राजकोषीय नीति एवं राजस्व (अर्थव्यवस्था)

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21. भारत सरकार ने FRBM (राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन) अधिनियम किस वर्ष लागू किया ? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) 2004-05
Solution:
  • 5 जुलाई, 2004 को FRBM (राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन) अधिनियम भारत सरकार द्वारा लागू किया गया।
  • अतः निकटतम उत्तर के रूप में विकल्प (d) का चयन किया जा सकता है।
  • पृष्ठभूमि
    • FRBM अधिनियम की अवधारणा 1990 और 2000 के दशक में भारत की बढ़ती राजकोषीय समस्याओं से उत्पन्न हुई
    • जब उच्च राजकोषीय घाटा, राजस्व घाटा और ऋण-जीडीपी अनुपात चिंता का विषय बन गया था।
    • इसे 2000 में पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा द्वारा संसद में विधेयक के रूप में पेश किया गया था
    • जो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के तहत वित्तीय अनुशासन को कानूनी रूप देने का प्रयास था।
    • 2003 में अधिनियम पारित होने के बाद, इसे 2004 में प्रभावी बनाया गया ताकि सरकार के व्यय में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
  • मुख्य उद्देश्य
    • अधिनियम का प्राथमिक लक्ष्य राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3% तक सीमित करना और राजस्व घाटे को पूरी तरह समाप्त करना था
    • जिसकी समयसीमा मार्च 2008 निर्धारित की गई।
    • यह वित्तीय प्रबंधन को मजबूत करने, सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग और मौद्रिक नीति पर राजकोषीय बाधाओं को हटाने के लिए बनाया गया।
    • इसके अलावा, यह अंतर-पीढ़ीगत इक्विटी सुनिश्चित करता है, अर्थात वर्तमान व्यय भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ न डाले।
  • प्रमुख प्रावधान
    • बजट दस्तावेज: प्रत्येक बजट के साथ तीन महत्वपूर्ण बयान प्रस्तुत करने अनिवार्य किए गए
    • मैक्रोइकॉनॉमिक फ्रेमवर्क स्टेटमेंट, मीडियम-टर्म फिस्कल पॉलिसी स्टेटमेंट और फिस्कल पॉलिसी स्ट्रैटेजी स्टेटमेंट।​
    • उधार प्रतिबंध: आरबीआई से प्रत्यक्ष उधार पर रोक (1 अप्रैल 2006 से) और कुल देनदारियों को जीडीपी के 9% से नीचे रखना।​
    • लक्ष्य: राजकोषीय घाटा 2008-09 तक 3% और राजस्व घाटा शून्य।
    • हालांकि, ये लक्ष्य पूरी तरह प्राप्त नहीं हुए, जिसके कारण बाद में संशोधन आवश्यक हुए।​
  • संशोधन और विकास
    • 2012 और 2015 में अधिनियम में बदलाव किए गए ताकि लक्ष्यों में लचीलापन आए।
    • 2018 के संशोधन ने राजस्व घाटे को प्रभावी राजस्व घाटे से बदल दिया और मध्यम-अवधि का राजकोषीय ढांचा जोड़ा।
    • हाल के वर्षों में, जैसे 2023-24 में CAG ने इसकी समीक्षा की, जिसमें पारदर्शिता संबंधी मुद्दे उजागर हुए।
  • महत्व और प्रभाव
    • FRBM ने भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान की, लेकिन कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान लक्ष्यों में छूट दी गई।
    • यह अधिनियम जसवंत सिंह जैसे वित्त मंत्रियों के नेतृत्व में लागू हुआ और वर्तमान में भी बजट प्रक्रिया का आधार बना हुआ है।
    • कुल मिलाकर, यह वित्तीय अनुशासन का प्रतीक है, हालांकि पूर्ण सफलता के लिए निरंतर सुधार जरूरी हैं।

22. मध्यकाल में 'भोग' शब्द का अर्थ क्या था? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) राजस्व कार्य
Solution:
  • मध्यकाल में 'भोग' शब्द राज्य द्वारा अपने पदाधिकारियों को दिए गए राजस्व कार्य को संदर्भित करता है।
  • ये राजस्व कार्य आमतौर पर भूमि या अन्य संसाधनों के रूप में होते थे, जिनका उपयोग कृषि या अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा सकता था।
  • प्राथमिक अर्थ
    • मध्ययुगीन भारत (लगभग 8वीं से 18वीं शताब्दी तक
    • विशेषकर दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में) में 'भोग' शब्द का उपयोग सामंती व्यवस्था के तहत राजस्व संग्रहण के अधिकार को देने के लिए किया जाता था।
    • राज्य अपने अधिकारियों, सैनिकों या अन्य लाभार्थियों को सेवा के बदले भूमि या उसके राजस्व का 'भोग' प्रदान करता, जिससे वे कर वसूल कर अपनी आय प्राप्त करते।
    • ये असाइनमेंट अस्थायी या वंशानुगत हो सकते थे, लेकिन हमेशा राज्य की संप्रभुता के अधीन रहते।
  • अन्य संदर्भ
    • उत्तर भारत की प्राचीन कृषि व्यवस्था में 'भोग' ग्रामीणों द्वारा राजा को फल-फूल, जलाऊ लकड़ी आदि के रूप में दिए जाने वाले उपहार या कर को भी दर्शाता था
    • जो राजा के 'उपभोग' के लिए होता। कुछ ग्रंथों में यह मंदिरों को दान या भेंट के रूप में भी उल्लिखित है
    • लेकिन मुख्य ऐतिहासिक प्रयोग राजस्व से जुड़ा रहा।
    • धार्मिक या सांस्कृतिक रूप से 'भोग' देवताओं को अर्पित भोजन को कहते, पर मध्यकालीन प्रशासनिक संदर्भ में यह भिन्न था।
  • ऐतिहासिक महत्व
    • यह प्रथा सामंती ढांचे को मजबूत करती थी, जहां 'भोग' प्राप्तकर्ता कर वसूली के माध्यम से स्वावलंबी बनते, लेकिन राज्य को निष्ठा बनाए रखनी पड़ती।
    • उदाहरणस्वरूप, सल्तनत काल में 'इक्ता' जैसी व्यवस्था इससे मिलती-जुलती थी।
    • सामान्य हिंदी अर्थों जैसे सुख-भोग या नैवेद्य से अलग, मध्यकाल में यह आर्थिक-प्रशासनिक शब्द था।

23. निम्नलिखित मदों में से कौन-सा सरकारी बजट के गैर-योजनागत राजस्व व्यय का हिस्सा नहीं है? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के लिए केंद्रीय सहायता
Solution:
  • राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के लिए केंद्रीय सहायता सरकारी बजट के योजनागत राजस्व व्यय का हिस्सा है
  • जबकि रक्षा सेवाएं, सब्सिडी, वेतन और पेंशन गैर-योजनागत राजस्व व्यय के भाग हैं।
  • राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को केंद्रीय सहायता गैर-योजनागत राजस्व व्यय का हिस्सा नहीं है।
  • गैर-योजनागत राजस्व व्यय क्या है?
    • गैर-योजनागत राजस्व व्यय सरकार के दैनिक संचालन और नियमित खर्चों को कवर करता है
    • जिसमें कोई संपत्ति सृजन या निवेश नहीं होता।
    • इसमें ब्याज भुगतान, सब्सिडी (जैसे उर्वरक और खाद्यान्न), सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्ते, पेंशन, रक्षा सेवाएं (राजस्व भाग), पुलिस और अन्य प्रशासनिक सेवाएं शामिल हैं।
    • यह व्यय अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता नहीं बढ़ाता, बल्कि मौजूदा सेवाओं को बनाए रखता है।
  • योजना व्यय की परिभाषा
    • योजना व्यय विकास योजनाओं और परियोजनाओं पर केंद्रित होता है, जो अर्थव्यवस्था की उत्पादकता बढ़ाने का लक्ष्य रखता है।
    • इसमें बुनियादी ढांचा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई जैसी योजनाएं, और राज्यों को केंद्रीय सहायता शामिल है।
    • केंद्रीय सहायता योजना व्यय का हिस्सा है क्योंकि यह विकास कार्यक्रमों को फंड करती है, न कि नियमित खर्च।
  • विस्तृत व्याख्या
    • भारतीय बजट में व्यय को राजस्व/पूंजीगत और योजनागत/गैर-योजनागत में वर्गीकृत किया जाता था
    • (हालांकि 2017 के बाद यह वर्गीकरण समाप्त हो गया, लेकिन प्रश्न पारंपरिक संदर्भ पर आधारित है
    • गैर-योजनागत राजस्व व्यय कुल बजट का बड़ा हिस्सा होता है, जैसे 2025-26 बजट में ब्याज भुगतान अकेले 30% से अधिक।
    • केंद्रीय सहायता योजना के तहत आती है क्योंकि यह वित्त आयोग सिफारिशों या योजनाओं (जैसे समग्र शिक्षा) के लिए दी जाती है।
    • अन्य विकल्प नियमित होते हैं, लेकिन यह विकासोन्मुख है।

24. निम्नलिखित में से कौन-सा केंद्र सरकार के लिए एक पूंजीगत व्यय नहीं है? [CHSL (T-I) 9 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) वेतन और वृद्धावस्था पेंशन
Solution:
  • स्थायी परिसंपत्तियों में सुधार, सड़कों और पुलों का निर्माण, राज्य सरकार को ऋण केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय के भाग हैं
  • जबकि वेतन और वृद्धावस्था पेंशन सरकारी बजट के राजस्व व्यय के भाग हैं।
  • पूंजीगत व्यय की परिभाषा
    • पूंजीगत व्यय सरकार द्वारा ऐसी संपत्तियों पर किया जाता है जो लंबे समय (एक वर्ष से अधिक) तक उपयोगी रहती हैं
    • भविष्य में आय उत्पन्न करने की क्षमता रखती हैं।
    • उदाहरणस्वरूप, स्कूल-अस्पतालों का निर्माण, सड़कें-पुल, भूमि अधिग्रहण, ऋण-अग्रिम देना (जो संपत्ति सृजित करते हैं
    • शेयरों में निवेश। ये व्यय भारत के केंद्रीय बजट में अलग से वर्गीकृत होते हैं और GDP वृद्धि को बढ़ावा देते हैं।
    • वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार ने GDP के 3.1% के बराबर ₹11.21 लाख करोड़ का प्रावधान किया।
  • राजस्व व्यय बनाम पूंजीगत व्यय
    • राजस्व व्यय (Revenue Expenditure) दैनिक संचालन के लिए होते हैं, जो संपत्ति सृजित नहीं करते, जैसे सब्सिडी, वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान।
    • ये बार-बार होते रहते हैं और संपत्ति नहीं बनाते।
    • पूंजीगत व्यय में निवेश भविष्य की उत्पादकता बढ़ाता है, जबकि राजस्व व्यय वर्तमान खपत पर केंद्रित होता है।
  • उदाहरण और बजट संदर्भ
    • पूंजीगत व्यय: रेलवे, रक्षा उपकरण, सड़कें (2023-24 में 10 लाख करोड़ से अधिक)।​
    • गैर-पूंजीगत: पेंशन, सब्सिडी (जैसे उर्वरक सब्सिडी)। ये गैर-योजना व्यय में आते हैं।
    • केंद्र सरकार का कैपेक्स निजी क्षेत्र को भी प्रेरित करता है, जिसमें मशीनरी (53.1%) पर अधिक खर्च होता है।​

25. सरकारी बजट के स्थायित्वकारी कार्य में मुख्य रूप से ....... शामिल होता है। [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) मांग को बढ़ाने या घटाने के लिए हस्तक्षेप
Solution:
  • सरकारी बजट के स्थायित्वकारी कार्य में मुख्य रूप से मांग को बढ़ाने या घटाने के लिए हस्तक्षेप शामिल होता है।
  • सरकार को आय तथा रोजगार में उतार-चढ़ाव को भी कम करना होता है। अर्थव्यवस्था में, रोजगार का तथा कीमतों का स्तर कुल मांग पर निर्भर करता है
  • कुल मांग, सरकार के अतिरिक्त निजी क्षेत्र के लाखों-करोड़ों कारकों के व्यक्तिगत निर्णयों पर भी निर्भर करती है।
  • सरकार का हस्तक्षेप, चाहे वह मांग का विस्तार करने के लिए हो अथवा इसे कम करने के लिए, स्थिरीकरण कार्य कहलाता है।
  • स्थायित्वकारी कार्य का अर्थ
    • मंदी या अपस्फीति की स्थिति में सरकार व्यय बढ़ाकर या करों में कटौती करके मांग को प्रोत्साहित करती है
    • जबकि मुद्रास्फीति या तेजी के दौरान व्यय घटाकर या कर बढ़ाकर मांग को नियंत्रित करती है। इससे रोजगार, उत्पादन और कीमतों में अस्थिरता कम होती है।
  • विस्तारवादी और संकुचनकारी नीतियां
    • विस्तारवादी राजकोषीय नीति (expansionary fiscal policy) में घाटे का बजट बनाया जाता है
    • जहां सरकारी खर्च (जैसे बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, सब्सिडी) बढ़ता है और कर कम होते हैं
    • जिससे मांग बढ़ती है। इसके विपरीत, संकुचनकारी नीति (contractionary policy) में अधिशेष बजट के माध्यम से खर्च कटौती और कर वृद्धि की जाती है
    • अतिरिक्त मांग पर अंकुश लगे। भारत जैसे विकासशील देशों में यह कार्य व्यावसायिक चक्र (business cycles) को संतुलित करने में महत्वपूर्ण है।
  • भारतीय संदर्भ में उदाहरण
    • भारत में 2025-26 के बजट में मंदी से निपटने के लिए पूंजीगत व्यय बढ़ाया गया, जो मांग को बढ़ावा देता है।
    • कोविड-19 जैसी महामारी के दौरान आत्मनिर्भर भारत पैकेज इसी स्थायित्वकारी हस्तक्षेप का उदाहरण था
    • जहां व्यय बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को सहारा दिया गया।
    • आनुपातिक कर (progressive taxes) और कल्याण अंतरण (welfare transfers) भी स्थिरता में सहायक होते हैं
    • क्योंकि तेजी में कर संग्रह बढ़ता है और मंदी में सब्सिडी उपभोग बनाए रखती है।​​
  • महत्व और चुनौतियां
    • यह कार्य अर्थव्यवस्था को झटकों से बचाता है, लेकिन अत्यधिक घाटा मुद्रास्फीति या कर्ज बढ़ा सकता है।
    • सरकार को सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना पड़ता है, जैसा कि फ्रिट्जर नियम (Frisch rule) या आधुनिक मौद्रिक नीतियों में देखा जाता है।
    • कुल मिलाकर, स्थायित्वकारी कार्य बजट का सबसे गतिशील हिस्सा है जो समग्र आर्थिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करता है।

26. करेंसी नोटों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

i. इनका नैज मूल्य (Intrinsic value) नहीं होता है।

ii. इन्हें कागजी मुद्रा कहा जा सकता है।

iii. ये वैधानिक पत्र नहीं हैं।

Correct Answer: (d) केवल i और ii
Solution:
  • करेंसी नोट को फिएट (Fiat) मनी कहा जाता है। इनका सोने एवं चांदी के सिक्कों की तरह नैज/आंतरिक मूल्य नहीं होता है।
  • इन्हें कागजी मुद्रा कहा जाता है। ये वैधानिक पत्र हैं, क्योंकि इन्हें देश का कोई भी नागरिक किसी भी प्रकार के लेन-देन के निपटान के लिए अस्वीकार नहीं कर सकता है।
  • करेंसी नोटों की विशेषताएँ
    •  वे केवल इसलिए मूल्यवान हैं क्योंकि सरकार उन्हें कानूनी निविदा (legal tender) का दर्जा देती है और जनता उन्हें स्वीकार करती है।
    • इन्हें 'फिएट मनी' या अधिदिष्ट मुद्रा कहा जाता है
    • क्योंकि इनका मूल्य सोने या चांदी जैसे धातुओं से बंधा नहीं होता, बल्कि सरकारी डिक्री से निर्धारित होता है।
  • सत्य कथनों का विश्लेषण
    • आमतौर पर इस प्रकार के प्रश्नों में निम्नलिखित कथन दिए जाते हैं:
    • कथन i: उनका कोई यथार्थ मूल्य नहीं है। यह सत्य है। नोट कागज के टुकड़े हैं, जिनका स्वाभाविक मूल्य शून्य के करीब होता है।​
    • कथन ii: इन्हें अधिदिष्ट मुद्रा कहा जा सकता है। यह भी सत्य है। 'फिएट मनी' या 'फिएट करेंसी' ही इसका अंग्रेजी समकक्ष है, जो सरकारी आदेश पर टिका होता है।
    • कथन iii: वे वैध मुद्रा नहीं हैं। यह असत्य है। करेंसी नोट पूर्ण वैध मुद्रा हैं
    • जिन्हें ऋण चुकाने, कर भुगतान और सभी लेन-देन के लिए स्वीकार करना अनिवार्य है।​
  • भारतीय संदर्भ में करेंसी नोट
    • भारत में RBI 1934 के RBI अधिनियम के तहत ₹2 से ऊपर के नोट जारी करता है
    • जबकि ₹1 के नोट सरकार द्वारा जारी होते हैं। करेंसी चेस्ट (RBI द्वारा अधिकृत बैंकों की शाखाएँ) नोटों का भंडारण और वितरण करती हैं।
    • जाली नोटों को रोकने के लिए नोटों में सुरक्षा विशेषताएँ जैसे वॉटरमार्क, सिक्योरिटी थ्रेड और इंटीग्लियो प्रिंटिंग होती हैं।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • ब्रिटिश काल में 1861 से नोट जारी होने लगे, लेकिन स्वतंत्र भारत में RBI एकमात्र जारीकर्ता बना।
    • 2016 के नोटबंदी और 2019 के नए नोट श्रृंखला ने डिजाइन में बदलाव लाए। वर्तमान में Mahatma Gandhi (New) Series चल रही है।​
  • आर्थिक महत्व
    • ये नोट ब्लैक मनी और जाली मुद्रा को नियंत्रित करने में सहायक हैं, हालाँकि डिजिटल पेमेंट्स (जैसे UPI) से नकद उपयोग घट रहा है।
    • फिर भी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है।​

27. भारत में कौन-सा मंत्रालय सभी मूल्यवर्ग के सिक्के जारी करता है? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) वित्त मंत्रालय
Solution:
  • भारत में वित्त मंत्रालय सभी मूल्य वर्ग के सिक्के जारी करता है।
  • कानूनी आधार
    • वित्त मंत्रालय को सिक्कों का एकमात्र अधिकार प्राप्त है, जो सिक्का अधिनियम, 1906 (समय-समय पर संशोधित) के तहत निर्धारित है।
    • यह अधिनियम भारत सरकार को सिक्कों की डिजाइनिंग, ढलाई और विनियमन की जिम्मेदारी सौंपता है।
    • विभाग ऑफ इकोनॉमिक अफेयर्स (DEA) सिक्कों के उत्पादन, वितरण और पुराने सिक्कों को प्रचलन से बाहर करने की निगरानी करता है।
  • उत्पादन प्रक्रिया
    • सिक्के सरकारी स्वामित्व वाली सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (SPMCIL) द्वारा बनाए जाते हैं।
    • इसके चार मुख्य टकसाल हैं: मुंबई, कोलकाता (अलीपुर), हैदराबाद (सैफाबाद और चेरलापल्ली), तथा नोएडा। ये सभी मूल्यवर्ग (जैसे 50 पैसे से 20 रुपये तक) के सिक्के ढालते हैं।
  • RBI की भूमिका
    • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) सिक्के सीधे जारी नहीं करता, बल्कि वित्त मंत्रालय की ओर से उनका वितरण करता है।
    • RBI सिक्कों की मात्रा, डिजाइन और नीति पर मंत्रालय को सलाह देता है तथा बैंकों के माध्यम से सिक्कों का प्रबंधन सुनिश्चित करता है।
    • भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 22 RBI को नोट जारी करने का अधिकार देती है (1 रुपये को छोड़कर), लेकिन सिक्के सरकार के क्षेत्राधिकार में हैं।
  • सिक्का नीति निर्माण
    • वित्त मंत्रालय RBI के परामर्श से सिक्का नीति तैयार करता है।
    • इसमें सिक्कों के मूल्यवर्ग, डिजाइन, धातु संरचना और उत्पादन मात्रा का निर्णय शामिल होता है।
    • नीति अर्थव्यवस्था की जरूरतों (जैसे मुद्रास्फीति, प्रचलन मांग) के आधार पर अपडेट होती रहती है। उदाहरणस्वरूप, हाल के वर्षों में छोटे मूल्यवर्गों पर जोर दिया गया है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ
    • स्वतंत्रता के बाद से सिक्के भारत सरकार के नियंत्रण में रहे हैं। 2011 का सिक्का निर्माण अधिनियम ने आधुनिक ढांचा प्रदान किया।
    • SPMCIL ने 2000 के दशक से उच्च गुणवत्ता वाले सिक्के (जैसे बायमेटालिक) पेश किए हैं।
    • वित्त मंत्रालय ही 1 रुपये के नोट भी जारी करता है, जो तकनीकी रूप से सिक्के जैसा ही है।
  • अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
    • सिक्कों पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं।
    • विशेष सिक्के (जैसे स्मारक सिक्के) भी वित्त मंत्रालय की मंजूरी से जारी होते हैं।
    • RBI प्रचलन में सिक्कों की पर्याप्तता सुनिश्चित करने के लिए टकसालों से समन्वय करता है।

28. वित्त विधेयक 2023 के अनुसार नई कर व्यवस्था का चुनाव करने वाले निर्धारितियों के लिए धारा 87A के तहत छूट के लिए पात्र कुल आय की प्रारंभिक सीमा को 5,00,000 रुपये से बढ़ाकर ....... रुपये कर दिया गया है। [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) 7,00,000
Solution:
  • वित्त अधिनियम, 2023 के अनुसार, नई कर व्यवस्था का चुनाव करने वाले निर्धारितियों के लिए धारा 87A के तहत छूट के लिए पात्र कुल आय की प्रारंभिक सीमा को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 7 लाख रुपये कर दिया गया है।
  • धारा 87A का अवलोकन
    • धारा 87A आयकर अधिनियम की एक महत्वपूर्ण प्रावधान है जो कम आय वाले व्यक्तिगत करदाताओं को उनकी कुल कर देयता पर पूर्ण या आंशिक छूट प्रदान करती है।
    • पुरानी व्यवस्था में यह छूट 5 लाख रुपये तक की आय पर 12,500 रुपये तक सीमित थी
    • इससे 7 लाख रुपये तक की कर योग्य आय वाले व्यक्ति अपनी पूरी टैक्स देनदारी को शून्य कर सकते हैं, क्योंकि अधिकतम छूट राशि 25,000 रुपये कर दी गई।
  • बजट 2023 में किए गए बदलाव
    • फरवरी 2023 में पेश किए गए वित्त विधेयक 2023 ने नई कर व्यवस्था को डिफॉल्ट बना दिया और धारा 87A के तहत महत्वपूर्ण संशोधन किए। मुख्य बदलाव इस प्रकार हैं:
    • नई कर व्यवस्था में आय सीमा: 5 लाख से बढ़ाकर 7 लाख रुपये। इससे पहले यह लाभ केवल पुरानी व्यवस्था तक सीमित था।
    • छूट की अधिकतम राशि: नई व्यवस्था में 25,000 रुपये (पुरानी में 12,500 रुपये)।
    • लाभार्थी: केवल निवासी व्यक्तिगत करदाता (HUF, फर्म आदि को नहीं), जिनकी कुल कर योग्य आय (कटौतियों के बाद) निर्दिष्ट सीमा से कम या बराबर हो।
    • उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की कर योग्य आय 6.5 लाख रुपये है और वे नई व्यवस्था चुनते हैं
    • तो 0-3 लाख पर 0%, 3-6 लाख पर 5%, और 6-7 लाख पर 10% स्लैब लागू होते हैं।
    • कुल टैक्स लगभग 20,000 रुपये बनेगा, जो धारा 87A की 25,000 रुपये छूट से पूरी तरह माफ हो जाएगा।
  • पात्रता शर्तें
    • योग्य व्यक्ति: केवल निवासी व्यक्ति (रेजिडेंट इंडिविजुअल)। HUF, AOP, BOI, फर्म या कंपनियां अयोग्य।
    • आय गणना: कुल आय Chapter VIA कटौतियों (80C, 80D आदि) के बाद। नई व्यवस्था में अधिकांश कटौतियां उपलब्ध नहीं।
    • प्रभावी तिथि: FY 2023-24 (AY 2024-25) से लागू।
    • सीमाएं: छूट कुल टैक्स देयता तक सीमित; अधिशेष का कोई कैरी फॉरवर्ड नहीं।
    • यदि आय 7 लाख से थोड़ी अधिक है, तो मार्जिनल रिलीफ उपलब्ध हो सकती है।
  • बाद के बदलाव (बजट 2025 के संदर्भ में)
    • हालांकि प्रश्न वित्त विधेयक 2023 पर केंद्रित है
    • बाद में बजट 2025 ने नई व्यवस्था में धारा 87A छूट को और बढ़ाकर 12 लाख रुपये आय सीमा और 60,000 रुपये छूट कर दिया (FY 2025-26 के लिए)।
    • लेकिन मूल 2023 बदलाव 7 लाख रुपये पर ही आधारित था।
  • लाभ और सलाह
    • यह प्रावधान मध्यम वर्ग को राहत देता है, क्योंकि 7 लाख आय पर टैक्स शून्य हो जाता है।
    • करदाता ITR फाइलिंग के समय व्यवस्था चुन सकते हैं।
    • सलाह: आय विवरण जांचें और कैलकुलेटर का उपयोग करें। अधिक जानकारी के लिए आयकर विभाग की वेबसाइट देखें।

29. बाजार कीमत और कारक लागत पर योग में मूलभूत अंतर क्या है? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) निवल अप्रत्यक्ष कर
Solution:
  • बाजार कीमत और कारक लागत पर योग में मूलभूत अंतर निवल अप्रत्यक्ष कर कहलाता है।
  • निवल अप्रत्यक्ष कर = अप्रत्यक्ष कर - उपदान
  • परिभाषाएं
    • बाजार कीमत वह मूल्य है जिस पर वस्तुएं और सेवाएं वास्तव में बाजार में बिकती हैं, जिसमें उत्पादन कर, बिक्री कर (जैसे GST) और व्यापार मार्जिन शामिल होते हैं।
    • कारक लागत उत्पादन के उत्पादकों (भूमि, श्रम, पूंजी, उद्यमिता) को किए गए भुगतानों का योग है, जो केवल इनपुट लागतों को दर्शाती है बिना किसी कर या सब्सिडी के।
    • उदाहरणस्वरूप, यदि एक कारखाना मार्कर बनाने में श्रमिकों को ₹10, कच्चे माल को ₹5 और मशीनरी किराए को ₹5 देता है, तो कारक लागत ₹20 प्रति मार्कर है।​
  • गणना सूत्र
    • कारक लागत को बाजार कीमत में परिवर्तित करने का सूत्र:
    • बाजार कीमत = कारक लागत + शुद्ध अप्रत्यक्ष कर (अप्रत्यक्ष कर - सब्सिडी)
    • यहां शुद्ध अप्रत्यक्ष कर वह राशि है जो सरकार उत्पादन या बिक्री पर लगाती है (जैसे उत्पाद शुल्क, VAT) घटाकर सब्सिडी (सरकारी अनुदान)।​
    • राष्ट्रीय आय लेखांकन में, जीडीपी बाजार कीमत पर मापी जाती है, जबकि कारक लागत पर जीडीपी उत्पादकों की वास्तविक आय दिखाती है।​
  • आर्थिक महत्व
    • बाजार कीमत बाजार की वास्तविकता (मांग-आपूर्ति) दर्शाती है, जबकि कारक लागत संसाधन आवंटन की कुशलता मापती है।​
    • भारत जैसे देशों में, जीडीपी को पहले कारक लागत पर मापा जाता था, लेकिन 2015 से बाजार कीमत पर स्थानांतरित किया गया ताकि कर प्रभाव शामिल हो।​
    • शुद्ध अप्रत्यक्ष कर सकारात्मक होने पर बाजार कीमत > कारक लागत, और सब्सिडी अधिक होने पर विपरीत।
    • यह अंतर मूल्यह्रास (Depreciation) से भिन्न है, जो दोनों में समान रूप से घटाया जाता है।​
  • उदाहरण से समझें
    • मान लीजिए एक किसान गेहूं उगाता है:
    • कारक लागत: बीज ₹100, श्रम ₹200, उर्वरक ₹150 = कुल ₹450।
    • अप्रत्यक्ष कर ₹50 (उत्पाद शुल्क), सब्सिडी ₹20।
    • बाजार कीमत: ₹450 + ₹30 (शुद्ध कर) = ₹480 प्रति क्विंटल।
    • उपभोक्ता ₹480 चुकाता है, लेकिन किसान को ₹450 मिलता है।​
    • यह अंतर राष्ट्रीय आय में दोहरी गणना रोकता है और उत्पादक आय सही दिखाता है।​
  • संबंधित अवधारणाएं
    • मूल मूल्य (Basic Price): कारक लागत + उत्पादन कर - उत्पादन सब्सिडी (व्यापार मार्जिन बिना)।
    • जीडीपी@बाजार कीमत = मूल्यवर्धन@मूल मूल्य + उत्पाद शुल्क - सब्सिडी।​
    • ये अंतर नीति-निर्माताओं को कर प्रभाव समझने में सहायक हैं, जैसे मुद्रास्फीति में अप्रत्यक्ष करों की भूमिका।​

30. निम्नलिखित में से क्या सरकारी बजट का एक उद्देश्य है? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

(A) जीडीपी विकास

(B) संसाधनों का पुनओवंटन

(C) संतुलित क्षेत्रीय विकास

Correct Answer: (c) सभी A, B और C
Solution:
  • जीडीपी विकास, संसाधनों का पुनर्भावंटन तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास सरकारी बजट के प्रमुख उद्देश्य हैं।
  • सरकार बजट के माध्यम से निश्चित वस्तुओं तथा सेवाओं को उपलब्ध कराती है, जिन्हें बाजार तंत्र के माध्यम से उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है।
  • भारत जैसे देश में केंद्रीय बजट इन लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रमुख साधन है।
  • मुख्य उद्देश्य
    • सरकारी बजट का प्राथमिक लक्ष्य आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है, जिसमें जीडीपी वृद्धि, निवेश और रोजगार सृजन शामिल होता है।
    • यह पिछड़े क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे जैसे सड़कें, बांध और सिंचाई परियोजनाओं के लिए धन आवंटित करके संतुलित क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करता है।
    • इसके अलावा, बजट आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए मुद्रास्फीति, मंदी या तेजी के चक्रों को नियंत्रित करता है।
    • बजट आय और संपत्ति के पुनर्वितरण के माध्यम से आर्थिक असमानता कम करता है
    • जैसे प्रगतिशील कर व्यवस्था से अमीरों पर अधिक कर लगाकर गरीबों के कल्याण योजनाओं में खर्च।
    • यह सार्वजनिक उपक्रमों का प्रबंधन भी करता है, जो लाभ के बजाय सामाजिक कल्याण पर केंद्रित होते हैं।
  • विस्तृत भूमिकाएँ
    • रोजगार सृजन: बजट श्रम-प्रधान तकनीकों और विशेष रोजगार कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करता है
    • जिससे बेरोजगारी घटती है। उदाहरणस्वरूप, ग्रामीण विकास योजनाओं में भारी निवेश से लाखों नौकरियाँ पैदा होती हैं।
    • संसाधनों का पुनःआवंटन: सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के आधार पर संसाधनों का न्यायसंगत वितरण, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और गरीबी उन्मूलन पर फोकस।
    • सामाजिक न्याय: वंचित वर्गों के लिए सब्सिडी, पेंशन और कल्याणकारी योजनाएँ लागू करके समानता लाना।​