विविध (अर्थव्यवस्था) भाग-II

Total Questions: 50

31. निम्नलिखित में से कौन-सा निजी आय के संबंध में सही है? [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) निजी आय = निजी क्षेत्र को उपगत होने वाले घरेलू उत्पाद से प्राप्त कारक आय + राष्ट्रीय ऋण ब्याज + विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय + सरकार से चालू अंतरण + शेष विश्व से अन्य निवल अंतरण
Solution:
  • निजी आय विभिन्न स्रोतों से किसी व्यक्ति या परिवार की कुल आय का प्रतिनिधित्व करती है।
  • इसमें व्यावसायिक आय और वेतन, मजदूरी या कमीशन के अलावा अन्य रूपों में प्राप्त आय भी शामिल है।
  • निजी आय = निजी क्षेत्र को उपगत होने वाले घरेलू उत्पाद से प्राप्त कारक आय + राष्ट्रीय ऋण ब्याज + विदेशों से प्राप्त निवल कारक आय + सरकार से चालू अंतरण + शेष विश्व से अन्य निवल अंतरण।
  • निजी आय की परिभाषा
    •  इसमें वेतन, मजदूरी, लाभांश, ब्याज, किराया, व्यापारिक लाभ, राष्ट्रीय ऋणों पर ब्याज तथा हस्तांतरण आय (जैसे पेंशन, सब्सिडी आदि) सम्मिलित होते हैं
    • लेकिन सरकारी क्षेत्र की आय को इससे बाहर रखा जाता है।
    • सरल शब्दों में, निजी आय निजी क्षेत्र की वह कमाई है
    • जो कर भुगतान से पहले प्राप्त होती है और इसमें सार्वजनिक क्षेत्र (सरकार एवं उसके उपक्रमों) की आय शामिल नहीं होती।
  • निजी आय की गणना सूत्र
    • निजी आय की गणना निम्नलिखित मानक सूत्र से की जाती है:
    • निजी आय = घरेलू उत्पाद से निजी क्षेत्र को प्राप्त कारक आय + विदेश से शुद्ध कारक आय (NFIA) + समस्त चालू हस्तांतरण आय - सरकारी क्षेत्र को प्राप्त आय
      एक अन्य रूप में:
    • निजी आय = निजी क्षेत्र का शुद्ध घरेलू उत्पाद से कारक आय + राष्ट्रीय ऋण ब्याज + विदेश से शुद्ध कारक आय + सरकार से वर्तमान हस्तांतरण + शेष विश्व से अन्य शुद्ध हस्तांतरण।
    • उदाहरणस्वरूप, यदि घरेलू उत्पाद से निजी क्षेत्र को 100 करोड़ की आय मिली, विदेश से 10 करोड़ की NFIA प्राप्त हुई
    • हस्तांतरण 5 करोड़ हैं तथा सरकारी क्षेत्र को 15 करोड़ की आय मिली, तो निजी आय = 100 + 10 + 5 - 15 = 100 करोड़ होगी।​
  • निजी आय की विशेषताएँ
    • निजी क्षेत्र केंद्रित: केवल निजी व्यक्तियों एवं व्यवसायों की आय शामिल, सरकारी आय वर्जित।​
    • हस्तांतरण आय सम्मिलित: पेंशन, ब्याज भुगतान, विदेशी अनुदान आदि जो उत्पादन से जुड़े नहीं, इन्हें जोड़ा जाता है।
    • राष्ट्रीय ऋण ब्याज शामिल: सरकार द्वारा जनता को चुकाया जाने वाला ब्याज निजी आय का हिस्सा माना जाता है।
    • घरेलू + विदेशी आय: NFIA (Net Factor Income from Abroad) जोड़कर वैश्विक दृष्टिकोण दिया जाता है।​
      ये विशेषताएँ निजी आय को राष्ट्रीय आय से अलग करती हैं, जहाँ केवल आय भुगतान (बिना हस्तांतरण) शामिल होते हैं।​
  • निजी आय का महत्व
    • निजी आय देश के निजी क्षेत्र की वित्तीय स्थिति को प्रतिबिंबित करती है
    • जो उपभोक्ता व्यय, बचत दर और आर्थिक विकास की भविष्यवाणी करने में सहायक है।
    • भारत जैसे विकासशील देशों में यह नीति-निर्माण के लिए उपयोगी है, क्योंकि यह बताती है
    • निजी क्षेत्र कितनी आय उत्पन्न कर रहा है और सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता कहाँ है।
    • इसके अलावा, यह प्रयोज्य आय (Disposable Income) की गणना का आधार बनती है
    • जहाँ प्रत्यक्ष कर घटाकर उपभोग योग्य आय निकाली जाती है।

32. यदि मांग की कीमत लोच (Price elasticity of demand) एक से कम है, तो वस्तु की मांग को ....... कहा जाता है। [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) बेलोचदार
Solution:
  • मांग की कीमत लोच किसी उत्पाद की कीमत में परिवर्तन के परिणामस्वरूप उसकी मात्रा में होने वाले परिवर्तन की माप है।
  • मांग की कीमत लोच क्या है?
    • जहां  मांग की मात्रा और  कीमत है। लोच का मान पूर्णांक (absolute value) में देखा जाता है।
    • यदि |e_d| < 1, तो मांग बेलोचदार होती है
    • अर्थात् कीमत में बड़ा बदलाव होने पर भी मांग बहुत कम प्रभावित होती है।
  • बेलोचदार मांग की विशेषताएं
    • बेलोचदार मांग वाली वस्तुओं में कीमत बढ़ने पर उपभोक्ता कुल व्यय बढ़ाते हैं
    • क्योंकि मांग की मात्रा में कमी कीमत वृद्धि से कम होती है।
    • उदाहरणस्वरूप, यदि कीमत 10% बढ़े और मांग केवल 4% घटे, तो |e_d| = 0.4 < 1।
    • मांग वक्र खड़ा (steeper) होता है।
    • पूर्ण बेलोचदार मांग (|e_d| = 0) में मांग वक्र लंबवत रेखा होता है, जैसे जीवनरक्षक दवाएं।
  • प्रकार और तुलना
    • लोच का प्रकार | |e_d| मान | कुल व्यय का प्रभाव | मांग वक्र |
    • बेलोचदार (Inelastic) | < 1 | कीमत ↑ ⇒ व्यय ↑ | खड़ा |
    • एकक लोचदार (Unitary) | = 1 | व्यय अपरिवर्तित | आयताकार हाइपरबोला |
    • लोचदार (Elastic) | > 1 | कीमत ↑ ⇒ व्यय ↓ | सपाट  |
    • पूर्ण लोचदार (|e_d| = ∞) में थोड़ी कीमत वृद्धि से मांग शून्य हो जाती है। ​
  • उदाहरण और प्रभाव
    • नमक, दवाएं, बिजली या पेट्रोल जैसी आवश्यक वस्तुओं की मांग बेलोचदार होती है
    • क्योंकि इनके विकल्प कम होते हैं।
    • व्यवसाय कीमत बढ़ाकर लाभ बढ़ा सकते हैं। दीर्घकाल में लोच बढ़ सकती है यदि विकल्प उपलब्ध हों।

33. ......., जिसे खोज बेरोजगारी (search unemployment) के रूप में भी जाना जाता है, तब होता है जब कर्मचारी अपनी वर्तमान नौकरी खो देते हैं और दूसरी नौकरी खोजने की प्रक्रिया में होते हैं। [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) प्रतिरोधात्मक बेरोजगारी
Solution:
  • प्रतिरोधात्मक (घर्षणात्मक) बेरोजगारी (Frictional unem- ployment) एक प्रकार की बेरोजगारी है
  • जो तब होती है जब श्रमिक एक नौकरी से दूसरी नौकरी में जाता है। प्रतिरोधात्मक बेरोजगारी नौकरियों के बीच बिताया गया समय है
  • जब तक श्रमिक नौकरी की तलाश कर रहा होता है।
  • परिभाषा और विशेषताएं
    • घर्षण बेरोजगारी वह अल्पकालिक बेरोजगारी है जो नौकरियों के बीच संक्रमण के दौरान होती है।
    • इसमें वे लोग शामिल होते हैं जो कार्य करने के योग्य हैं, काम करना चाहते हैं
    • लेकिन सक्रिय रूप से नौकरी तलाश रहे हैं
    • जैसे रिज्यूमे भेजना, इंटरव्यू देना या जॉब पोर्टल्स पर आवेदन करना।
    • यह बेरोजगारी श्रमिकों की व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर करती है, जैसे बेहतर वेतन, स्थान या काम के हालात की खोज।
    • पूर्ण रोजगार की स्थिति में भी यह हमेशा मौजूद रहती है, क्योंकि श्रम बाजार कभी स्थिर नहीं होता।
  • कारण
    • नौकरी बदलना: कर्मचारी स्वेच्छा से पुरानी नौकरी छोड़कर नई ढूंढते हैं, जैसे प्रमोशन या बेहतर अवसरों के लिए।
    • नए प्रवेशकर्ता: छात्र, गृहिणियां या क्षेत्र बदलने वाले नए लोग बाजार में प्रवेश करते हैं।
    • अपरिपूर्ण सूचना: नियोक्ता और कर्मचारी एक-दूसरे के बारे में पूरी जानकारी न होने से मैचमेंट में देरी होती है।
    • भौगोलिक गतिशीलता: लोग पसंदीदा शहर या क्षेत्र में नौकरी की तलाश करते हैं।
  • अन्य प्रकारों से अंतर
    • घर्षण बेरोजगारी संरचनात्मक (कौशल असंगति), चक्रीय (आर्थिक मंदी) या मौसमी (ऋतु-आधारित) से अलग है।
    • यह स्वाभाविक और अल्पकालिक (कुछ सप्ताह से महीनों तक) होती है, जबकि अन्य दीर्घकालिक या संकटजन्य होती हैं।
    • उदाहरणस्वरूप, भारत जैसे विकासशील देशों में युवाओं की बड़ी संख्या के कारण यह दर अधिक रहती है।​
  • आर्थिक प्रभाव
    • यह बेरोजगारी अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक नहीं, बल्कि सकारात्मक मानी जाती है
    • क्योंकि यह श्रमिकों को बेहतर匹配 वाली नौकरियां दिलाती है, उत्पादकता बढ़ाती है।
    • हालांकि, उच्च घर्षण बेरोजगारी बाजार की अक्षमता दर्शाती है, जैसे जॉब सर्च में बाधाएं।
    • सरकारें जॉब पोर्टल्स, करियर काउंसलिंग और सूचना अभियानों से इसे कम करती हैं।
    • कुल बेरोजगारी दर में इसका योगदान 2-3% तक होता है।
  • मापन और उदाहरण
    • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार, बेरोजगार वह है
    • जो पिछले 4 सप्ताह में नौकरी तलाश चुका हो और तत्काल काम शुरू कर सके।
    • भारत में, PLFS (Periodic Labour Force Survey) डेटा से पता चलता है कि शहरी युवाओं में यह प्रमुख है।
    • उदाहरण: एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर बेंगलुरु से दिल्ली बेहतर सैलरी के लिए शिफ्ट होता है और 1-2 महीने बेरोजगार रहता है।

34. निम्नलिखित में से किन प्रकारों से, समस्त मांग फलन (aggregate demand function), उपभोग फलन से संबंधित है? [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

I. उनमें ढलान C एक समान है।

II. समस्त मांग फलन उपभोग फलन के समानांतर है।

Correct Answer: (d) I और II दोनों
Solution:
  • उपभोग फलन का ढाल सीमांत उपभोग प्रवृत्ति को दर्शाता है, जो कि आय में परिवर्तन के परिणामस्वरूप उपभोग में परिवर्तन है।
  • समस्त मांग फलन में एक घटक के रूप में उपभोग भी शामिल है
  • इसलिए कुल मांग फलन का ढाल उपभोग करने के लिए सीमांत प्रवृत्ति द्वारा निर्धारित किया जाता है।
  • कुल मांग फलन और उपभोग फलन एक-दूसरे के समानांतर हैं।
  • उपभोग फलन की परिभाषा
    • उपभोग फलन घरेलू क्षेत्रों द्वारा की जाने वाली खपत को आय के फलन के रूप में दिखाता है
    • C = \bar{C} + cY_d, जहां \bar{C} स्वायत्त उपभोग (autonomous consumption) है
    • c सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) है, और Y_d उपलब्ध आय (disposable income) है। इसका ढलान MPC (0 < c < 1) होता है।
  • संबंध का पहला प्रकार: एक समान ढलान
    • दोनों फलनों का ढलान समान होता है, जो MPC के बराबर है। समग्र मांग फलन का ढलान भी c होता है
    • क्योंकि AD में उपभोग सबसे प्रमुख आय-निर्भर घटक है
    • निवेश (I), सरकारी व्यय (G) और शुद्ध निर्यात (NX) स्वायत्त माने जाते हैं।
    • उदाहरणस्वरूप, चार-क्षेत्रीय मॉडल में dAD/dY = c, क्योंकि dC/dY = c और अन्य घटकों का d/dY = 0। इससे मांग वक्र नीचे की ओर ढलान वाला बनता है।​
  • संबंध का दूसरा प्रकार: समानांतरता
    • समग्र मांग फलन उपभोग फलन के समानांतर होता है।
    • उपभोग फलन C = \bar{C} + cY के समानांतर AD = (\bar{C} + \bar{I} + \bar{G} + \bar{NX}) + cY होता है
    • जहां स्वायत्त भाग बढ़ जाता है लेकिन ढलान वही रहता है।
    • चित्र में दोनों रेखाएं समान ढलान वाली समानांतर रेखाएं बनाती हैं
    • उपभोग फलन AD से नीचे होती है। दो-क्षेत्रीय मॉडल (AD = C + I) में यह और स्पष्ट है।​
  • गणितीय व्युत्पत्ति
    • उपभोग फलन से समग्र मांग प्राप्त करने के लिए:
    • AD = C + \bar{A}, जहां \bar{A} = \bar{I} + G + NX (स्वायत्त व्यय)।
    • C = a + bY (a = \bar{C}, b = MPC) ⇒ AD = (a + \bar{A}) + bY।
    • यह दिखाता है कि AD उपभोग फलन का ऊपर खिसका हुआ रूप है।
    • संतुलन में Y = AD = C + \bar{A}, जो उपभोग से प्रेरित है।
  • आर्थिक निहितार्थ
    • मल्टीप्लायर प्रभाव: MPC के कारण उपभोग में वृद्धि AD को गुणात्मक रूप से बढ़ाती है (1/(1 - MPC))।
    • मॉडल-वार भिन्नताएं: दो-क्षेत्र (AD = C + I), तीन-क्षेत्र (C + I + G), चार-क्षेत्र में उपभोग का योगदान प्रमुख रहता है (लगभग 60-70%)।
    • वक्र का आकार: दोनों के नीचे ढलान से AD वक्र बाएं नीचे की ओर झुका होता है।
  • अन्य संभावित संबंध
    • कभी-कभी पूछे जाते विकल्पों में शामिल:
    • उनका अवकलन समान नहीं (नहीं, क्योंकि स्वायत्त भाग अलग)।
    • इंटरसेप्ट समान नहीं (\bar{C} vs \bar{C} + अन्य)।
      सही संबंध: I और II दोनों (ढलान समान + समानांतर)।​

35. अर्थव्यवस्था में समाजवादी समाज के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 10 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

I. सरकार ही यह निर्णय लेती है कि किन वस्तुओं का उत्पादन किया जाए।

II. समाजवाद में माल का वितरण लोगों की आवश्यकता के आधार पर किया जाना चाहिए।

Correct Answer: (b) I और II दोनों
Solution:
  • अर्थव्यवस्था में समाजवादी समाज में सरकार तय करती है कि कौन-सी वस्तुओं का उत्पादन किया जाना है।
  • समाजवाद के अंतर्गत वस्तुओं का वितरण लोगों की आवश्यकता के आधार पर होना चाहिए।
  • इसका उद्देश्य होता है, आय असमानता को कम करना।
  • मुख्य विशेषताएं
    • जिससे निजी लाभ के बजाय सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता मिलती है।
    • उत्पादन संबंधी सभी निर्णय सरकार या केंद्रीय योजना प्राधिकरण द्वारा लिए जाते हैं
    • जिसमें यह तय किया जाता है कि क्या, कितना और कैसे उत्पादन होगा।
    • कीमत यंत्र (प्राइस मैकेनिज्म) की भूमिका सीमित होती है
    • क्योंकि वस्तुओं का वितरण आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है, न कि मांग-आपूर्ति पर।
  • सही कथन की पहचान
    • प्रश्न में "निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है" का उल्लेख है, लेकिन विकल्प नहीं दिए गए हैं
    • इसलिए समाजवादी समाज के संदर्भ में सामान्यतः स्वीकृत सही कथनों पर विचार करें।
    • सरकार उत्पादन के प्रकार का निर्णय लेती है,
    • वस्तुओं का वितरण आवश्यकता के आधार पर होता है।
    • ये कथन समाजवादी सिद्धांत के मूल हैं, जहां केंद्रीकृत नियोजन और समानता प्रमुख हैं।
  • गुण और दोष
    • गुण: आर्थिक समानता सुनिश्चित होती है, क्योंकि आय वितरण कुशलता पर आधारित होता है।
    • सामाजिक सेवाएं जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य सबके लिए सुलभ होती हैं। यह सामूहिक कल्याण को बढ़ावा देता है।
    • दोष: आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव होने से नवाचार कम हो सकता है।
    • प्रतिस्पर्धा न होने से दक्षता प्रभावित होती है। केंद्रीकृत निर्णयों से नौकरशाही बढ़ सकती है।
  • भारतीय संदर्भ
    • भारत जैसे मिश्रित अर्थव्यवस्था वाले देश में समाजवादी तत्व दिखते हैं
    • जैसे MGNREGA और PDS, जो समानता और कल्याण पर आधारित हैं। हालांकि, पूर्ण समाजवाद नहीं अपनाया गया।​
    • ये विशेषताएं कार्ल मार्क्स से प्रेरित हैं, जहां वर्ग संघर्ष के बाद राज्य स्वामित्व आता है।
    • कुल मिलाकर, समाजवादी समाज सामाजिक न्याय पर केंद्रित है।

36. किसी फर्म में जोड़े गए मूल्य की गणना इस प्रकार की जाती है- [CHSL (T-I) 09 मार्च, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) फर्म के उत्पादन का मूल्य - फर्म द्वारा प्रयुक्त मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य
Solution:
  • राष्ट्रीय आय की गणना के लिए तीन विधियां हैं-आय विधि, व्यय विधि और मूल्यवर्धित विधि।
  • मूल्यवर्धित से तात्पर्य किसी फर्म या संगठन द्वारा अपनी उत्पादन गतिविधियों का उपयोग करके कच्चे माल के लिए अतिरिक्त मूल्य से है।
  • इसकी गणना आउटपुट के मूल्य और मध्यवर्ती वस्तुओं के मूल्य के बीच के अंतर के रूप में की जाती है।
  • मूल्यवर्धित = उत्पादन का मूल्य - मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य (कच्चा माल)
  • मूल सूत्र
    • फर्म के जोड़े गए मूल्य की गणना मुख्य रूप से इस फॉर्मूले से होती है:
    • जोड़ा गया मूल्य (Value Added) = उत्पादन का कुल मूल्य (Output Value) - मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य
    • यह फर्म द्वारा उत्पादित वस्तु या सेवा के बाजार मूल्य से उन inputs को घटाकर निकाला जाता है
    • जो अन्य फर्मों से खरीदी गई हों। उदाहरण के लिए, अगर एक फर्म कच्चे माल को खरीदकर कार बनाती है
    • तो कार की बिक्री मूल्य से कच्चे माल, पार्ट्स आदि की लागत घटाई जाती है।
  • गणना की प्रक्रिया (चरणबद्ध)
    • मूल्य वर्धित विधि से राष्ट्रीय आय (जैसे GDP) निकालने के लिए फर्म स्तर पर निम्न चरण अपनाए जाते हैं:
    • चरण 1: उत्पादक उद्यमों की पहचान
    • प्राथमिक (कृषि), द्वितीयक (उद्योग) और तृतीयक (सेवा) क्षेत्रों में सभी फर्मों को वर्गीकृत करें।
    • प्रत्येक फर्म के उत्पादन का बाजार मूल्य (Gross Value of Output at Market Price - GVOMP) निकालें।
    • चरण 2: सकल मूल्य वर्धित (GVA) की गणना
    • प्रत्येक फर्म के लिए: GVA = GVOMP - मध्यवर्ती खपत (Intermediate Consumption)।
    • सभी फर्मों का योग: सकल घरेलू उत्पाद (GDP at Market Price) = ∑ GVA सभी क्षेत्रों में।
    • चरण 3: शुद्ध मूल्य वर्धित (NVA) निकालना
    • NVA = GVA - मूल्यह्रास (Depreciation)।
    • यह पूंजीगत संपत्तियों के घिसाव को ध्यान में रखता है।
    • चरण 4: शुद्ध घरेलू उत्पाद (NDP) और राष्ट्रीय आय
    • NDP = GDP - मूल्यह्रास - शुद्ध अप्रत्यक्ष कर।
    • फिर, राष्ट्रीय आय (NNP) = NDP + विदेश से शुद्ध कारक आय (NFIA)।
    • यह विधि डबल काउंटिंग (दोहरी गणना) से बचाती है
    • क्योंकि केवल वही मूल्य गिना जाता है जो फर्म ने वास्तव में जोड़ा हो।
  • उदाहरण
    • मान लीजिए एक बेकरी फर्म आटा (मध्यवर्ती वस्तु, ₹100) खरीदकर ब्रेड (उत्पाद, ₹200) बनाती है।
    • जोड़ा गया मूल्य = ₹200 - ₹100 = ₹100।
    • अगर कई फर्में हों (जैसे किसान → आटे का मिल → बेकरी
    • तो कुल GDP सभी चरणों के जोड़े मूल्य का योग होता है, न कि अंतिम उत्पाद का मूल्य।​

37. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 16 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

I. 2011 में भारत में मृत्यु दर 7.2 प्रति 100 है।

II. 2012 में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 72.6 वर्ष है।

Correct Answer: (d) न तो I और न ही II
Solution:
  • वर्ष 2011 में भारत में मृत्यु दर 7.1 प्रति हजार थी, न कि 7.2 प्रति 100 भारत में 7.2 प्रति हजार मृत्यु दर वर्ष 2010 में दर्ज की गई थी
  • जो वर्ष 2020 के संदर्भ में घटकर 6 प्रति हजार हो गई है। अतः कथन । गलत है।
  • वर्ष 2010-2014 के मध्य जीवन प्रत्याशा 67.9 वर्ष (विश्व बैंक के अनुसार, वर्ष 2012 में 68 वर्ष) रही।
  • जबकि वर्ष 2014-2018 के मध्य 69.4 वर्ष दर्ज की गई। वर्ष 2016-2020 के मध्य यह 70 वर्ष दर्ज है।
  • विश्व बैंक के अनुसार, वर्ष 2022 में 68 वर्ष दर्ज किया गया है। अतः कथन II भी गलत है।
  • अभाज्य संख्याओं की परिभाषा
    • अभाज्य संख्या की मानक परिभाषा यह है
    • यह 1 से बड़ी कोई प्राकृत संख्या होनी चाहिए जो केवल 1 और स्वयं से ही विभाज्य हो। उदाहरणस्वरूप:
    • 2 पहली अभाज्य संख्या है (केवल 1 और 2 से विभाजित)।
    • 3 केवल 1 और 3 से विभाजित होती है।
    • 1 को अभाज्य नहीं माना जाता क्योंकि इसके केवल एक ही भाजक हैं
    • 1 स्वयं। अभाज्य परीक्षण (primality test) में हमेशा 1 को बाहर रखा जाता है।​
  • भाज्य संख्याओं की परिभाषा
    • भाज्य संख्याएँ 1 से बड़ी वे प्राकृत संख्याएँ हैं जिनके कम से कम तीन भाजक होते हैं (1, स्वयं और कम से कम एक अन्य)।
    • 1 के पास केवल एक भाजक है, इसलिए यह भाज्य भी नहीं है।
    • भाज्य संख्याएँ अभाज्य संख्याओं के गुणनफल से बनती हैं, परंतु 1 को ऐसा नहीं माना जाता।​
  • ऐतिहासिक एवं शैक्षिक संदर्भ
    • यह प्रश्न CTET जैसे शिक्षक भर्ती परीक्षाओं (जैसे 21 जनवरी 2024 पेपर-I गणित) में आता है
    • जहाँ NCERT कक्षा 6-10 पाठ्यक्रम के अनुसार 1 को न अभाज्य न भाज्य कहा जाता है।
    • प्राचीन गणितज्ञ युक्लिड ने भी Elements में 1 को विशेष (unit) माना, न कि अभाज्य।
    • आधुनिक संख्या सिद्धांत (number theory) में भी यही मान्यता है।

38. व्यय विधि के अनुसार, जीडीपी की दी गई अभिव्यक्ति में, निम्नलिखित में से कौन अर्थव्यवस्था द्वारा किए गए आयात व्यय का प्रतिनिधित्व करता है? [CHSL (T-I) 15 अगस्त, 2023 (IV-पाली]

C + I + G + X - M

Correct Answer: (c) M
Solution:
  • अर्थव्यवस्था में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के योग की गणना करके जीडीपी की गणना करते हैं। जिसका सूत्र है-
  • Y = C + I + G + (X - M) जहां Y = जीडीपी, C = उपभोग, I = निवेश, G = सरकारी खर्च,  X = निर्यात, M = आयात ।
  • व्यय विधि का मूल सूत्र
    • व्यय विधि का मानक सूत्र है:
    • GDP = C + I + G + (X - M)
    • C: निजी उपभोक्ता खपत व्यय (Consumption Expenditure) – घरों द्वारा वस्तुओं और सेवाओं पर किया गया खर्च।
    • I: सकल घरेलू निवेश (Gross Domestic Investment) – व्यवसायों और घरों द्वारा पूंजीगत वस्तुओं पर निवेश।
    • G: सरकारी व्यय (Government Expenditure) – केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वस्तुओं, सेवाओं और बुनियादी ढांचे पर खर्च।
    • X: निर्यात (Exports) – विदेशियों द्वारा भारतीय वस्तुओं और सेवाओं पर किया गया खर्च।
    • M: आयात (Imports) – अर्थव्यवस्था द्वारा विदेशी वस्तुओं और सेवाओं पर किया गया कुल व्यय।
    • इस सूत्र में M अर्थव्यवस्था द्वारा किए गए कुल आयात व्यय का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है।
    • यह वह राशि है जो C, I और G में शामिल आयातित वस्तुओं को समायोजित करने के लिए घटाई जाती है, ताकि केवल घरेलू मूल्य वर्धन ही गिने जाए।​
  • आयात व्यय क्यों घटाया जाता है?
    • C, I और G सभी घटक आयातित वस्तुओं को शामिल कर सकते हैं। उदाहरणस्वरूप:
    • यदि कोई उपभोक्ता आयातित मोबाइल फोन खरीदता है, तो यह C में जुड़ता है, लेकिन फोन का उत्पादन भारत में नहीं हुआ।
    • इसी तरह, व्यवसाय आयातित मशीनरी पर निवेश (I) करते हैं या सरकार विदेशी सॉफ्टवेयर खरीदती है (G)।
    • इन आयातों को घटाने से शुद्ध निर्यात (NX = X - M) प्राप्त होता है
    • जो GDP को केवल घरेलू उत्पादन तक सीमित रखता है। यदि M को न घटाया जाए
    • तो GDP में विदेशी उत्पादन का मूल्य शामिल हो जाएगा, जो गलत होगा।
  • व्यय विधि की विशेषताएँ और महत्व
    • यह विधि मांग पक्ष (Demand Side) से GDP मापती है, जो अर्थव्यवस्था की कुल मांग को दर्शाती है।
    • नाममात्र GDP (Nominal GDP) देती है, जिसे मूल्य स्थिरीकरण सूचकांक (Deflator) से वास्तविक GDP में बदला जाता है।
    • भारत जैसे विकासशील देशों में यह विधि लोकप्रिय है क्योंकि आंकड़े सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) से आसानी से उपलब्ध होते हैं।

39. ......., यह किसी व्यक्ति द्वारा ऋण का भुगतान कर पाने में असमर्थ होने की कानूनी घोषणा है [CHSL (T-I) 16 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) दिवालियापन
Solution:
  • दिवालियापन (Bankruptcy) उन लोगों या व्यवसायों के लिए एक कानूनी कार्यवाही है
  • जो अपना बकाया ऋण चुकाने में असमर्थ हैं। यह उन लोगों के लिए होता है, जो अपने बिलों का भुगतान करने में सक्षम नहीं हैं।
  • दिवालियापन क्या है?
    • भारत में, यह इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, 2016 (IBC) के तहत विनियमित होता है
    • जो व्यक्तियों, कंपनियों और साझेदारियों के लिए अलग-अलग प्रावधान प्रदान करता है।
    • व्यक्ति के मामले में, यह तब घोषित किया जाता है
    • जब देनदार स्वयं या लेनदार द्वारा NCLT (National Company Law Tribunal) या DRT (Debt Recovery Tribunal) में याचिका दायर की जाती है।
    • दिवालियापन दिवाला (insolvency) से अलग है—दिवाला वित्तीय असमर्थता की स्थिति है, जबकि दिवालियापन उसकी कानूनी मान्यता।
  • दिवालियापन की प्रक्रिया
    • याचिका दायर करना: यदि ऋण 1,000 रुपये से अधिक है और 30 दिनों से अधिक बकाया है
    • तो लेनदार या देनदार स्वयं IBC के तहत आवेदन कर सकता है। व्यक्तिगत मामलों में, रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) नियुक्त होता है
    • जो देनदार की संपत्ति, आय और देनदारियों का मूल्यांकन करता है।
    • मोरेटोरियम (Moratorium): याचिका स्वीकार होने पर, कोई नया मुकदमा या संपत्ति जब्ती नहीं हो सकती, जो देनदार को राहत देता है।
    • रिपेमेंट प्लान: देनदार 180 दिनों में पुनर्भुगतान योजना प्रस्तुत करता है।
    • यदि असफल, तो दिवालिया प्रक्रिया शुरू होती है, जिसमें संपत्ति बिक्री (liquidation) होती है।
    • निर्णय: NCLT अंतिम आदेश देता है, और बकाया ऋण माफ हो सकते हैं यदि संपत्ति अपर्याप्त हो।
  • ऋण चुकाने पर कानूनी कार्रवाई
    • ऋण डिफॉल्ट पर पहले लेनदार नोटिस भेजता है (30-60 दिन का समय)। यदि भुगतान न हो, तो:
    • सिविल कोर्ट: मुकदमा दायर कर संपत्ति जब्ती और नीलामी का आदेश लिया जा सकता है।
    • SARFAESI एक्ट: बैंक संपत्ति पर कब्जा कर नीलाम कर सकते हैं (90 दिनों के बाद NPA घोषित होने पर)।
    • IBC के तहत दिवालियापन: चरम स्थिति में लागू, जहां देनदार दिवालिया घोषित हो जाता है।
    • क्रिमिनल केस: यदि धोखाधड़ी साबित हो (जैसे चेक बाउंस under NI Act), तो जेल हो सकती है
    • लेकिन साधारण डिफॉल्ट पर नहीं। CIBIL स्कोर खराब होता है, भविष्य के लोन मुश्किल।
  • व्यक्तिगत अधिकार और विकल्प
    • यदि आप ऋण चुका नहीं पा रहे:
    • लेनदार से बातचीत: पुनर्गठन (restructuring), EMI कम या मोरेटोरियम मांगें।
    • ऋण निपटान (Settlement): एकमुश्त कम राशि देकर मामला बंद करें।
    • स्वयं दिवालियापन याचिका: संपत्ति बचाने के लिए IBC का सहारा लें, लेकिन क्रेडिट हिस्ट्री 7-10 वर्ष प्रभावित रहती है।
    • गारंटर का जोखिम: यदि गारंटर हैं, तो उनकी संपत्ति पर भी कार्रवाई हो सकती है।
  • सावधानियां और सलाह
    • डिफॉल्ट से बचने के लिए समय पर भुगतान करें या वकील से सलाह लें।
    • 2026 तक, IBC ने 1 लाख से अधिक मामलों को हल किया है
    • लेकिन व्यक्तिगत दिवालियापन अभी सीमित हैं। कानूनी नोटिस हमेशा वकील से भेजें।

40. अर्थव्यवस्था में सरकारी प्रतिभूतियों (government securities) के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 16 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

I. यह केंद्र सरकार या राज्य सरकारों द्वारा जारी एक व्यापार योग्य लिखत/साधन (instrument) है।

II. उन्हें जोखिम मुक्त गिल्ट-एज लिखत/साधन (instrument) कहा जाता है।

Correct Answer: (b) I और II दोनों
Solution:
  • एक सरकारी सुरक्षा (जी-सेक) संघीय या राज्य सरकारों द्वारा जारी एक व्यापार योग्य साधन है।
  • यह दो प्रकार की होती है-लघु अवधि और दीर्घ अवधि। इन्हें जोखिम-मुक्त गिल्ट-एज्ड इंस्ट्रूमेंट के रूप में जाना जाता है
  • क्योंकि वे सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं और इसीलिए डिफॉल्ट का कोई खतरा नहीं होता है।
  • सही कथन
    • अर्थव्यवस्था में सरकारी प्रतिभूतियों के संबंध में निम्नलिखित दोनों कथन सही हैं:​
    • यह केंद्र सरकार या राज्य सरकारों द्वारा जारी एक व्यापार योग्य साधन है।
    • उन्हें जोखिम मुक्त गिल्ट-एज इंस्ट्रूमेंट कहा जाता है।
  • सरकारी प्रतिभूतियों की परिभाषा
    • सरकारी प्रतिभूतियाँ वे ऋण उपकरण हैं जो केंद्र या राज्य सरकारें अपनी राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए जारी करती हैं।
    • ये ट्रेडेबल सिक्योरिटीज होती हैं
    • जिन्हें प्राइमरी मार्केट में नीलामी के माध्यम से और सेकेंडरी मार्केट (जैसे RBI के NDS-OM प्लेटफॉर्म या स्टॉक एक्सचेंज) में खरीदा-बेचा जा सकता है।
    • ट्रेजरी बिल (T-Bills) शॉर्ट-टर्म (91, 182 या 364 दिन) के होते हैं
    • जबकि सरकारी बॉन्ड या डेटेड सिक्योरिटीज 2 से 40 वर्ष तक की मैच्योरिटी वाली होती हैं।
    • राज्य सरकारें केवल स्टेट डेवलपमेंट लोन्स (SDLs) जारी करती हैं ।
  • जोखिम-मुक्त गिल्ट-एज्ड सिक्योरिटीज क्यों?
    • इन्हें 'गिल्ट-एज्ड' (gilt-edged) कहा जाता है क्योंकि सरकार द्वारा जारी होने पर डिफॉल्ट का जोखिम शून्य होता है
    • सरकार अपनी मुद्रा जारी करने वाली प्राधिकारी होती है। ब्याज (कूपन) और मूलधन का भुगतान गारंटीड होता है
    • जो इन्हें सबसे सुरक्षित निवेश बनाता है। हालांकि, ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से मार्केट वैल्यू प्रभावित हो सकती है, लेकिन क्रेडिट रिस्क नहीं ।
  • अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
    • मौद्रिक नीति संचरण: RBI ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMO) में G-Secs खरीद-बेचकर तरलता और ब्याज दरें नियंत्रित करता है।
    • उदाहरणस्वरूप, G-Secs खरीदने से बाजार में पैसे की आपूर्ति बढ़ती है ।​
    • बाजार पर दबाव: हाल के वर्षों में राज्य सरकारों का उधार बढ़ा है
    • 2024-25 में वेटेड एवरेज यील्ड 7.2% तक घटी), जो कुल सरकारी बॉन्ड सप्लाई को प्रभावित कर RBI की नीतियों को चुनौती दे रहा है ।​
    • निवेशक भागीदारी: खुदरा निवेश कम है क्योंकि तरलता सीमित और प्रक्रिया जटिल लगती है, लेकिन FPI अधिकृत हैं (क्वांटिटेटिव लिमिट्स के साथ) ।​
    • यील्ड में बदलाव: मुद्रास्फीति गिरावट, RBI रेपो दर कट और टैक्स बदलावों से 10-वर्षीय G-Sec यील्ड 7.4% से घटकर ~7% हुई ।​
  • निवेश कैसे करें?
    • RBI रिटेल डायरेक्ट, स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) या म्यूचुअल फंड्स के माध्यम से।
    • न्यूनतम निवेश ₹10,000 से शुरू।
    • जोखिम कम होने से पेंशन फंड्स, बैंक इनका प्रमुख खरीदार हैं ।