विविध (अर्थव्यवस्था) भाग-IITotal Questions: 5021. ....... एक ऐसा संगठन है जो भारत में संपूर्ण सहकारी आंदोलन का प्रतिनिधित्व कर रहा है। [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (III-पाली)](a) NCUI(b) TRIFED(c) NFCSF(d) NABARDCorrect Answer: (a) NCUISolution:भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (NCUI) की स्थापना वर्ष 1929 में 'अखिल भारतीय सहकारी संस्थान संघ के रूप में की गई थीजिसका नाम बदलकर वर्ष 1961 में 'भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ' (NCUI) कर दिया गया।यह भारत में संपूर्ण सहकारी आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता है।इसका उद्देश्य भारत में सहकारी आंदोलन को बढ़ावा देना तथा विकसित करना है।NCUI का इतिहास इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।यह भारतीय सहकारी आंदोलन की सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्य करता हैजो 1904 के सहकारी साख अधिनियम से प्रारंभ हुए आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता है।उद्देश्य और कार्यNCUI सहकारी समितियों के प्रचार-प्रसार, प्रशिक्षण, परामर्श और वकालत सेवाएं प्रदान करता है।यह देश भर के सहकारी संगठनों—जैसे कृषि, विपणन, डेयरी और आवास सहकारी—का राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करता है।इसके अलावा, यह नीति निर्माण में सहकारियों की आवाज उठाता है और अंतरराष्ट्रीय सहकारी गठबंधन (ICA) से जुड़ा रहता है।सहकारिता आंदोलन में भूमिकाभारत का सहकारिता आंदोलन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण रहा हैजिसमें अमूल, IFFCO जैसी संस्थाएं शामिल हैं।NCUI इस आंदोलन को राष्ट्रीय और वैश्विक मंचों पर ले जाता हैजैसे 2024 के ICA सम्मेलन की तैयारी। सरकार की 'सहकार से समृद्धि' पहल में भी यह सक्रिय है, जो हर गांव को सहकारी से जोड़ने पर केंद्रित है।वर्तमान महत्वजनवरी 2026 तक, NCUI सहकारी क्षेत्र की चुनौतियों जैसे डिजिटलीकरण और FPO गठन में योगदान दे रहा है।यह वित्तीय समावेशन और सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है, खासकर ग्रामीण भारत में।22. अर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं के लिए समस्त मांग के स्तर को निर्धारित करने के लिए निम्नलिखित में से कौन-सी धारणा बनाई गई है? [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (IV-पाली)]i. अल्पकाल में नियत अंतिम वस्तु कीमत और नियत ब्याज की दर को मान लेते हैं।II. समस्त पूर्ति पूर्णतः लोचदार माना जाता है।(a) केवल II(b) I और II दोनों(c) केवल 1(d) न तो I और न ही IICorrect Answer: (b) I और II दोनोंSolution:अर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं के लिए समस्त मांग के स्तर को निर्धारित करने हेतु यह मान लिया जाता हैअल्पकाल में अंतिम वस्तु की कीमत तथा ब्याज दर नियत (स्थिर) है तथा समस्त पूर्ति पूर्णतः लोचदार है।कुल आपूर्ति पूरी तरह से लोचदार है, का अर्थ हैफर्म किसी दिए गए मूल्य स्तर पर वस्तुओं और सेवाओं की कितनी भी मात्रा का उत्पादन कर सकता है।यह धारणा अर्थव्यवस्था में कुल मांग और आपूर्ति के मध्य विश्लेषण को सरल बनाती है।कुल मांग की अवधारणामैक्रोइकोनॉमिक्स के संदर्भ में, विशेष रूप से कक्षा 12 के NCERT पाठ्यक्रम के अध्याय "आय और रोजगार का निर्धारण" में, कुल मांग के स्तर का निर्धारण अल्पकालिक संतुलन विश्लेषण के लिए किया जाता है।यहां मूल्य स्तर को स्थिर मान लिया जाता हैकुल निर्गम (output) पूरी तरह से कुल मांग पर निर्भर होता है।मुख्य धारणा: कुल आपूर्ति की पूर्ण लोचशीलताअर्थव्यवस्था में अंतिम वस्तुओं की कुल मांग के स्तर को निर्धारित करने के लिए कुल आपूर्ति (AS) को पूरी तरह से लोचदार मानना सबसे महत्वपूर्ण धारणा है।इसका अर्थ है कि किसी दिए गए मूल्य स्तर पर फर्में जितनी भी मात्रा की मांग होउतना ही उत्पादन कर सकती हैं—कोई उत्पादन बाधा नहीं।यह धारणा क्यों बनाई जाती है?संतुलन विश्लेषण को सरल बनाना: यदि AS लोचदार हैतो बाजार संतुलन (जहां AD = AS) में कुल निर्गम का स्तर पूरी तरह से AD पर निर्भर हो जाता है।कीमतों में बदलाव की बजाय, मात्रा ही समायोजन करती है।अल्पकालिक फोकस: वास्तविक अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार स्तर पर AS ऊर्ध्वाधर होती हैलेकिन अल्पकाल में बेरोजगारी या अप्रयुक्त संसाधनों के कारण AS क्षैतिज (लोचदार) मानी जाती है।इससे प्रभावी मांग का सिद्धांत (Keynesian principle) लागू होता है, जहां "मांग ही आपूर्ति पैदा करती है"।गुणक प्रभाव: स्वायत्त व्यय (जैसे निवेश या सरकारी खर्च) में वृद्धि से AD बढ़ती हैपूर्ण लोचदार AS के कारण कुल निर्गम बराबर बढ़ जाता है।उदाहरण: यदि MPC = 0.8 हो, तो ₹100 के निवेश से निर्गम में ₹500 की वृद्धि।अन्य सहायक धारणाएंकुल मांग निर्धारण में ये धारणाएं भी की जाती हैं, लेकिन मुख्य फोकस AS की लोच पर रहता है:स्थिर मूल्य स्तर: अंतिम वस्तुओं की कीमतें और ब्याज दरें अल्पावधि में स्थिर।इससे AD वक्र नीचे की ओर ढलान वाला नहीं, बल्कि क्षैतिज AS के साथ संतुलन आसान।स्थिर प्रौद्योगिकी और पूंजी स्टॉक: उत्पादन क्षमता में कोई बदलाव नहीं।पूर्ण रोजगार से नीचे आउटपुट: अर्थव्यवस्था न्यून मांग की स्थिति में, जहां अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध23. जुलाई, 2022 में, निम्नलिखित में से किसने सोशल स्टॉक एक्सचेंज (SSE) के लिए विस्तृत रूपरेखा अधिसूचित की है? [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (II-पाली)](a) सेबी(b) कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय(c) आरबीआई(d) नीति आयोगCorrect Answer: (a) सेबीSolution:सोशल स्टॉक एक्सचेंज, गैर-लाभकारी संगठनों को स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध करने की अनुमति देता हैजो वैकल्पिक निधि जुटाने की संरचना प्रदान करता है।एनएसई को पूंजी बाजार नियामक, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) से सोशल स्टॉक एक्सचेंज शुरू करने की मंजूरी मिल गई है।इसके लिए सेबी ने विस्तृत रूपरेखा अधिसूचित की है।SSE क्या है?यह मौजूदा स्टॉक एक्सचेंजों (जैसे NSE और BSE) के अलग खंड के रूप में कार्य करता है।SEBI ने 25 जुलाई 2022 को इसकी रूपरेखा जारी कीजो ICDR (Issue of Capital and Disclosure Requirements) विनियमों में संशोधन के माध्यम से अधिसूचित हुई।अधिसूचना का समय और पृष्ठभूमिSEBI ने SSE की विस्तृत रूपरेखा जुलाई 2022 में अधिसूचित की, हालांकि कुछ स्रोतों में सितंबर 2022 का उल्लेख पूर्ण फ्रेमवर्क अनावरण के लिए है।यह 2020 से चली आ रही चर्चा का परिणाम था, जिसमें SEBI ने एक समिति गठित की थी।जुलाई अधिसूचना ने SSE को धन जुटाने का एक नियामक ढांचा प्रदान कियाजिसके बाद दिसंबर 2022 में BSE और NSE को सैद्धांतिक मंजूरी मिली।मुख्य विशेषताएंपात्र संस्थाएं: गैर-लाभकारी संगठन (ट्रस्ट, सोसाइटी, सेक्शन 8 कंपनी) और लाभकारी सामाजिक उद्यम SSE पर लिस्ट हो सकते हैं।सामाजिक उद्यमों को भूख, गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण जैसे निर्दिष्ट क्षेत्रों में कार्य करना होता है।धन जुटाने के तरीके: जीरो कूपन जीरो प्रिंसिपल (ZCZP) इंस्ट्रूमेंट्स, म्यूचुअल फंड्स, स्माइल्स (वॉलंटरी डोनेशन) आदि। लिस्टिंग पूर्व पंजीकरण अनिवार्य है।नियम: SSE मुख्य स्टॉक एक्सचेंज से अलग होगालेकिन एक ही इकाई के तहत संचालित। न्यूनतम 1 करोड़ रुपये का सामाजिक ऑडिट अनिवार्य।कार्यान्वयन और प्रभावSSE का उद्देश्य भारत के लगभग 31 लाख NPOs को पारदर्शी तरीके से फंडिंग उपलब्ध कराना है।दिसंबर 2022 में BSE को पहली मंजूरी मिली, उसके बाद NSE को।पहली लिस्टिंग दिसंबर 2023 में SGBS उन्नति फाउंडेशन की हुई।यह वैश्विक मॉडल (जैसे ब्राजील, UK) से प्रेरित है और सामाजिक प्रभाव निवेश को बढ़ावा देता है।24. एक प्रकार का ऋण जो उधारकर्ताओं को प्रारंभिक चरणों में कम भुगतान करने की अनुमति देता है, लेकिन परिपक्वता पर शेष राशि का एकमुश्त राशि (lump sum) के रूप में पुनर्भुगतान ....... के रूप में जाना जाता है। [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (I-पाली)](a) पेडे लोन्स(b) इनकम-सेंसटिव पेमेंट(c) बैलून मॉर्टगेज(d) इंग्लिश मॉर्टगेजCorrect Answer: (c) बैलून मॉर्टगेजSolution:बैलून मॉर्टगेज एक प्रकार का रीयल एस्टेट (Real Estate) ऋण हैजो उधारकर्ताओं को प्रारंभिक चरणों में कम भुगतान या कोई मासिक भुगतान नहीं करने की छूट देता है।उधारकर्ता, अवधि के अंत में पूरी शेष राशि या एकमुश्त भुगतान चुकाता है।परिभाषाजिससे मासिक किस्तें कम रहती हैं।ऋण की परिपक्वता तिथि (मेच्योरिटी) पर शेष मूलधन की एक बड़ी एकमुश्त राशि (लंपसम) चुकानी पड़ती हैकार्यप्रणालीइस लोन में भुगतान संरचना दो चरणों में होती है:प्रारंभिक अवधि: केवल ब्याज का भुगतान या न्यूनतम मूलधन, जिससे नकदी प्रवाह आसान रहता है।अंतिम भुगतान: पूरी शेष राशि एकमुश्त, जो कुल लोन राशि का बड़ा हिस्सा होता है।उदाहरणस्वरूप, 5 वर्ष के लोन में पहले 4 वर्ष ब्याज मात्र और 5वें वर्ष में 80-90% मूलधन।प्रकारबुलेट लोन: पूरी मूलधन अंत में एकमुश्त, मासिक केवल ब्याज।बलून मोर्टगेज: आवास ऋणों में प्रचलित, जहां अंतिम भुगतान बलून जैसा बड़ा होता है।फायदेकम प्रारंभिक EMI से स्टार्टअप्स या अस्थायी आय वालों को लाभ।कुल ब्याज कम हो सकता है यदि जल्दी रिफाइनांस किया जाए।नकदी प्रवाह प्रबंधन आसान।नुकसानअंतिम बलून पेमेंट का दबाव, जो अप्रत्याशित हो सकता है।डिफॉल्ट जोखिम अधिक, क्रेडिट स्कोर प्रभावित।ब्याज दरें ऊंची हो सकती हैं।भारत में उपयोगभारत में यह व्यवसाय ऋण, होम लोन या NBFC द्वारा दिया जाता हैजैसे बजाज फिनसर्व में बुलेट पेमेंट विकल्प।रेरा नियमों के तहत होम लोन में सावधानी बरतें। हमेशा पुनर्भुगतान क्षमता जांचें।25. निम्नलिखित में से कौन-सा एक वर्ष के दौरान एक फर्म की मालसूची में परिवर्तन को व्यक्त करने का सही तरीका है? [CHSL (T-I) 17 मार्च, 2023 (II-पाली)](a) एक वर्ष के दौरान एक फर्म की मालसूची में परिवर्तन (मूल्यवर्धित - फर्म द्वारा प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुएं + एक वर्ष के दौरान फर्म की बिक्री)(b) एक वर्ष के दौरान एक फर्म की मालसूची में परिवर्तन (मूल्यवर्धित - फर्म द्वारा प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुएं - एक वर्ष के दौरान फर्म की बिक्री)(c) एक वर्ष के दौरान एक फर्म की मालसूची में परिवर्तन (मूल्यवर्धित + फर्म द्वारा प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुएं + एक वर्ष के दौरान फर्म की बिक्री)(d) एक वर्ष के दौरान एक फर्म की मालसूची में परिवर्तन (मूल्यवर्धित + फर्म द्वारा प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुएं - एक वर्ष के दौरान फर्म की बिक्री)Correct Answer: (d) एक वर्ष के दौरान एक फर्म की मालसूची में परिवर्तन (मूल्यवर्धित + फर्म द्वारा प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुएं - एक वर्ष के दौरान फर्म की बिक्री)Solution:एक वर्ष के दौरान एक फर्म की मालसूची में परिवर्तन को व्यक्त करने का सही तरीका हैमालसूची टर्नओवर की गणना करना या मालसूची में परिवर्तन के सूत्र का उपयोग करना।अबिक्रित निर्मित वस्तुओं अथवा अर्धनिर्णित वस्तुओं अथवा कच्चे मालों का स्टॉक, जो कोई फर्म एक वर्ष से अगले वर्ष तक रखता हैउसे मालसूची कहते हैं। मालसूची एक स्टॉक चर (Stock Variable) है।फर्म की मालसूची में परिवर्तन = मूल्यवर्धित + फर्म द्वारा प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुएं एक वर्ष के दौरान फर्म की बिक्री। अतः विकल्प (d) सही उत्तर है।मालसूची परिवर्तन की अवधारणामालसूची में परिवर्तन एक महत्वपूर्ण आर्थिक संकेतक है जो बताता हैकिसी फर्म ने उत्पादित माल में से कितना बेचा और कितना स्टॉक में रखा। यदि उत्पादन बिक्री से अधिक हैतो मालसूची बढ़ती है (सकारात्मक परिवर्तन); यदि बिक्री अधिक है, तो मालसूची घटती हैनकारात्मक परिवर्तन)। यह अवधारणा मुख्य रूप से मैक्रोइकोनॉमिक्स में GDP गणना के दौरान उपयोग होती हैजहां स्टॉक में बदलाव को मूल्य वर्धन का हिस्सा माना जाता है।उदाहरण के लिए, यदि कोई फर्म वर्ष में 100 यूनिट माल उत्पादित करती है और 80 यूनिट बेचती हैतो मालसूची में 20 यूनिट की वृद्धि होगी। यह सूत्र क्लोजिंग इन्वेंटरी - ओपनिंग इन्वेंटरी से भी जुड़ा हैलेकिन फंडामेंटल स्तर पर उत्पादन-बिक्री अंतर ही सही तरीका है।अन्य विकल्प क्यों गलत हैंप्रश्न बहुविकल्पीय होने पर अन्य विकल्प जैसे "मूल्य वर्धित + मध्यवर्ती सामान - बिक्री" या केवल "क्लोजिंग इन्वेंटरी - ओपनिंग इन्वेंटरी" आंशिक सही लग सकते हैंलेकिन पूर्ण रूप से सटीक नहीं। मूल्य वर्धित मध्यवर्ती इनपुट्स से जुड़ा होता हैसीधे इन्वेंटरी चेंज से। सही सूत्र हमेशा उत्पादन-बिक्री है।गणना का सूत्र और महत्वसूत्र: मालसूची परिवर्तन = उत्पादन - बिक्रीयह राष्ट्रीय आय लेखांकन में उत्पादन विधि (Production Method) का आधार है।भारत जैसे देशों में CSO (Central Statistics Office) इसी पर GDP अनुमान लगाता है।सकारात्मक चेंज अर्थव्यवस्था में संचय दर्शाता है, जबकि नकारात्मक चेंज मंदी का संकेत।फर्म स्तर पर, यह कैश फ्लो और लाभप्रदता प्रभावित करता है।वित्तीय विवरणों में इसे बैलेंस शीट से वेरीफाई किया जाता है: समापन स्टॉक - प्रारंभिक स्टॉक।व्यावहारिक उपयोगGDP में भूमिका: कुल इन्वेंटरी चेंज सकल घरेलू उत्पाद में जोड़ा जाता है।फर्म मैनेजमेंट: उच्च इन्वेंटरी होल्डिंग कॉस्ट बढ़ाती है, इसलिए जस्ट-इन-टाइम (JIT) सिस्टम अपनाए जाते हैं।उदाहरण: 2025 में ऑटो सेक्टर में उत्पादन > बिक्री होने से इन्वेंटरी बढ़ी, जो मंदी का संकेत था।26. सीमांत उत्पादन संभावना के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 20 मार्च, 2023 (III-पाली)]I. यह दो वस्तुओं के उन संयोगों को दर्शाती है, जिनका उत्पादन अर्थव्यवस्था के संसाधनों का पूर्णरूप से उपयोग करने पर किया जाता है।II. यह अर्थव्यवस्था की उत्पादन संभावनाओं को दर्शाती है।(a) केवल I(b) केवल II(c) I और II दोनों(d) न तो I और न ही IICorrect Answer: (c) I और II दोनोंSolution:सीमांत उत्पादन संभावना अनाज तथा कपास (दो वस्तुओं) के उन संयोगों को दर्शाती हैजिनका उत्पादन अर्थव्यवस्था के संसाधनों का पूर्णरूप से उपयोग करने पर किया जाता है।सीमांत उत्पादन संभावना के ठीक नीचे स्थित कोई भी बिंदु अनाज तथा कपास का वह संयोग दर्शाता हैजो तब उत्पादित होगा जब सभी अथवा कुछ संसाधनों का उपयोग या तो पूरी तरह न किया गया हो अथवा उनका अपव्यय करते हुए किया गया होअर्थात यह अर्थव्यवस्था की उत्पादन संभावनाओं को भी दिखाती है।परिभाषा और अवधारणासीमांत उत्पादन संभावना वक्र (PPF) एक ग्राफिकल प्रतिनिधित्व हैजो दो वस्तुओं (जैसे अनाज और कपास) के बीच उत्पादन के विभिन्न संयोजनों को दिखाता हैजब संसाधनों का पूर्ण और कुशल उपयोग किया जाता है। यह वक्र बाहर की ओर उत्तल (concave to origin) होता हैजो अवसर लागत के बढ़ते सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है।अर्थात, एक वस्तु के एक अतिरिक्त इकाई उत्पादन के लिए दूसरी वस्तु का त्याग बढ़ता जाता है।उदाहरणस्वरूप, यदि अर्थव्यवस्था 4 इकाई अनाज या 10 इकाई कपास का अधिकतम उत्पादन कर सकती हैतो बीच के बिंदु संसाधनों के पूर्ण उपयोग को दर्शाते हैं।विकल्पों का विश्लेषणप्रश्न में "निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है" का उल्लेख है, लेकिन विकल्प निर्दिष्ट नहीं हैं।सामान्यतः इस प्रकार के बहुविकल्पीय प्रश्नों (जैसे UPSC, NCERT कक्षा 12 अर्थशास्त्र) में निम्नलिखित सामान्य कथन आते हैं:सही कथन वह है जो PPF को "सीमित संसाधनों वाली अर्थव्यवस्था में दो वस्तुओं के अधिकतम उत्पादन संयोजनों का वक्र" बताता है।विशेषताएँउत्तल आकार: संसाधनों का बहु-उपयोगिता (multi-purpose nature) कारण अवसर लागत बढ़ती है।उदाहरण: अनाज से कपास की ओर स्थानांतरण पर प्रारंभ में कम अनाज त्याग, बाद में अधिक।अवसर लागत: वक्र का ढलान (MRPT) = त्यागी गई वस्तु A / प्राप्त वस्तु B। यह निरंतर नहीं रहता।कुशल बिंदु: वक्र पर सभी बिंदु कुशल (efficient); अंदर अप효 (inefficient); बाहर असंभव (attainable only with growth)।प्रभाव: तकनीकी प्रगति या संसाधन वृद्धि से वक्र बाहर खिसकता है (shift rightward)।आर्थिक महत्वPPF पूर्ण रोजगार, संसाधन वितरण की कुशलता, व्यापार लाभ (comparative advantage) और विकास नीतियों का मूल्यांकन करने में सहायक है।बाजार अर्थव्यवस्था में मूल्य निर्धारण इसे प्रभावित करता हैजबकि नियोजित अर्थव्यवस्था में योजना आयोग इसका उपयोग करता है।वास्तविक दुनिया में, COVID-19 जैसे संकटों ने स्वास्थ्य उपकरणों की ओर PPF shift दिखाया।27. धन के संबंध में निम्नलिखित पदों का मिलान कीजिए। [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (II-पाली)]सूची Iसूची IIi. प्राथमिक कार्यA. राष्ट्रीय आय का वितरणii. द्वितीयक कार्यB. मूल्य मानiii. धन की बुराइयांC. मूल्य संचयiv. आकस्मिक कार्यD. मूल्य की अस्थिरताCode :iiiiiiiv(a)BCDA(b)ADBC(c)DCAB(d)CBAD(a)(b)(c)(d)Correct Answer: (a)Solution:प्राथमिक कार्य (i - b: मूल्य का माप)धन का सबसे बुनियादी या प्राथमिक कार्य वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को मापने का कार्य करना है।यह धन को एक सामान्य इकाई (जैसे रुपये या डॉलर) के रूप में स्थापित करता हैजिससे विभिन्न वस्तुओं की तुलना आसान हो जाती है।उदाहरणस्वरूप, एक सेब का मूल्य 50 रुपये और एक किताब का 500 रुपये बताकर हम उनकी सापेक्षिक कीमत समझ सकते हैं।यह कार्य वस्तु विनिमय प्रणाली की जटिलताओं को दूर करता है।द्वितीयक कार्य (ii - c: मूल्य संचय)धन के द्वितीयक कार्यों में मूल्य का संचय या भंडारण प्रमुख है। लोग अपनी बचत को धन के रूप में रखते हैंजो समय के साथ मूल्य को संरक्षित रखता है। इसके अलावा, यह आस्थगित भुगतान का मानक भी बनता हैजैसे ऋण चुकाने या वेतन भुगतान में।यह कार्य धन को संपत्ति के रूप में उपयोगी बनाता है, क्योंकि नकदी आसानी से संग्रहीत और उपयोग की जा सकती है।धन की बुराइयाँ (iii - d: मूल्य की अस्थिरता)धन की प्रमुख बुराइयों में मूल्य की अस्थिरता आती है, जो मुद्रास्फीति या अपस्फीति के कारण होती है।जब महंगाई बढ़ती है, तो धन का क्रय शक्ति घट जाता है, जिससे बचत का मूल्य कम हो जाता है।अन्य बुराइयाँ जैसे काला धन प्रोत्साहन या आर्थिक असमानता भी इससे जुड़ी हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम पैदा करता है।आकस्मिक कार्य (iv - a: राष्ट्रीय आय का वितरण)धन के आकस्मिक (contingent) कार्य सामान्य परिस्थितियों से परे होते हैंजैसे राष्ट्रीय आय का वितरण। धन कर प्रणाली के माध्यम से सरकार आय को विभिन्न वर्गों में बाँटती हैजैसे सब्सिडी या कल्याण योजनाएँ। यह सार्वजनिक राजस्व का स्रोत भी बनता है। ये कार्य धन की बहुमुखी भूमिका दर्शाते हैं।धन के कार्यों का व्यापक संदर्भधन की ये श्रेणियाँ पारंपरिक अर्थशास्त्र (जैसे वॉ-walking की परिभाषा) पर आधारित हैं।प्राथमिक कार्य विनिमय को सुगम बनाते हैं, द्वितीयक स्थिरता प्रदान करते हैंजबकि बुराइयाँ और आकस्मिक कार्य आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में प्रासंगिक हैं।आधुनिक समय में डिजिटल मुद्रा (जैसे UPI) इन कार्यों को और सशक्त बनाती है28. एमपी (MP) पर जीएनपी (GNP) में से ....... घटाने पर हमें एमपी (MP) पर जीडीपी (GDP) प्राप्त होती है। [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (I-पाली)](a) विदेश से निवल कारक आय(b) सब्सिडी(c) अप्रत्यक्ष कर(d) मूल्यह्रासCorrect Answer: (a) विदेश से निवल कारक आयSolution:बाजार कीमतों पर जीएनपी (GNP) में से विदेश से निवल कारक आय घटाने पर हमें बाजार कीमतों पर जीडीपी (GDPmp) प्राप्त होती हैअर्थात GDPmp = GNPmp - NFIA (Net Factor Income from Anbrod)NFIA की गणनाNFIA = निवासियों की विदेश से आय - गैर-निवासियों की देश में आयसकारात्मक NFIA: विदेश से अधिक आय (जैसे रेमिटेंस) → GNP > GDP।नकारात्मक NFIA: देश में विदेशियों की अधिक आय → GNP < GDP।उदाहरण: यदि भारत का GNP<sub>MP</sub> ₹200 लाख करोड़ और NFIA ₹10 लाख करोड़ हैतो GDP<sub>MP</sub> = ₹190 लाख करोड़।व्यावहारिक महत्वGDP देश की आंतरिक उत्पादकता मापता है, जबकि GNP निवासियों की कुल कमाई।भारत जैसे विकासशील देशों में NFIA सकारात्मक रहता है (प्रवासी आय से), इसलिए GNP थोड़ा अधिक होता है।यह अंतर मौद्रिक नीति, विकास दर विश्लेषण और अंतरराष्ट्रीय तुलना के लिए महत्वपूर्ण है।29. निम्नलिखित में से कौन-सा विदेशी प्रतिस्पर्धा का एक लाभ है? [CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (I-पाली)](a) कुशलता से उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहन(b) विदेशी बाजार का विस्तार(c) नए उत्पादों को विकसित करने की कोई आवश्यकता नहीं है(d) विदेशी मुद्रा भंडार की बचतCorrect Answer: (a) कुशलता से उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहनSolution:विदेशी प्रतिस्पर्धा की वजह से कुशलता से उत्पादन करने हेतु प्रोत्साहन मिलता है।विदेशी प्रतिस्पर्धा तब उभरती है, जब एक देश के व्यवसाय को दूसरे देशों के व्यवसाय से प्रतिद्वंद्विता करनी पड़ती है।अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी कभी-कभी विदेशों में सस्ती उत्पादन लागत के कारण कम कीमतों पर सामान पेश कर सकते हैं, जिसे प्राय डम्पिंग (Dumping) कहा जाता है।मुख्य लाभ: बढ़ी हुई प्रतिस्पर्धा क्योंकि विदेशी उत्पाद सस्ते, उच्च गुणवत्ता वाले या नवीन तकनीक वाले हो सकते हैं।उदाहरणस्वरूप, ऑटोमोबाइल क्षेत्र में विदेशी कंपनियों जैसे टोयोटा या ह्युंडई के आने से मारुति सुजुकी जैसी भारतीय कंपनियों ने अपनी उत्पादकताडिजाइन और कीमतों में सुधार किया। इससे उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प, कम कीमतें और बेहतर गुणवत्ता मिलती है।नवाचार और तकनीकी उन्नतिविदेशी प्रतिस्पर्धा घरेलू फर्मों को नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है।कंपनियां उत्पादन प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाती हैं, अनुसंधान-विकास (R&D) में निवेश करती हैंनए उत्पाद लॉन्च करती हैं। उदाहरण के लिए, आईटी और फार्मास्यूटिकल क्षेत्रों में विदेशी प्रतिस्पर्धा ने भारत को जेनेरिक दवाओं और सॉफ्टवेयर निर्यात में वैश्विक नेता बनाया।इससे कुल उत्पादकता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था लंबे समय में मजबूत होती है।उपभोक्ता कल्याणउपभोक्ताओं के लिए यह सबसे प्रत्यक्ष लाभ है। विदेशी प्रतिस्पर्धा से उत्पादों की विविधता बढ़ती हैजैसे स्मार्टफोन बाजार में ऐप्पल या सैमसंग के आने से चीनी ब्रांडों की कीमतें गिरीं और सुविधाएं बेहतर हुईं।कीमतें प्रतिस्पर्धी रहती हैं, गुणवत्ता सुधरती है और सेवाएं (जैसे वॉरंटी) बेहतर होती हैं।इससे मध्यम वर्ग के उपभोक्ताओं का जीवन स्तर ऊंचा उठता है।आर्थिक विकास और रोजगार सृजनप्रतिस्पर्धा से कुशल उद्योग विकसित होते हैं, जो निर्यात बढ़ाते हैं और विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं।भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) ने विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में लाखों नौकरियां पैदा की हैं।हालांकि प्रारंभिक रूप से कुछ नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं, लेकिन लंबे समय में कुशल रोजगार बढ़ते हैं।संभावित विकल्पों का विश्लेषणप्रश्न "निम्नलिखित में से कौन-सा" संकेत देता है कि बहुविकल्पीय प्रश्न हो सकता है। सामान्य विकल्पों में:नए उत्पाद विकसित करने की कोई आवश्यकता नहीं: यह हानि है, न कि लाभ, क्योंकि प्रतिस्पर्धा नई नवाचार की मांग करती है।बढ़ती प्रतिस्पर्धा: यह स्पष्ट लाभ है, जैसा ऊपर वर्णित।अन्य संभावित जैसे "उत्पादन लागत वृद्धि" या "आयात निर्भरता" हानियां हैं।इस प्रकार, बढ़ती प्रतिस्पर्धा विदेशी प्रतिस्पर्धा का प्रमुख लाभ है।भारत के संदर्भ में उदाहरण1991 के बाद भारत ने लाइसेंस राज समाप्त कर विदेशी कंपनियों को प्रवेश दिया। रिलायंस जैसी कंपनियां प्रतिस्पर्धा से मजबूत हुईंजबकि टाटा ने कोरस बोरिंग से सीखा। वर्तमान में, पीएलआई योजना प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रही है।हालांकि, छोटे उद्योगों को चुनौती मिलती है, लेकिन समग्र लाभ अर्थव्यवस्था को वैश्विक बनाते हैं।निष्कर्ष स्वरूप प्रभावविदेशी प्रतिस्पर्धा अल्पकालिक दर्द (जैसे छोटे उद्योगों का बंद होना) दे सकती हैलेकिन दीर्घकालिक लाभ जैसे दक्षता, विकास और उपभोक्ता सशक्तिकरण प्रदान करती है। सरकार को नीतियों से संतुलन बनाना चाहिए।30. निम्नलिखित में से कौन सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) की सही सीमा को इंगित करता है? [CHSL (T-I) 10 मार्च, 2023 (I-पाली)](a) - 1 < MPC < 0(b) 0 < MPC < 1(c) 1 < MPC < 1(d) 0 < MPC < ∞Correct Answer: (b) 0 < MPC < 1Solution:सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC), से तात्पर्य है-उपभोग में परिवर्तन के फलस्वरूप आय में होने वाला परिवर्तन; अर्थात MPC=AC/AY सीमांत उपयोग प्रवृत्ति हमेशा धनात्मक होती है।इसका अर्थ यह हुआ कि जब आय बढ़ती है, तो वह सारी की सारी उपभोग पर व्यय नहीं की जाती।इसके विपरीत जब आय घटती है, तो उपभोग व्यय उसी अनुपात में नहीं घटता, और यह कभी भी शून्य नहीं हो सकता हैअतः o < MPC < 1 यह सीमांत उपभोग प्रवृत्ति की सीमा है।MPC की परिभाषा और सूत्रMPC को कीनेस जॉन मेनार्ड केन्स ने लोकप्रिय बनाया, जो समष्टि अर्थशास्त्र में उपभोग कार्य का अभिन्न अंग है। सूत्र सरल हैयहां ΔC उपभोग में परिवर्तन है और ΔY आय में परिवर्तन। उदाहरणस्वरूप, यदि आय में ₹100 की वृद्धि होती है₹80 खर्च हो जाते हैं, तो MPC = 80/100 = 0.8। यह मान बताता है कि 80% अतिरिक्त आय उपभोग पर जाती हैबाकी 20% बचत पर। औसत उपभोग प्रवृत्ति (APC = C/Y) से भिन्न, MPC केवल सीमांत (अतिरिक्त) आय पर केंद्रित है।सही सीमा क्यों 0 < MPC < 1?MPC = 0 नहीं हो सकता: यदि पूरी अतिरिक्त आय बचाई जाए (ΔC = 0), तो MPC शून्य होगालेकिन वास्तविक जीवन में कोई भी व्यक्ति पूरी आय बचत में नहीं रखता; न्यूनतम आवश्यकताएं उपभोग सुनिश्चित करती हैं।हालांकि सैद्धांतिक रूप से संभव, व्यावहारिक रूप से MPC > 0 रहता है।MPC = 1 नहीं हो सकता: यदि पूरी अतिरिक्त आय खर्च हो जाए (ΔS = 0), तो MPC एक होगालेकिन लोग हमेशा कुछ बचत करते हैं (भविष्य की अनिश्चितता के लिए), इसलिए MPC < 1।वास्तविक सीमा: 0 से 1 के बीच, जैसे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में MPC 0.7-0.9 तक ऊंचा होता है(कम बचत), जबकि विकसित देशों में 0.5-0.7। भारत जैसे देश में MPC आमतौर पर 0.6-0.8 के आसपास अनुमानित है।अन्य विकल्पों का खंडनप्रश्न बहुविकल्पीय होने पर सामान्य विकल्प जैसे "MPC ≥ 1", "MPC ≤ 0", या "0 ≤ MPC ≤ 1" आते हैं।MPC ≥ 1 गलत: इससे अर्थव्यवस्था में नकारात्मक बचत होगी, जो अवास्तविक है।MPC ≤ 0 गलत: उपभोग कभी नकारात्मक नहीं होता।0 ≤ MPC ≤ 1 सशर्त सही: सैद्धांतिक अंतिम बिंदु शामिललेकिन व्यावहारिक रूप से सख्ती से 0 < MPC < 1, क्योंकि पूर्ण बचत या उपभोग दुर्लभ है।MPC का आर्थिक महत्वMPC कीनेसियन गुणक (Multiplier = 1/(1-MPC)) का आधार है।यदि MPC=0.8, गुणक=5, अर्थात् निवेश में ₹1 वृद्धि से राष्ट्रीय आय ₹5 बढ़ेगी।सरकारी व्यय, कर नीतियां इसी पर निर्भर करती हैं। उच्च MPC से प्रोत्साहन प्रभावी, निम्न से बचत बढ़ती है।उदाहरण और व्यावहारिक अनुप्रयोगमान लीजिए एक परिवार की आय ₹50,000 से ₹60,000 हो जाती है (ΔY=10,000)।यदि उपभोग ₹30,000 से ₹36,000 (ΔC=6,000) हो, MPC=0.6।भारत में NSSO डेटा से MPC ग्रामीण क्षेत्रों में 0.8+ और शहरी में 0.6-0.7 दिखता है।महामारी जैसे संकट में MPC घट सकता है (सावधानीपूर्ण बचत)।Submit Quiz« Previous12345Next »