यू.जी.सी. NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2020 जून 2021 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY) (Shift – II)

Total Questions: 100

71. सही विकल्प को चिन्हित करें:

Correct Answer: (b) हेगेल की द्वंदात्मक प्रणली और देकार्त का सिद्धांत सत्तामीमांसीय द्वैतवाद है।
Solution:

(1) हेगेल एक निरपेक्ष प्रत्ययवादी तो है लेकिन डेविड ह्यूम तर्क बुद्धिवादी न होकर अनुभववादी एवं संशयवादी हैं।
(2) हेगेल एक द्वन्दात्मक प्रणाली के समर्थक हैं, वहीं डेकार्त का सिद्धान्त सत्तामीमांसीय द्वैतवाद है।
(3) हेगेल कांट के अज्ञेयवाद और देववाद के घोर विरोधी हैं।
(4) ‘यथार्थ तर्कमूलक है’ (Real is Rational) हेगेल का कथन है परन्तु बर्कले का दर्शन भौतिकवादी न होकर विज्ञानानुभववादी है।

72. "जब कभी हमें किसी वस्तु का ज्ञान होता है तो हमारे मस्तिष्क में उस वस्तु को जानने का प्रत्यय निहित होता है जिसके माध्यम से हम उस वस्तु को जान पाते हैं। 'इस कथन में क्या अन्तर्निहित है?

Correct Answer: (b) अवबोध का प्रतिनिधानात्मक सिद्धांत
Solution:

अवबोध के प्रतिनिधानात्मक सिद्धान्त, को प्रत्यय प्रतिनिधित्ववाद के नाम से भी जाना जाता है। अरस्तू, जॉन लॉक इस सिद्धान्त का समर्थन करते हैं। लॉक के अनुसार बाह्य पदार्थ का प्रत्यक्ष नहीं होता, केवल अनुमान होता है। प्रत्यक्ष केवल गुणों का होता है, द्रव्य का नहीं। यह कथन कि 'जब हमें किसी वस्तु का प्रत्यक्ष होता है, तो वह हमारे मस्तिष्क में प्रत्यय के रूप में होता है। इसी प्रत्यय के माध्यम से हम बाह्य वस्तु को जानते हैं।' लॉक का है।

73. निम्नलिखित में से किसे डेविड ह्यूम द्वारा मान्यता दी गई है?

(A) प्रत्ययों का सम्बन्ध
(B) तथ्यों के विषय
(C) अबोधित उप-स्तर
(D) कार्यकारण-भाव के सिद्धांत का खंडन

Correct Answer: (a) A, B और D
Solution:

डेविड ह्यूम एक संदेहवादी दार्शनिक हैं। ह्यूम के अनुसार संस्कारों और विज्ञानों को छोड़कर और कोई हमारे ज्ञान का विषय नहीं हो सकता है। डेविड ह्यूम ने प्रत्ययों (विज्ञानों) के सम्बन्ध के साथ तथ्यों के विषय की बात कही है। ह्यूम के अनुसार हमारा ज्ञान दो प्रकार से होता है- प्रत्ययों का और तथ्यों के जगत का। डेविड ह्यूम ने कारण कार्य नियम का खण्डन किया है।

74. कान्ट के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों में से जो सही है, उसे चिन्हित करें

(A) ज्ञान परिघटनाओं तक ही सीमित है
(B) प्रत्यय निरपेक्ष-सत ज्ञान से परे है
(C) परिघटना प्रत्यय निरपेक्ष-सत का प्रकटन है
(D) बुद्धिमत्ता की कोटियाँ संख्या में बीस हैं

Correct Answer: (d) A, B और C सही हैं
Solution:

बुद्धिमत्ता की कोटियां संख्या में 12 होती हैं। काण्ट प्रत्यय-निरपेक्ष सत् (परमार्थ) को अनिवर्चनीय और अज्ञेय मानते थे। परिघटना (संवृत्ति-Phenomenon) परमार्थ का प्रकटन है। हमारा ज्ञान इन्हीं परिघटनाओं तक ही सीमित है। वास्तव में परमार्थ का विधिरूप ज्ञान असम्भव है क्योंकि विधिरूप ज्ञान सदा इन्द्रिय सम्वेदन और बुद्धि विकल्प इन दोनों पर निर्भर रहता है।

75. कान्ट के सन्दर्भ में निम्नलिखित कथनों में जो सही है, उसे चिन्हित करें

A. कान्ट ईश्वर के अस्तित्व के लिए दिए जाने वाले पारंपरिक प्रमाणों का खंडन करता है।
B. कान्ट दिक और काल को प्रागनुभविक यथार्थ के रूप में मान्यता देता है।
C. निरपेक्ष आदेश एक नैतिक सूक्ति है।
D. कान्ट की पुस्तक न्याय की समालोचना नैतिक सिद्धांतों पर लिखी गई है

Correct Answer: (d) A और C सही हैं
Solution:

काण्ट ईश्वर के अस्तित्व के लिए दिये गये पारम्परिक प्रमाणों का खण्डन करते हैं। काण्ट के दर्शन में दिक और काल प्रागनुभविक सत् यथार्थ न होकर प्रत्यक्ष के प्रागनुभविक आकार हैं। काण्ट का नैतिक सिद्धान्त 'निरपेक्ष आदेश का सिद्धान्त' कहलाता है। काण्ट की पुस्तक 'न्याय की समालोचना' सौंदर्यशास्त्र पर लिखी गयी है जबकि नैतिक सिद्धान्तों पर लिखी गयी पुस्तक 'व्यावहारिक बुद्धि की समालोचना' है।

76. जैन नीतिशास्त्र के अनुसार जीव निम्नलिखित में से कौन से गुणों से युक्त है?

A. चेतना
B. सुख
C. वीर्य
D. श्रेयस

Correct Answer: (d) केवल A और C
Solution:

जैन दर्शन के अनुसार, चैतन्य जीव का स्वभाव है, जीव कर्ता, भोक्ता तथा ज्ञाता है। जीव अनन्त है, जीव में चार प्रकार की पूर्णताएं - अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त वीर्य एवं अनन्त आनन्द पायी जाती हैं।

77. नीतिशास्त्र के शास्त्रीय (क्लासिकीय) सिद्धांतों में समर्थित कर्म सिद्धांत के बारे में निम्नलिखित कथनों में से कौन सही है।

A. कर्मवाद में अपेक्षा की जाती है। कि व्यक्ति का स्वयं का 'चरित्र' ही उसके स्वयं की 'नियति' हो।
B. नैतिक रूप से साधक के अतीत कर्म ही उसके उसकी वर्तमान की खुशियों और दुखों के लिए उत्तरदायी होते हैं।
C. किसी व्यक्ति का वर्तमान उसके उसकी अतीत द्वारा निर्धारित होता है।
D. मानव स्वतंत्र साधक है।
E. किसी व्यक्ति का भविष्य, वर्तमान द्वारा निर्धारित नहीं होता है।

Correct Answer: (b) केवल A, B, C और D
Solution:

भारतीय नीतिशास्त्र में कर्मवाद का सिद्धान्त मानव के पूर्वजन्म, वर्तमान जीवन, और भविष्य जीवन से सम्बन्धित है। कर्मवाद के सिद्धान्त में प्राणी मात्र द्वारा किये गये कर्म, कर्म बन्धन और कर्मफल के बारे में विस्तृत विवेचन प्राप्त होता है।

78. नीचे दो कथन दिए हैं :

कथन I : ईश्वरवादी व्यवस्था में केवल कर्म संकल्पना को मानकर ही हम वैयक्तिक प्रसन्नता और अप्रसन्नता के अशुभ एवं असमताओं की समस्या का समाधान कर सकते हैं।
कथन - II: गैर ईश्वरवादी व्यवस्था जैसे बौद्ध धर्म में, कर्म को एक व्यक्ति की संभाव्यताओं और दूसरे के बीच की समान असमताओं की व्याख्या के क्रम में ग्रहण किया गया है।
उपर्युक्त कथनों के आलोक में निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर चुनेंः

Correct Answer: (a) कथन I और II दोनों सही हैं।
Solution:

ईश्वरवादी व्यवस्था में कर्म संकल्पना का महत्व है। और प्रारब्ध को सुधारकर भविष्य जीवन में प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं वहीं गैर ईश्वरीय व्यवस्था में कर्म एक संभाव्यता के रूप में ग्रहीत है।

79. "मन यद्यपि अनगिनत छापों द्वारा विविधिकृत, कोई अन्य वस्तु अर्थात आत्मा को अनुभव और मुक्ति प्रदान करने के क्रम में वहाँ है, यह इसके सम्मिश्र प्रकृति से इसका अनुसरण करती है" यह कथन भारतीय शास्त्रीय दर्शन की निम्नलिखित की किस शाखा से सम्बन्धित है?

Correct Answer: (d) सांख्य
Solution:

सांख्य दर्शन में मन को एक आभ्यान्तरिक इन्द्रिय माना गया है। इसके अतिरिक्त पुरुष या आत्मा की सत्ता स्वयं सिद्ध मानी जाती है।

80. सांख्य दर्शन के अनुसार निम्नलिखित में कौन सही है।

Correct Answer: (a) अत्मा चेतन है और पूर्णतया असक्रिय है।
Solution:

सांख्य दर्शन में दो तरह की सत्ताओं की बात हुई है- पुरुष एवं प्रकृति। जहां प्रकृति त्रिगुणात्मिका है और सक्रिय है, वहीं पुरुष चेतन एवं निष्क्रिय है। पुरुष त्रिगुणों से रहित है तो प्रकृति अचेतन है। पुरुष नानाविधि बहुत्व में हैं वही प्रकृति एक है। पुरुष को ही सांख्य दर्शन में आत्मा कहा जाता है।