विविध (भारतीय राजव्यवस्था) भाग-II

Total Questions: 39

11. अमेरिका के मामले 'दोहरी नागरिकता' से आप क्या समझते हैं? [CGL (T-I) 25 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) देश की नागरिकता के साथ वहां के उस संघटक राज्य की नागरिकता जहां व्यक्ति रहता है / पैदा हुआ है।
Solution:
  • अमेरिका के मामले में 'दोहरी नागरिकता' का अर्थ है
  • देश की नागरिकता के साथ वहां के उस संघटक राज्य की नागरिकता जहां व्यक्ति रहता है
  • जन्म लिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में एक व्यक्ति देश के साथ-साथ उसके राज्य का भी नागरिक होता है, यह अमेरिका की संघीय विशेषता है।
  • मायने और परिभाषा
    • अमेरिका की शिक्षा-विधि के अनुसार, नागरिकता का संबंध केवल देश के साथ नहीं रहता
    • किसी-किसी राज्य (यूएस के राज्यों) के साथ भी नागरिकता का संबंध माना जा सकता है।
    • इसलिए एक व्यक्ति एक ही समय में देश और राज्य की नागरिकता हो सकता है [websources: Testbook प्रकार की व्याख्या].​
  • कैसे संभव है
    • अमेरिकी कानून स्पष्ट रूप से दूसरे देश की नागरिकता लेने पर अमेरिकी नागरिकता नहीं खोने देता
    • जब तक दूसरे देश की नागरिकता भी वैध रूप से स्वीकार्य हो। इसका अर्थ है कि dual citizenship संभव है
    • लेकिन इसके राजनैतिक-जिम्मेदारियाँ और कराधान जैसे दायित्वों के प्रति सतर्क रहना पड़ता है.​
  • दायित्व और अधिकार
    • दोहरी नागरिकता वाले अमेरिकी नागरिक को दोनों देशों के नियमों का पालन करना होता है
    • भरना, जरूरत पड़ने पर सैन्य दायित्व (जहाँ लागू हो), और चुनाव/रज्य-नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों में भागीदारी आदि। साथ ही, पासपोर्ट की उपलब्धता के अनुसार यात्रा की स्वतंत्रता बढ़ जाती है.​
  • कानूनी और प्रशासनिक पहलू
    • कुछ संघीय देश/राज्यों में विशेष प्रशासनिक नमूनों के कारण नागरिकता के दायरे में भिन्नताएँ हो सकती हैं
    • अमेरिका में सामान्य तौर पर नागरिकता पाने के बाद किसी अन्य देश की नागरिकता स्वीकारने से अमेरिकी नागरिकता स्वतः नहीं छूटती।
    • यह स्थिति कई देशों में समान रूप से लागू हो सकती है, पर हर देश की नीति भिन्न हो सकती है.​
  • लोकप्रिय मिथक बनाम वास्तविकता
    • कई परीक्षाओं/ज्ञान-स्रोतों में यह माना जाता है
    • अमेरिका में “द्वि-नागरिकता” पूरी तरह से संरक्षित है
    • किसी एक देश की नागरिकता लेने से अन्याय नहीं होता
    • असल में यह निर्णय कुछ मामलों में जटिल हो सकता है
    • क्योंकि कुछ देशों की नागरिकता लेने से उनकी सरकार के नियम एकदम अलग हो सकते हैं
    • कुछ देशों की नागरिकता लेने से अमेरिकी कानून के कुछ दायित्वों में बदलाव आ सकता है.​
  • क्या अमेरिका में किसी के पास एक समय में दो नागरिकताएँ हो सकती हैं?
    • हाँ, संभव है, बशर्ते दूसरा देश भी द्वि-नागरिकता स्वीकार करता हो और दोनों देशों के कानूनों के अनुरूप व्यवहार किया जाए।
    • अमेरिका अपने नागरिकों को अन्य देशों की नागरिकता लेने से रोकता नहीं है.​
  • क्या द्वि-नागरिकता लेने पर अमेरिकी नागरिकता खो जाती है?
    • सामान्य स्थिति में नहीं; अमेरिकी नागरिकता खोने की स्थिति तब हो सकती है
    • अगर स्वयं व्यक्ति ऐसी क्रिया कर दे जो अमेरिकी कानून के अनुसार नागरिकता छोड़ने के समान मानी जाए
    • कानूनन निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत नागरिकता छोड़ दे।
    • लेकिन के बारे में सामान्य तौर पर दूसरा देश लेने से अमेरिकी citizenship स्वत: समाप्त नहीं होता.​
  • क्या कर कानून में बदलाव आते हैं?
    • द्वि-नागरिकता रखने वाले लोगों को दुनियाभर में कर देयताओं के नियमों को समझकर पालन करना पड़ता है
    • अमेरिका जहाँ नागरिकता पर कर देयता बना सकता है, वहीं दूसरे देश की भी कर व्यवस्था लागू हो सकती है
    • जिसे संयुक्त रूप से देखना चाहिए.​
  • अमेरिका बनाम अन्य देश (द्वि-नागरिकता के संदर्भ में)
    • अधिकार: दोनों देशों के नागरिक अधिकारों का लाभ
    • दायित्व: दोनों देशों के कानूनों का पालन (कर, सेना, जूरी आदि)
    • यात्रा: अमेरिकी पासपोर्ट से प्रवेश-निकास आसान
    • जोखिम/चिंताएँ: टैक्स-अपील्स, सुरक्षा-आवश्यकताएँ, कुछ मामलों में भिन्न कानूनी दायित्व

12. भारत में आयुध अधिनियम किस वर्ष पारित किया गया था? [CHSL (T-I) 10 मार्च, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) 1959
Solution:
  • भारत में आयुध अधिनियम वर्ष 1959 में पारित किया गया था
  • जिसका उद्देश्य भारत में हथियारों एवं गोला-बारूद के अधिग्रहण, कब्जे, निर्माण, बिक्री, आयात एवं निर्यात को विनियमित करना है।
  • उद्देश्य: आग्नेय हथियारों के उत्पादन, कब्जे, बिक्री, हस्तांतरण, आयात-निर्यात और परिवहन को विनियमित करना; लाइसेंसिंग आवश्यक बनाना।
  • लाइसेंसिंग: नागरिकों के लिए हथियार रखने/धारण के लिए वैध लाइसेंस अनिवार्य।
  • दंड: अवैध कब्जा, निर्माण, बिक्री या ले जाने पर सजा-दार्जन निर्धारित।
  • संशोधन: समय के साथ सुरक्षा और नियंत्रण बढ़ाने के लिए कई बार संशोधन किए गए हैं (उदा. 2016 के आयुध नियम के संशोधन).
  • उद्धरण और संदर्भ
    • आयुध अधिनियम, 1959 के बारे में आधिकारिक संक्षेप/सूचना देखें
    • भारत सरकार के आधिकारिक प्रकाशन और कानून-आधार स्रोत ।​
    • 1959 के अधिनियम के साथ सम्बद्ध नियम और संशोधनों की जानकारी आयुध नियम, 2016 से जुड़ीसरकारी नोटिफिकेशन में मिलती है ।​
  • यदि चाहें तो आगे ऐसी चीजें भी दे सकता हूँ:
    • उम्र-आधार पर लाइसेंसिंग के मानक (योग्यता, पात्रता, सुरक्षा मानक).
    • प्रमुख संशोधनों की एक क्रमवार सूची (वर्ष-प्रारूप और प्रावधान).
    • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1878 के ब्रिटिश-era अधिनियम से 1959 के अधिनियम तक परिवर्तन-यात्रा.

13. भारत में दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) किस वर्ष पारित किया गया था? [CHSL (T-I) 10 मार्च, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) 1961
Solution:
  • भारत में दहेज प्रतिषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act), 1961 में पारित किया गया था।
  • यह अधिनियम दहेज प्रथा पर अंकुश लगाने के लिए बनाया गया था, जो भारत में एक सामाजिक बुराई है
  • जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण पर रोक लगती है।
  • अधिनियम का इतिहास
    • दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 को 20 मई 1961 को पारित किया गया और यह पूरे भारत (जम्मू-कश्मीर को छोड़कर, जो तब अलग था) में लागू हुआ।
    • यह भारत गणराज्य के बारहवें वर्ष में संसद द्वारा अधिनियमित हुआ।
    • प्रथा की जड़ें गहरी होने के बावजूद, स्वतंत्र भारत में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए यह पहला प्रमुख कदम था।​
  • मुख्य प्रावधान
    • अधिनियम दहेज को "विवाह के समय या उसके पहले-पश्चात् सीधे या परोक्ष रूप से दी जाने वाली कोई संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति" के रूप में परिभाषित करता है।
    • दहेज लेने, देने या मांगने पर न्यूनतम 6 माह की कैद और 5,000 रुपये तक जुर्माना या दोनों होता है
    • अधिकतम सजा 2 वर्ष की कैद और 10,000 रुपये का जुर्माना है।
    • मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महर या दान को दहेज से बाहर रखा गया है।​
  • संशोधन और सख्ती
    • 1984 और 1986 में संशोधन कर दंड को कठोर बनाया गया, जिसमें दहेज मांग पर न्यूनतम 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपये या दहेज मूल्य (जो अधिक हो) जुर्माना जोड़ा गया।
    • इनमें विवाह संबंधी विज्ञापनों पर रोक और वर-वधू को दिए जा सकने वाले उपहारों की सीमा भी निर्धारित की गई।
    • धारा 498A (IPC, 1983) के साथ यह महिलाओं के खिलाफ क्रूरता को दंडित करता है।​​
  • प्रभाव और आंकड़े
    • कानून के बावजूद NCRB डेटा के अनुसार प्रतिवर्ष हजारों दहेज उत्पीड़न मामले दर्ज होते हैं।
    • जागरूकता और सख्त प्रवर्तन की आवश्यकता बनी हुई है।
    • अधिनियम सभी धर्मों पर लागू होता है।​

14. 'स्वतंत्र भारत का संविधान बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के ऐसे संविधान सभा द्वारा बनाया जाना चाहिए, जो व्यस्क मताधिकार के आधार पर चुना गया हो।' यह बयान किसने दिया था ? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) जवाहरलाल नेहरू
Solution:
  • स्वतंत्र भारत का संविधान बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के ऐसे संविधान सभा द्वारा बनाया जाना चाहिए
  • जो वयस्क मताधिकार के आधार पर चुना गया हो। यह कथन जवाहरलाल नेहरू का था।
  • core answer: यह पंक्ति जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत के संविधान के संदर्भ में कहा था
  • स्वतंत्र भारत का संविधान बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संविधान सभा के द्वारा बनाया जाना चाहिए।
  • यह विचार नेहरू के लोकतांत्रिक और प्रतिनिधि शासन के सपने का हिस्सा था।​
  • विस्तार से समझना
    • संदर्भ और इतिहास: नेहरू ने दशक के अंत में भारत के संविधान-निर्माण की दिशा-निर्देशों को सुगठित करते समय यह स्पष्ट किया
    • लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता की भागीदारी से तैयार किया गया संविधान ही वास्तविक स्वतंत्रता का आधार होगा।
    • वह चाहते थे कि संविधान सभा जनता द्वारा चुनी जाए और उसकी संरचना सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित हो।​
    • अन्य प्रमुख संदर्भ: इस विचार के साथ कुछ अन्य नेताओं और विचारकों के योगदान भी जुड़ते हैं
    • जैसे एम.एन. रॉय, सरदार पटेल आदि—पर मुख्य संदर्भ इस बयान के लिए नेहरू का उल्लेखित योगदान ही माना जाता है।​
    • संविधान सभा का गठन और प्रक्रिया: संविधान सभा का चुनाव 1946–1947 के दायरे में हुआ
    • 1949 में संविधन-स्वीकृति (अंगीकृत) के साथ यह प्रक्रिया समाप्त मानी जाती है
    • इसी क्रम में नेहरू के दर्शन के अनुरूप यह निर्धारित किया गया
    • संविधान का मसौदा संविधान सभा के माध्यम से तयार होना चाहिए।​

15. निम्नलिखित में से क्या भारतीय संविधान का राजनीतिक दर्शन नहीं है? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) एक सर्वनिष्ठ राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है
Solution:
  • ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों के प्रति संवेदनशील, धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील एवं सामुदायिक मूल्यों के प्रति उदारवादी ये सभी भारतीय संविधान का राजनीतिक दर्शन है
  • परंतु एक सर्वनिष्ठ राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं है, यह भारतीय संविधान का राजनीतिक दर्शन नहीं है।
  • व्यापक प्रकृति (धारणा)
    • भारतीय संविधान का दर्शन बहु-विध (multipronged) है
    • उदार लोकतंत्र, सामाजिक-आर्थिक समानता, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढांचा, और राष्ट्रीय एकता में संतुलन बनाना।
    • इन सभी परंपराओं के साथ, संविधान नागरिकों की धार्मिक, भाषाई और सामाजिक विविधताओं को मान्यता देता है
    • वंचित समूहों के लिए संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
    • इस विस्तृत दर्शन को एक छोटे स्पेस में नहीं कैद किया जा सकता, बल्कि इसे स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय और एकात्मक राष्ट्रीय दृश्य के साथ जोड़ा जाना चाहिए.​
  • लोकतांत्रिक मूल्यों पर केंद्रित
    • प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों के ढांचे के साथ, संविधान लोक प्रतिनिधित्व, चुनावी प्रक्रिया, और सत्ता के peaceful transfer को सुनिश्चित करता है
    • ताकि जनता के शासन के मूल नैतिक सिद्धांत बने रहें.​
  • सामाजिक-आर्थिक न्याय
    • समानता के अधिकार, सामाजिक-नीतियों के जरिए कमजोर समूहों की स्थिति सुधारना, और आर्थिक-न्याय की दिशा में संस्थागत संरचनाओं को सक्षम बनाना
    • ये सब संविधान के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं.​
  • धर्मनिरपेक्षता और बहुधर्मी सह-अस्तित्व
    • राज्य-धर्म separation और विविध धार्मिक-आस्था के भीतर विविधताओं की सुरक्षा संविधान की केंद्रीय धुरी है
    • यह धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक अधिकारों के वितरण को सीमित करता है
    • ताकि समान नागरिक अधिकार हर नागरिक तक पहुँचें.​
  • संविधान के दर्शन से जुड़ी संभावित गलतफहमी
    • कभी-कभी लोग इसे “उदार” या “शुद्ध औपनिवेशिक/पश्चिमी” मॉडल के साथ सीधे जोड़ लेते हैं
    • परन्तु भारतीय धारणा स्थानीय सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार विकसित हुई है।
    • यह दृष्टिकोण भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और संघीय संतुलन को एक साथ मानता है
    • जो एक विशेष देश के लिए लचीला और व्यावहारिक मॉडल बनाता है.​
    • साथ ही, यह दर्शन संरक्षित अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक-नीतिगत प्रगतिशीलताओं को भी स्वीकारता है
    • ताकि संसद और न्यायिक व्यवस्था के माध्यम से समय के साथ सुधार संभव हो सके.​
  • कौन सा पहलू नहीं है?
    • अगर पूछा जाए कि इनमें से कौन सा भारतीय संविधान का राजनीतिक दर्शन नहीं है
    • तो स्पष्ट उत्तर यह नहीं दिया जा सकता कि एक “एकल” विशेष स्वरूप है।
    • कारण यह है कि दर्शन एक बहुआयामी संयोजन है
    • उदार लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, संघीय प्रकृति और धर्मनिरपेक्षता सभी एक साथ स्थापित हैं।
    • hence, किसी एक घटक को बाहर रखना या न मानना दर्शन को गलत ठहराने के समान हो सकता है।
    • वास्तविकता में, भारतीय संविधान का दर्शन इन सभी को जोڑकर चलने का संदेश देता है.​
    • मुख्य स्रोतों के संकेत
    • संविधान का राजनीतिक दर्शन पर समेकित परिपेक्ष्य: बहु-आयामी, समावेशी और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक उपायों पर जोर, स्वतंत्रता–समानता–सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्धता.​
    • प्रमुख विशेषताएं और धर्मनिरपेक्षता का संकेत: संविधान का ढांचा संघीयता, उदार लोकतंत्र और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक चर्चाओं के अनुरूप है.​
    • प्रस्तावना के तत्व और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली का उल्लेख: लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व—ये सभी मिलकर संविधान के उद्देश्यों को बताते हैं.​

16. निम्नलिखित में से कौन-सी भारतीय संविधान की एक विशेषता है? [CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) सबसे लंबा लिखित संविधान
Solution:
  • भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं-
    • सबसे लंबा लिखित संविधान
    • संघात्मकता एवं एकात्मकता का मिश्रण
    • एकीकृत और स्वतंत्र न्यायपालिका
    • संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता
    • सरकार का संसदीय स्वरूप।
  • मुख्य विशेषताएं (संघीय, लिखित, सर्वोच्चता)
    • लिखित संविधान: भारत का संविधान एक लिखित दस्तावेज है जो राष्ट्रीय कानून के ऊपरी सिद्धांतों को स्थापित करता है।
    • यह स्पष्ट रूप से राज्यों और केंद्र के बीच शक्तियों का विभाजन निर्धारित करता है, ताकि कानून का अनुपालन सुनिश्चित हो सके ।​
    • संघीय संरचना जिसमें केंद्रीय और राज्य सरकारों के बीच शक्तियों का विभाजन होता है
    • परन्तु यह संरचना आवश्यक स्थिति में केंद्र को नियंत्रण भी दे सकती है।
    • यह द्वैध शासन की कल्पना के साथ एक मजबूत संघीय ढांचे को दर्शाता है ।​
    • संविधान की सर्वोच्चता: संविधान ही सर्वोच्च कानून है, कोई भी अन्य कानून या तख्तावत संविधान के विरुद्ध नहीं हो सकता।
    • केंद्र/राज्य सरकारें संविधान के अनुरूप काम करने की बाध्य हैं ।​
    • संशय-मुक्त और दीर्घकालिक: भारतीय संविधान को “गतिशील” या “अनुकूलनीय” कहा जाता है
    • क्योंकि उसमें समय के साथ सामाजिक-राजनीतिक बदलावों के अनुसार संशोधन और न्यायिक र Interpretation संभव है।
    • यह लचीलापन इसे विविधता भरे देश के लिए उपयुक्त बनाता है ।​
  • संसदीय शासन और सरकार की विशेषताएं
    • संसदीय सरकार: भारत में सरकार का स्वरूप ब्रिटिश मॉडल से प्रेरित है
    • संसद के प्रति जिम्मेदार निकाय (कार्यपालिका) और निर्वाचित संसद के भीतर बहुमत के आधार पर शासन।
    • राष्ट्रपति/गवर्नर जैसे पद नाममात्र हो सकते हैं
    • वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्रियों के हाथ में रहती है ।​
    • मंत्रिपरिषद की सामूहिक जिम्मेदारी: सरकार के मंत्री विधायिका के प्रति एकजुट जवाबदेह होते हैं
    • वे लोकसभा/राज्य विधानसभा के सदस्य भी होते हैं और विधान के माध्यम से नया कानून बनाते हैं ।​
    • एकीकृत और स्वतंत्र न्यायपालिका: सर्वोच्च न्यायालय के नीचे राज्यों की उच्च न्यायालयें आती हैं
    • सभी नागरिकों को समान आधार पर अधिकार मिलते हैं।
    • न्यायपालिका संविधान द्वारा संरक्षित स्वतंत्र रहती है ।​
  • मौलिक अधिकार और सामाजिक-नीतिगत सिद्धांत
    • मौलिक अधिकार: नागरिकों के मूल अधिकार संरक्षित होते हैं
    • जिनमें समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता आदि शामिल हैं।
    • संपूर्ण कानूनी व्यवस्था इन अधिकारों के संरक्षण के लिए बनती है, ताकि भेदभाव नहीं हो सके ।​
    • राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत: संविधान नागरिकों के विकास के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत भी देता है
    • सरकार सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों की दिशा में कदम उठाए। यह अधिकारों की पूरक भूमिका निभाते हैं ।​
    • धर्मनिरपेक्षता और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: संविधान सभी नागरिकों के लिए समानता और एक स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष मंच देता है
    • हर नागरिक को वोट देने का समान अधिकार है ।​
  • अन्य अद्वितीय पहलू
    • एकल नागरिकता: सभी नागरिक देश की एक ही नागरिकता के पात्र होते हैं, चाहे वे किसी भी राज्य में रहते हों।
    • यह संघीय तंत्र के भीतर राष्ट्रीय एकता को मजबूत बनाता है ।​
    • आपातकालीन प्रावधान: आपातकालीन परिस्थितियों में केंद्र सरकार के पास व्यापक शक्तियाँ हो जाती हैं
    • हालांकि यह लोकतांत्रिक आचरण के साथ नियंत्रित है ताकि अधिकारों पर विराम न लगे।
    • यह भारतीय संविधान की एक विशिष्ट और कभी-कभी चर्चा का विषय रहा अनोखी विशेषता है ।​
    • नागरिक नियंत्रण और स्वतंत्र निकाय: संविधान में स्वतंत्र निकाय
    • जिनके पास राजनीतिक नियंत्रण से मुक्त काम करने की शक्तियाँ होती हैं
    • भी शामिल हैं, जो लोकतांत्रिक प्रणालियों को मजबूत बनाते हैं ।​

17. गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, जो आतंकवादी गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों और संघों की कुछ गैर-कानूनी गतिविधियों के लिए अधिक प्रभावी रोकथाम का प्रावधान करता है, को भारत में पहली बार किस वर्ष लागू किया गया था? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) 1967
Solution:
  • गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम पहली बार भारत में वर्ष 1967 में लागू किया गया था।
  • जिसके अंतर्गत आतंकवादी गतिविधियों से निपटने वाले व्यक्तियों एवं संघों की कुछ गैर-कानूनी गतिविधियों की अधिक प्रभावी रोकथाम का प्रावधान किया गया है।
  • पृष्ठभूमि और उद्देश्यों
    • UAPA का उद्देश्य आतंकवाद से जुड़ी गतिविधियों और उनसे जुड़ी असामाजिक/गैर-कानूनी गतिविधियों को रोकना है
    • देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता सुरक्षित रहे।
    • यह कानून विशेषत: आतंकवाद से जुड़े अपराधों के लिए अधिक कठोर शिकायत, गिरफ्तारी, संपत्ति जब्ती आदि के प्रावधान देता है.
  • संशोधन और परिवर्तन
    • 1967 के मूल स्वरूप के बाद कई बार संशोधित किया गया है
    • जिसमें प्रमुख संशोधन 2019 शामिल है ताकि आतंकवाद से जुड़े अपराधों की परिभाषा, आतंकवादी समूहों के खिलाफ कठोर उपाय और संपत्ति-जब्ती जैसे प्रावधान मजबूत हों।
    • यह जानकारी सामान्य ज्ञान स्रोतों और आधिकारिक प्रेस रिलीज़ से संगत है।​
  • संदर्भित बिंदु
    • भारत में UAPA के अंतर्गत दर्ज मामलों, परिभाषाओं और संशोधनों के बारे में शिक्षण और सामान्य ज्ञान स्रोत एकीकृत रूप से 1967 को शुरुआती वर्ष के रूप में पुष्टि करते हैं।​
  • यदि चाहें तो इस विषय पर मैं:
    • कानून की मूल धारा/अनुच्छेदों के संक्षिप्त संकलन के साथ timeline दे सकता हूँ
    • 2019 के संशोधन के प्रमुख प्रावधानों का तात्पर्य समझाकर उद्धरण सहित तुलना दे सकता हूँ
    • न्यायिक निर्णयों में अब तक क्या नया उदाहरण/राय आयी है, उसका संक्षेप दे सकता हूँ

18. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद भारतीय संविधान में सहकारी समितियों के प्रावधान से संबंधित है? [CHSL (T-I) 10 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) 243 ZH से 243 ZT
Solution:
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243ZH से 243ZT तक में सहकारी समितियों से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
  • संवैधानिक प्रावधानों में सहकारी समितियों से संबंधित अनुच्छेद मुख्यतः भाग IX-B में आते हैं। नीचे विस्तृत उत्तर दिया गया है।
  • पृष्ठभूमि और प्रमुख तथ्य
    • भाग IX-B: यह भाग सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, शासन-प्रबंधन, और नियंत्रण के नियम-नियमांक को निर्धारित करता है।
    • अनुच्छेद 243-ZH से 243-ZT इस भाग के भीतर आते हैं, जिनमें विविध राज्य/केंद्र शासित संरचनाओं के लिए प्रावधान दिए गए हैं.
    • अनुच्छेद 243ZI (कई स्रोतों में भी उद्धृत) और अन्य संबंधित अनुच्छेदों के माध्यम से सहकारी समितियों के लिए विशेष प्रावधान का उल्लेख है
    • जिससे राज्यों को अपने कानून बनाकर इन संस्थाओं के संचालन को सुगम बनाना होता है.
    • संशोधन का उद्देश्य: देश में सहकारी समितियों को लोकतांत्रिक, पेशेवर और आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाना, ग्रामीण विकास और व्यापक समाज-हित के लिए उनका सक्रियरण सुनिश्चित करना है.
  • अनुदेश और प्रभाव
    • बहु-राज्य सहकारी समितियों के संबंध में संसद के पास औचित्य और व्यवस्था बनाम अन्य सहकारी समितियों के लिए राज्य विधानसभाओं के पास निज कानून बनाने की शक्ति है
    • ताकि राज्यों के सामाजिक-आर्थिक संदर्भ के अनुसार ढांचा स्थापित किया जा सके.
    • कुछ स्रोतों के अनुसार अनुच्छेद 43B जैसे निर्देशक सिद्धांत भी संविधान में जोड़े गए
    • ताकि राज्य नीति के अंतर्गत सहकारी समितियों के विकास के लिए मार्गदर्शन मिल सके.
  • परिणाम
    • प्रश्न के अनुरूप, सही उत्तर भाग IX-B है
    • जिसमें अनुच्छेद 243-ZH से 243-ZT शामिल हैं
    • यह सहकारी समितियों से संबंधित संविधानिक प्रावधानों का केंद्र है.

19. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों के संदर्भ में विशेष उपबंध (special provison) से संबंधित है? [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) अनुच्छेद 371
Solution:
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371 महाराष्ट्र एवं गुजरात राज्यों के संदर्भ में विशेष उपबंध करता है।
  • जिसमें विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र और कच्छ हेतु अलग-अलग बोडौँ की स्थापना शामिल है।
  •  इन बोर्डों के कार्यों के बारे में वार्षिक रिपोर्ट राज्यों की विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य किया गया है ।
  • संक्षेप में विशद जानकारी:
    • अनुच्छेद 371 का उद्देश्य: महाराष्ट्र और गुजरात राज्यों के लिए विशेष प्रावधान
    • इन राज्यों के भीतर विशिष्ट क्षेत्रीय या भूगोलिक इकाइयों के विकास और प्रशासन में केंद्रीय-राज्य संबंध सुव्यवस्थित रहे ।
    • उप-प्रावधान और संरचना: विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, कच्छ आदि क्षेत्रों के लिए पृथक विकास बोर्डों की स्थापना की जाती है
    • इन बोर्डों के वित्तीय और प्रशासनिक कार्यों पर राज्यों के साथ केंद्र का संयुक्त नियंत्रण रहता है
    • प्रत्येक बोर्ड का वार्षिक आडिट-रिपोर्ट राज्य विधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है ।
    • अन्य राज्यों के लिए भी विशेष उपबंध मौजूद हैं
    • जैसे नागालैंड, असम, मणिपुर आदि के लिए विभिन्न अनुच्छेद (371A, 371B, 371C आदि) हैं
    • केवल महाराष्ट्र-गुजरात तक सीमित नहीं हैं, पर महत्त्वपूर्ण संरचना का हिस्सा हैं ।
  • फार्मल संदर्भ (संविधान के भाग/अनुच्छेद):
    • अनुच्छेद 371 — महाराष्ट्र और गुजरात के लिए विशेष उपबंध का मूल स्त्रोत है ।
    • अनुच्छेद 371A–371J आदि अन्य राज्यों के लिए विशिष्ट उपबंधों को परिभाषित करते हैं
    • जैसे 371C मणिपुर, 371D आंध्र प्रदेश/तेलंगाना आदि) ।
  • व्यावहारिक उदाहरण और प्रभाव:
    • विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, कच्छ के लिए नए विकास बोर्ड, केंद्रीय फंडिंग के भीतर एक स्थानीय-उन्मुख विकास योजना की समन्वय प्रक्रिया को समर्थ बनाते हैं
    • राज्यपाल और राष्ट्रपति के कुछ विशेष अधिकार इन प्रक्रियाओं में जुड़े रहते हैं ताकि क्षेत्रीय असंतुलन कम हो सके ।
    • प्रत्येक बोर्ड की वार्षिक रिपोर्ट से राज्य विधानसभा को क्षेत्रीय विकास पर पारदर्शिता मिलती है
    • नीति-निर्माण के लिए ठोस डेटा उपलब्ध रहता है ।

20. चंपारण कृषि अधिनियम कब पारित किया गया था? [CHSL (T-I) 20 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) 1918
Solution:
  • प्रश्नानुसार चंपारण कृषि अधिनियम वर्ष 1918 में पारित किया गया था।
  • डब्ल्यू, मौड़ ने 29 नवंबर, 1917 को विधान परिषद में चंपारण कृषि विधेयक पेश किया और उसी दिन एक उल्लेखनीय भाषण भी दिया।
  • पृष्ठभूमि और उद्देश्‍य
    • गांधीजी के नेतृत्त्व में किसानों की समस्याओं की जाँच के लिए आयोग की स्थापना और सचेतना अभियान हुए
    • ब्रिटिश प्रशासन ակॉर्डेटीशन और किसानों के हितों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए.​
  • विधेयक का पेश किया जाना और पास होना
    • चंपारण कृषि विधेयक पहली बार विधायक परिषद में 29 नवंबर 1917 को पेश किया गया था
    • जिसे मौड समिति की सिफारिशों के आधार पर तैयार किया गया था.​
    • यह विधेयक लगभग एक वर्ष बाद 4 मार्च 1918 को पारित हुआ और चंपारण कृषि अधिनियम के रूप में कानून बन गया.​
  • कानून की प्रमुख प्रविधियाँ और प्रभाव
    • अधिनियम का उद्देश्य किसानों की शिकायतों को दूर करना और भूमि-नील (नील) किसान व्यवस्था से जुड़े दमनकारी प्रथाओं के निवारण हेतु एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान करना था.​
    • गांधी, राजेंद्र प्रसाद और अन्य नेताओं की भागीदारी ने इस आंदोलन-विधेयक को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष के बीच एक मील का पत्थर बना दिया, जिसने बाद के अहिंसक प्रतिरोध और सविनय अवज्ञा के विचारों को आकार दिया.​
  • महत्त्वपूर्ण तिथियाँ
    • 29 नवंबर 1917: चंपारण कृषि विधेयक विधान परिषद में पेश किया गया.​
    • 4 मार्च 1918: विधेयक पारित हुआ और चंपारण कृषि अधिनियम अस्तित्व में आया.​
  • संदर्भ और स्वादिष्ट विवरण
    • चंपारण अधिनियम के पारित होने से पहले और बाद में चंपारण सत्याग्रह के प्रभाव से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अहिंसक प्रतिरोध के तरीकों की महत्ता बढ़ी.​
    • कुछ स्रोतों में वर्ष 1918 के भीतर महीनों के भीतर पारित होने की पुष्टि मिलती है
    • जो 4 मार्च के अनुमानित तिथि को मजबूत बनाती है.