1990 के दशक के दौरान भारतीय राज्य का अपने प्रवासी जनसमूह के साथ संबंध का प्रश्न जिसके विषय में पहले मान लिया गया था कि इसका कमोवेश हल हो चुका है- एक बार पुनः नीति-सम्बन्धी बहस में आगे बढ़कर आया। प्रवासी समुदायों में, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका में, होने वाले घटनाक्रम में इस प्रक्रिया को सुगम कर दिया। इन घटनाओं में प्रमुख थे|
1989 में 'ग्लोबल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ पीपल ऑफ इंडियन ओरिजिन' (GOPIO) का बनाया जाना और 1993 में अमेरिकी कांग्रेस के अंदर 'इंडिया कॉकस' की स्थापना। जबकि पहले संगठन ने विभिन्न समुदायों के हितों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया, दूसरे संगठन ने इसकी संभावना जतायी कि भारतीय प्रवासी समूह का कम से कम एक वर्ग ऐसा हो सकता है जो अपने नये अपनाये गये देश में सचेतन राजनीतिक अभिकर्ता हो।
उदाहरण के लिए GOPIO के सदस्यों ने 1990 के दशक के मध्य में भारत सरकार के साथ हुई अपनी बैठकों में 'पर्सन ऑफ इंडियन ऑरिजिन' (PIO) कार्ड का विचार, प्रस्तावित कर प्रवासी समूह के विशेष स्थान को संस्थागत मान्यता देने के प्रश्न को जीवित रखा। संयुक्त राज्य अमेरिका के अंदर भारतीय मूल के राजनीतिक रूप से सक्रिय लॉबीकर्ता भारतीय सरकार के वस्तुतः प्रवक्ता बन गये, विशेषकर 1998 के नाभिकीय परीक्षणों के बाद की परिस्थिति में।
संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा परीक्षणों के बाद लगाए गये आर्थिक प्रतिबंधों को कम करने में इन समूहों के समर्थन को, और साथ ही प्रतिबंधों को सह सकने के लिए नाभिकीय परीक्षणों के तुरंत बाद भारत सरकार द्वारा जारी किये गये 'रिसर्जेट इंडिया' बांडों के प्रति दिखाये गये उनके उत्साह को, इसका महत्त्वपूर्ण द्योतक माना गया कि प्रवासी समूह स्वदेश के लिए सतत प्रतिबद्ध है। यह ऐसी प्रतिबद्धता थी जिसे भारतीय सरकार के अनुसार नये सहस्राब्दी में औपचारिक रूप से मान्यता प्रदान किया जाना आवश्यक था।
भारत सरकार द्वारा 'PIO कार्ड' जारी किये जाने का विचार किस संगठन ने दिया?