विविध (आधुनिक भारतीय इतिहास)

Total Questions: 51

41. निम्नलिखित में से किस वर्ष सर्व श्वेत साइमन कमीशन के विरोध में एक अखिल भारतीय अभियान चलाया गया था? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 23 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) 1928
Solution:
  • साइमन कमीशन का गठन 1927 में हुआ था, लेकिन यह 3 फरवरी 1928 को भारत आया था। इसके सभी सदस्य श्वेत (ब्रिटिश) थे
  • इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था, जिसके कारण भारत में इसका व्यापक विरोध हुआ। इस विरोध में 'साइमन गो बैक' के नारे लगाए गए,
  • लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में मृत्यु हो गई। यह विरोध एक अखिल भारतीय अभियान था।
  • साइमन कमीशन सात ब्रिटिश संसद सदस्यों का एक समूह था जो संवैधानिक सुधारों का अध्ययन करने के लिए 1928 में भारत आया था।
  • इस कमीशन को इसके अध्यक्ष, सर जॉन साइमन के नाम पर साइमन कमीशन कहा जाता था।
  • यह पूर्णतः श्वेत आयोग या सर्व-श्वेत आयोग था, अर्थात इसमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था, जिसके कारण पूरे भारत में इसका व्यापक विरोध हुआ।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने कमीशन का बहिष्कार किया, स्वशासन और संवैधानिक सुधारों पर चर्चा में भारतीयों को शामिल करने की मांग की।
  • लाला लाजपत राय जैसे प्रमुख नेताओं ने कमीशन का कड़ा विरोध किया, और विरोध प्रदर्शनों में से एक के दौरान, पुलिस ने उन पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया, जिससे अंततः उनकी मृत्यु हो गई।
    Other Information
  • 1939
    •  1939 द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत और युद्ध में भारत की बाद की भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण था।
  • 1922
    • 1922 वर्ष चौरी-चौरा घटना के लिए जाना जाता है, जिसके कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया।
  • 1942
    •  1942 महात्मा गांधी द्वारा भारत में ब्रिटिश शासन के अंत की मांग करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन शुरू करने के लिए उल्लेखनीय है।
  • साइमन कमीशन का पृष्ठभूमि
    • जिसके सभी सात सदस्य ब्रिटिश थे और इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था। इसे "सर्व श्वेत आयोग" कहा गया
    • क्योंकि यह पूर्णतः श्वेत सदस्यों वाला था, जिससे भारतीयों में व्यापक असंतोष फैला।
    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सहित सभी प्रमुख दलों ने इसका बहिष्कार घोषित कर दिया।​
  • विरोध अभियान का स्वरूप
    • 3 फरवरी 1928 को कमीशन के बंबई पहुंचने पर देशभर में हड़तालें, जुलूस और विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, जहां "साइमन गो बैक" के नारे लगाए गए।
    • कोलकाता, लाहौर, लखनऊ, विजयवाड़ा और पुणे जैसे शहरों में काले झंडे दिखाए गए और आयोग को कड़ा विरोध झेलना पड़ा।
    • लाला लाजपत राय ने लाहौर में नेतृत्व किया, जहां पुलिस लाठीचार्ज से उनकी मृत्यु हो गई।​
  • प्रभाव और महत्व
    • यह अभियान स्वतंत्रता संग्राम में एकजुटता का प्रतीक बना, जिसने भारतीयों की स्वशासन की मांग को मजबूत किया।
    • आयोग की रिपोर्ट 1930 में आई, लेकिन विरोध के कारण इसका प्रभाव सीमित रहा।
    • यह घटना ने बाद के आंदोलनों जैसे भारत छोड़ो आंदोलन की नींव रखी।​

42. प्रथम अखिल भारतीय किसान सभा का गठन कहां हुआ था? [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) लखनऊ
Solution:
  • प्रथम अखिल भारतीय किसान सभा (All India Kisan Sabha) का गठन 1936 में लखनऊ में हुआ था। इस सभा का उद्देश्य किसानों को उनके अधिकारों के लिए एकजुट करना था। इसके पहले अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती थे, और एन. जी. रंगा इसके सचिव थे।
  • इसका गठन एन.जी. के नेतृत्व में किया गया था। रंगा और स्वामी सहजानंद सरस्वती।
  • सभा का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ किसानों और खेतिहर मजदूरों को एकजुट करना था।
  • सभा ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद भी किसानों के कल्याण के लिए काम करना जारी रखा।
  • अखिल भारतीय किसान सभा को अब अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) के नाम से जाना जाता है और यह भारत में किसानों का प्रतिनिधित्व करने वाले सबसे बड़े संगठनों में से एक है।
    other Information
  • लाहौर अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के 1940 सत्र का स्थल था, जहाँ ऐतिहासिक पाकिस्तान प्रस्ताव पारित किया गया था। अमृतसर जलियाँवाला बाग हत्याकांड के लिए प्रसिद्ध है।
  • यह 13 अप्रैल 1919 को हुआ था, जब कर्नल रेजिनाल्ड डायर की कमान के तहत ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिकों ने निहत्थे भारतीय नागरिकों की भीड़ पर
  • राइफलों से गोलीबारी की थी, जो ब्रिटिश शासन के खिलाफ शांतिपूर्वक विरोध कर रहे थे।
  • दिल्ली भारत की राजधानी है और इसने देश के इतिहास और राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कई महत्वपूर्ण घटनाओं का स्थल था, जिसमें 1942 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया भारत छोड़ो आंदोलन भी
    शामिल था।
  • पृष्ठभूमि
  • इसकी जड़ें 1920 के दशक में हैं, जब बिहार में 1923 में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने बिहार किसान सभा की स्थापना की ।
  • 1929 में सहजानंद के नेतृत्व में किसान आंदोलन तेज हुआ, और 1935 में संयुक्त प्रांत में किसान संघ बना ।
  • एन.जी. रंगा जैसे नेताओं ने प्रांतीय सभाओं को एकजुट करने की योजना बनाई ।​
  • प्रमुख नेता और भूमिकाएं
  • स्वामी सहजानंद सरस्वती: पहले अध्यक्ष चुने गए; बिहार आंदोलन के प्रमुख नेता ।​
  • प्रो. एन.जी. रंगा: महासचिव; स्वतंत्रता सेनानी और किसान नेता ।​
  • अन्य: ई.एम.एस. नंबूदरीपाद, करीनंद शर्मा, यमुना करजी, राहुल सांकृत्यायन ।​
  • महत्वपूर्ण निर्णय
  • इस अधिवेशन में 1 सितंबर को हर साल किसान दिवस मनाने का फैसला लिया गया ।
  • सभा का उद्देश्य किसानों को जमींदारों और ब्रिटिश शोषण से मुक्त करना था, जो ग्राम सभाओं से जिला स्तर तक संगठित होकर उभरा ।
  • बाद में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव बढ़ा ।​

43. अनुबंधित सेवा के लिए अर्हता प्राप्त करने वाले पहले भारतीय कौन थे? [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) सत्येंद्र नाथ टैगोर
Solution:
  • सत्येंद्र नाथ टैगोर (रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई) 1863 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) के लिए अर्हता प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे।
  • उस समय इसे 'अनुबंधित सेवा' भी कहा जाता था। उनकी यह उपलब्धि भारतीयों के लिए ब्रिटिश प्रशासन में उच्च पदों तक पहुँचने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी।
  •  सत्येन्द्र नाथ टैगोर अनुबंधित सेवा के लिए अर्हता प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे।
  •  उन्होंने 1863 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) परीक्षा उत्तीर्ण की और बंगाल प्रेसीडेंसी सिविल सेवा में शामिल हो गए।
  • वह ब्रम्हा समाज के सदस्य थे।
  •  टैगोर टैगोर परिवार के एक प्रमुख सदस्य थे और नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे।
    Other Information
  •  प्रसंविदा सेवा एक शब्द था जिसका उपयोग भारतीय सिविल सेवा के उच्च रैंक का वर्णन करने के लिए किया जाता था
  • जो भारत में ब्रिटिश राज की प्रशासनिक शाखा थी।
  •  गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे और भारत के लिए संवैधानिक सुधारों और स्व-शासन की वकालत करते थे।
  • वह महात्मा गांधी के गुरु भी थे।
  •  सुभाष चंद्र बोस एक उग्र राष्ट्रवादी नेता थे।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया।
  • सुरेंद्र नाथ बनर्जी एक प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादी नेता थे जिन्होंने इंडियन नेशनल एसोसिएशन की स्थापना की थी।
  • यह बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बन गई।

44. चित्तरंजन दास ने चुनाव लड़ने के लिए 1923 में किसके साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की थी? [CHSL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) मोतीलाल नेहरू
Solution:
  • असहयोग आंदोलन की असफलता के बाद स्वराज पार्टी (कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी) का गठन जनवरी, 1923 में सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने किया।
  • सी.आर. दास इसके अध्यक्ष तथा मोतीलाल नेहरू इसके महासचिव थे। इस पार्टी का उद्देश्य चुनावों के माध्यम से काउंसिलों में प्रवेश कर तथा उन्हें काम न करने देकर वर्ष 1919 के भारत शासन अधिनियम का उच्छेदन करना था।
  • स्थापना का पृष्ठभूमि
    • स्वराज पार्टी की स्थापना 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद में हुई, जब महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद कांग्रेस में विभाजन हो गया।
    • दिसंबर 1922 में गया कांग्रेस अधिवेशन में चित्तरंजन दास की अध्यक्षता में विधान परिषदों का बहिष्कार जारी रखने का प्रस्ताव पारित हुआ
    • जिससे असंतुष्ट दास ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद परिवर्तनवादी गुट (जो परिषदों में प्रवेश कर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ संघर्ष करना चाहता था) ने यह नया दल बनाया।​
  • प्रमुख संस्थापक और भूमिकाएँ
    • चित्तरंजन दास: पार्टी के अध्यक्ष बने, जिन्हें 'देशबंधु' कहा जाता था। वे बंगाल से थे और स्वराज (स्वशासन) की मांग को मजबूत करने के लिए चुनाव लड़ना चाहते थे।​
    • मोतीलाल नेहरू: सचिव नियुक्त हुए, जिन्होंने दास के साथ मिलकर दल की रणनीति तैयार की।​
    • अन्य प्रमुख नेता: विट्ठलभाई पटेल, मदन मोहन मालवीय, नरसिंह चिंतामन केलकर और जयकर भी जुड़े।​
  • उद्देश्य और गतिविधियाँ
    • पार्टी का मुख्य लक्ष्य विधान परिषदों में चुनाव लड़कर ब्रिटिश सरकार को अंदर से कमजोर करना था, न कि बहिष्कार करना।
    • 1923 के बंगाल विधान परिषद चुनावों में स्वराज पार्टी ने बहुमत हासिल किया और स्वशासन की मांग तेज की।
    • यह दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 'कांग्रेस-खिलाफत स्वराज्य पार्टी' के रूप में भी जाना गया, जो राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था।​
  • महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ
    • स्वराज पार्टी ने 1923-1926 तक विधान परिषदों में सक्रिय रहकर ब्रिटिश नीतियों का विरोध किया, जैसे कि बजट पास न करने और स्वराज प्रस्ताव लाने में।
    • चित्तरंजन दास की मृत्यु (1925) के बाद मोतीलाल नेहरू ने नेतृत्व संभाला, लेकिन 1926 में कांग्रेस ने इसे भंग करने का फैसला लिया।
    • इसने स्वतंत्रता संग्राम में चुनावी राजनीति की शुरुआत की।​​

45. वर्ष 1922 में गठित स्वराज पार्टी के अध्यक्ष कौन थे? [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) चितरंजन दास
Solution:
  • स्वराज पार्टी के अध्यक्ष चितरंजन दास थे। स्वराज पार्टी की स्थापना दिसंबर 1922 में कांग्रेस के गया अधिवेशन के बाद हुई थी
  • जिसमें चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू प्रमुख नेता थे। चितरंजन दास पार्टी के अध्यक्ष बने, जबकि मोतीलाल नेहरू सचिव थे। 
  •  पार्टी का उद्देश्य स्वशासन प्राप्त करना तथा ब्रिटिश शासन से अधिक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना था।
  • चित्तरंजन दास एक प्रमुख भारतीय राजनीतिज्ञ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता थे।
  •  उन्हें 'देशबंधु' के नाम से भी जाना जाता था, जिसका अर्थ है 'राष्ट्र' मित्र'।
  •  स्वराज पार्टी का गठन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण बदलाव था, जिसका ध्यान विधायी सुधारों और सरकार में सक्रिय भागीदारी पर केंद्रित था।
    Other Information
  •  पार्टी का उद्देश्य चुनावों के माध्यम से विधान परिषदों में प्रवेश करना तथा अंदर से ब्रिटिश सरकार का विरोध करना था।
  • स्वराज पार्टी ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों और आंदोलनों की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • चित्तरंजन दास के नेतृत्व और दूरदर्शिता ने पार्टी के प्रारंभिक वर्षों के दौरान इसकी नीतियों और कार्यों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • स्वराज पार्टी का गठन
    •  हालांकि औपचारिक घोषणा 1 जनवरी 1923 को इलाहाबाद में की गई। यह पार्टी असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद बनी
    • जब चित्तरंजन दास ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि अधिवेशन में विधान परिषदों का बहिष्कार जारी रखने का प्रस्ताव पारित हुआ।
    • चित्तरंजन दास को अध्यक्ष चुना गया, जबकि मोतीलाल नेहरू इसके सचिव बने; अन्य प्रमुख सदस्यों में विट्ठलभाई पटेल और मदन मोहन मालवीय शामिल थे।​
  • उद्देश्य और रणनीति
    • पार्टी का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश विधान परिषदों में प्रवेश कर सरकार के खिलाफ अंदरूनी संघर्ष करना थान
    • कि पूर्ण बहिष्कार। नेताओं ने स्वराज (स्वशासन) प्राप्त करने के लिए चुनाव लड़ने और विधायिकाओं में रचनात्मक विरोध करने का फैसला किया
    • जो असहयोग आंदोलन की निष्क्रियता के बाद एक नई दिशा थी। इससे वे 'अपरिवर्तनवादी' गुट के रूप में जाने गए, जो गांधीजी के बहिष्कार नीति से असहमत थे।​
  • प्रमुख उपलब्धियां
    • स्वराज पार्टी ने 1923 के चुनावों में जबरदस्त सफलता हासिल की, विशेषकर बंगाल और सेंट्रल प्रांत में बहुमत प्राप्त कर विधान परिषदों में सरकार को कठिनाई पहुंचाई।
    • चित्तरंजन दास ने बंगाल में मुख्यमंत्री पद संभाला, लेकिन साम्प्रदायिक दबावों के कारण इस्तीफा दे दिया।
    • पार्टी ने 1926 तक सक्रिय रही, जब आंतरिक मतभेदों और कांग्रेस के साथ विलय से यह समाप्त हो गई।​​

46. किस वर्ष में हिंदू महासभा की स्थापना मुस्लिम कट्टरवाद की प्रतिक्रिया के रूप में की गई थी? [CGL (T-I) 25 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) 1915
Solution:
  • हिंदू महासभा की स्थापना 1915 में मदन मोहन मालवीय और अन्य नेताओं द्वारा की गई थी।
  • इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य मुस्लिम कट्टरवाद (और बाद में मुस्लिम लीग) की राजनीति और हिंदू समुदाय की सामाजिक और धार्मिक रक्षा करना था।
  • स्थापना और कारण
    • हिंदू महासभा की स्थापना पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में हरिद्वार (प्रयाग) में हुई थी।
    • उस समय भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी तत्वों के बढ़ते प्रभाव के मद्देनजर हिंदू समाज के हितों की रक्षा और संगठन के लिए हिंदू महासभा का गठन किया गया।
    • यह संगठन मुख्यतः हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदुओं के अधिकारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम बना।
  • राजनीतिक भूमिका
    • हिंदू महासभा ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक विशिष्ट भूमिका निभाई। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की मुखर आलोचक थी
    • मुस्लिम लीग के प्रति कट्टरपंथी प्रतिक्रिया स्वरूप उभरी। हिंदू महासभा ने उस दौर में हिंदू समुदाय के संगठित होने और अपने राजनीतिक तथा सामाजिक हितों की रक्षा के लिए काम किया।
  • महत्वपूर्ण तथ्य
    • हिंदू महासभा ने अखंड भारत का नारा दिया और हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया।
    • यह संगठन आर्य समाज और अन्य हिंदू संगठनों से भी जुड़ा हुआ था।
    • बाद में 1925 में यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ भी जुड़ा।
    • इसके प्रमुख नेताओं में मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, और विनायक दामोदर सावरकर प्रमुख थे।
    • इस प्रकार, हिंदू महासभा की स्थापना 1915 में मुस्लिम कट्टरवाद और उसके बढ़ते प्रभाव के विरोध और हिंदू समुदाय के हितों की रक्षा के लिए हुई थी।
    • यह संगठन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रमुख वाहक था और इसका गठन उस समय की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का परिणाम था

47. भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, भारत सरकार के ....... का एक बंदी निकाय है। [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) शिक्षा मंत्रालय
Solution:
  • भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (Indian Council of Historical Research - ICHR), भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय (जिसे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय कहा जाता था) का एक स्वायत्त निकाय है।
  • इसकी स्थापना 1972 में इतिहास अनुसंधान को बढ़ावा देने और दिशा देने के उद्देश्य से की गई थी।
  • स्थापना और पृष्ठभूमि
    • कार्यदल में शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय (वर्तमान शिक्षा मंत्रालय) के अधिकारी शामिल थे
    • जैसे वीराराघवन और श्रीमती एस. दुरैस्वामी। यह सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के तहत पंजीकृत है
    • जो साहित्यिक, वैज्ञानिक और धर्मार्थ संस्थाओं के लिए लागू होता है।​
  • उद्देश्य
    • परिषद का मुख्य लक्ष्य ऐतिहासिक शोध को बढ़ावा देना, वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक इतिहास लेखन को प्रोत्साहित करना है।
    • इसमें 24 उद्देश्य वर्णित हैं, जिनमें देश में ऐतिहासिक अनुसंधान और उसके उपयोग को बढ़ाने के लिए विभिन्न उपाय शामिल हैं।
    • यह इतिहासकारों को सहायता प्रदान करती है और शोध परियोजनाओं का समर्थन करती है।​
  • संगठन संरचना
    • परिषद के शीर्ष पर एक अध्यक्ष और सदस्य-सचिव होते हैं। उदाहरण के लिए, 2022 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उमेश अशोक कदम को सदस्य-सचिव नियुक्त किया गया था।
    • यह शिक्षा मंत्रालय के अधीन कार्य करती है और स्वायत्तता के साथ शोध गतिविधियां संचालित करती है।​

48. भारतीय स्वतंत्रता दिवस के 75वें वर्ष के समारोह का विषय क्या था? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम
Solution:
  • राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम (Nation First, Always First)। भारत की स्वतंत्रता के 75वें वर्ष के समारोह
  • जिसे आजादी का अमृत महोत्सव कहा गया, का आधिकारिक विषय "राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम" (Nation First, Always First) था।
  • यह समारोह 2021 से शुरू होकर 2023 तक चला।
  •  जो भारत सरकार की एक प्रमुख पहल के रूप में शुरू किया गया। यह उत्सव भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर केंद्रित था
  • 2021 से 2022-2027 तक चला, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के नायकों, संस्कृति, उपलब्धियों और भविष्य की प्रगति पर जोर दिया गया।​
  • आजादी का अमृत महोत्सव
    • यह कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा आयोजित सतत प्रयास था, जिसमें देशभर में प्रदर्शनियां, रैलियां, सामुदायिक कार्यक्रम और डिजिटल अभियान शामिल थे।
    • इसमें असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों को दर्शाया गया, साथ ही विस्मृत स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करने पर बल दिया गया।
    • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन में इस महोत्सव को आजादी की ललक और भविष्य की उन्नति से जोड़ा, जिसमें नए इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग और तकनीकी नवाचार पर जोर दिया गया।​
  • प्रमुख थीम और संदेश
    • कुछ स्रोतों में 75वें समारोह की उप-थीम के रूप में "राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम" का उल्लेख है, जो राष्ट्र को सर्वोपरि रखने के संदेश पर आधारित था।
    • लोगों से सोशल मीडिया पर तिरंगा प्रोफाइल फोटो लगाने का आह्वान किया गया, जिसे 2 अगस्त से 15 अगस्त तक चलाया गया।
    • स्थानीय स्तर पर राज्यों और शहरों ने भी अपने कार्यक्रम आयोजित किए, जैसे ठाणे में 12-15 अगस्त तक कार्निवल और प्रदर्शनियां।​
  • अन्य पहलें
    • इस वर्ष स्वर्णिम विजय वर्ष (1971 युद्ध की याद में) और महापरिनिर्वाण दिवस जैसी विशेष योजनाएं शुरू की गईं।
    • महोत्सव ने 5000 वर्षों के प्राचीन इतिहास को 75 वर्षों की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए सामूहिक उपलब्धियों को रेखांकित किया।
    • कुल मिलाकर, यह समारोह न केवल इतिहास की स्मृति था, बल्कि आधुनिक भारत की प्रगति का प्रतीक भी बना।

49. निम्नलिखित में से किसने आम लोगों में राष्ट्रवाद की भावना जगाने के लिए शिवाजी महोत्सव की शुरुआत की? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) लोकमान्य तिलक
Solution:
  • बाल गंगाधर तिलक, जिन्हें लोकमान्य तिलक के नाम से जाना जाता है, ने आम लोगों में राष्ट्रवाद की भावना जगाने और ब्रिटिश विरोध को मजबूत करने के लिए 1893 में गणपति महोत्सव और 1895 में शिवाजी महोत्सव की शुरुआत की।
  • ये त्योहार लोगों को एक मंच पर लाने और राजनीतिक शिक्षा देने का माध्यम बने।
  • शिवाजी महोत्सव :-
    • यह महान मराठा योद्धा राजा शिवाजी के सम्मान में महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला एक सांस्कृतिक त्योहार है।
      Other Information
  •  गोपाल कृष्ण गोखले :-
    •  वह एक समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने भारत में निम्न वर्गों और महिलाओं के उत्थान के लिए काम किया।
    •  वह महात्मा गांधी के गुरु भी थे।
  •  अरविन्द घोष :-
    •  वह एक क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की।
    •  वह क्रांतिकारी समूह, अनुशीलन समिति के सदस्य थे।
  •  सुरेंद्रनाथ बनर्जी :-
    • वह एक स्वतंत्रता सेनानी थे और उन शुरुआती भारतीय राजनीतिक नेताओं में से एक थे
    • जिन्होंने ब्रिटिश सरकार में भारतीयों के लिए स्वशासन और प्रतिनिधित्व की मांग की थी।
  • शुरुआत और स्थान
    • तिलक ने 15 अप्रैल 1895 को रायगढ़ किले में इस महोत्सव की शुरुआत की, जहां छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ था।
    • यह उत्सव महाराष्ट्र के लोगों में शिवाजी के प्रति गर्व और एकता की भावना पैदा करने के लिए शुरू किया गया, जो जाति-धर्म के आधार पर बंटे थे।​
  • उद्देश्य
    • तिलक का मुख्य लक्ष्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनता को एकजुट करना था, क्योंकि पारंपरिक त्योहार निजी रूप से मनाए जाते थे।
    • शिवाजी को मराठा योद्धा के रूप में प्रस्तुत कर उन्होंने राष्ट्रवाद का संदेश फैलाया, जो बाद में पूरे भारत में फैला।​
  • प्रभाव
    • इसके साथ ही तिलक ने 1893 में सार्वजनिक गणेशोत्सव भी शुरू किया, जिससे अंग्रेज परोक्ष रूप से प्रभावित हुए।
    • शिवाजी महोत्सव ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।​

50. सन् ....... में, अंबेडकर ने मंदिर प्रवेश आंदोलन शुरू किया जिसमें महार जाति के लोगों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया था। [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 04 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) 1927
Solution:
  • डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने 1927 में मंदिर प्रवेश आंदोलन शुरू किया, जिसमें महार जाति के लोगों ने महाराष्ट्र के महाड में चावदार तालाब से पानी लेने और कालाराम मंदिर में प्रवेश करने के लिए संघर्ष किया।
  • इस आंदोलन का उद्देश्य अस्पृश्यता को समाप्त करना और दलितों को सार्वजनिक अधिकारों और धार्मिक समानता दिलाना था
  • यह आंदोलन अंबेडकर द्वारा शुरू किया गया पहला प्रमुख प्रयास था, जो अछूतों या दलितों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिलाने के लिए था
  • क्योंकि उस समय जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें मंदिरों, कुओं और सार्वजनिक स्थानों से वंचित रखा जाता था।​
  • आंदोलन का प्रारंभ
    • 27 जून 1927 को अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ अमरावती के अंबादेवी मंदिर (Ambadevi Temple) की ओर मार्च किया, ताकि दलितों को धार्मिक स्थलों में प्रवेश की अनुमति मिल सके।
    • इससे पहले दलितों ने मंदिर समिति को दो बार अपील की थी, लेकिन असफल रहे, इसलिए यह सत्याग्रह एक अहिंसक विरोध के रूप में उभरा।
    • हालांकि, ऊपरी जातियों के विरोध के कारण तत्काल सफलता नहीं मिली, लेकिन इसने पूरे देश को जातीय पूर्वाग्रहों की गहराई दिखाई।​
  • अन्य प्रमुख आंदोलन
    • 1927 से 1935 के बीच अंबेडकर ने तीन मंदिर प्रवेश आंदोलनों का नेतृत्व किया। 1929 में पुणे के पार्वती मंदिर सत्याग्रह हुआ
    • जबकि 1930 में नासिक के कालाराम मंदिर आंदोलन सबसे बड़ा था, जिसमें 2 मार्च से 15,000 से अधिक दलित अनुयायी शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए इकट्ठे हुए।
    • इन आंदोलनों में महार समुदाय की भारी भागीदारी रही, जो अंबेडकर के जन्म जाति से जुड़ी थी
    • इन्होंने मंदिरों के कुओं से पानी पीने तथा प्रवेश के अधिकारों को लक्षित किया।​
  • उद्देश्य और प्रभाव
    • इन आंदोलनों का मुख्य लक्ष्य हिंदू समाज में जातिगत भेदभाव को उजागर करना और दलितों को समान अधिकार दिलाना था।
    • हालांकि अदालत ने दलितों के पक्ष में फैसला नहीं दिया और कालाराम आंदोलन 1933 तक चला, फिर भी इन्होंने कई मंदिरों को दलितों के लिए खोलने का मार्ग प्रशस्त किया तथा सामाजिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुए।
    • अंबेडकर ने बाद में मंदिर प्रवेश से अधिक शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी पर जोर दिया।