यू.जी.सी. NTA नेट /जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY)

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित परिच्छेद को सावधानीपूर्वक पढ़िए और प्रश्नों पर आधारित के उत्तर दीजिए?

'विश्लेषण' शब्द प्राचीन यूनानी पद 'स्नालुसिस' से प्राप्त किया गया है। उत्सर्ग 'एना' का तात्पर्य 'ऊपर' और लुसिस का तात्पर्य गंवाना, नियुक्ति करना या पृथक्कीकरण है जिसमें 'एनालुसिस' का तात्पर्य ढीला होना' था 'विलीनीकरण' है। यह पद तत्परता से समस्या के समाधान या विलीन करने तक विस्तारित किया गया और इस अर्थ में इसको प्राचीन यूनानी ज्यमिति और दर्शनशास्त्र में प्रयुक्त किया गया। प्राचीन यूनानी ज्यमिति में विकसित की गई विश्लेषण विधि का प्लेटो और अरस्तु दोनों पर प्रभाव पड़ा।
लेकिन, सुकरात के परिभाषा के साथ सरोकार का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है जिसमें आधुनिक अवधारणात्मक विश्लेषण की जड़े पाई जा सकती है। हमारे पास जो यूनानी विचारधारा है, वह अब कार्यविधियों का एक जटिल जाल है, जिसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुकरात की परिभाषा है, जिसकी प्लेटो ने अपनी विभाजन विधि और उनसे सम्बन्धित परिकल्पना विधि में व्याख्या की, जो ज्यमितीय विश्लेषण और अरस्तु द्वारा विकसित एनालिटिक्स पर आधारित है।
पिहली दो सहशब्दियो से भी अधिक समय से इस बोर में सहमति न होने से आज इन कार्यविधियों के बीच सम्बन्ध बढ़ते विवाद का विषय बन गए है।
इन सभी के केन्द्र में मेनो के अन्तविरोध द्वारा उठाई गई दार्शनिक समस्याएँ है, जिसको हम अब विश्लेषण के अन्तविरोध के रूप में जनित है, जो इस बात से सम्बन्धित है, कि किस प्रकार कोई विश्लेषण सही और सूचनात्मक दोनों हो सकता है तथा (प्लेटो के) अनुस्मरण सिद्धान्त के माध्यम से समाधान के प्रयास ने स्वयं इन सिद्धान्त के विषय में वृहत साहित्य को जन्म दिया है।
प्लेटो ने सुकरात की परिभाषा को किसमें विस्तारित किया।

Correct Answer: (c) विभाजन विधि
Solution:

(c)

92. प्लेटो की परिकल्पना विधि किस पर आधारित है:

Correct Answer: (c) ज्यामितीय विश्लेषण
Solution:

(c)

93. सुकरात के परिभाषा के साथ सरोकार ने किसका मार्ग प्रशस्त किया?

Correct Answer: (d) अवधारणात्मक विश्लेषण
Solution:

(d)

94. यूनानी विचारधारा में क्या सम्मिलित है:-

Correct Answer: (b) विधियों का जटिल जाल (नेटवर्क)
Solution:

(b)

95. विश्लेषण का विरोधाभास किससे सम्बन्धित है?

Correct Answer: (b) कोई भी विश्लेषण कैसे सूचनात्मक हो सकता है।
Solution:

(b)

96. निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़कर, नीचे दिए प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

नागार्जुन ने ज्ञानमीमांसा में जिस एक दार्शनिक समस्या को उठाता है, उसका सम्बन्ध तथाकथित प्रतिगमित औचित्य स्थापन से माना है, इस अवधारणा के कारण विज्ञान के अंशमात्र को भी जानने और पहचानने के लिए प्रमाण की जरूरत है। इसके लिए उस स्रोत को जानना आवश्यक है जिसमें वह अन्तनिर्हित है। नागार्जुन का मानना है कि यह वह विसंगत है, क्योंकि इसके लिए प्रमाणों की अनन्त शृंखलाका उस प्रमाण के लिए अंछित होगी जिसे मान लिया गया है।
मीमांसा और वेदान्त दार्शनिक यह तर्क देते है, कि प्रतिगमन की ऐसी धमकी यह दर्शाती है, कि ज्ञान 'स्वतः प्रमाण्य' अपने में प्रमाणित होता है। वेदान्ती ओपनिपिदक उपदेशों के सर्वाधिक और गहन सत्य (आत्मा) से इसे जोड़ते है क्योंकि यह 'आत्मप्रकाशक चेतना' (स्वप्रकाश) है जबकि मीमांसा के ज्ञानपरक सिद्धान्त स्व-प्रमाण्य से जोड़ते है।
कम से कम आध्यात्मिक ज्ञान (विधा) में चेतना, स्वचेतना है। इससे यह निष्कर्ष निकालता है कि बोध सम्बन्धी सभी प्रश्नों के लिए बोध सही है, क्योंकि केवल यह कह सकते है कि बोध की ही अपने तक पहुँच होती है। बोध विषयक एकमात्र संगत प्रश्न के लिए एकमात्र बोध के किसी भी प्रश्न के लिए एकमात्र संगत आवश्यकता उसके आस्तित्व, प्रकृति और अपने बोध की है।
ज्ञान की स्वतः प्रमाण्यता से क्या सिद्ध होता है? 

Correct Answer: (c) संज्ञान बोध के साथ इसके होने से ही आता है।
Solution:

(c)

97. भारतीय दर्शन में असीम प्रतिगमन का समकक्ष क्या है?

Correct Answer: (b) अनावस्था दोष
Solution:

(b)

98. निम्न गद्याश से तार्किक रूप से क्या अर्थ नही लगाया जा सकता है?

Correct Answer: (b) वस्तुएं अस्तित्वहीन है।
Solution:

(b)

99. ऊपर दिया गद्यांश एक अच्छा तर्क किसके विरुद्ध माना जाता है?

(A) संज्ञान की सम्भावना
(B) संज्ञान के औचित्य स्थापन की सम्भावना
(C) ज्ञान की प्रकाशक प्रकृति
(D) ज्ञान की सम्पूर्ण आधार की सम्भावना
कूटः

Correct Answer: (c) B, D
Solution:

(c)

100. मीमांसको के अनुसार परत; प्रमाण्यवाद में कौन-सा दोष उत्पन्न होता है?

Correct Answer: (a) अनावस्था
Solution:

(a)