यू.जी.सी. NTA नेट /जेआरएफ परीक्षा, जून 2020 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY)

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उत्तर दीजिए ?

यद्यपि भिन्न-भिन्न लोग मेज को थोड़ा-थोड़ा भिन्न प्रकार से देखते हैं तथापि वे भी जब मेंज की तरफ देखते हैं तो न्यूनाधिक रूप में एक जैसी वस्तु देखते हैं और उनके देखने में होने वाली भिन्नताओं को प्रकाश के परिप्रेक्ष्य और परावर्तन के नियमों के द्वारा समझाया जा सकता है ताकि विभिन्न लोगों के इन्द्रिय प्रदत्त कथनों में निहित स्थायी वस्तु तक पहुँचा जा सके।
अतः यह सच है की विभिन्न तरंगों के विभिन्न इन्द्रिय प्रदत्त होते है तथा यह भी सच है की विभिन्न समय में दिए गए किसी एक स्थान पर एक व्यक्ति का एक ही इन्द्रिय प्रदत्त होता है जिससे हम यह जान लेते हैं की उपर्युक्त इन्द्रिय प्रदत्त कथनों के अतिरिक्त एक स्थाई सार्वजनिक वस्तु है जिसे विभिन्न समय में विभिन्न लोगो के इन्द्रिय दत्त कथनों द्वारा देखा जाना माना जाता है।
अब जहाँ एक उपर्युक्त विचार यह माने जाने पर निर्भर करते हैं की हमारे अतिरिक्त अन्य लोग हैं जो इस प्रश्न को उठाएंगे। अन्य लोग अपनी बातें कतिपय इन्द्रिय प्रदत्त कथनों यथा उनकी दृष्टि अथवा उनकी आवाज के द्वारा बताएंगे, यदि मुझे यह विश्वास करने का कारण नहीं है की मेरे इन्द्रिय प्रदत्त से स्वतंत्र भी भौतिक वस्तुए हैं। यह विश्वास करने का कारण भी नही की अन्य लोग मेरे सपने के भाग के अतिरिक्त भी अस्तित्ववान है।
इस प्रकार जब हम यह बताने का प्रयास करते हैं कि हमारे इन्द्रिय प्रदत्त कथन से स्वतंत्र भी वस्तुएं अवश्य होंगी तो हम अन्य व्यक्तियों के साक्ष्य को उद्धृत नहीं कर सकते हैं क्योंकि साक्ष्य में ही इन्द्रिय दत्त कथन हैं।
उपर्युक्त गद्यांश में दूसरे पैरा में किसे उद्धृत किया गया है?

Correct Answer: (a) प्रत्ययवाद
Solution:

प्रश्नगत गद्यांश के दूसरे पैरा में उद्धृत है की "जब हम यह बताने का प्रयास करते हैं की हमारे इन्द्रिय प्रदत्त कथन से स्वतंत्र भी वस्तुएं है तो हम अन्य व्यक्तियों के साक्ष्य को उद्धृत नही कर सकते क्योंकि साक्ष्य में ही इन्द्रियदत्त कथन है।” यह उद्धरण वस्तुतः प्रत्ययवाद की ओर संकेत है।

92. उपर्युक्त गद्यांश के पहले पैरा में निम्नलिखित में से किसके विषय पक्ष प्रस्तुत किया गया है?

Correct Answer: (b) वस्तुवाद
Solution:

पैरा के अनुसार "यह सच है की विभिन्न समय में दिए गए किसी एक स्थान पर ही व्यक्ति का एक ही इन्द्रिय प्रदत्त होता है, जिससे हम यह जान सकते हैं की उपर्युक्त इन्द्रिय प्रदत्त कथनों के अतिरिक्त एक स्थाई सार्वजनिक वस्तु है, जिसे विभिन्न समय में विभिन्न लोगों के इन्द्रिय दत्त कथनों द्वारा देखा जाना जा सकता है।" यह वस्तुतः वस्तुवाद की व्याख्या है।

93. दिए गए गद्यांश में वाह्या जगत का अस्तित्व प्रभावित करने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा/ से कारण बताया बताए/ गए हैं है?

A. अन्य लोगों का साक्ष्य
B. सादृश स्थितियों में इन्द्रिय प्रदत्त में सदृशता
C. हमारे इन्द्रिय प्रदत्त में भिन्नता को प्रकाश परिप्रेक्ष्य और परावर्तन के नियमों से समझाया जा सकता है।
D. इन्द्रिय गत अनुभूति की दोषक्षमता
निम्नलिखित में सही विकल्प का चयन कीजिए?

Correct Answer: (b) केवल A, B और C
Solution:

वाह्य जगत का अस्तित्व निम्न कारणों से प्रभावित होता
(i) अन्य लोगो का साक्ष्य ।
(ii) सादृश्य स्थितियो में इन्द्रिय प्रदत्त में सदृशता।
(iii) हमारे इन्द्रिय प्रदत्त में भिन्नता जो प्रकाश परिप्रेक्ष्य और परावर्तन के नियमों से समझी जा सकती है।

94. उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार 'मेरा यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है की मेरे इन्द्रिय प्रदत्त कथनो से स्वतंत्र भी भौतिक वस्तुएं हैं। मेरा यह विश्वास करने का भी कारण नहीं है की अन्य लोग मेरे सपने के भाग के अतिरिक्त भी अस्तित्ववान हैं क्योंकि-

A. मुझे यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है की अन्य लोग मिथ्या बोल रहे हो।
B. अन्य व्यक्तियों का अस्तित्व भी इन्द्रिय प्रदत्त कथनों में सिमट सकता है।
C. जो वस्तु हम सपने में देखते हैं वो वास्तविक जगत में नहीं है।
D. मैं केवल अपनी अनुभूति के बारे में आश्वस्त हो सकता हूं।
निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए?

Correct Answer: (b) केवल B
Solution:

मेरा यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं है की मेरे इन्द्रिय पदत्त कथनों से स्वतंत्र भी भौतिक वस्तुएँ है। मेरा यह विश्वास करने का भी कारण नही है की अन्य लोग मेरे सपने के भाग के अतिरिक्त भी अस्तित्ववान है क्योंकि अन्य व्यक्तियों का अस्तित्व भी इन्द्रिय प्रदत्त कथनो में सिमट सकता है।

95. जगत में हमारे अतिरिक्त अन्य लोग हैं, इस स्थिति की विरोधी दार्शनिक स्थिति है:-

Correct Answer: (a) अहंमात्रवाद
Solution:

जगत में हमारे अतिरिक्त अन्य लोग भी है इस स्थिति की विरोधी दार्शनिक स्थिति है अहंमात्रवाद।

96. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िए और उत्तर दीजिए ?

यदि आप सोचते हैं की सत्य ज्ञान की अमुक वस्तुएं, प्रसरण द्वारा स्थापित होती हैं, तो हमारा प्रश्न है कि वे प्रमाण कैसे स्थापित होते हैं? यदि आप समझते हैं की प्रमेय को प्रमाण द्वारा स्थापित किया जाता है, तथा वे प्रमाण अन्य प्रमाण द्वारा स्थापित होते हैं, तो यदि आप समझते हैं की प्रमाण के बिना प्रमाण स्थापित किए जाते हैं तो आप की दार्शनिक स्थिति अनुपयोगी है। यह विचार की प्रमाण, अन्य वस्तुओं के साथ-साथ स्वयं को भी स्थापित करते हैं को स्वतः प्रमाण्यवाद करते हैं, जिसके प्रवक्ता प्रभाकर एवं शंकर रहे है।
अब यदि आप यह सोच रहे हैं की प्रमाण के स्थापित होने से प्रमेय स्थापित होते हैं और प्रमेय के स्थापित होने से प्रमाण स्थापित होते है तो उनमें अन्योन्याश्रय दोष होगा।
निम्नलिखित में कौन-सा भारतीय दर्शन यह विश्वास करता है की "प्रमाण स्वयं को स्थापित करता है।"
A. न्याय
B. बौद्ध
C. प्रभाकर
D. शंकर का अद्वैत
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए-

Correct Answer: (c) केवल C और D
Solution:

पूर्वमीमांसकों में प्रभाकर का महत्वपूर्ण स्थान है। ये स्वतः प्रमाण्यवाद को मानते है। प्रभाकर के अनुसार 'स्वतः' का अर्थ है 'ज्ञान जनक सामग्री'। जो दोषरहित कारण सामग्री ज्ञान को उत्पन्न करती है, वही सामग्री उस ज्ञान के प्रमाण्य को भी साथ ही उत्पन्न करती है। स्वतः प्रमाण्यवाद पर इसी तरह का मत शंकर का भी है। प्रभाकर और शंकर के अनुसार "प्रमाण अन्य वस्तुओं के साथ-साथ स्वयं को भी स्थापित करते हैं, को स्वतः प्रमाण्यवाद कहते हैं।

97. यदि हम विश्वास करें की प्रमाण के द्वारा प्रमेय स्थापित होते है और प्रमेय स्थापित होने से प्रमाण भी स्थापित हो जाते हैं, इनमे से कौन सा दोष होगा?

Correct Answer: (c) अन्योन्याश्रयदोष
Solution:

"अगर यह माना जाए की प्रमाण के द्वारा प्रमेय स्थापित होते है" और प्रमेय के द्वारा प्रमाण की स्थापना होती है तो इसमें जो दोष उत्पन्न होगा उसे अन्योन्याश्रय दोष कहते है।

98. दिए गए गद्यांश में किस प्रकार का तर्क है?

Correct Answer: (a) उभयतः पाश
Solution:

दो या दो से अधिक वस्तुओं में से एक का चयन करने की कठिन स्थिति को दुविधा या उभयतःपाश कहते है। प्रस्तुत गद्यांश में प्रमेय और प्रमाण के बीच असमंजस की स्थिति होने से उभयतः पाश तर्क है।

99. यदि हम यह विश्वास करते है की, प्रमाण स्वयं किसी प्रमाण से स्थापित नहीं होता है तो किस दार्शनिक स्थिति को छोड़ा जाता है?

Correct Answer: (a) प्रमेय की स्थापना प्रमाण द्वारा होती है।
Solution:

यदि यह समझा जाता है की प्रमेय को प्रमाण द्वारा स्थापित किया जाता है, तथा वे प्रमाण अन्य प्रमाण द्वारा स्थापित होते हैं, तो यदि यह समझा जाता है कि प्रमाण के बिना प्रमाण स्थापित किए जाते हैं तो यह अनुपयोगी दार्शनिक स्थिति होती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि "यह विश्वास की प्रमाण स्वयं किसी प्रमाण से स्थापित नहीं होता है तो जिस दार्शनिक स्थिति को छोड़ा जाता है वह है "प्रमेय की स्थापना प्रमाण द्वारा होती है।"

100. यह कथन की 'प्रमाण अन्य वस्तुओं के साथ-साथ स्वयं को भी स्थापित करते हैं, जिस सिद्धांत को निरूपित करता है?

Correct Answer: (b) स्वतः प्रमाण्यवाद
Solution:

जब प्रमाण अन्य वस्तुओं के साथ-साथ स्वयं को भी प्रमाणित करते है तो यह सिद्धांत स्वतः प्रमाण्यवाद कहलाता है। प्रभाकर और कुमारिल जैसे मीमांसक स्वतः प्रमाण्यवादी है।