विविध (रसायन विज्ञान)

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11. एक तत्व X की परमाणु संख्या क्या होगी, जो आवर्त 2 और समूह 17 में उपस्थित है? [CGL (T-I) 14 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) 9
Solution:
  • फ्लोरीन (F) का परमाणु संख्या 9 होता है, जो आवर्त 2 व समूह 17 में उपस्थित होता है।
  • आवर्त सारणी की स्थिति
    • आवर्त सारणी में तत्वों की स्थिति उनके इलेक्ट्रॉनिक विन्यास पर आधारित होती है।
    • दूसरी आवर्त के तत्वों में K (संयोजी कोश) ही भरा होता है
    • जिसमें अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन समाहित हो सकते हैं।
    • समूह 17 के तत्वों में संयोजी कोश में 7 इलेक्ट्रॉन होते हैं (ns² np⁵)
    • इसलिए आवर्त 2 के लिए इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 1s² 2s² 2p⁵ है, जो कुल 9 इलेक्ट्रॉनों को दर्शाता है।
  • तत्व की पहचान
    • यह तत्व फ्लोरीन है, जिसका प्रतीक F है।
    • आवर्त 2 में समूह 17 का स्थान निम्नानुसार निर्धारित होता है:
    • Li (3), Be (4), B (5), C (6), N (7), O (8), F (9), Ne (10)।
    • फ्लोरीन सबसे प्रतिक्रियाशील अधातु है और हलोजन परिवार का सदस्य है।
  • गुणधर्म
    • फ्लोरीन एक हरा-पीला गैस है जो अत्यधिक विषैली और प्रतिक्रियाशील होती है।
    • यह सभी तत्वों (जल को छोड़कर) के साथ अभिक्रिया करती है
    • HF जैसे यौगिक बनाती है। इसका परमाणु भार लगभग 19 u है।
  • महत्वपूर्ण तथ्य
    • समूह 17 के अन्य तत्व: Cl (17), Br (35), I (53), At (85)।
    • फ्लोरीन का उपयोग दांतों की पेस्ट में फ्लोराइड के रूप में होता है।

12. WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) के अनुसार, निम्नलिखित में से कौन पारंपरिक पेयजल उपचार संयंत्रों में बने कीटाणुशोधन उप-उत्पादों का उदाहरण नहीं है? [CGL (T-I) 21 अप्रैल, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) टाइटेनिया
Solution:
  • टाइटेनिया पारंपरिक पेयजल उपचार संयंत्रों में बने कीटाणुशोधन उप-उत्पादों के उदाहरण में शामिल नहीं है।
  • शेष सभी पेयजल उपचार संयंत्रों में कीटाणुशोधन में प्रयुक्त होते हैं।
  • कीटाणुशोधन उप-उत्पाद क्या हैं?
    • मुख्यतः क्लोरीन गैस, सोडियम हाइपोक्लोराइट या क्लोरीन डाइऑक्साइड जैसे रसायनों से।
    • इन प्रक्रियाओं के दौरान प्राकृतिक कार्बनिक पदार्थों (जैसे humic acids) के साथ प्रतिक्रिया होने पर disinfection by-products (DBPs) बनते हैं
    • जो स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।
    • WHO दिशानिर्देशों के अनुसार, इनमें मुख्यत
    • ट्राइहैलोमीथेन्स (THMs) जैसे ब्रोमेट (ब्रोमीन युक्त), क्लोराइट (क्लोराइन डाइऑक्साइड से) और क्लोरेट (क्लोरीन से संबंधित) शामिल हैं।
  • विकल्पों का विश्लेषण
    • ब्रोमेट (Bromate): ओजोन कीटाणुशोधन के दौरान ब्रोमाइड आयनों से बनता है
    • जो पारंपरिक संयंत्रों में आम है और WHO द्वारा संभावित कैंसरजनक माना जाता है।
    • क्लोराइट (Chlorite): क्लोरीन डाइऑक्साइड disinfection से उत्पन्न होता है
    • जो वैकल्पिक कीटाणुशोधक के रूप में उपयोग होता है।
    • क्लोरेट (Chlorate): क्लोरीन-आधारित उपचारों (जैसे हाइपोक्लोराइट) से बनता है, जो संयंत्रों में व्यापक है।
    • टाइटेनिया (Titanate): यह टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO2) से संबंधित यौगिक है
    • जो फोटोकैटेलिटिक प्रक्रियाओं या नैनोटेक्नोलॉजी में प्रयोग होता है
    • लेकिन पारंपरिक रासायनिक कीटाणुशोधन (क्लोरीन/ओजोन) उप-उत्पाद नहीं है।
    • WHO के संदर्भ में इसे DBPs सूची में नहीं गिना जाता।
  • WHO दिशानिर्देश और महत्व
    • WHO की "Guidelines for Drinking-water Quality" में DBPs की सांद्रता सीमाएं निर्धारित हैं
    • जैसे ब्रोमेट के लिए 10 µg/L, ताकि जोखिम न्यूनतम रहे।
    • पारंपरिक संयंत्रों (कोगुलेशन, फ्लोक्यूलेशन, सेडिमेंटेशन, फिल्ट्रेशन और disinfection) में DBPs नियंत्रण के लिए पूर्व-क्लोरीनीकरण कम किया जाता है
    • वैकल्पिक disinfectants अपनाए जाते हैं।
    • टाइटेनिया उन्नत उपचार (जैसे UV/TiO2 photocatalysis) से जुड़ा है, जो अभी पारंपरिक नहीं माना जाता।

13. जब दूध दही में परिवर्तित होता है, तो यह किस प्रकार का परिवर्तन होता है? [CHSL (T-I) 9 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) रासायनिक परिवर्तन
Solution:
  • जब दूध दही में परिवर्तित होता है, तो यह रासायनिक परिवर्तन का उदाहरण है।
  • परिवर्तन का प्रकार
    • रासायनिक परिवर्तन वह होता है जिसमें पदार्थ की रासायनिक संरचना बदल जाती है
    • नया पदार्थ बनता है, जो अपरिवर्तनीय होता है।
    • दूध से दही बनने पर लैक्टोज (दूध की चीनी) लैक्टिक एसिड में बदल जाता है
    • जिससे प्रोटीन का विकृतीकरण (denaturation) हो जाता है।
    • यह प्रक्रिया बैक्टीरिया द्वारा उत्प्रेरित होती है और दूध को स्थायी रूप से गाढ़ा बना देती है।
  • प्रक्रिया का विस्तार
    • दूध उबालने के बाद ठंडा किया जाता है और इसमें थोड़ा सा पुराना दही (starter culture) मिलाया जाता है
    • जो लैक्टोबैसिलस जैसे बैक्टीरिया प्रदान करता है।
    • ये बैक्टीरिया लैक्टोज को ग्लूकोज और गैलेक्टोज में तोड़ते हैं
    • फिर इन्हें लैक्टिक एसिड में बदलते हैं। लैक्टिक एसिड दूध के कैसिन प्रोटीन को जमाता है
    • जिससे दही की गाढ़ी बनावट बनती है। pH मान कम हो जाता है
    • (अम्लीय हो जाता है), जो बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ावा देता है।
  • रासायनिक बनाम भौतिक
    • भौतिक परिवर्तन में केवल आकार या अवस्था बदलती है
    • (जैसे बर्फ पिघलना), लेकिन रासायनिक संरचना नहीं।
    • दूध-दही में नई रासायनिक संरचना (लैक्टिक एसिड और जमे प्रोटीन) बनती है
    • इसलिए यह रासायनिक है। इसे उलटा नहीं किया जा सकता—दही से शुद्ध दूध वापस नहीं मिलता।
  • अतिरिक्त विशेषताएँ
    • मंद परिवर्तन: यह तीव्र नहीं, बल्कि धीमी गति से होता है (कई घंटों में)।
    • जैव रासायनिक: सूक्ष्मजीवों (लैक्टोबैसिलस) की सहायता से जटिल यौगिक सरल बनते हैं।
    • स्वास्थ्य लाभ: दही पाचन सुधारता है, प्रोबायोटिक्स प्रदान करता है।
    • यह प्रक्रिया प्राचीन है और भारतीय संस्कृति में प्रमुख।

14. निम्नलिखित में से किस समूह के तत्वों को कैल्कोजन कहा जाता है? [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) समूह-16
Solution:
  • समूह 16 को कैल्कोजन (Chalcogen) समूह कहा जाता है।
  • कैल्कोजन समूह में प्रमुख रूप से पांच तत्व होते हैं
  • ऑक्सीजन (O), सल्फर (S), सेलेनियम (Se), टेल्यूरियम (Te) और पोलोनियम (Po)।
  • इस समूह का सामान्य इलेक्ट्रॉनिक विन्यास ns² np⁴ होता है।
  • कैल्कोजन तत्वों की सूची
    • कैल्कोजन समूह में निम्नलिखित पाँच मुख्य तत्व शामिल हैं:
    • ऑक्सीजन (O)
    • सल्फर (S)
    • सेलेनियम (Se)
    • टेल्यूरियम (Te)
    • पोलोनियम (Po) ।
    • ये सभी तत्व ns² np⁴ इलेक्ट्रॉनिक विन्यास वाले होते हैं
    • जिससे उनके बाहरी कोश में छह संयोजी इलेक्ट्रॉन होते हैं
    • पोलोनियम रेडियोधर्मी है और कभी-कभी लिवरमोरियम (Lv) को भी इस समूह से जोड़ा जाता है
    • लेकिन मुख्य रूप से ऊपर बताए तत्व ही मान्य हैं ।
  • नाम की उत्पत्ति और महत्व
    • चाल्कोजन" शब्द ग्रीक भाषा के "chalc" (ताँबा) और "genes" (जन्म देने वाला) से बना है
    • क्योंकि ये तत्व धातुओं के सल्फाइड और ऑक्साइड अयस्कों का निर्माण करते हैं
    • जैसे ताँबे का अयस्क चाल्कोपाइराइट । ये अयस्क धातु निष्कर्षण उद्योग में महत्वपूर्ण हैं।
    • समूह 16 को पहले VIA या VIB भी कहा जाता था
    • लेकिन IUPAC मानक में यह p-ब्लॉक का समूह 16 है ।
  • रासायनिक गुण
    • इन तत्वों के सामान्य ऑक्सीकरण मान -2, +2, +4 और +6 होते हैं
    • क्योंकि वे दो इलेक्ट्रॉन ग्रहण कर द्वितीयक प्राप्त करने की प्रवृत्ति रखते हैं ।
    • ऑक्सीजन गैस, अत्यधिक क्रियाशील अधातु।
    • सल्फर ठोस, अपररूपी (rhombic, monoclinic)।
    • सेलेनियम और टेल्यूरियम अधातु से उपधातु की ओर।
    • पोलोनियम उपधातु ।

15. नॉन-स्टिक तवे पर ....... की परत चढ़ी होती है। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) पॉलीटेट्रा फ्लोरोएथिलीन
Solution:
  • पॉलीटेट्राफ्लोरोएथिलीन (PTFE), जिसे टेफ्लॉन के नाम से भी जाना जाता है
  • एक उच्च प्रदर्शन वाला प्लास्टिक है जो अपने अद्वितीय गुणों के लिए जाना जाता है
  • जैसे कि उच्च तापमान प्रतिरोध, कम घर्षण, और रासायनिक निष्क्रियता।
  • टेफ्लॉन क्या है?
    • टेफ्लॉन का वैज्ञानिक नाम पॉलीटेट्राफ्लूरोएथिलीन (PTFE) है
    • जो कार्बन और फ्लोरीन परमाणुओं से मिलकर बना एक सिंथेटिक रसायन है।
    • यह 1930 के दशक में खोजा गया था और इसकी खासियत यह है
    • यह लगभग घर्षणरहित (non-friction) सतह प्रदान करता है
    • जिससे तेल या खाना आसानी से चिपकता नहीं।
    • नॉन-स्टिक तवे बनाने वाली कंपनियां इस परत को उच्च तापमान पर स्प्रे या कोटिंग के रूप में चढ़ाती हैं
    • जो 200-400 डिग्री सेल्सियस तक की गर्मी सहन कर सकती है।
  • यह परत कैसे काम करती है?
    • टेफ्लॉन की सतह इतनी चिकनी होती है कि भोजन के कण या तेल इसके अणुओं से आसानी से चिपक नहीं पाते
    • क्योंकि इसकी सतह पर पानी या तेल का संपर्क कोण (contact angle) बहुत अधिक होता है।
    • सामान्य तवे पर लोहा या एल्युमीनियम की सतह खुरदरी होती है, जिससे चिपकाव होता है
    • लेकिन टेफ्लॉन इस घर्षण को 1/10 से भी कम कर देता है। पहले PTFE को PFOA नामक केमिकल से बनाया जाता था
    • लेकिन अब स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं के कारण PFOA-मुक्त टेफ्लॉन का उपयोग होता है।
  • अन्य वैकल्पिक परतें
    • कुछ आधुनिक नॉन-स्टिक तवों पर टेफ्लॉन के अलावा सिरेमिक, हार्ड एनोडाइज्ड या टाइटेनियम आधारित कोटिंग्स भी चढ़ाई जाती हैं।
    • सिरेमिक कोटिंग: प्राकृतिक सिलिका से बनी, अधिक पर्यावरण-अनुकूल और 450°C तक सुरक्षित।
    • टाइटेनियम: टेफ्लॉन से कठोर, खरोंच प्रतिरोधी लेकिन महंगी।
    • ये विकल्प टेफ्लॉन की तुलना में कम विषाक्त होते हैं, लेकिन टेफ्लॉन अभी भी सबसे आम है।
  • फायदे
    • कम तेल में खाना बनाना संभव, जो स्वस्थ है।
    • सफाई आसान, समय बचता है।
    • ऊर्जा दक्षता अधिक, खाना जल्दी पकता है।
  • नुकसान और सावधानियां
    • उच्च तापमान (260°C से ऊपर) पर टेफ्लॉन विषाक्त धुएं छोड़ सकता है
    • जो फ्लू जैसी बीमारी (पॉलीमर फ्यूम फीवर) पैदा कर सकता है।
    • खरोंच पड़ने पर परत उतर सकती है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक (कैंसर, थायरॉइड जोखिम) हो सकती है
    • इसलिए धातु के बर्तन न इस्तेमाल करें।
    • सफाई के लिए बेकिंग सोडा-नींबू या नमक का पेस्ट उपयोगी है, जो काली परत हटाता है
    • बिना कोटिंग खराब किए। तवे की उम्र 1-3 साल होती है; खरोंच दिखने पर बदलें।
  • रखरखाव टिप्स
    • नरम स्पंज और डिशवॉश ही इस्तेमाल करें।
    • गर्म तवे पर ठंडा पानी न डालें, क्रैक हो सकता है।
    • कम-मध्यम आंच पर उपयोग करें।

16. मीठे अखरोट के स्वाद और भूरे रंग के लिए पाक क्रिया में बड़े पैमाने पर उपयोग की जाने वाली चीनी को भूरा करने की प्रक्रिया क्या कहलाती है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 17 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) कैरामेलिकरण
Solution:
  • पाक क्रिया में, मीठे, अखरोटी स्वाद और भूरे रंग के लिए चीनी को भूरा करने की प्रक्रिया को कार्मेलाइजेशन (Caramelization) कहते हैं
  • कारामेलाइजेशन 
    • यह प्रक्रिया बड़े पैमाने पर मिठाइयों, ब्रेड, कुकीज़ और अन्य व्यंजनों में उपयोग होती है
    • जहां चीनी का स्वाद गहरा, नट्टी और समृद्ध बन जाता है।
  • प्रक्रिया का विवरण
    • कारामेलाइजेशन एक गैर-एंजाइमेटिक ब्राउनिंग रिएक्शन है
    • जो Sucrose, Glucose या Fructose जैसी चीनी के तापमान ११०-१८०°C पर विघटित होने से शुरू होता है।
    • चीनी के अणु पहले पानी छोड़ते हैं, फिर पॉलीमराइज होकर कारामेलन बनाते हैं
    • जो भूरा रंग और अखरोटिया स्वाद पैदा करता है।
    • सफेद चीनी से शुरू होकर यह सुनहरे भूरे रंग तक पहुंचती है
    • लेकिन ज्यादा गर्म करने पर कड़वी हो सकती है।
  • रासायनिक परिवर्तन
    • पहला चरण (१३०°C के आसपास): Sucrose पानी खोकर Levulinic acid और Hydroxymethylfurfural बनाती है।
    • दूसरा चरण: ये यौगिक पॉलीमर बनाते हैं, जो melanoidins (भूरे पिगमेंट) उत्पन्न करते हैं।
    • स्वाद कारक: Aldehydes और ketones जैसे यौगिक नट्टी, मक्खन जैसा स्वाद देते हैं
    • जो भुने अखरोट से मिलता-जुलता होता है।
  • पाक कला में उपयोग
    • उदाहरण: क्रème brûlée की टॉपिंग, caramel sauce, या प्याज को कारामेलाइज करना।
    • टिप्स: कम आंच पर धीरे पकाएं (३०-६० मिनट), चीनी को हिलाते रहें ताकि जल न जाए।
    • नमक या मक्खन मिलाने से स्वाद बढ़ता है।
    • वैज्ञानिक अंतर: यह Maillard reaction से अलग है
    • जो चीनी और प्रोटीन के बीच होती है (जैसे मांस भूनने में)।

17. एक विलयन में 450g जल में 50g शर्करा है। विलयन के द्रव्यमान प्रतिशत द्वारा द्रव्यमान के संदर्भ में सांद्रता का परिकलन कीजिए। [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) 10%
Solution:
  • सांद्रता का सूत्र
    • द्रव्यमान प्रतिशत (w/w) का सूत्र निम्नलिखित है:
    • द्रव्यमान %=(विलेय का द्रव्यमानविलयन का कुल द्रव्यमान)×100
    • यह सूत्र रसायन शास्त्र में विलयन की सांद्रता व्यक्त करने का सबसे सरल और सामान्य तरीका है
    • जहाँ विलेय शर्करा है और विलयन जल + शर्करा का मिश्रण होता है।
  • चरणबद्ध गणना
    • सबसे पहले विलयन का कुल द्रव्यमान ज्ञात करें:
    • विलायक (जल) = 450 g
    • विलेय (शर्करा) = 50 g
    • कुल विलयन = 450 g + 50 g = 500 g
    • द्रव्यमान %=(50500)×100=0.1×100=10%
    • इस प्रकार, विलयन की द्रव्यमान प्रतिशत सांद्रता 10% है।
  • व्याख्या और महत्व
    • यह 10% का अर्थ है कि 100 ग्राम विलयन में 10 ग्राम शर्करा मौजूद है।
    • द्रव्यमान प्रतिशत सांद्रता का उपयोग तब किया जाता है
    • जब विलयन के घटकों के द्रव्यमान ज्ञात हों और आयतन मापना कठिन हो।
    • यह विधि खाद्य उद्योग, औषधि निर्माण और रासायनिक प्रयोगशालाओं में व्यापक रूप से अपनाई जाती है
    • क्योंकि यह द्रव्यमान संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित होती है।

18. हल्दी पाउडर में किसकी मिलावट होती है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) लेड क्रोमेट
Solution:
  • हल्दी में लेड क्रोमेट, हल्दी की रंगत को बेहतर बनाने और इसे ज्यादा पीला या चमकीला दिखाने के लिए मिलाया जाता है।
  • हल्दी में करक्यूमिन नामक रसायन होता है
  • जो किसी व्यक्ति के शरीर में हड्डी की चोट के कारण उत्पन्न सूजन को कम कर सकता है।
  • मुख्य मिलावटें
    •  इसके अलावा मेटानिल येलो जैसे सिंथेटिक रंग, चॉक पाउडर या कैल्शियम कार्बोनेट (वजन बढ़ाने के लिए), आटा, बेसन, चावल का आटा, स्टार्च, धूल कण और कभी-कभी फेरस सल्फेट भी पाया जाता है।
    • लेड क्रोमेट: पीला वर्णक, पेंट उद्योग से लिया जाता है।
    • मेटानिल येलो: कृत्रिम रंग, चमक बढ़ाने के लिए।
    • चॉक पाउडर: सफेद पाउडर, मात्रा बढ़ाने को।
    • आटा/बेसन: सस्ता फिलर, घुलनशीलता बढ़ाता है।
  • स्वास्थ्य जोखिम
    • ये मिलावटें विषैली होती हैं; लेड क्रोमेट से सीसा विषाक्तता हो सकती है
    • जो किडनी, दिमाग और हृदय को नुकसान पहुंचाती है।
    • पेट दर्द, उल्टी, कैंसर का खतरा और बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।
    • मेटानिल येलो तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, जबकि चॉक पाउडर पाचन बिगाड़ता है।
  • मिलावट जांचने के तरीके
    • घर पर आसान टेस्ट से शुद्धता जांचें:
    • पानी टेस्ट: हल्दी पानी में डालें; शुद्ध हल्दी तलछट छोड़ती है, मिलावटी घुल जाती है या गंदा पानी बनता है
    • आयोडीन टेस्ट: आयोडीन डालें; नीला/बैंगनी रंग आटा/बेसन दर्शाता है
    • HCl टेस्ट: हाइड्रोक्लोरिक एसिड में मिलाएं; गुलाबी रंग मेटानिल येलो दिखाता है।
    • सिरका टेस्ट: झाग उठे तो चूना/चॉक है।
    • गंध/रंग: शुद्ध हल्दी की तेज मिट्टी जैसी गंध, चमकीला रंग संदिग्ध।
  • रोकथाम के उपाय
    • शुद्ध हल्दी खरीदें: विश्वसनीय ब्रांड चुनें, FSSAI मार्क देखें, ढीली न खरीदें।
    • जड़ वाली हल्दी घर पर पीसें या ऑर्गेनिक चुनें।
    • नियमित जांच और जागरूकता से मिलावट कम हो सकती है।

19. पारदर्शी साबुन बनाने में किसका प्रयोग किया जाता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 23 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) इथेनॉल
Solution:
  • पारदर्शी साबुन बनाने के लिए इथेनॉल का प्रयोग किया जाता है।
  • इथेनॉल तेल-एथिल एस्टर चरण में उत्प्रेरक घुलनशीलता को बढ़ाता है।
  • इस प्रकार इथेनॉल के कारण साबुनीकरण की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है।
  • मुख्य सामग्री
    • पारदर्शी साबुन के लिए क्षारीय तेल जैसे नारियल तेल, अरंडी का तेल या पाम तेल का प्रयोग होता है
    • जिन्हें स्थिरता प्रदान करने के लिए चुना जाता है।
    • ग्लिसरीन को साबुनीकरण प्रक्रिया से प्राप्त कर वापस मिलाया जाता है
    • जो नमी बनाए रखता है और पारदर्शिता बढ़ाता है।
    • इथेनॉल या आइसोप्रोपिल अल्कोहल विलायक के रूप में कार्य करता है
    • जबकि शर्करा ह्यूमेक्टेंट की भूमिका निभाती है।
  • निर्माण प्रक्रिया
    • सबसे पहले कास्टिक सोडा (सोडियम हाइड्रॉक्साइड) को डिस्टिल्ड वॉटर में घोलें
    • फिर तेलों (जैसे नारियल तेल 50 ग्राम, जैतून तेल 50 ग्राम) को गर्म करें और ग्लिसरीन व स्टियरिक एसिड मिलाएं।
    • कास्टिक घोल को तेल में मिलाकर साबुनीकरण करें, फिर एथेनॉल डालकर धीरे-धीरे गर्म करें ताकि मिश्रण स्पष्ट हो जाए।
    • अंत में 12 घंटे ठंडा होने दें, जिससे पारदर्शी साबुन तैयार हो जाता है।
  • एथेनॉल की भूमिका
    • एथेनॉल सतह तनाव कम करता है और साबुन को एकसमान घोल बनाता है
    • जिससे अपारदर्शी साबुन के विपरीत स्पष्ट रूप मिलता है।
    • यह साबुनीकरण को तेज करता है और साबुन को अधिक कोमल बनाता है।
    • अन्य विकल्प जैसे सोडियम क्लोराइड साबुन को सख्त करने के लिए होते हैं, लेकिन पारदर्शिता के लिए अनुपयुक्त हैं।
  • अन्य योजक
    • खुशबू के लिए आवश्यक तेल, मुल्तानी मिट्टी या कपूर जैसी जड़ीबूटियां मिलाई जा सकती हैं
    • लेकिन स्पष्टता बनाए रखने के लिए न्यूनतम मात्रा में।
    • जल सभी सामग्री को मिलाने में सहायक होता है।
    • यह साबुन त्वचा के लिए कोमल और मॉइस्चराइजिंग होता है।

20. किस प्रसिद्ध रसायनज्ञ ने 'जीवनवाद के सिद्धांत' को यह कहकर खंडन किया कि कार्बनिक पदार्थ केवल जीवित चीजों से ही उत्पादित किए जा सकते हैं? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 30 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) फ्रेडरिक वोहलर
Solution:
  • रसायनज्ञ 'फ्रेडरिक वोहलर' ने जीवनवाद का सिद्धांत यह कहकर खंडन किया
  • कार्बनिक पदार्थों का उत्पादन केवल सजीव से ही हो सकता है।
  • कार्बन के रासायनिक यौगिकों को कार्बनिक यौगिक के रूप में परिभाषित किया जाता है।
  • जीवनवाद का सिद्धांत
    • जीवनवाद का सिद्धांत 19वीं शताब्दी की शुरुआत में प्रचलित था
    • जिसे मुख्य रूप से स्वीडिश रसायनज्ञ योन्स जैकब बर्जेलियस ने 1815 के आसपास मजबूती दी।
    • इस सिद्धांत के अनुसार, कार्बनिक यौगिकों (जैसे यूरिया, ग्लूकोज आदि) में एक रहस्यमयी "जीवन शक्ति" (vis vitalis) होती है
    • जो केवल जीवित प्राणियों में ही मौजूद रहती है।
    • अकार्बनिक पदार्थों से इन्हें बनाना असंभव माना जाता था
    • क्योंकि वैज्ञानिक प्रयोगशाला में बार-बार असफल हो रहे थे।
  • फ्रेडरिक वोहलर का योगदान
    • फ्रेडरिक वोहलर एक जर्मन रसायनज्ञ थे, जिनका जन्म 31 जुलाई 1800 को हुआ था।
    • 1828 में, उन्होंने पोटैशियम साइनेट और अमोनियम सल्फेट से अमोनियम साइनेट बनाया
    • जिसे गर्म करने पर यूरिया में परिवर्तित कर दिया। यूरिया एक प्राकृतिक कार्बनिक यौगिक है
    • जो मानव मूत्र में पाया जाता है। इस प्रयोग ने सिद्ध कर दिया
    • कोई विशेष "जीवन शक्ति" की आवश्यकता नहीं है; सामान्य रासायनिक अभिक्रियाएं ही पर्याप्त हैं।
  • प्रयोग का विवरण
    • वोहलर ने अमोनियम साइनेट (NH₄OCN) को 130-150°C पर गर्म किया
    • जो धीरे-धीरे यूरिया (NH₂CONH₂) में बदल गया। प्रतिक्रिया इस प्रकार है
    • यह क्रिस्टल्स के रूप में प्राप्त हुआ, जो प्राकृतिक यूरिया से समरूप था।
    • उन्होंने अपने मित्र यustin Liebig को पत्र लिखकर इसकी सूचना दी
    • जिसमें लिखा: "मैं अकार्बनिक पदार्थों से जीवित प्राणी का भोजन बना रहा हूं!"।
  • प्रभाव और महत्व
    • वोहलर के इस कार्य ने कार्बनिक रसायनशास्त्र को नई दिशा दी
    • जिससे कार्बनिक और अकार्बनिक रसायन के बीच की कृत्रिम दीवार ढह गई।
    • इससे आधुनिक संश्लेषणात्मक रसायन का मार्ग प्रशस्त हुआ
    • जिसके फलस्वरूप दवाइयां, प्लास्टिक, रंग आदि कृत्रिम रूप से बनने लगे।
    • आज 10 मिलियन से अधिक कार्बनिक यौगिक ज्ञात हैं।
    • हालांकि कुछ वैज्ञानिकों ने तुरंत इसे स्वीकार नहीं किया
    • लेकिन 1840 के दशक तक यह सिद्धांत पूर्णतः अस्वीकृत हो गया।