसार दर्शन शास्त्र किस से सम्बन्धित है?

A. एन्द्रिकानुभाव
B. विषय निष्ठ चेतना
C. आध्यात्मिक चेतना
D. प्रगानुभाविक चेतना
निम्नलिखित दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुने:

Correct Answer: (c) केवल B, C और D
Solution:

के.सी. भट्टाचार्य के अनुसार चेतना के चार स्तर हो सकते हैं-
(1) आनुभविक चेतना
(2) विषयनिष्ठ चेतना (Objective Consciousness)
(3) आध्यात्मिक चेतना
(4) प्रागनुभविक चेतना। चेतना के इन स्तरों में प्रथम स्तर का सम्बन्ध विज्ञान से है। बाकि तीन स्तर आनुभविक से ऊपर हैं, जिनका सम्बन्ध दर्शनशास्त्र से है।

30. नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक को अभिकथन (A) और दूसरे को तर्क (R) कहा गया है।

अंतःप्रज्ञा यथार्थ का अव्यवहित ज्ञान है।
तर्क (R) : अंतः प्रज्ञा हृदय का गुणधर्म है।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में निम्नांकित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेः

Correct Answer: (b) (A) और (R) दोनों सही हैं परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
Solution:

अन्तः प्रज्ञावाद एक वस्तुनिष्ठ सिद्धान्त माना जाता है। क्लार्क ने इस सम्बन्ध में चार नैतिक सिद्धान्त दिये जो स्वतः सिद्ध, अपरिवर्तनीय एवं निरपेक्ष है तथा अन्तः प्रज्ञा द्वारा इनका अव्यवहित (Immediate) ज्ञान प्राप्त होता है-
(1) ईश्वर सत् यथार्थ के प्रति निष्ठा (2) समानता (3) परोपकार तथा (4) आत्म रक्षा का सिद्धान्त। यह बौद्धिक अन्तः प्रज्ञावाद है। इसके अतिरिक्त भावनात्मक अंतःप्रज्ञावादी, अंतः प्रज्ञा को हृदय का गुणधर्म मानते हैं, जो भावनाओं पर आधारित होते हैं। स्पष्ट है कि दोनों कथन तो सत्य हैं, परन्तु अभिकथन (A) की तर्क (R) व्याख्या नहीं करता है।