विविध (भौतिक विज्ञान)

Total Questions: 12

1. कोरिऑलिस बल किसके कारण होता है? [MTS (T-I) 07 जुलाई, 2022 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) पृथ्वी के घूर्णन
Solution:
  • कोरिऑलिस बल एक आभासी बल है, जो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होता है।
  • कोरिऑलिस बल अक्षांशों के कोण के सीधे समानुपात में बढ़ता है।
  • यह ध्रुवों पर सर्वाधिक और विषुवत वृत्त पर अनुपस्थित होता है।
  • कारण
    • कोरिऑलिस बल का मुख्य कारण पृथ्वी का अपनी धुरी पर पूर्व से पश्चिम की ओर घूमना है।
    • पृथ्वी के विभिन्न अक्षांशों पर घूर्णन गति अलग-अलग होती है
    • विषुवत् रेखा पर अधिकतम और ध्रुवों की ओर घटती जाती है
    • जिससे कोई भी उत्तर-दक्षिण दिशा में गतिमान वस्तु पर यह बल कार्य करता है।
    • यह बल वास्तविक नहीं, बल्कि घूर्णी संदर्भ तल (rotating frame of reference) में अभिलाक्षणिक (fictitious) प्रभाव है।
  • गणितीय सूत्र
    • कोरिऑलिस बल की परिमाण Fc=−2m(ω⃗×v⃗)
    • से दी जाती है, जहाँ m वस्तु का द्रव्यमान, ω⃗ पृथ्वी की कोणीय वेग सदिश (ध्रुवों की ओर निर्देशित), और v⃗ वस्तु का वेग है।
    • यह बल वस्तु की गति के लंबवत् कार्य करता है और अक्षांश ϕ पर 2ωvsin⁡ϕ के रूप में व्यक्त होता है।
  • प्रभाव
    • उत्तरी गोलार्ध में यह बल दाईं ओर विक्षेपित करता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर।
    • विषुवत् रेखा पर शून्य और ध्रुवों पर अधिकतम होता है
    • जिससे हवाएँ समदाब रेखाओं के लंबवत् बहने के बजाय विक्षेपित हो जाती हैं।
    • महासागरीय धाराएँ भी इससे 45° कोण पर मुड़ जाती हैं।
  • मौसम पर प्रभाव
    • यह बल चक्रवातों और प्रतिचक्रवातों की घूर्णी गति का कारण बनता है
    • क्योंकि उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के लिए कोरिऑलिस प्रभाव आवश्यक है।
    • पवनों को प्रभावित कर मौसम पैटर्न बनाता है, जैसे व्यापारिक पवनें पूर्व से पश्चिम मुड़ जाती हैं।

2. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) का मुख्यालय कहां स्थित है? [C.P.O.S.I. (T-I) 09 नवंबर, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) हैदराबाद
Solution:
  • राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) तथा अंतरिक्ष विभाग के प्रमुख केंद्रों में से एक है। इसका मुख्यालय हैदराबाद में स्थित है।
  • स्थान विवरण
    • NRSC का मुख्यालय हैदराबाद के बालानगर में है, जो तेलंगाना राज्य की राजधानी है।
    • यह केंद्र शादनगर के पास एक डेटा रिसेप्शन स्टेशन भी संचालित करता है
    • जहां भारतीय और विदेशी सुदूर संवेदन उपग्रहों से डेटा प्राप्त किया जाता है।
    • पिन कोड 500037 है, और आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।
  • इतिहास
    • NRSC की स्थापना मूल रूप से राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग एजेंसी (NRSA) के रूप में हुई थी
    • जो अंतरिक्ष विभाग (DOS) के अधीन थी। 1 सितंबर 2008 को इसे ISRO का पूर्ण केंद्र बना दिया गया।
    • तब से यह ISRO के बुनियादी ढांचे का अभिन्न अंग है।
  • कार्य और जिम्मेदारियां
    • यह केंद्र हवाई और उपग्रह स्रोतों से डेटा प्रबंधन करता है
    • जिसमें ग्राउंड स्टेशन स्थापना, डेटा उत्पाद निर्माण, उपयोगकर्ताओं को वितरण, आपदा प्रबंधन सहायता, भू-स्थानिक सेवाएं और क्षमता निर्माण शामिल हैं।
    • यह कृषि, जल संसाधन, वन्यजीव, शहरी नियोजन और पर्यावरण निगरानी जैसे क्षेत्रों में सुदूर संवेदन अनुप्रयोग विकसित करता है।

3. LPG को छोटे सिलिंडरों में उच्च दाब के अंतर्गत संगृहीत किया जाता है, क्योंकि ....... I [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 21 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) गैस, द्रव रूप में बदल जाती है, जिससे भंडारण के लिए कम जगह की आवश्यकता होती है।
Solution:
  • LPG को छोटे सिलिंडरों में उच्च दाब के अंतर्गत संगृहीत किया जाता है, क्योंकि गैस द्रव के रूप में बदल जाती है
  • जिससे भंडारण के लिए कम जगह की आवश्यकता होती है।
  • घरेलू गैस सिलेंडर में LPG तरल अवस्था में संगृहीत की जाती है।
  • LPG में रिसाव को ज्ञात करने के लिए मिथाइल मर्केप्टन का प्रयोग किया जाता है।
  • LPG क्या है?
    • जो पेट्रोलियम रिफाइनरी से प्राप्त होता है।
    • सामान्य तापमान और दाब पर यह गैस रूप में रहता है
    • लेकिन मध्यम दाब (लगभग 5-10 बार) पर आसानी से द्रवीभूत हो जाता है।
    • यह गुण इसे छोटे घरेलू सिलिंडरों (जैसे 14.2 किग्रा) के लिए आदर्श बनाता है।
  • उच्च दाब भंडारण का विज्ञान
    • उच्च दाब के तहत LPG द्रव बन जाता है क्योंकि दाब बढ़ने से अणुओं के बीच आकर्षण बल मजबूत होता है
    • गैस का उबलने बिंदु ऊंचा हो जाता है। उदाहरणस्वरूप, प्रोपेन का उबलने बिंदु सामान्य दाब पर -42°C है
    • लेकिन 8-10 बार दाब पर यह कमरे के तापमान पर द्रव रहता है।
    • इससे गैस का आयतन 250-300 गुना कम हो जाता है—600 लीटर गैस मात्र 2 लीटर द्रव में बदल जाती है।
    • सिलिंडर से वाल्व खोलने पर दाब कम होने से द्रव फिर गैस बनता है और स्टोव तक पहुंचता है।
  • छोटे सिलिंडरों के लाभ
    • पोर्टेबिलिटी: छोटे आकार (12-15 किग्रा) के कारण घरों, रेस्तरां या कैंपिंग में आसानी से ले जाया जा सकता है।
    • सुरक्षा: स्टील सिलिंडर उच्च दाब (16-20 बार तक) सहन करने योग्य होते हैं
    • द्रव रूप में होने से रिसाव का खतरा कम रहता है। हालांकि, अधिक गर्मी से दाब बढ़ सकता है
    • इसलिए सिलिंडर को ठंडी जगह पर रखें।
    • आर्थिकता: कम जगह में अधिक ऊर्जा (लगभग 28 MJ/kg) संग्रहित होती है, जो बड़े टैंकों की तुलना में सस्ता पड़ता है।
  • भंडारण प्रक्रिया
    • LPG को रिफाइनरी में कंप्रेसर से संपीड़ित कर सिलिंडर भरे जाते हैं।
    • दाब 100-200 PSI (लगभग 7-14 बार) रखा जाता है।
    • सिलिंडर में 80-85% द्रव और ऊपर गैस की परत रहती है
    • जो विस्तार के लिए जगह देती है। भारत में IS 3196 मानक के अनुसार सिलिंडर बनते हैं।
  • जोखिम और सावधानियां
    • उच्च दाब से विस्फोट का खतरा रहता है
    • अगर सिलिंडर क्षतिग्रस्त हो या आग के पास रखा जाए (BLEVE प्रभाव)।
    • रेगुलेटर, हॉज पाइप नियमित जांचें और लीक टेस्ट करें।
    • उच्च दाब भंडारण के बावजूद, यह CNG या PNG से अधिक सुरक्षित है घरेलू उपयोग के लिए।

4. कोई कंगारू प्रथम 40 सेकंड में 150 मी. दौड़ता है और फिर, अगले 10 सेकंड में 100 मी. दौड़ता है। अभी भी उसका विस्थापन केवल 50 मी. है। कंगारू का औसत वेग ज्ञात कीजिए। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 1 दिसंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) 1 मी./सेकंड
Solution:
  • औसत वेग =  कुल विस्थापन/कुल समय
  • = 50 मी./(40+10) सेकंड
  • = 50/50
  • = 1 मी./सेकंड
  • औसत वेग की परिभाषा
    • औसत वेग एक सदिश राशि है जो कुल विस्थापन को कुल समय से विभाजित करके निकाला जाता है।
    • सूत्र है:औसत वेग=Δs⃗Δtयहाँ Δs⃗
    • प्रारंभिक और अंतिम स्थिति के बीच वेक्टर विस्थापन है।
    • विस्थापन दूरी नहीं, बल्कि सीधी रेखा में वास्तविक परिवर्तन है।
  • समस्या का विश्लेषण
    • कंगारू पहले 40 सेकंड में 150 मीटर दौड़ता है, जो संभवतः आगे की ओर है।
    • फिर अगले 10 सेकंड में 100 मीटर दौड़ता है
    • जो पीछे की ओर होना चाहिए क्योंकि कुल विस्थापन केवल 50 मीटर रह गया
    • पहले भाग में विस्थापन = +150 मीटर (O से 150 मीटर आगे, बिंदु A)।
    • दूसरे भाग में विस्थापन = -100 मीटर (A से 100 मीटर पीछे, बिंदु B)।
    • कुल विस्थापन = 150 - 100 = 50 मीटर (O से B तक आगे की ओर)।
      कुल समय = 40 + 10 = 50 सेकंड।
  • गणना
    • औसत वेग=50 मीटर50 सेकंड=1 मीटर/सेकंड
      वेग की दिशा आगे की ओर है क्योंकि विस्थापन धनात्मक है।
    • ध्यान दें: औसत चाल कुल दूरी (150 + 100 = 250 मीटर) से निकलेगी
    • जो 5 m/s होगी, लेकिन प्रश्न औसत वेग का है।
  • वेग-समय ग्राफ की कल्पना
    • यदि वेग-समय ग्राफ बनाएँ
    • तो पहले 40 सेकंड में क्षेत्रफल 150 मीटर (औसत वेग 150/40 = 3.75 m/s)
    • अगले 10 सेकंड में -100 मीटर (औसत -10 m/s)। कुल क्षेत्रफल 50 मीटर है
    • जो औसत वेग को पुष्टि करता है।
    • यह दर्शाता है कि वेग सदैश होने से दिशा महत्वपूर्ण है।

5. बेकरेल, जो एक विघटन प्रति सेकंड (dps) के बराबर है, को किस प्रतीक द्वारा दर्शाया जाता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) Bq
Solution:
  • बेकरेल (Becquerel) जो एक विघटन प्रति सेकंड (dps) के बराबर है, को Bq के प्रतीक से दर्शाया जाता है।
  • यह रेडियोधर्मिता की SI इकाई है।
  • 1 बेकरेल को प्रति सेकंड 1 नाभिक क्षय के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • यह इकाई 1975 में अपनाई गई थी
    • फ्रांसीसी भौतिकशास्त्री हेनरी बेकरेल के सम्मान
    • जिन्होंने 1896 में रेडियोऐक्टिविटी की खोज की।
    • पहले क्यूरी (Ci) इकाई प्रचलित थी
    • लेकिन Bq अधिक वैज्ञानिक और सुसंगत है।
    • 1 Bq = 1 s^{-1}, जो विघटन दर को स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है।
  • उपयोग और उदाहरण
    • रेडियोऐक्टिविटी मापने में Bq का प्रयोग चिकित्सा, पर्यावरण निगरानी और भौतिकी प्रयोगों में होता है।
    • उदाहरणस्वरूप, मानव शरीर में पोटैशियम-40 से लगभग 4,400 Bq गतिविधि उत्पन्न होती है।
    • बड़े मानों के लिए उपसर्ग जैसे kBq (10^3 Bq) या MBq (10^6 Bq) जोड़े जाते हैं।

6. ग्लेन टी. सीबर्ग द्वारा 1940 में खोजे गए कौन-से एक्टिनाइड का उपयोग उपग्रहों में संवेदनशील विद्युत घटकों के लिए ऊष्मा स्रोत के साथ-साथ उपग्रहों के लिए ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जाता है? [CGL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) नोबेलियम
Solution:
  • ग्लेन टी. सीबर्ग द्वारा 1940 में खोजे गए नोबेलियम एक्टिनाइड तत्व का उपयोग उपग्रहों में संवेदनशील विद्युत घटकों के लिए ऊष्मा स्रोत के साथ-साथ उपग्रहों के लिए ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जाता है।
  • इसका प्रतीक No है तथा इसका परमाणु क्रमांक 102 है।
  • इस तत्व का नामकरण अल्फ्रेड नोबल के सम्मान में रखा गया है।
  • खोज का इतिहास
    • ग्लेन टी. सीबर्ग ने 1940 में अपने सहयोगियों के साथ प्लूटोनियम (परमाणु संख्या 94) की पहली बार पहचान की।
    • यह खोज यूरेनियम को न्यूट्रॉन से बमबारी करके की गई थी। प्लूटोनियम एक कृत्रिम तत्व है
    • जो एक्टिनाइड श्रृंखला का हिस्सा है और प्राकृतिक रूप से बहुत कम मात्रा में पाया जाता है।
  • भौतिक और रासायनिक गुण
    • प्लूटोनियम एक चांदीया-ग्रे रंग की रेडियोधर्मी धातु है
    • जो हवा के संपर्क में आने पर तेजी से ऑक्सीड होकर सुस्त परत बना लेती है।
    • यह सामान्यतः +3, +4, +5 और +6 ऑक्सीकरण अवस्थाओं में पाया जाता है
    • कई अपररूप (allotropes) प्रदर्शित करता है।
    • इसकी रेडियोधर्मिता के कारण यह विषैला और संभाले जाने में कठिन होता है।
  • उपग्रहों में उपयोग
    • प्लूटोनियम-238 (Pu-238) का अल्फा क्षय लंबे समय तक स्थिर ऊष्मा उत्पन्न करता है
    • जिसका उपयोग रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर (RTG) में होता है।
    • RTG उपग्रहों को बिजली प्रदान करते हैं और संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक्स को अंतरिक्ष की चरम ठंड से बचाते हैं।
    • उदाहरणस्वरूप, नासा के वॉयेजर, कैसिनी और न्यू होराइजन्स मिशनों में Pu-238 आधारित RTG का उपयोग हुआ।
    • इसका आधा जीवनकाल 87.7 वर्ष है, जो लंबे मिशनों के लिए आदर्श है।
  • अन्य अनुप्रयोग और तुलना
    • प्लूटोनियम-239 मुख्यतः नाभिकीय ईंधन और हथियारों में प्रयुक्त होता है
    • लेकिन Pu-238 विशेष रूप से शांतिपूर्ण अंतरिक्ष उपयोग के लिए तैयार किया जाता है।
    • क्यूरियम या अमेरिकियम जैसे अन्य एक्टिनाइड्स के विपरीत, Pu-238 की उच्च विशिष्ट शक्ति (लगभग 0.56 वाट/ग्राम) इसे उपग्रहों के लिए श्रेष्ठ बनाती है।
    • हालांकि, इसकी कमी और उत्पादन लागत उच्च होने से मिशनों की संख्या सीमित रहती है।

7. प्रकाश संचरण के लिए आवश्यक सैद्धांतिक पदार्थ 'प्रकाशवाही ईथर' के माध्यम से पृथ्वी की गति का पता लगाने के लिए किस प्रयोग की रूपरेखा तैयार की गई थी? [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) माइकल्सन और मोरले प्रयोग
Solution:
  • प्रकाश संचरण के लिए आवश्यक सैद्धांतिक पदार्थ 'प्रकाशवाही ईथर' के माध्यम से पृथ्वी की गति का पता लगाने के लिए माइकल्सन और मोरले प्रयोग की रूपरेखा तैयार की गई थी।
  • यह प्रक्रिया माइकल्सन इंटरफेरोमीटर पर निर्भर करती है
  • जो एक संवेदनशील ऑप्टिकल उपकरण है
  • जो दो परस्पर लंबवत दिशाओं में चलने वाले प्रकाश के ऑप्टिकल पथ की लंबाई की तुलना करता है।
  • ईथर की अवधारणा
    • 19वीं शताब्दी में वैज्ञानिक समुदाय यह मानता था कि प्रकाश एक तरंग है
    • इसलिए इसके संचरण के लिए किसी माध्यम की आवश्यकता होनी चाहिए, जिसे 'ल्यूमिनिफेरस ईथर' कहा गया।
    • ईथर को पूर्णतः स्थिर, अदृश्य और अत्यंत लचीला माना जाता था जो अंतरिक्ष को भरता था।
    • पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर कक्षीय गति (लगभग 30 किमी/सेकंड) के कारण पृथ्वी को ईथर के सापेक्ष गति करनी चाहिए
    • जिससे प्रकाश की गति दिशानुसार भिन्न होनी चाहिए।
  • प्रयोग का उद्देश्य
    • प्रयोग का मुख्य लक्ष्य ईथर के सापेक्ष पृथ्वी की 'एब्सोल्यूट मोशन' को मापना था।
    • यदि ईथर स्थिर है, तो पृथ्वी की गति की दिशा में प्रकाश की गति अधिक (c + v) और विपरीत दिशा में कम (c - v) होनी चाहिए
    • जबकि लंबवत दिशा में भिन्न प्रभाव दिखना चाहिए। इससे 'ईथर विंड' का पता चलना था।
  • प्रयोग की रूपरेखा और उपकरण
    • इंटरफेरोमीटर का उपयोग: माइकलसन ने विशेष इंटरफेरोमीटर बनाया
    • जिसमें एक प्रकाश स्रोत से निकलने वाली किरण को आधा चांदी-युक्त दर्पण (बीम स्प्लिटर) से दो समकोणीय दिशाओं में विभाजित किया जाता था।
    • दोनों भुजाएँ: एक भुजा ईथर के सापेक्ष पृथ्वी की गति की दिशा में (लंबाई L), दूसरी समकोणीय (लंबाई L)।
    • प्रत्येक भुजा के अंत में पूर्ण परावर्तक दर्पण लगे थे, जो प्रकाश को वापस भेजते।
    • संयोजन और अवलोकन: परावर्तित किरणें पुनः बीम स्प्लिटर पर मिलतीं
    • जहां हस्तक्षेप पैटर्न (इंटरफेरेंस फ्रिंज) टेलीस्कोप से देखा जाता।
    • घूर्णनशील प्लेटफॉर्म पर उपकरण को 90 डिग्री घुमाकर फ्रिंज शिफ्ट की अपेक्षा थी।
    • गणना: अपेक्षित शिफ्ट Δ = (L/λ)(v²/c²), जहाँ v ≈ 30 किमी/स, c = 3×10⁸ मी/स, λ = प्रकाश तरंगदैर्ध्य।
    • इससे 0.4 फ्रिंज शिफ्ट की भविष्यवाणी थी।
  • परिणाम और महत्व
    • प्रयोग के परिणाम नकारात्मक आए—कोई शिफ्ट नहीं मिला, सभी दिशाओं में प्रकाश गति स्थिर (c) पाई गई।
    • यह 'ईथर हाइपोथेसिस' को अस्वीकार करता था। हेनरी लॉरेंट्ज़ और जॉर्ज फिट्जगेराल्ड ने संकुचन परिकल्पना दी
    • लेकिन आइंस्टीन ने 1905 में विशेष सापेक्षता में इसे हल किया
    • जहाँ प्रकाश गति सभी निरीक्षकों के लिए स्थिर है।
    • प्रयोग ने क्वांटम यांत्रिकी और आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान की नींव रखी।
  • बाद के विकास
    • माइकलसन ने 1904-1921 तक परिष्कृत संस्करण किए, लेकिन परिणाम वही रहे।
    • अन्य प्रयोग जैसे ट्रोउटन-नोबल ने भी ईथर को खारिज किया। आज ईथर की अवधारणा अप्रासंगिक है।

8. ......., विकिरण बेल्ट चुंबकीय रूप से फंसे हुए अत्यधिक ऊर्जावान आवेशित कणों की विशाल पट्टी है, जो पृथ्वी को घेरे रहते हैं [CGL (T-I) 13 अप्रैल, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) वैन एलेन (Van Allen)
Solution:
  • वैन एलेन, विकिरण (radiation) बेल्ट ऊर्जा वान आवेशित कणों का एक क्षेत्र है
  • जिनमें से अधिकांश सौर वायु से उत्पन्न होते हैं। यह पृथ्वी को चारों ओर से घेरता है
  • जिसमें लगभग अभेद्य अवरोध होता है, जो सबसे तेज ऊर्जावान इलेक्ट्रॉनों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोकता है।
  • संरचना
    • विकिरण बेल्ट मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में विभाजित होती है।
    • आंतरिक बेल्ट पृथ्वी की सतह से लगभग 1,000 से 6,000 किलोमीटर ऊपर फैली होती है
    • इसमें मुख्यतः उच्च ऊर्जा वाले प्रोटॉन होते हैं, जो ऊपरी वायुमंडल से ब्रह्मांडीय किरणों के टकराव से उत्पन्न होते हैं।
    • बाहरी बेल्ट 15,000 से 25,000 किलोमीटर ऊंचाई तक विस्तृत है
    • इसमें ज्यादातर इलेक्ट्रॉन भरे होते हैं, जो सौर हवाओं से आते हैं।
  • उत्पत्ति और खोज
    • इन बेल्ट की खोज 1958 में अमेरिकी भौतिकशास्त्री जेम्स वैन एलन ने की थी
    • जब एक्सप्लोरर-1 उपग्रह ने इन कणों का पता लगाया।
    • पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इन आवेशित कणों को अपनी चुंबकीय रेखाओं के साथ बांधे रखता है
    • जिससे वे ध्रुवों की ओर बढ़ते हैं और कभी-कभी ऑरोरा (ध्रुवीय ज्योति) का निर्माण करते हैं।
  • महत्व और प्रभाव
    • ये बेल्ट पृथ्वी को सूर्य की हानिकारक सौर हवाओं से बचाती हैं
    • लेकिन अंतरिक्ष यात्राओं के लिए खतरा पैदा करती हैं
    • क्योंकि इनमें इतनी ऊर्जा होती है कि इलेक्ट्रॉनिक उपकरण खराब हो सकते हैं
    • मानव स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
    • अपोलो मिशनों ने इन बेल्ट को पार करने के लिए विशेष ट्रैजेक्ट्री चुनी थी ताकि विकिरण का सामना कम हो।
  • विशेषताएं
    • बेल्ट का आकार चुंबकीय गतिविधियों से बदलता रहता है, जैसे सौर ज्वाला से इनकी तीव्रता बढ़ सकती है।
    • दक्षिण अटलांटिक विसंगति जैसे क्षेत्रों में चुंबकीय क्षेत्र कमजोर होने से बेल्ट प्रभावित होती हैं।
    • ये कण इतने ऊर्जावान होते हैं कि इनकी गति प्रकाश की गति के करीब पहुंच जाती है।

9. 'शंकुक' (gnomon) ....... का एक भाग है। [CGL (T-I) 21 अप्रैल, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) सौर घड़ी
Solution:
  • 'शंकुक' (gnomon) सौर घड़ी का एक भाग है।
  • इसमें मुख्यतः फर्श या किसी क्षैतिज समतल पर एक खड़ा छड़ होता था
  • जिसकी छाया की स्थिति दिन का समय बताती थी।
  • शंकुक क्या है?
    • शंकुक, जिसे अंग्रेजी में "gnomon" कहा जाता है
    • एक सरल धातु की छड़, तार या पिन होता है जो सूर्य की किरणों से छाया डालता है।
    • यह सूर्य घड़ी (sundial) का मुख्य हिस्सा है
    • जहां इसकी छाया घड़ी की सतह पर निशानियों से समय बताती है।
    • प्राचीन सभ्यताओं जैसे मिस्र, बेबीलोन और भारत में इसका उपयोग सदियों से होता आया है
    • जो संभवतः दुनिया का सबसे पुराना खगोलीय यंत्र माना जाता है।
  • सौर घड़ी में भूमिका
    • सौर घड़ी में शंकुक को पृथ्वी की घूर्णन अक्ष के समांतर स्थापित किया जाता है
    • ताकि वर्ष भर सटीक समय मिले। दिन के उजाले में सूर्य की किरणें शंकुक पर पड़ती हैं
    • इसकी छाया घड़ी की चिह्नित डायल पर घूमती हुई घंटे दर्शाती है।
    • यह रेत में गड़ा डंडा जैसा सरल रूप भी ले सकता है
    • जैसा सहारा के खानाबदोशों ने सदियों तक उपयोग किया।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • शंकुक का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जैसे भारतीय ज्योतिष में समय और दिशा मापन के लिए।
    • विकिपीडिया के अनुसार, यह दिन में समय बताने का सरल प्राचीन उपकरण था।
    • गणित में भी "gnomon" शब्द का प्रयोग वर्ग या पैरेललोग्राम से निकाले गए भाग को कहने के लिए होता है
    • लेकिन सामान्य संदर्भ में यह सूर्य घड़ी से जुड़ा है।
  • अन्य उपयोग और भ्रम
    • कुछ प्रश्नों में विकल्प जैसे बोलोमीटर, दूरबीन या ट्रांसफार्मर दिए जाते हैं
    • लेकिन शंकुक इनका भाग नहीं है—यह केवल सौर घड़ी से संबंधित है।
    • आधुनिक संदर्भों में भी gnomon का यही अर्थ प्रमुख है
    • जैसे सूर्य घड़ी के मॉडल में त्रिकोणीय ब्लेड के रूप में।
    • भारत में SSC जैसी परीक्षाओं में यह सामान्य ज्ञान प्रश्न के रूप में आता है।

10. S-400 Triumf (Triumph का रूसी रूपांतरण) मिसाइल प्रणाली रूस में तैयार की गई ....... मिसाइल सुरक्षा प्रणाली है। [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) सतह से हवा में मार करने वाली
Solution:
  • S-400 Triumf (Triumph का रूसी रूपांतरण) मिसाइल प्रणाली रूस में तैयार की गई सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल सुरक्षा प्रणाली है।
  • S-400 Triumf एक विमान भेदी हथियार की अल्माज (Almaz) केंद्रीय डिजाइन ब्यूरो द्वारा विकसित मिसाइल सुरक्षा प्रणाली है।
  • मुख्य विशेषताएं
    • S-400 Triumf बहु-कार्यात्मक रडार, स्वायत्त खोज व लक्ष्य ट्रैकिंग सिस्टम, मिसाइल लॉन्चर और कमांड सेंटर को एकीकृत करती है।
    • यह विमान, UAV, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइलों सहित सभी प्रकार के हवाई लक्ष्यों को 400 किमी तक की दूरी पर 30 किमी ऊंचाई तक नष्ट कर सकती है।
    • प्रणाली एक साथ 36 लक्ष्यों पर हमला कर सकती है और 160 मिसाइलों का मार्गदर्शन कर सकती है।
  • मिसाइल प्रकार
    • S-400 चार प्रकार की मिसाइलों का उपयोग करती है layered defense के लिए:
    • 9M96E: 40 किमी रेंज
    • 9M96E2: 120 किमी रेंज
    • 48N6: 250 किमी रेंज
    • 40N6E: 400 किमी रेंज, मच 14+ गति वाले लक्ष्यों को नष्ट करने में सक्षम।
  • तैनाती और गतिशीलता
    • रूस की Almaz-Antey द्वारा निर्मित यह प्रणाली ट्रक-आधारित (जैसे BAZ-64022 या MZKT-7930) है
    • जो 5-10 मिनट में तैनात हो जाती है। रडार में 92N2E (Grave Stone), 96L6 (Cheese Board) और 91N6E (Big Bird) शामिल हैं
    • जो स्टील्थ विमानों का भी पता लगाते हैं। भारत ने इसे "सुदर्शन चक्र" नाम दिया है
    • पंजाब, राजस्थान व ओडिशा में तैनात किया है।
  • उपयोगकर्ता देश और महत्व
    • रूस, चीन, तुर्की, अल्जीरिया, बेलारूस और भारत इसके प्रमुख उपयोगकर्ता हैं।
    • यह AWACS, टोमाहॉक क्रूज मिसाइल और हाइपरसोनिक खतरों से सुरक्षा प्रदान करती है।
    • 2007 में सेवा में आई यह प्रणाली वैश्विक हवाई रक्षा में सबसे उन्नत मानी जाती है।