विविध (भारत का भूगोल)Total Questions: 4331. निम्नलिखित में से नदियों और सहायक नदियों का कौन सा युग्म गलत है? [CHSL (T-I) 20 मार्च, 2023 (I-पाली)](a) सिंधु - झेलम(b) गोदावरी - मंजीरा(c) यमुना - टोंस(d) चंबल - राप्तीCorrect Answer: (d) चंबल - राप्तीSolution:राप्ती नदी, घाघरा की सहायक नदी है न कि चंबल की। टोंस नदी यमुना नदी की सहायक नदी है।मंजीरा या मांजरा नदी गोदावरी नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है।सिंधु नदी एशिया की सबसे लंबी नदियों में से एक है। झेलम नदी सिंधु नदी तंत्र की एक सहायक नदी है।सामान्य सच्ची जोड़ियों के उदाहरण (उद्धृत मानक तथ्य)गंगा नदी के प्रमुख सहायक: यमुना, घाघरा, दामोदर, सोन, कोसी, चित्रांकित अन्य क्षेत्रीय सहायक नदियाँ आदि।यह आयाम इसकी व्यापक जलग्रहण क्षेत्र को दर्शाते हैं [उच्चारण: यह यमुना को गंगा की मुख्य सहायक बताता है][उद्धरण: सामान्य हिंदी स्रोतों में गंगा-यमुना विन्यास].कृष्णा नदी के पश्चिमी घाट से निकलने वाले सहायक नदियाँ जैसे घाटप्रभा (घाटप्रभा कृष्णा के द्वितीयक जल स्रोतों में एक प्रमुख सहायक मानी जाती है)[ध्यान दें: कृष्णा-घाटप्रभा संबंध का सामान्य विवरण]।गोदावरी नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ: माही, पेड्नि, बेद्र आदि—परन्तु यह विशेष क्रम कुछ स्रोतों में भिन्न हो सकता हैगोदावरी को अलग प्रमुख पथ के रूप में माना जाता है, जिसमें कुछ सहायक नदियाँ मिलती हैं।सिंधु नदी नेटवर्क में श्योक, चिनाब, झेलम आदि upper catchment के सहायक नदियाँ हैंसतलुज, ब्यास, रावी, चनाब आदि lower प्रवाह में आते हैं। यह स्पष्ट रूप से एकीकृत हिमनद/वर्षा जल प्रणालियाँ दर्शाते हैं।गलत जोड़ा कौन सा हो सकता हैयदि विकल्प II कहता है कि कृष्णा–घाटप्रभा युग्म सही है, और दुष्कर तथ्य यह हैघाटप्रभा कृष्णा की एक महत्वपूर्ण सहायक नदियों में से मानी जाती हैइस प्रकार II सामान्य तौर पर सही माना जाता है। लेकिन, प्रश्न के संदर्भ में कई अध्ययन यह भी दिखाते हैं कि कुछ प्रश्न-जोड़े भ्रम पैदा करते हैंक्योंकि घाटप्रभा को कृष्णा के साथ प्रमुख सहायक के रूप में सूचीबद्ध किया जा सकता हैकभी-कभी इसे कृष्णा-घाटप्रभा के बजाय कृष्णा-गोदावरी परिदृश्य के भीतर देखा जाता है।I. तापी – मांजरा: आम स्तर पर तापी नदी के साथ मांजरा नदी को जोड़ा जाना गलत माना जाता हैक्योंकि मांजरा महाराष्ट्र-बालाघाट पहाड़ी क्षेत्र से निकलती है और तापी नदी के साथ सीधे एक स्पष्ट संगम के रूप में नहीं जुड़ी मानी जाती।कुछ स्रोत इसे त्रुटिपूर्ण जोड़ा मानते हैं। इस कारण यह एक plausible गलत जोड़ा है।गोदावरी की सहायक नदियों के बारे में यदि सूची में "घाटप्रभा" को कृष्णा की सहायक के रूप में बतलाया गया हैतो यह उत्तरदायित्व के अनुसार सही माना जा सकता है क्योंकि घाटप्रभा कृष्णा की एक प्रमुख सहायक नदियों में से मानी जाती है। लेकिन यह निष्कर्ष स्रोत-निर्भर होआप के लिए स्पष्ट निष्कर्षतापी – मांजरा युग्म को अक्सर गलत माना गया है, क्योंकि मांजरा तापी की प्रमुख सहायक नदी के रूप में सामान्य रूप से सूचीबद्ध नहीं मानी जाती। इस कारण I(तापी – मांजरा) को इस प्रश्न के सेट में गलत जोड़ा माना जा सकता है।कृष्णा – घाटप्रभा जोड़ा अक्सर सही माना गया है, क्योंकि घाटप्रभा कृष्णा नदी की एक प्रमुख सहायक/युक्त प्रवाह के रूप में दर्ज होती है।गोदावरी की स्थिति में दिये गए अन्य युग्मों पर निर्भरता के कारण, यदि कोई स्रोत इसे कृष्णा-घाटप्रभा के साथ भ्रमित कर रहा होII भी सही हो सकता है; पर सामान्यतः II सही माना जाता है।32. हिमालय की नदियों के 'प्रवाह के भाग- विशेषता' का निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही है? [CHSL (T-I) 20 मार्च, 2023 (I-पाली)]I. ऊपरी भाग (Upper course)-विसर्पII. निचली भाग (Lower course)- गोखुर झील(a) केवल I(b) केवल II(c) न तो I और न ही II(d) I और II दोनोंCorrect Answer: (b) केवल IISolution:जब नदी मैदानों में प्रवाहित होती है, तो निम्न कटाव की अपेक्षा क्षैतिज अपरदन अधिक करते हुए घाटी को चौड़ा करती है।क्षैतिज अपरदन अधिक होने के कारण मंद ढालों पर बहती हुई नदियां वक्रित होकर 'नदी विसर्प' बनाती हैं।अतः युग्म I गलत है। हिमालय की नदियों के निचले भाग गोखुर झील जैसे होते हैं।नदियां गोखुर झीलों का निर्माण मंद ढाल वाले मैदानों पर करती हैं। अतः युग्म II सही है।प्रवेश और स्रोत (उद्गम)हिमालयी नदियाँ: इनका प्रमुख उद्गम हिमालय पर्वत शृंखला में स्थित ग्लेशियरों/हिमनदों के पिघलन से होता हैयह पिघलन वर्षभर चलता रहता है और ऊँचे उच्चापास से जल प्रवाह देता है.प्रायद्वीपीय नदियाँ: इनका स्रोत अक्सर पहाड़ी क्षेत्र या पश्चिमी घाट/मध्य ऊँचाई क्षेत्रों से होता हैप्रवाह की प्रकृति (बारहमासी बनाम मौसमी)हिमालयी नदियाँ: भारी और बारहमासी प्रवाह; ग्लेशियर पिघलने के कारण पूरे वर्ष जल मिलता हैप्रायद्वीपीय नदियाँ: अधिकतर मौसमी/मॉनसून-निर्भर प्रवाह; वर्षा ऋतु में बहाव अधिक और शुष्क मौसम में घटता हैकुछ नदियाँ साल भर कम प्रवाह दिखाती हैं, कुछ मॉनसून-निर्भर होती हैं.घाटी और संरचनाहिमालयी नदियाँ V-आकार की गहरी घाटियाँ बनाती हैंऊँचे पहाड़ों के कारण deras गहराई और बहाव निर्दिष्ट होते हैं.प्रायद्वीपीय नदियाँ उथली घाटियों में बहती हैंउनके मार्ग सामान्यतः छोटे डेल्टा बनाते हैं और चट्टानी/पर्वतीय भूभाग पर निर्भर होती हैं.जलग्रहण क्षेत्र और डेल्टाहिमालयी नदियाँ के बेसिन विशाल होते हैं और उनके जलग्रहण क्षेत्र सैकड़ों-हज़ारों वर्ग किलोमीटर तक फैले होते हैंऊँचे स्रोतों से बड़े डेल्टा निर्माण की प्रवृत्ति कम होती है या विस्तृत नहीं होती.प्रायद्वीपीय नदियाँ आम तौर पर छोटे-तट वाले डेल्टा बनाती हैंउनके डेल्टा आकार आकार-में-आकार भिन्न होता है, पर क्षेत्रीय जलग्रहण क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटा हो सकता है.प्रमुख उदाहरण और उपयोगहिमालयी नदियों के प्रमुख उदाहरण: सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ हिमालय से आरम्भ होती हैंइनका शुष्क/ बरसाती परिवर्तन सतत् जलापूर्ति और सिंचाई के लिए महत्त्वपूर्ण है.प्रायद्वीपीय नदियाँ: मानक उदाहरण पश्चिमी घाट से निकलनेवाली नदियाँ और बंगाल की खाड़ी की ओर बहती कुछ प्रमुख नदियाँ हो सकती हैंइनका योगदान अधिकतर गाँव-शहर जल आपूर्ति और सिंचाई पर निर्भर होता है, पर डेल्टा आकार हिमालयी नदियों से भिन्न होता है.संक्षिप्त तुलना (संक्षेप तालिका)उद्गम: हिमालयी नदियाँ ग्लेशियर/ हिमनद से; प्रायद्वीपीय नदियाँ पर्वत/घाटी सेप्रवाह: हिमालयी – बारहमासी; प्रायद्वीपीय – मौसमी/मॉनसून-निर्भरघाटी: हिमालयी – गहरी, V-आकार; प्रायद्वीपीय – उथली घाटियाँजलग्रहण क्षेत्र: हिमालयी – बड़े; प्रायद्वीपीय – अपेक्षाकृत छोटे डेल्टा संभवप्रमुख उदाहरण: हिमालयी – गंगा-यमुना-ब्रह्मपुत्र; प्रायद्वीपीय – पश्चिमी घाट से निकलनेवाली और उनकी बंगाल की खाड़ी की ओर बहती नदियाँनोट/स्पष्टीकरणबहुधा शिक्षण-उद्धरणों में हिम Himalayan नदी प्रणालियाँ बारहमासी और तरंग-आधारित हुन्छ; जबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ बरसात-आधारित होती हैंकुछ पाठों में इसे और अधिक सरल तौर पर कहा जाता है कि हिमालयी नदियाँ ऊँचे हिमनद से जल-प्राप्त करती हैं और वर्षभर चालू रहती हैंजबकि प्रायद्वीपीय नदियाँ मॉनसून-आधारित बहती हैं.यह तुलनात्मक विश्लेषण सामान्य भूगोलिक पाठ में प्रस्तुत किया गया हैसंदर्भ पाठ के आधार पर विशिष्ट नदियों के गुण थोड़ा भिन्न हो सकते हैं।उद्धरण स्रोतहिमालय से निकलने वाली नदियों की बारहमासी प्रवाह और ग्लेशियर-आधारित जल-प्रवाह की विशेषताएं.हिमालयी बनाम प्रायद्वीपीय नदियों का अंतर और प्रवाह-गुण विशेषताएं.हिमालयी नदियों के उद्गम, घाटी संरचना, और डेल्टा-निर्माण के संबंध में विवरण.33. कोयले के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है? [CHSL (T-I) 14 मार्च, 2023 (II-पाली)](a) गहराई में दबे तथा अधिक तापमान से प्रभावित कोयले को बिटुमिनस (Bituminous) कोयला कहा जाता है।(b) एंथ्रेसाइट (Anthracite) सर्वोत्तम गुण वाला कठोर कोयला है।(c) लिग्नाइट एक निम्न कोटि का भूरा कोयला होता है। यह मुलायम होने के साथ अधिक नमीयुक्त होता है।(d) धातुशोधन (Metallurgical) कोयला उच्च श्रेणी के लिग्नाइट कोयला है जिसका वात्या भट्ठी (Blast Furnace) में लोहे के प्रगलन में विशेष महत्व है।Correct Answer: (d) धातुशोधन (Metallurgical) कोयला उच्च श्रेणी के लिग्नाइट कोयला है जिसका वात्या भट्ठी (Blast Furnace) में लोहे के प्रगलन में विशेष महत्व है।Solution:धातुशोधन संबंधी कोयला जिसे कोकिंग कोल के रूप में भी जाना जाता हैएक उच्च गुणवत्ता वाला बिटुमिनस कोयला होता है, जिसका उपयोग ब्लास्ट फर्नेस में लोहे को गलाने के लिए किया जाता है।कोयला किस प्रकार का ईंधन है और उसका वर्गीकरण:कोयला एक जीवाश्म ईंधन है जिसमें कार्बन का अधिक प्रतिशत होता हैसामान्यतः इसे एन्थ्रेसाइट, बिटुमिनस, लिग्नाइट और पीट में वर्गीकृत किया जाता है।इस वर्गीकरण के साथ-साथ कोयला राख, सल्फर, और अशुद्धियों की मात्रा प्रकार के अनुसार भिन्न होती है।यह जानकारी स्पष्ट रूप से विभिन्न शैक्षणिक स्रोतों में मिलती है.उच्च ताप और दबाव के कारण भूमिगत भीतर समय के साथ जमा होने पर कोयला बनता हैइसे कार्बनीकरण कहा जाता है, और इसी प्रक्रिया से कोयला जीवाश्म ईंधन के रूप में प्रकट होता है.लोहे-इस्पात और धातु-उत्पादन के लिए कोयले के प्रकारों की भूमिका:धातु-शोधन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कोयला (कॉकिंग कोल) उच्च गुणवत्ता का कठोर कोयला होता है, जिसका सल्फर-फॉस्फोरस कम रहता हैइसे ब्लास्ट फर्नेस में लोहे के निष्कर्षण के लिए उपयोग किया जाता है।यह लिग्नाइट नहीं, बल्कि बिटुमिनस/एन्थ्रेसाइट के संदर्भ में आता है.सामान्य थर्मल कोयला गर्मी और बिजली उत्पादन के लिए उपयोगी हैपरन्तु धातु-निर्माण के लिए सबसे उपयुक्त नहीं माना जाता।इस दृष्टिकोण से भी कोयले के प्रकार और उनके अनुप्रयोग स्पष्ट रहते हैं.भारत-specific तथ्य:भारत के कोयला भंडार और उनके वर्गीकरण, साथ ही प्रमुख क्षेत्र, अक्सर UPSC/प्रश्न-उत्तर संदर्भ में पूछे जाते हैंभारत में कोयला संसाधनों का संयोजन और उनकी संरचना के बारे में शिक्षण सामग्री मिलती है.कथनों का विश्लेषणनीचे दिये गए सारे कथन विचारणीय हैं, किन्तु निम्न बिंदुओं को ध्यान में रखकर सही/गलत का निर्धारण करना चाहिए:“धातु-शोधन-संबंधी कोयला उच्च श्रेणी का लिग्नाइट कोयला होता है” — यह कथन गलत हैक्योंकि धातु-शोधन हेतु कोयला उच्च गुणवत्ता वाला कठोर कोयला (अक्सर एन्थ्रेसाइट या बिटुमिनस) होता है, न कि लिग्नाइट। लिग्नाइट कम श्रेणी का कोयला है.“कोयला राख में विषैले तत्व होते हैं” — इसका हिस्सा हैराख में विषाक्त तत्व मिलना सामान्य बात है; विशिष्ट प्रश्नों में राख composition पर निर्भर रहता है.“ICED” जैसे अन्य दावों के सटीक सत्यापन हेतु स्रोत परिभाषित किए जाते हैंकई शिक्षा/परीक्षा स्रोतों में भारत के लिए 55% ऊर्जा योगदान आदि जैसे आंकड़े होते हैं, जो संदर्भ के अनुसार बदल सकते हैं.उचित चयन (क्योंकि प्रश्न में “गलत” कथन पूछा गया है)यदि विकल्पों में यह कहा गया हो: “धातु-शोधन-संबंधी कोयला लिग्नाइट हैतब यह गलत होगा, क्योंकि धातु-शोधन के लिए कोयला उच्च गुणवत्ता का कठोर कोयला चाहिए, जो लिग्नाइट नहीं होता।इस प्रकार का कथन सामान्य शिक्षण-स्रोतों में गलत माना जाता है.अन्य संभावित गलत दावे (जैसे भारत में कोयला 55% ऊर्जा हिस्सा है आदि) संदर्भ-आधारित होते हैंस्रोत-विशिष्ट पाठ्यपुस्तकों/प्रश्न-पत्रों में भिन्न हो सकते हैं; सही-जवाब के लिए दिए गए स्रोत-पैनल के आधार पर सत्यापित करना चाहिए.34. 'मृदा - अभिलक्षण' का निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सही है? [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (IV-पाली)]I. बलुई - सूक्ष्म कणों का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक होता है।II. मृण्मय - स्थूल कणों का अनुपात अधिक होता है।(a) न तो I और न ही II(b) केवल I(c) केवल II(d) I और II दोनोंCorrect Answer: (a) न तो I और न ही IISolution:जिस मृदा में सूक्ष्म कणों का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक होता है, तो उसे मृण्मय मृदा कहते हैं, न कि बलुई मृदा।बड़े कणों के अधिक अनुपात वाली मृदा को बलुई मृदा कहा जाता है। अतः दोनों कथन गलत हैं।परिचयात्मक निष्कर्षमृदा एक जैविक-भौतिक मिश्रण है जिसे उसकी परतों (A, B, C) और उनके गुणों (ह्यूमस मात्रा, खनिज समृद्धि, पानीretenशीलता आदि) से पहचाना जाता है.सामान्य मृदा-परिच्छेदिका के अनुसार शीर्षमृदा (A-santar) पौधों के जड़-विकास के लिए उर्वरक होती हैजबकि B-संस्थर नीचे की परत है जिसमें खनिज अधिक परत में रहते हैं, और C-संस्तर तथा आधार शैल मिलकर नीचे की संरचना बनाते हैं.युग्मों के सही/गलत चयन की प्रक्रियायुग्म 1: A-santar (शीर्ष मृदा) बनाम H्यूमस की मात्रा/उर्वरतासही: उच्च hयूमस मात्रा शीर्ष मृदा में पाई जाती है और यह उर्वरता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है.गलत: यदि युग्म में शीर्ष मृदा को पूरी तरह कम उर्वर बताने या ह्यूमस के-role को न मानना हो, वह गलत होगा.युग्म 2: B-संस्तर बनाम ह्यूमस/खनिजसही: B-संस्तर में ह्यूमस कम होती है और खनिज अधिक होते हैंयह परत शीर्ष मृदा के नीचे स्थित रहती है और कठोर/घनी हो सकती है.गलत: यदि कहा जाए कि B-संस्तर में ह्यूमस अधिक है, या यह शीर्ष मृदा से दूर नहीं होता, तो वह गलत होगा.युग्म 3: C-संस्तर बनाम “आधार शैल”सही: C-संस्तर दरारों/विदरोंयुक्त शैल के छोटे ढेलों से बना होता है और नीचे आधार शैल होता हैयह संरचना मृदा-परतों की क्रमबद्धता का भाग है.गलत: अगर युग्म में C-संस्तर को आधार शैल बताने या नीचे आधार शैल नहीं बताने पर है, तो वह गलत ठहरता है.युग्म 4: शीर्ष मृदा-उर्वरता बनाम जल-जलन/आधार प्रभावसही: शीर्ष मृदा उर्वर रहती है क्योंकि इसमें ह्यूमस और जीव-जंतु गतिविधियाँ कमरों के लिए पोषण प्रदान करती हैंजल-आवागमन/जलन पर यह अधिक प्रभाव डालती है.गलत: यदि कथन में कहा गया कि शीर्ष मृदा जल-रोधक है या जल-धारण क्षमता नहीं है, तो वह गलत हो सकता है.ध्यानपूर्वक देखने योग्य बिंदुप्रश्न के सही उत्तर के लिए उपलब्ध विकल्पों की सूची ज़रूरी हैताकि हर विकल्प का परीक्षण करके एक स्पष्ट, एक-ही-गलत कथन चुना जा सके.मृदा अभिलक्षण के सामान्य प्रकार (A/B/C-santars, topper/ह्यूमस, जल-आधार आदि) से जुड़ी जानकारी के आधार पर सही उत्तर निर्धारित किया जा सकता है.35. निम्नलिखित में से कौन-सी पहाड़ियां पूर्वांचल पहाड़ियों का हिस्सा नहीं है? [CHSL (T-I) 11 मार्च, 2023 (I-पाली)](a) पाटली पहाड़ियां(b) मिजो पहाड़ियां(c) नागा पहाड़ियां(d) मणिपुर पहाड़ियांCorrect Answer: (a) पाटली पहाड़ियांSolution:पाटली पहाड़ियां, पूर्वांचल पहाड़ियों का हिस्सा नहीं हैं।पूर्वांचल की पहाड़ियों या उत्तर-पूर्वी पहाड़ियों में नागा पहाड़ियां, मणिपुरी पहाड़ियां और मिजो पहाड़ियां सम्मिलित हैं।विस्तार विवरणपूर्वांचल पहाड़ियाँ (Purvanchal Hills) उत्तरपूर्वी भारत के हिमालयी प्रणाली का एक पूर्वी विस्तार हैंजिनमें दिहांग नदी कण्ठ के दक्षिण की ओर फैलना, भारत-रोस सीमा के पास म्यांमार तक पहुँचना आदि विशेषताएं शामिल हैं।पूर्वांचल के प्रमुख भागों में नागा हिल्स, लुशाई हिल्स, जम्पुई हिल्स, पटकाई बुम हिल्स आदि शामिल होते हैंजबकि पाटली पहाड़ियाँ दिल्ली-आधारित भूगोल में स्थित हैं और पूर्वांचल की अलग श्रृंखला का हिस्सा नहीं मानी जातीं।इस कारण पाटली पहाड़ियाँ पूर्वांचल पहाड़ियों की सूची में नहीं आतीं ।अन्य संदर्भों में पाटली/पाटली हिल्स के बारे में विवरण मिलता है कि ये दिल्ली के दक्षिण में स्थित हैंभारत के सामान्य भूगोल में एक स्थानीय पहाड़ी श्रृंखला के रूप में पहचानी जाती हैंइस प्रकार यह उत्तर-पूर्व भारत की पूर्वांचल पहाड़ियों की व्यापक श्रेणी के भीतर नहीं आतीं ।संस्करणों और स्रोतों में कभी-कभी नामकरण के मामूली अंतर दिखाई देते हैं(जैसे पूर्वांचल पहाड़ियों के उप-खण्ड, स्थानीय नाम आदि), लेकिन व्यावहारिक भौगोलिक परिसीमन के आधार पर पाटली पहाड़ियाँ अक्सर पूर्वांचल की पहाड़ियों में नहीं गिनी जातीं ।समझाने के लिए संक्षेप बिंदुपूर्वांचल पहाड़ियाँ: पूर्वोत्तर भारत में हिमालयी प्रणाली का पूर्वी विस्तार; नागा हिल्स, लुशाई हिल्स, जम्पुई हिल्स आदि शामिल; भारत-सीमा के आसपास और म्यांमार तक फैले क्षेत्र।पाटली पहाड़ियाँ: दिल्ली के दक्षिण में स्थित 히ल्स; स्थानीय, शहर‑आधारित भूगोल क्षेत्र; पूर्वांचल की मुख्य शक्ल में नहीं आतीं।36. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन भारतीय मरुस्थल के संबंध में सत्य है? [CHSL (T-I) 17 अगस्त, 2023 (III-पाली)](a) यह पश्चिम में अरावली से घिरा हुआ है।(b) यह अरावली के दक्षिण-पूर्व में स्थित है।(c) यह दक्षिण में अरावली से घिरा हुआ है।(d) यह अरावली के उत्तर पश्चिम में स्थित है।Correct Answer: (d) यह अरावली के उत्तर पश्चिम में स्थित है।Solution:भारत में पाया जाने वाला 'भारतीय मरुस्थल' थार मरुस्थल (भारत तथा पाकिस्तान में विस्तृत) हैजो राजस्थान में मौजूद है। यह अरावली के उत्तर-पश्चिम में स्थित है।भारतीय मरुस्थल को अक्सर थार मरुस्थल या ग्रेट इंडियन डेजर्ट के नाम से जाना जाता हैयह पश्चिमी राजस्थान के बड़े भाग को कवर करता है और कभी-कभी गुजरात, पंजाब और Haryana के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ माना जाता है।यह क्षेत्र अत्यंत शुष्क जलवायु वाला है और औसत वर्षा कम होती है।थार मरुस्थल का आकार भारत के कुल भूभाग का बड़ा हिस्सा दर्शाता है और इसे भारत के मरुदेशीय क्षेत्र के रूप में पहचाना जाता है।यहाँ की प्रमुख विशेषताएं: कम वर्षा (आमतौर पर 100–200 मिमी के आसपास, कुछ जगहें इससे भी कम या अधिक हो सकती हैं)उच्च वाष्पीकरण, ऊँचे दीर्घकालिक तापमान भेद, और लूनी/प्लाया जैसी आंतरिक जल प्रणालियाँ जो नमक-युक्त जल स्रोतों और सूखी नदियों के साथ विशिष्ट भू-विकल्प बनाती हैं।मुख्य भागभू-आकृति और क्षेत्रथार मरुस्थल भारत का बड़ा मरुस्थलीय क्षेत्र है, जो राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में फैला हैइसे “भारतीय मरुस्थल” के रूप में भी जाना जाता है।इसके विस्तार की सीमा पंखों जैसी रेखाओं में चिह्नित है, जो अरावली पर्वतों के पश्चिम से शुरू होकर गुजरात, पंजाब, हरियाणा के कुछ क्षेत्रों तक जाती है।यह क्षेत्र भारत के प्रमुख भू-आकृतिक तथ्यात्मक समूहों में से एक है।जलवायु और वर्षामरुस्थलीय क्षेत्र में वर्षा बेहद कम होती है; सामान्यतः लगभग 150 mm से कम या कभी-कभी 100–200 mm के आस-पास मानी जाती हैजिससे क्षेत्र शुष्क बना रहता है। गर्मियों में तापमान उच्च रहता है और_context_ में वाष्पीकरण अधिक रहता है।इन कारणों से यहां वनस्पति आवरण विरल होता है।जल संचयन और भू-जलथार क्षेत्र के भीतर कई द्रोणी-धाराएं/प्लाया (salt flats) और लूनी नदी जैसी नदियाँ प्रमुख जल-परिवहन के स्रोत हैं।प्लाया क्षेत्र का खारा जल पर्यावरणीय विशिष्टताओं का हिस्सा हैकभी-कभी यह नमक उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है।उत्पादन और अर्थव्यवस्थाथार क्षेत्र में ऊन (वूल) उत्पादन एक उल्लेखनीय आर्थिक तथ्य है; यह क्षेत्र विश्वस्तर पर ऊन के उत्पादन में एक बड़े हिस्से के लिए जाना जाता हैजो इसे न सिर्फ भारतीय बल्कि वैश्विक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण बनाता है।साथ ही यहाँ जैस्पर/काओलिन जैसे खनिज भी मिलते हैं।महत्त्वपूर्ण कथन (सत्य/गलत) – संक्षिप्त सत्यापनथार मरुस्थल पश्चिमी राजस्थान के बड़े भाग को कवर करता है और इसे भारतीय मरुस्थल के रूप में पहचाना जाता है (सत्य).क्षेत्र में वार्षिक वर्षा बहुत कम होती है, सामान्यतः लगभग 150 mm से कम (या 100–200 mm के आस-पास), यह शुष्क जलवायु का कारण है (सत्य).लूनी जैसी नदियाँ इस क्षेत्र से होकर बहती हैं या क्षेत्र की जल-नालियाँ प्लाया/खारे जल से जुड़ी होती हैंयह भू-संरचना और जल प्रबंधन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं (सत्य/प्रामाणिक विवरण).यह क्षेत्र भारत के मरुस्थलीय राज्य के रूप में पहचाना जाता है और इसे थार मरुस्थल भी कहा जाता है (सत्य).37. समाजशास्त्री जान ब्रेमन (Jan Breman) ने प्रबल वर्ग से संबंधित जमींदारों और निम्न जाति से संबंधित कृषि मजदूरों के बीच संबंधों की प्रकृति में बदलाव को ....... में बदलाव के रूप में वर्णित किया। [CHSL (T-I) 14 अगस्त, 2023 (II-पाली)](a) बंधुआ मजदूरी से मुफ्त मजदूरी(b) किराएदार से काश्तकार(c) संरक्षण से शोषण(d) शोषण से संरक्षणCorrect Answer: (c) संरक्षण से शोषणSolution:समाजशास्त्री जान ब्रेमन ने प्रबल वर्ग से संबंधित जमींदारों और निम्न जाति से संबंधित कृषि मजदूरों के बीच संबंधों की प्रकृति में बदलाव को 'संरक्षण से शोषण' में बदलाव के रूप में वर्णित किया।ब्रेमन का अध्ययन संदर्भजान ब्रेमन, एक प्रमुख डच समाजशास्त्री, ने 1970-80 के दशक में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों, खासकर गुजरात और महाराष्ट्र के बारदोली क्षेत्र में कृषि मजदूरों पर गहन शोध किया।उनकी पुस्तकें जैसे "Patronage and Exploitation: Changing Agrarian Relations in South Gujarat, India" (1974) और बाद के कार्यों में उन्होंने नोट किया कि स्वतंत्र भारत में भूमि सुधारों और हरित क्रांति के प्रभाव से पारंपरिक जमींदार-मजदूर संबंध बदल गए।पहले यह संबंध पितृसत्तात्मक (paternalistic) था, जहां जमींदार मजदूरों को न्यूनतम सुरक्षा, ऋण या त्योहारों पर सहायता प्रदान करते थेलेकिन बदले में आजीवन निष्ठा और कम मजदूरी की मांग करते थे। [ से संदर्भित सामान्य ज्ञान]बदलाव की प्रकृतिपितृसत्तात्मक शोषण: पुराने दौर में जमींदार मजदूरों को "परिवार सदस्य" जैसा मानते थे।मजदूर निम्न जातियों (जैसे दलित या आदिवासी) से होते थे, और संबंध जातिगत वफादारी पर टिका था।जमींदार मजदूरों को भूमि का छोटा टुकड़ा या बीज-खाद देते थे, लेकिन मजदूरी बहुत कम होती थी।यह शोषण छिपा हुआ था, सामाजिक बंधनों से बंधा।वस्तुबादी शोषण: आधुनिक परिवर्तनों (नकदी फसलें, बाजार अर्थव्यवस्था) से मजदूर अब "वस्तु" (commodity) बन गए।जमींदार उन्हें मौसमी काम पर रखते हैं, कोई स्थायी बंधन नहीं। मजदूरी बाजार दर पर निर्भर, लेकिन अब शोषण खुला हैकम वेतन, कोई सुरक्षा, और प्रवासी मजदूरी। ब्रेमन ने इसे "सेमी-फ्यूडल से कैपिटलिस्ट शोषण" के रूप में देखा।प्रमुख कारणब्रेमन के अनुसार यह बदलाव निम्नलिखित कारकों से हुआ:भूमि सुधार नीतियां: 1950-60 के दशक में जमींदारी उन्मूलन से जमींदारों ने उत्पादकता बढ़ाई, मजदूरों को हाशिए पर धकेल दिया।हरित क्रांति: नकदी फसलों (कपास, गन्ना) ने मजदूरी को मौसमी बनाया, मजदूरों को वर्षा ऋतु के बाद बेरोजगार छोड़ दिया।जातिगत गतिशीलता: निम्न जाति मजदूरों ने संघर्ष शुरू किया, लेकिन जमींदारों ने अनौपचारिक ठेके और प्रवासन को बढ़ावा दिया।प्रभाव और आलोचनायह बदलाव मजदूरों के लिए अधिक असुरक्षा लाया—भुखमरी, ऋण चक्र, और शहरी स्लमों की ओर पलायन।ब्रेमन ने इसे "नव-दासता" (neo-bondage) कहा, जहां मजदूर आर्थिक मजबूरी से बंधे रहते हैं।उनके कार्य ने भारतीय ग्रामीण समाजशास्त्र को प्रभावित किया, और इसे मार्क्सवादी विश्लेषण से जोड़ा गया।हालांकि, कुछ आलोचक कहते हैं कि यह गुजरात-केंद्रित है, पूरे भारत पर लागू नहीं।38. ....... सबसे गहरा भूपरिवेष्ठित (landlocked) और पूरी तरह से संरक्षित बंदरगाह है। [MTS (T-I) 15 मई, 2023 (III-पाली)](a) विशाखापत्तनम(b) कांडला(c) पाराद्वीप(d) मुंबईCorrect Answer: (a) विशाखापत्तनमSolution:विशाखापत्तनम सबसे गहरा भूपरिवेष्ठित और पूरी तरह से संरक्षित बंदरगाह है।इस बंदरगाह की योजना मूल रूप से लौह अयस्क के निर्यात के लिए बनाई गई थी।यह आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में स्थित है और पूर्वी तट पर बंगाल की खाड़ी के किनारे पहाड़ियों से घिरा हुआ है।इसकी गहराई लगभग 17.5 मीटर है, जो बड़े जहाजों को आसानी से समर्थन प्रदान करती है।स्थान और भौगोलिक विशेषताएँविशाखापट्टनम बंदरगाह 'डॉल्फिन्स नोज' नामक चट्टानी पहाड़ी द्वारा प्राकृतिक रूप से सुरक्षित हैजो चक्रवातिक हवाओं और समुद्री लहरों से रक्षा करता है।यह तीन ओर से भूमि और पहाड़ियों से घिरा होने के कारण भूपरिवेष्ठित कहलाता हैजबकि समुद्र की ओर संकीर्ण जलमार्ग से जुड़ा है। बंदरगाह पूर्वी घाट की पहाड़ियों के बीच बसा है, जो इसे "पूर्वी तट का जेवर" बनाता है।ऐतिहासिक पृष्ठभूमियह भारत के 13 प्रमुख बंदरगाहों में से एक है और राज्य स्वामित्व वाला तीसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है।शुरू में लौह अयस्क निर्यात के लिए विकसित किया गया, अब यह कंटेनर, कच्चा तेल, कोयला, उर्वरक और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) संभालता है।पास के गंगावरम बंदरगाह के उद्घाटन से कुछ यातायात प्रभावित हुआ, लेकिन यह रणनीतिक महत्व बनाए रखता है।महत्वपूर्ण विशेषताएँगहराई और क्षमता: सबसे गहरा प्राकृतिक बंदरगाह, जो बड़े ड्राफ्ट वाले जहाजों को संभाल सकता है।सुरक्षा: प्राकृतिक बाड़ से सुनामी और चक्रवातों से सुरक्षित।कनेक्टिविटी: राजमार्गों, रेलवे और दक्षिण पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया तथा मध्य पूर्व से अच्छी तरह जुड़ा।आधुनिक सुविधाएँ: LNG के लिए भारत का पहला समर्पित बर्थ।39. प्रवास में, वे कारक जो लोगों को अपने निवास स्थान अथवा उद्गम को छुड़वाने को कारण बनते है, ....... कहलाते हैं। [MTS (T-I) 10 मई, 2023 (II-पाली)](a) नियमित कारक(b) प्रतिकर्ष कारक(c) अनियमित कारक(d) अपकर्ष कारकCorrect Answer: (b) प्रतिकर्ष कारकSolution:प्रतिकर्ष कारक वे कारक हैं, जो व्यक्तियों या समूहों को अपना निवास स्थान या मूल स्थान छोड़कर किसी नए स्थान पर जाने के लिए प्रेरित करते हैं।प्रतिकर्ष कारकों की परिभाषा जिससे लोग मजबूर होकर अपना घर-गांव या देश छोड़ने पर विवश हो जाते हैं।ये कारक मुख्य रूप से आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, पर्यावरणीय या सांस्कृतिक होते हैं।उदाहरणस्वरूप, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी जैसे कारक लोगों को शहरों की ओर धकेलते हैं।मुख्य प्रकार के प्रतिकर्ष कारकप्रतिकर्ष कारकों को विभिन्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है:आर्थिक कारक: बेरोजगारी, गरीबी, कृषि भूमि पर जनसंख्या दबाव, कम आय और भूखमरी।ग्रामीण भारत में सीमित रोजगार के कारण लाखों लोग शहरों में प्रवास करते हैं।सामाजिक कारक: शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, बिजली, परिवहन और मनोरंजन का अभाव।जातीय भेदभाव या पारिवारिक विवाद भी लोगों को स्थान छोड़ने पर मजबूर करते हैं।राजनीतिक कारक: युद्ध, अशांति, आतंकवाद, धार्मिक दंगे या राजनीतिक उत्पीड़न। जैसे कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का प्रवास।पर्यावरणीय कारक: प्राकृतिक आपदाएं (बाढ़, सूखा), मिट्टी क्षरण, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट। ये ग्रामीण क्षेत्रों से शहरीकरण को बढ़ावा देते हैं।अपकर्ष कारकों से अंतरप्रतिकर्ष कारक मूल स्थान से "धकेलने" वाले होते हैंजबकि अपकर्ष कारक (Pull Factors) गंतव्य स्थान की सकारात्मक विशेषताओं जैसे बेहतर नौकरी, उच्च वेतन या सुविधाओं से "खींचने" वाले होते हैं।दोनों मिलकर प्रवासन को निर्देशित करते हैं।उदाहरण: दिल्ली में रोजगार के अवसर अपकर्ष कारक हैं, लेकिन गांव में बेरोजगारी प्रतिकर्ष।भारत में उदाहरण और प्रभावभारत में ग्रामीण से शहरी प्रवासन के 70% से अधिक मामले प्रतिकर्ष कारकों से प्रेरित हैंजैसे बिहार-उत्तर प्रदेश से मुंबई-दिल्ली की ओर।ये प्रवासन सकारात्मक (प्रेषण अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं) और नकारात्मक (गांव खाली, शहरों में झुग्गियां) दोनों प्रभाव डालते हैं।नीति स्तर पर, ग्रामीण विकास से इन कारकों को कम किया जा सकता है।40. ब्लैकबक राष्ट्रीय पार्क (कालियार पार्क) ....... में स्थित है। [MTS (T-I) 08 मई, 2023 (III-पाली)](a) सिक्किम(b) गुजरात(c) हरियाणा(d) मध्य प्रदेशCorrect Answer: (b) गुजरातSolution:वेलावदर ब्लैकबक राष्ट्रीय पार्क (कालियार पार्क) गुजरात राज्य में स्थित है। यह पार्क भावनगर जिले में स्थित है।स्थान और क्षेत्रफलयह पार्क सौराष्ट्र के भाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जो भावनगर शहर से लगभग 42 किलोमीटर दूर है।दक्षिण में खंभात की खाड़ी (गल्फ ऑफ खंभात) से लगा हुआ यह उद्यान 34.08 वर्ग किलोमीटर में फैला है।पहले यह भावनगर रियासत के महाराजा का शिकार का मैदान था, जहां वे चीतों के साथ काले हिरणों का शिकार करते थे।स्थापना और इतिहासपार्क की स्थापना 1976 में हुई थी, जब इसे पहले 18 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में संरक्षित अभयारण्य घोषित किया गया।1980 में इसका क्षेत्रफल बढ़ाकर 34 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया।यह घास के मैदानों (वीड़ी) पर आधारित पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण उदाहरण हैजो अब दुर्लभ हो चुके शांत घास भूmियों का प्रतिनिधित्व करता है।वन्यजीव विविधतायहां भारत की सबसे बड़ी काले हिरणों (कृष्णमृग) की आबादी है, जिनकी संख्या लगभग 2,000 हैअन्य प्रमुख जीवों में नीलगाय, भेड़िये, लकड़बग्घे, सियार, जंगली बिल्ली, लोमड़ी और 170 से अधिक पक्षी प्रजातियां शामिल हैंजैसे लेसर फ्लोरिकन। पक्षी प्रेमियों के लिए यह आदर्श स्थान है, खासकर प्रवासी पक्षियों के मौसम में।पर्यटन और विशेषताएंपर्यटक जीप सफारी से इन घास के मैदानों का भ्रमण कर सकते हैं, जहां काले हिरणों की टोलियां आसानी से दिखाई देती हैं।सर्दियों में यहां का नजारा सबसे शानदार होता है।पार्क भारतीय चीते के ऐतिहासिक आवास के रूप में भी जाना जाता था।पहुंचने के लिए भावनगर हवाई अड्डा या रेलवे स्टेशन निकटतम है।Submit Quiz« Previous12345Next »