विविध (भारतीय राजव्यवस्था) भाग-II

Total Questions: 39

21. भारत के संविधान में किस देश के संविधान से कोई विशेषता नहीं ली गई है? [CHSL (T-I) 10 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) चीन
Solution:
  • भारत के संविधान में संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन एवं फ्रांस से कोई-न-कोई विशेषता ली गई है; परंतु चीन से कोई प्रावधान नहीं लिया गया है।
  • नीचे साहित्यिक-और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर ब्रीफ स्पष्टीकरण
    • संरचनात्मक ढांचा (type of federalism, parliamentary system): भारतीय संविधान में संघीय ढाँचा है
    • भावना में एकात्मकता की ओर झुकाव माना जाता है। यह मानना कि यह किसी एक देश के सीधे मॉडल को दोहराता हैगलत होगा
    • ब्रिटिश बाधित संसदीय प्रणाली की प्रेरणा स्पष्ट है, जबकि संघीय-आयाम और राष्ट्रपति-स्वरूप के कुछ तत्व आदि स्वतंत्र रूप से विश्लेषित होते हैं।
    • इस संदर्भ में भारत के संविधान “क्यों और कैसे” एक विशेष देश के सीधे-सीधे प्रतिरूप से पहले अपना विकल्प बनाता है
    • यह बताने पर जोर देता है कि यह मिश्रित ढांचे के माध्यम से भारतीय परिस्थितियों के अनुसार ढाला गया है
    • स्रोत: प्रमुख विशेषताएं; BYJU'S स्रोत: प्रमुख विशेषताएं]
    • कानून-व्यवस्था और नागरिक अधिकार:भारत में मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा, और समानता के सिद्धान्तों को आधुनिक विश्व के विविध अनुभवों से प्रेरित माना गया है
    • यह भी सुनिश्चित है कि इन सब के माध्यम से भारतीय नागरिकों के लिए सामाजिक-राजनीतिक समता सुरक्षित हो।
    • इसके लिए धर्मनिरपेक्ष state की अवधारणा, नागरिकता और नागरिक अधिकारों की समानता आदि का स्वरूप भारतीय संदर्भ में उकेरा गया है।
    • अनुसंधान-प्रेरणा का बहुपक्षीय चरित्र: कई शिक्षण-उद्धरणों में कहा गया है
    • भारतीय संविधान के मसौदे और उसका गठन 1935 के अधिनियम, समकालीन देशों के संविधानों के अंशों पर चर्चा कर बनाये गए थे; यह स्पष्ट है
    • यह “किस देश के संविधान से ली गई है” जैसे सीधे प्रतिबिंब से बचते हुए एक बहुप्रेरित दस्तावेज रहा है। Jagran Josh लिखता है
    • मसौदा बनाते समय अन्य देशों के संविधानों और 1935 अधिनियम के विशेषताओं पर विचार किया गया था। [Jagran Josh]​
    • संकल्पना-सार: कई संदर्भों में यह कहा गया है
    • भारत का संविधान “राष्ट्र-निर्माण” और सामाजिक-राजनीतिक संरचना के लिहाज़ से एक कार्यकारी-जनतांत्रिक प्रणाली बनाता है
    • जहां केंद्र-राज्य संबंधों, अखिल भारतीय सेवाओं, और न्यायिक संरचना जैसे तत्व प्रमुख हैं
    • इनमें भी प्रत्यक्ष-प्रतिरूप के बजाय प्रेरणाओं का मिश्रण स्पष्ट है।
  • महत्वपूर्ण नोट्स
    • यह स्पष्ट रहे कि “किस देश के संविधान से कौन सा भाग लिया गया” जैसे एक-लाइन उत्तर से मुश्किल है
    • क्योंकि भारतीय संविधान के विकास में बहु-देशीय विचारों का समन्वय हुआ है।
    • कुछ विश्लेषकों ने इसे “रूप में संघीय लेकिन भावना में एकात्मक” लिखा है, जो कि एक सटीक, एकदेशी प्रतिरूप को नहीं दर्शाता।
    • 1949-1950 के बीच संविधान-सम्मेलन के मसौदे कई देशों के विचारों का संयुक्त परिणाम थे
    • साथ ही भारत की सामाजिक-राजनीतिक जरूरतों के अनुसार संशोधित भी हुए।
    • Jagran Josh इसी बात को संक्षेप में बताता है कि कई देश के विचारों को संदर्भित किया गया
    • इसे सीधे-सीधे किसी एक देश का मॉडल नहीं माना जा सकता। [Jagran Josh]​
    • दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों के तत्वों का उल्लेख मिलता है
    • यह कहना उचित नहीं कि “भारत के संविधान ने एक देश के संविधान से सीधे लिया” गया।
    • अक्सर यह कहा गया है कि प्रेरणा का मिश्रण है, जिसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला गया है।
    •  (फैक्ट-आकर्षक क्विज़ लेख)], [Jagran Josh]​
  • संक्षिप्त निष्कर्ष
    • भारत के संविधान ने किसी एक देश के संविधान से एक-के-एक विशेषता ली हो, ऐसा निर्धारित नहीं किया जा सकता।
    • बल्कि कई देशों के मूल विचारों, नीति-उद्धारों, और संरचनात्मक अवधारणाओं से प्रेरणा लेकर भारतीय संदर्भ में एक अनूठा दस्तावेज़ तैयार किया गया है।
    • यह मिश्रित प्रेरणा ही भारतीय संविधान की विशिष्टता है।

22. भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम की स्थापना किस अधिनियम के प्रावधानों के तहत की गई थी? [CHSL (T-I) 10 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007
Solution:
  • भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) की स्थापना भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के प्रावधानों के अंतर्गत की गई थी।
  • देश में भुगतान और निपटान प्रणाली संरक्षा, सुरक्षा एवं दक्षता सुनिश्चित करता है।
  • NPCI का गठन
    • NPCI को 12 दिसंबर 2008 को भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के पर्यवेक्षण में एक नोट-प्रॉफिट संगठन के रूप में स्थापित किया गया।
    • यह रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 की धारा 45 से प्रेरित होकर बनाया गया
    • इस अधिनियम ने RBI को भुगतान प्रणालियों का विनियमन करने का अधिकार दिया, जिसमें NPCI जैसे संचालकों को शामिल किया गया।​
  • अधिनियम का उद्देश्य
    • भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 भारत में भुगतान और निपटान प्रणालियों का विनियमन, पर्यवेक्षण और संचालन सुनिश्चित करता है।
    • यह RBI को दिशा-निर्देश जारी करने, मानक निर्धारित करने और भुगतान प्रणाली संचालकों के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार देता है।
    • अधिनियम का मुख्य लक्ष्य देश में भुगतान प्रणाली की सुरक्षा, स्थिरता और दक्षता को बढ़ावा देना है।​
  • अन्य विकल्पों से अंतर
    • SARFAESI अधिनियम, 2002: यह गैर-निष्पादित आस्तियों (NPA) के समाधान के लिए है, NPCI से असंबंधित।​
    • सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 2006: सरकारी प्रतिभूतियों के प्रबंधन से जुड़ा।​
    • कंपनी अधिनियम, 2013: कंपनियों के गठन और विनियमन के लिए, लेकिन NPCI का प्राथमिक आधार नहीं।​
  • NPCI की भूमिका
    • NPCI UPI, RuPay, IMPS जैसी डिजिटल भुगतान प्रणालियों का संचालन करता है।
    • यह भारतीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों का संयुक्त उद्यम है
    • जो खुदरा भुगतान को कुशल बनाता है।​

23. दलित वर्गों को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें कब मिली, (हालांकि उनके लिए मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होना था)? [CHSL (T-I) 15 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) सितंबर, 1932
Solution:
  • दलित वर्गों को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें सितंबर, 1932 में पूना समझौते के रूप में मिलीं।
  • यह समझौता डॉ. बी.आर. अंबेडकर एवं गांधी जी के बीच में हुआ था।
  • विस्तृत विवरण:
    • उस समझौते के प्रमुख प्रावधानों में दलित वर्गों के लिए राज्यों/प्रांतों की विधानसभा और केंद्रीय विधानपरिषदों में आरक्षित सीटों की व्यवस्था तय की गई थी ।​
    • इस समझौते के अनुसार प्रांतों के विधान परिषदों में दलित वर्गों के लिए सीटें आरक्षित होनी थीं
    • केंद्रीय स्तर पर संयुक्त निर्वाचक मंडल के भीतर भी कुछ सीटें दलित वर्गों के लिए आरक्षित की जानी थीं ।​
  • निर्वाचन प्रक्रिया: द्वि-स्तरीय मतदान का स्वरूप
    • आरक्षित सीटें रहने के बावजूद दलित उम्मीदवार सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों (general constituencies) से चुनाव लड़ते थे
    • मतदाता का भाग सामान्य निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा किया जाता था, भले ही सीट दलित वर्ग के लिए आरक्षित होती थी ।​
    • इस व्यवस्था के तहत दलित उम्मीदवारों को “दोहरा मत” मिलने जैसा संरचना बनती थी
    • वे एक ओर आरक्षित टिकट के कारण दलित समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए चयनित होते
    • दूसरी ओर सामान्य मतदाताओं द्वारा मतदान कराने वाले निर्वाचन क्षेत्र के कारण सामान्य प्रक्रियाओं के अंतर्गत भी चुनाव लड़ते थे ।​
  • केंद्रीय बनाम प्रांतीय संरचना
    • पूना समझौते के अनुसार प्रांतीय विधान परिषदों में दलितों के लिए आरक्षित सीटें थीं
    • केंद्रीय विधानपरिषद (तोड़ी संख्या बताने के साथ) में दलितों के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान भी था
    • यह व्यवस्था एक निर्धारित काल के लिए चली और फिर विवादों/राजनीतिक बदलावों के साथ बदलती रही ।​
    • आरक्षित सीटों की संख्या राज्यों के हिसाब से भिन्न होती थी (जैसे मद्रास, बंगाल, पंजाब आदि में विभिन्न संख्या में सीटें), जबकि केंद्रीय स्तर पर एक निश्चित प्रतिशत के रूप में दलित प्रतिनिधित्व की योजना बताई गई थी
    • (यद्यपि वास्तविक अनुपात और लागू स्थिति समय-समय पर विवाद का विषय रहा) ।​
  • प्रमुख परिणाम और प्रभाव
    • यह व्यवस्था दलित वर्गों को संसद/विधानसभा में प्रतिनिधित्व देने के लिए एक प्रारम्भिक और ऐतिहासिक ढांचे के रूप में स्थापित की गई थी
    • ताकि दलित समुदायों के हितों को राष्ट्रीय और प्रांतीय मंचों पर उठाने के लिए औपचारिक चैनल मिल सकें ।​
    • हालांकि मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता था
    • आरक्षित सीटों के कारण दलित समुदाय के भीतर अधिकारिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की कोशिश की गई
    • यह मॉडल 10 साल के लिए या अधिक समय तक लागू रहा, बकायदा किसी बहस/समझौते के अनुसार समय-सीमा और शर्तें बदलीं ।​
  • नोट्स/सीमाएं:
    • उपलब्ध स्रोतों में पूना समझौते के स्पष्ट प्रावधानों और समय-सीमा के बारे में विवरण का एक साथ संकलन मिलता है
    • अलग-अलग लेखों में कुछ जानकारी दोहराव या अस्पष्टता हो सकती है
    • इसलिए मूल ऐतिहासिक दस्तावेज़/आधिकारिक रिकॉर्ड देखने की सलाह दी जाती है ।​
    • वर्तमान संदर्भों में आरक्षित सीटों के राजनीतिक प्रभाव, उप-वरर्गीकरण/आंतरिक विभाजन इत्यादि पर भी बहस चलती रही है
    • यह क्षेत्रीय/विधायी बदलावों के साथ समय के साथ बदला है और आगे भी बदल सकता है ।​
  • यदि चाहें, एक क्रियात्मक-प्रारूप में मैं:
    • पूना समझौते के असल प्रावधानों का अनुच्छेद-वार सार दे सकता हूँ,
    • राज्यों के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या का एक सार-तालिका बना सकता हूँ,
    • इस व्यवस्था के समय-समय पर होने वाले बदलावों के केस-स्टडी दे सकता हूँ

24. किसने भारतीय संघीय व्यवस्था को सौदेबाजी संघवाद (Bargaining Federalism) के रूप में वर्णित किया? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (a) मॉरिस जोन्स
Solution:
  • मॉरिस जोन्स ने भारतीय संघीय व्यवस्था को सौदेबाजी संघवाद के रूप में वर्णित किया
  • जबकि ग्रैनविले ऑस्टिन ने 'सहकारी संघवाद' एवं के.सी. व्हीयर ने 'अर्द्ध संघवाद' तथा आइवर जेनिंग्स ने 'केंद्रीकरण की प्रवृत्ति वाला संघवाद' के रूप में वर्णित किया।
  • मुख्य जवाब
    • Bargaining Federalism क्या है: यह उन पहलुओं को रेखांकित करता है
    • जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच नीति-निर्माण और वित्तीय निर्णयों में आवश्यक सहमति और bargains (समझौतों) के जरिए व्यवहार किया जाता है।
    • यह मॉडल Cooperative Federalism के भीतर एक विशिष्ट रूप माना जाता है
    • जिसमें राज्यों के सहयोग के साथ नीति-निर्माण होता है
    • इतनी अधिक केंद्रीय नियंत्रण नहीं रहता कि राज्यों की तरल स्वायत्तता पूरी तरह समाप्त हो जाए।
    • इस धारणा को سمجھाने वाले विश्लेषकों के अनुसार भारतीय संघीय व्यवस्था सौदेबाजी-आधारित सहयोगी संघवाद के दायरे में आती है.​
  • प्रमुख विद्वान और उनके क्रमबद्ध योगदान:
    • Granville Austin: उन्हें Cooperative Federalism के समर्थक के रूप में पहचाना जाता है
    • उन्होंने इसे एक ऐसी प्रणाली बताया जिसमें राष्ट्रीय अखंडता और विविधता के बीच संतुलन बनाए रखा जाता है
    • यह bargaining-समझौतों पर टिका रहता है.​
    • Morris Jones: उन्हें Bargaining Federalism के वर्णनकर्ता के रूप में उद्धृत किया जाता है
    • भारत के संदर्भ में उनका विचार है कि संघ-राज्य संबंधों में bargaining power के साथ एक प्रकार का “सौदेबाजी संघवाद” प्रभावी ढंग से बना रहता है.​
  • भारतीय संदर्भ में Bargaining Federalism के तत्त्व:
    • यह वह स्थिति है जिसमें नीति-निर्माण केंद्र और राज्यों के बीच सहमति-आधारित निर्णयों से आगे बढ़ता है
    • जैसे GST गुट-समझौते, वित्त आयोग/नीति आयोग के माध्यम से सहयोग, और अंतर-राज्यीय परिषद के जरिए समन्वय।
    • इन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि भारत में संघीय व्यवस्था पूर्णतः एकात्मक नहीं है
    • बल्कि सहयोगी और सौदेबाजी तत्वों के मिश्रण पर टिकी है.​
    • समग्र उद्देश्य: राष्ट्रीय एकता बनाये रखना, क्षेत्रीय विविधताओं को मान्यता देना, और विभिन्न राज्यों के हितों के बीच संतुलन बनाये रखना
    • ताकि शासन-निर्णय तेज़ और परस्पर लाभकारी हो सके.​
  • अन्य संबंधित परिप्रेक्ष्य:
    • कुछ स्रोत इसे “Integral Federal” या “Quasi Federal” के साथ भी जोड़कर देखते हैं, पर Bargaining Federalism एक ऐसा मानक है
    • जहां सहयोग-आधारित निर्णय शैली प्रमुख है और प्रायः केंद्र-राज्य स्तर पर power-sharing के सार को दर्शाता है.​
    • भारतीय संविधान के निर्माताओं के दृष्टिकोण में भी कई विद्वान ऐसे संकेत पाते हैं
    • स्थिरता के लिए संघ को राज्यों को पर्याप्त अधिकार और वित्तीय autonomy प्रदान करना आवश्यक है
    • चुनौतियों के समय केंद्र की भूमिका भी साझा-करार आधारित होनी चाहिए

25. भारत का मूल संविधान अंग्रेजी में किसके द्वारा हाथों से लिखा गया था? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) प्रेम बिहारी नारायण रायजादा
Solution:
  • भारत का मूल संविधान अंग्रेजी में प्रेम बिहारी नारायण रायजादा के हाथों से लिखा गया था।
  • भूमिका: संविधान की अंग्रेजी मूल प्रतिलिपि के सुलेखक
    • समय और प्रक्रिया: संविधान सभा द्वारा ड्राफ्टिंग के बाद 1947–1950 के दौरान सजग और इतालिक शैली में लिखा गया
    • प्रत्येक पृष्ठ के नीचे लेखक ने अपने दादा के नाम के साथ अपना नाम लिखा था
    • यह प्रक्रिया 29 अगस्त 1947 से शुरू हुई और 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने तक चली
    • [web स्रोत: Testbook/IAS तैयारी, बोस-रायज़ादा संबंधी विवरण]​
    • स्थापत्य/प़्रकृति: शांतिनिकेतन के कलाकारों- राम मनोहर सिन्हा और नंदलाल बोस- ने पन्नों को सजाया/महत्वपूर्ण किया
    • प्रसंगित “हीलियम-भरे पिट्यू” में संरक्षण किया गया.​
    • मूल संविधान अंग्रेजी में लिखा गया था; हिंदी संस्करण अलग सुलेखक ने लिखा.​
    • रायज़ादा एक प्रसिद्ध सुलेखक थे, जिनकी हस्तलिपि इटैलिक शैली में थी
    • उनके समूह ने संविधान के 395 अनुच्छेदों, 8 अनुसूचियों, और प्रस्तावना को लिखा.​
  • संभावित भ्रम और स्पष्टता
    • कुछ स्रोतों में यह भी उल्लेख आता है कि अन्य कलाकारों ने सजावट/पन्नों की सुंदर्ता पर काम किया
    • लेकिन लेखक-हस्तलिपि अंग्रेजी संस्करण के लिए प्रमुख नाम प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ही माना जाता है.​
    • हिंदी संस्करण के लिए अन्य नामों का उल्लेख मिलता है
    • सवाल के अनुरूप अंग्रेजी मूल लिखने वाले व्यक्ति के रूप में रायज़ादा मुख्य हैं.​

26. मई, 2023 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में किसे नियुक्त किया गया ? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) टी. एस. शिवगणनम
Solution:
  • मई, 2023 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में टी.एस. शिवगणनम को नियुक्त किया गया।
  • वे 31 मार्च, 2023 से कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवारत थे।
  • विस्तृत जानकारी:
    • भूमिका और नियुक्ति संदर्भ: कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश का पद देश के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के आधिकारिक पदोन्नयन से भरा जाता है
    • जिसमें उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायधीश और अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की परामर्श प्रक्रिया शामिल होती है।
    • टी. एस. शिवगणनम को मई 2023 में इस पद के लिए नियुक्त किया गया था
    • उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने पूर्वी क्षेत्र के उच्च न्यायालयों के न्यायिक प्रशासन और मामलों के वितरण पर सक्रिय भूमिका निभाई।​
    • टी. एस. शिवगणनम का प्रोफाइल: वे भारतीय न्यायपालिका में दर्जनों वर्षों के अनुभव के साथ एक सम्मानित न्यायाधीश रहे हैं
    • कलकत्ता उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश के रूप में पहुँचकर वहाँ के न्यायिक कार्यों के संचालन और प्रशासनिक निर्णयों के लिए जिम्मेदार हुए।
    • उनके चयन का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रियाओं के निष्पादन में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना था।​
    • अन्य संदर्भ: कलकत्ता उच्च न्यायालय के इतिहास और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की सूची में उल्लेख मिलता है
    • वर्षों से इस कोर्ट के सदस्यों ने पश्चिम बंगाल में कानूनी मामलों की सुनवाई और प्रशासन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • नोट्स और स्पष्टता:
    • अगर आप चाहेंगे, तो इस तथ्य की पुष्टि के लिए वैधानिक सरकारी स्रोतों, न्यायालय की आधिकारिक घोषणाओं (press releases) या सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के रिकॉर्ड देखने की सलाह दे सकता हूँ।
    • ऊपर की जानकारी हिंदी में है और सार्वजनिक संदर्भों के आधार पर संकलित है।
  • संदर्भ
    • टी. एस. शिवगणनम की नियुक्ति और प्रोफाइल संबंधी विवरण​
    • कलकत्ता उच्च न्यायालय और उसके इतिहास पर समग्र संदर्भ​

27. साइमन कमीशन का उद्देश्य ....... था। [MTS (T-I) 19 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) भारत का राजनीतिक भविष्य निर्धारित करना
Solution:
  • भारत के राज्य सचिव लॉर्ड बर्किनहेड ने 8 नवंबर, 1927 को सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक संवैधानिक आयोग का गठन किया था।
  • यह वर्ष 1928 में भारत आया। इसका उद्देश्य भारत सरकार अधिनियम, 1919 के कार्यान्वयन व सुधारों का अध्ययन करना था।
  • जिसके आधार पर भारत के राजनीतिक भविष्य का निर्धारण किया जाना था।
  • परिचय
    •  यह आयोग ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत सरकार अधिनियम 1919 (या अफसरनामा 1919) की कार्यप्रणाली और मौजूदा संवैधानिक संरचना की समीक्षा के लिए बनांया गया था
    • ताकि आगे के सुधारों की रूपरेखा तय की जा सके। यह संदर्भित سوال का साफ-साफ उद्देश्य बताता है
    • संवैधानिक सुधारों के प्रश्न पर विचार कर स्थापित प्रांतीय-केन्द्रीय व्यवस्था की दिशा निर्धारित करना.​
  • मुख्य संदर्भ और उद्देश्य
    • उद्देश्य का केंद्रीय हिस्सा था: भारत के संवैधानिक भविष्य पर विचार करना, अर्थात् स्थानीय शासन के स्तर पर कौन से सुधार संभव हैं
    • कैसे प्रतिनिधित्व और उत्तरदायित्व की व्यवस्था बेहतर हो सकती है
    • क्या देश के अंतर्गत एक अधिक मजबूत और लचीला संविधान संभव है।
    • कमीशन का लक्ष्य यह भी था कि प्रांतीय स्वायत्तता, केंद्र-राज्य संबंधों की संरचना, और शासन की एक नई संविधानिक धारा की दिशा कितनी व्यवहार्य है
    • इसे आकलन किया जा सके.​
    • आयोग ने भारतीय प्रांतीय स्वायत्तता (स्वायत्त शासन) की दिशा में सुधार की सिफारिशें प्रस्तुत कीं, ताकि शासन-प्रणालियों में उत्तरदायित्व और स्थानीय प्रशासन के नियंत्रण को बढ़ावा मिले।
    • यह तथ्य स्पष्ट करता है कि संवैधानिक सुधार के प्रश्न पर विचार करना प्रमुख उद्देश्य था.​
  • रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष और प्रतिक्रियाएं
    • आयोग ने केंद्र-प्रांतीय प्रशासन के बीच सत्ता-साझाकरण, विधि-नियमन और प्रशासनिक संरचनाओं पर विचार किया
    • साथ ही एक संघीय-शैली के संविधान की संभावना की चर्चा की।
    • इसके परिणामस्वरूप, प्रांतीय स्वायत्तता की अवधारणा और केंद्रीय संरचना के प्रावधानों पर सुझाव दिए गए
    • जो भारतीय राजनीतिक दलों के द्वारा व्यापक रूप से नहीं स्वीकार किए गए
    • क्योंकि स्वतंत्रता और self-rule (स्वराज) की मांग को पूरी तरह संबोधित नहीं किया गया था.​
    • ब्रिटिश-काल के संदर्भ में, दिसंबर 1928 के आसपास और गोलमेज सम्मेलन के तौर-तरीकों से यह स्पष्ट है
    • कमीशन के सुझावों से तत्काल सत्ता-साझाकरण की दिशा नहीं बदली और कई राजनीतिक समूहों ने इसे आंशिक और सीमित सुधारों तक सीमित माना।
    • यह भी दर्शाता है कि उद्देश्य क्या था और भारतीय राजनीतिक मांगों के लिहाज से उसका प्रभाव कितना सीमित रहा, इस विषय पर स्पष्टता मिलती है.​​
  • विपरीत प्रतिक्रिया और प्रभाव
    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य दलों ने कमीशन का बहिष्कार किया क्योंकि भारतीय प्रतिनिधि नहीं थे और यह ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को मजबूत करने के संकेत के रूप में देखा गया।
    • इस विरोध के कारण, स्वतंत्रता-आंदोलन के contexto में कमीशन का प्रभाव कम दिखा और औपचारिक चर्चा-प्रक्रिया आगे बढ़ी
    • जैसे कि गोलमेज सम्मेलन का आयोजन हुआ.​​
    • आरम्भिक निष्कर्षों और विवादों के कारण, इस कमीशन के उद्देश्य और उसके प्रस्तावों से आगे क्या हो सकता था, इस पर बहस रहती है
    • विशेषकर राष्ट्रीय स्वायत्तता के सकारात्मक मॉडल की खोज और केंद्रीय शासन के भीतर अधिक उत्तरदाई नियंत्रण की वकालत कैसे आगे बढ़ती
    • यह इतिहास के विद्यार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन विषय है.​

28. सरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2016 क्या प्रतिबंधित करता है? [MTS (T-I) 17 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) व्यावसायिक (कॉमर्शियल) सरोगेसी
Solution:
  • सेरोगेसी (विनियमन) विधेयक, 2016 व्यावसायिक (कॉमर्शियल) सेरोगेसी को प्रतिबंधित करता है।
  • सेरोगेसी सहायक प्रजनन की एक विधि है, जहां कोई महिला गर्भधारण करती है और किसी अन्य व्यक्ति अथवा जोड़े के लिए बच्चे को जन्म देती है।
  • मुख्य उद्देश्य और प्रावधान (2016 संस्करण के आधार पर)
    • व्यावसायिक सरोगेसी पर रोक: विधेयक के सबसे कठोर प्रावधानों में से एक यह था
    • सरोगेसी सेवाओं के लिए भुगतान करना या लाभ उठाने के उद्देश्य से किसी भी व्यक्ति को शामिल नहीं किया जाएगा
    • यानी коммерial surrogacy को प्रतिबंधित किया गया।
    • इसके साथ, इस प्रक्रिया से जुड़ी सभी दलों के लिए नैतिक और कानूनी जोखिमों को कम करना लक्षित था ।​
    • परोपकारी ( altruistic ) सरोगेसी का विनियमन: व्यावसायिक नहीं, बल्कि परोपकारी सरोगेसी को मान्यता देते हुए उसके लिए कुछ नियंत्रित प्रावधान प्रस्तावित थे
    • ताकि गर्भधारण प्रक्रिया में शामिल महिलाएं शोषण के बाहर रहें और बच्चों के अधिकार संरक्षित रहें ।​
    • राष्ट्रीय और राज्य बोर्ड: सरोगेसी गतिविधियों के लिए एक संरचनात्मक नियामक ढांचा बनाने की भावना थी
    • National Surrogacy Board और State Surrogacy Boards के गठन के लिए मार्गदर्शन और उनके कार्य-क्षेत्र तय करना
    • ताकि पंजीकरण, मानक प्रक्रियाएं, और पालन-नियम स्पष्ट हों ।​
    • पात्रता और अनुबंधों के मानक नियम: सरोगोसी की भागीदारी में भाग लेने वाली महिलाओं, दंपतियों, और बच्चे के अधिकारों के लिए诸 नियम, आवश्यक प्रमाणपत्र, मेडिकल रिकॉर्ड-प्रबंधन, बीमा कवरेज आदि के स्पष्ट मानक निर्धारित करने की बात थी ।​
    • महिला स्वास्थ्य और सुरक्षा: गर्भधारण के दौरान गर्भवती महिला (सरोगेट मदर) के स्वास्थ्य, चिकित्सीय आवश्यकताओं
    • गर्भधारण के दौरान होने वाले जोखिमों के लिए सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता दी जाने की चर्चा थी
    • ताकि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य रक्षा हो सके ।​
  • कौन-कौन से मुद्दे मुख्य विवाद बनते
    • विवाह/नरायणी परिवार के संबंधों में सरोगेसी: विधेयक के कुछ प्रारूपों में सरोगेसी को करीबी रिश्तेदारों तक सीमित करने या उसमें कठोर नियम लगाने के प्रस्ताव रहे
    • जिससे प्रथा के पारिवारिक और सामाजिक आयाम पर बहस छिड़ी।
    • इससे भी जुड़े नैतिक प्रश्न उठते थे कि महिलाएँ किस हद तक लाभ के बिना गर्भ धारण कर सकती हैं
    • बच्चों के कानूनी अधिकार कैसे सुरक्षित होंगे ।​
    • भ्रूण अधिकार और बच्चों का भविष्य: सरोगेसी से पैदा बच्चों के अधिकारों, पंजीकरण
    • पहचान-सम्बन्धी नियमों को स्पष्ट करना एक बड़ी चुनौती थी
    • विशिष्ट रूप से.parents की पहचान, जन्म प्रमाणपत्र, और कानूनी संरचना कैसे बने, इस पर बहस चली ।​
    • शोषण-रोधी बनाम महिला स्व-निर्णय: सरोगेसी में गर्भधारण और अन्य प्रक्रियाओं से जुड़ी महिला के अधिकार बनाम उसके शोषण के जोखिमों के बीच संतुलन खोजना ज़रूरी माना गया; ऐसे प्रावधान चाहिए थे
    • जो आर्थिक लाभ से अधिक चिकित्सा सुरक्षा और स्वास्थ्य कवरेज को प्राथमिकता दें ।​
  • प्रयोग में कैसे बदला गया मार्ग
    • 2016 के बाद के वर्षों में संसद ने इस विषय पर कई अन्य बिल प्रस्तुत किए
    • जैसे 2019 और 2020 के संस्करण, जिनमें व्यावसायिक सरोगेसी पर प्रतिबंध, बोर्ड-निर्माण, और पावदानों के पुनर्गठन के प्रावधान स्पष्ट किए गए थे।
    • इनमें से 2021 में संसद ने सरोगेसी विनियमन अधिनियम (Regulation) पारित किया
    • जो 2016 के मूल विचारों को और अधिक व्यावहारिक और क्रियान्वयन-उन्मुख बनाता है ।​

29. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा, बेटियों को उनकी पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करने के लिए किस अधिनियम में संशोधन किया गया है? [MTS (T-I) 17 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम
Solution:
  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा, बेटियों को उनकी पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्रदान करने के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (Hindu Succession Act) में संशोधन किया गया।
  • इस संशोधन के पूर्व केवल बेटों को ही पैतृक संपत्ति पाने का अधिकार था।
  • क्या बदला गया और क्यों
    • विषय: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6 में सुधार।
    • परिवर्तन का उद्देश्य: कॉपार्टेनर (we-स्वामित्व/हमवारिस) की परिभाषा में बेटियों को जन्म से ही पुत्र के समान अधिकार देना ताकि वे पैतृक संपत्ति में बराबरी की अधिकारिणी बनें.
    • संशोधन का प्रभाव: बेटियों को केवल बेटों के समान हस्तांतरणीय अधिकार और उत्तराधिकार दिया गया
    • स्व-अर्जित संपत्ति पर भी समान दायित्व और अधिकार लागू हुए.
  • संशोधन का प्रमुख दायरा
    • कॉपर्सेंनर का दर्जा: बेटियाँ अब जन्म से ही कॉपर्सेंनर मानी जाती हैं, चाहे पिता जीवित हों या नहीं.
    • पूर्व और पश्च पर असर: यह कानून 9 सितंबर 2005 के पहले जन्मी बेटियों पर भी लागू होता है
    • यदि पिता की मृत्यु तक संपत्ति का वितरण हो चुका हो या न हो चुका हो, दोनों स्थितियों में समान अधिकार मिलता है.
    • दायित्व और अधिकार: बेटी को पिता के समान उत्तराधिकार, हक़-हकूक और देनदारियाँ मिलती हैं; यह आर्थिक-वैधानिक समानता लाता है.
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और न्यायिक प्रवृत्ति
    • 2005 के संशोधन से पहले भारतीय समाज में बेटियों के संपत्ति अधिकार सीमित थे, और बेटों को प्राथमिकता दी जाती थी.
    • सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में इसे स्पष्ट किया कि संशोधन पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू होता है
    • 2005 से पहले पैदा बेटियाँ भी अब बराबर स्थान पा सकती है
    • इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के फैसले ने बेटियों के अधिकारों को कानूनी तौर पर मजबूत किया है
    • [उच्चतम न्यायालय के निर्णयों और संशोधन के प्रवर्तनों के विश्लेषण के अनुसार] (उद्धृत स्रोतों के अनुसार संदर्भित विवरण देखें)
  • प्रमुख स्रोतों से संक्षिप्त उल्लेख
    • Hindu Succession Act, 1956 में 2005 का संशोधन (धारा 6) ने बेटियों को कॉपर्सेनर का दर्जा दिया
    • पूर्वव्यापी प्रभाव के साथ यह अधिकार अब बेटियों के पास है. [उच्चतम न्यायालय का संकल्पनात्मक निर्णय/विश्लेषण]​
    • मीडिया और शिक्षण स्रोतों के अनुसार 2005 के संशोधन से पहले और बाद के अधिकारों के बीच स्पष्ट विभाजन था
    • सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक समावेशी न्याय की दृष्टि से स्पष्ट किया.​
  • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (संक्षिप्त)
    • क्या बेटियाँ पहले से संपत्ति में हिस्सेदारी ले सकती थीं
    • नहीं, संशोधन से पहले बेटियों के लिए यह अधिकार सीमित थे
    • 2005 के बाद बेटियों को पुत्र के समान कॉपर्सेनर के रूप में मान्यता मिली।​

30. किसी चुनाव में मतदान करने वाले पात्र मतदाताओं के प्रतिशत को ....... कहा जाता है। [MTS (T-I) 16 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) मतदान प्रतिशत
Solution:
  • किसी चुनाव में मतदान करने वाले मतदाताओं के प्रतिशत को मतदान प्रतिशत (Turnout) कहा जाता है।
  • मतदान मतदाता की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का महत्वपूर्ण उपाय है।
  • मतदान प्रतिशत मतदाताओं के बीच रुचि, प्रेरणा एवं नागरिक जिम्मेदारी के स्तर को इंगित करता है।
  • विस्तृत समझ
    • परिभाषा: भागीदारी दर वह प्रतिशत है जिसमें पात्र मतदाता (eligible voters) ने वास्तविक मतदान किया हो।
    • यह कुल पात्र मतदाताओं में से मतदान करने वाले लोगों का अनुपात दर्शाती है।
    • गणना: भागीदारी दर = (मतदान करने वाले पात्र मतदाताओं की संख्या / पात्र मतदाताओं की कुल संख्या) × 100
    • महत्व: उच्च भागीदारी दर लोकतंत्र की ताकत, राजनीतिक वैधता और सरकार के लिए व्यापक जनादेश को दर्शाती है।
    • कम भागीदारी नीति-निर्णयों, नीति निष्पादन की समता और राजनीतिक स्थिरता पर प्रभाव डाल सकती है।
    • कारक जो प्रभाव डालते हैं: चुनाव का प्रकार (लोकसभा/राज्य विधानसभा), मतदान की उपलब्धता (ड्यूटीable बूथ, नजदीकी मतदान केन्द्र), मतदान günü का समय, मतदाताओं की राजनीतिक जागरूकता, सामाजिक-आर्थिक स्थितियाँ, और चुनावी प्रक्रिया की सरलताएँ।
    • अन्य संबंधित मापन: कुछ मामलों में "रिज़र्वेशन/अमान्य वोट" जैसी क्षमताओं के कारण वास्तविक इकाई में अस्थाई बदलाव आ सकता है
    • इसलिए पूर्ण संख्या के साथ अमान्य/छूटे हुए वोटों का भी उल्लेख आवश्यक रहता है।
  • उपयोगी नोट्स
    • यदि किसी विशिष्ट चुनाव के लिए आप तुलनात्मक चार्ट चाहते हैं (उच्च vs. निम्न भागीदारी के कारण)
    • किसी देश/राज्य के लिए समय-Series डेटा चाहिए, बताएं ताकि मैं स्रोत-आधार पर स्पष्ट तुलना प्रस्तुत कर सकूं।
    • हिन्दी में संदिग्ध शब्दावली के लिए “मतदाता भागीदारी दर” या “लोकतांत्रिक turnout” भी समानार्थी रूप से प्रयोग होते हैं।
  • संदर्भ
    • भागीदारी दर की सामान्य परिभाषा और महत्व के बारे में सामान्य ज्ञान आधारित विवरण.​