1960 के दशक से, लैटिन अनुभव से निर्भरता के सिद्धांत को सामान्यीकृत करके इसे शेष विश्व पर लागू किया गया। वालरस्टेन (1974, 1980, 1989) ने एक विश्व आर्थिक व्यवस्था के अपने सिद्धांत को प्रतिपादित किया जो संकेन्द्रित वलयों-पश्चिम के केंद्रीय देशों, एक अर्ध-परिधि और परिधि इतिहास द्वारा संभव बनाये गये विभेदीकरण को शामिल करता है।
केंद्र में स्थित देश सर्वप्रथम औद्योगीकृत हुए और शेष विश्व पर एक निर्णायक बढ़त प्राप्त किया। परिधीय राज्य वे हैं जो केन्द्रीय देशों की आवश्यकताओं को संतुष्ट करते हैं और जिन्हें जानबूझकर उच्च औद्योगिक कुशलताओं का विकास करने से रोका जाता है।
'अर्ध-परिधि' राज्य मध्य श्रेणी में आते हैं जो किसी भी दिशा में जा सकते हैं और इनमें वे केन्द्रीय राज्य भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी केंद्रीय राज्य की स्थिति खो दी हो। संपूर्ण व्यवस्था श्रम के एक अंतर्राष्ट्रीय विभाजन को प्रतिबिम्बित करती है। इस व्यवस्था की मुख्य प्रवृत्ति अतिरिक्त मूल्यों का परिधि क्षेत्र से केंद्रीय राज्यों की ओर हस्तांतरण करना है।
पी.पी.रे (1971, 1973), एक फ्रांसीसी समाजशास्त्री ने उत्पादन के साधनों का अभिव्यक्तिरण की एक परिशुद्ध अवधारणा को आगे बढ़ाते हुये इसे द्वैतवाद के विचार से जोड़ा। उन्होंने तर्क किया कि विश्व के कुछ निश्चित क्षेत्रों में अल्पविकास वहाँ के देशज समाज की प्रवृत्ति के कारण अत्यधिक था। पश्चिम में, सामंती उच्च वर्ग के अभिवृत्ति के कारण सामंतवाद ने पूंजीवाद को जन्म दिया।
शेष विश्व में, जिसने यूरोपीय सामनवाद का अनुभव नहीं किया था, व्यापार और निवेश के माध्यम से एक समाज का विश्व अर्थव्यवस्था के रूप में एकीकरण का परिणाम मौजूदा शासित वर्गों को मजबूत करने, पूँजीवाद के विस्तार के उनके प्रतिरोध के बल देने के रूप में हुआ। कैंपारासों और बहरूर (1981) ने कहा है: निर्भरता संरचनात्मक स्थिति से संबंधित है जिसमें, केवल एक बाह्य सहायता पर एक अनन्य (अथवा सीमित) विश्वास के बिना एक स्वस्थ एकीकृत व्यवस्था अपने आर्थिक चक्र को पूरा नहीं कर सकती।
एक एकीकृत व्यवस्था के रूप में निर्भरता के लिये, इनमें से कौन जरूरी है?