विविध (विश्व का भूगोल)

Total Questions: 40

1. निम्नलिखित में से वर्षा जल संग्रहण का सबसे उपयुक्त उपयोग कौन-सा है? [CHSL (T-I) 9 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) सिंचाई
Solution:
  • वर्षा जल संग्रहण का सबसे उपयुक्त उपयोग सिंचाई है।
  • विद्युत और घरेलू जल आवश्यकताओं के लिए वर्षा जल का उपयोग
    • वर्षा जल को छत वर्षा जल संचयन प्रणाली (RWH) के माध्यम से संरक्षित किया जाता है
    • फिलtration/निस्पंदन के बाद पेयजल जैसे घरेलू उपयोगों में भी प्रयोग किया जा सकता है।
    • यह पानी की लागत कम करने में मदद करता है और छोटे समुदायों में जल सुरक्षा बढ़ाता है
    • निष्पादन के लिए छत से जल एक टैंक में जमा किया जाता है
    • आवश्यकतानुसार फिल्टर कर उपयोग किया जाता है.​
  • सिंचाई के लिए वर्षा जल का प्रमुख स्थान
    • वर्षा जल संग्रहण का सबसे उपयुक्त उपयोग खेतों, बागबानी और कृषि-उत्पादन के लिए सिंचाई है
    • इससे भूजल खपत में कमी और जल उपलब्धता year-round संभव होती है
    • यह कृषि-आधारित क्षेत्रो में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रमुख तरीका माना जाता है.​
  • भूजल पुनर्भरण और जल-चक्र में योगदान
    • विचलित वर्षा जल को भूमिगत गड्ढों/टंकियों तक पहुँचाने से भूजल पुनर्भरण संभव होता है
    • जिससे जमीन के नीचे जलस्तर स्थिर रहने में सहायता मिलती है
    • कुछ आधुनिक प्रणालियाँ जल को सीधे भूमिगत गड्ढों/तालाबों में भेजकर भूमिगत जल भंडारण को बढ़ाती हैं.​
  • प्रमुख लाभ
    • जल आपूर्ति लागत में कमी: वर्षा जल संग्रहण से घरेलू और कृषि जल लागत घटती है.​
    • बाढ़ सेลด प्रभाव: वर्षा जल को रोक कर संग्रहित करने से बाढ़ की गंभीरता कम होती है.​
    • मिट्टी erosion में कमी: नियंत्रित जल प्रवाह से मिट्टी का नुकसान कम होता है.​
  • विविध तकनीकें और उनके संरेखण
    • छत-आधारित वर्षा जल संग्रहण: छत से वर्षा जल को टैंकों/भूमिगत गड्ढों तक भेजना, फिल्टरिंग के बाद संचय करना
    • यह शहरों/घरों में सबसे सामान्य पद्धति है.​
    • सतह जल संकल्पन/नालियाँ: सड़क किनारे नालियों के माध्यम से जल को भूमिगत प्रवाह में पहुँचना
    • यह बड़े क्षेत्र में जल भंडारण का एक खुला तरीका है.​
    • भूजल पुनर्भरण की तकनीकें: जल को सीधे भूमिगत गड्ढों/होज में रिसने देना ताकि भूजल भंडार भर सके.​
  • कौन सा उपयोग प्राथमिकता के साथ किया जाना चाहिए?
    • अत्यधिक सूखे/पानी कमी वाले क्षेत्र में प्राथमिकता सिंचाई और कृषि-उत्पादन के लिए होगी ताकि फसलें सुरक्षित रहें और उत्पादन बाधित न हो.​
    • शहरों/घरों के लिए प्राथमिक उपयोग पेय/घरेलू जल हो सकता है
    • परंतु स्थायी सुरक्षा और पानी की आपूर्ति के लिए कृषि के साथ संयोजन में वर्षा जल संग्रहण की परियोजनाओं को प्राथमिकता देना अधिक प्रभावी रहता है.​
  • संकेत/नोट
    • उपलब्ध जल संसाधनों के अनुसार स्थानीय जल नीति/खपत के परिदृश्य के अनुसार योजना बनानी चाहिए ताकि वर्षा जल का संयोजन भूजल पुनर्भरण और कृषि-उपयोग में संतुलित रूप से हो सके.​
    • यदि संभव हो, संरचना와 प्रणाली का डिज़ाइन ऐसे रखें कि वर्षा जल साफ-सुथरा बने रहे और जलमार्ग में प्रदूषक कम से कम पहुंचे
    • यह स्वास्थ्य और जल गुणवत्ता के लिए महत्त्वपूर्ण है.​
  • उल्लेखित स्रोतों से उद्धृत प्रमुख निष्कर्ष
    • सिंचाई वर्षा जल संग्रहण का सबसे उपयुक्त उपयोग है.​
    • वर्षा जल का संचयन कृषि-उत्पादन के लिए जल संरचना को मजबूत करता है और भूजल स्तर को बनाए रखता है.​
    • छत-आधारित वर्षा जल संग्रहण प्रणाली मानव-आधारित जल सुरक्षा के लिए व्यापक रूप से अपनाई जाती है.​
    • वर्षा जल संग्रहण के अन्य लाभों में जल लागत घटना, बाढ़ नियंत्रण और मिट्टी संरक्षण शामिल हैं.​

2. हिमनद प्रवाह द्वारा उत्कीर्ण की गई पहाड़ियों की एक अंडाकार आकार की श्रृंखला का नाम बताइए। [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) ड्रमलिन
Solution:
  • ड्रमलिन अंडाकार आकार की समतल कटकनुमा स्थलरूप हैं
  • जो बड़े पैमाने पर हिमनदों के बहाव से बनी होती हैं, जिसमें रेत एवं बजरी के ढेर होते हैं।
  • ड्रमलिन के लंबे भाग हिमनद के प्रवाह के दिशा के समानांतर होते हैं।
  •  एक विशिष्ट अंडाकार श्रृंखला के रूप में।
  • अंडाकार श्रृंखला का नाम: यदि किसी क्षेत्र में हिमनद प्रवाह ने पहाड़ियों को घेरा/एरायन किया हो और वे एक अंडाकार घेरे में स्थित हों
  • तो भू-विज्ञान में इसे विशेष नाम से नहीं—बल्कि क्षेत्र-विशिष्ट संरचना (जैसे “क्वाड्रेंट/एलिप्टिकल रिंग-डिस्ट्रीक्शन” या स्थानीय स्थल-नाम) से चिन्हित किया जाता है।
  • सामान्य ज्ञान में कोई एक सार्वभौमिक नाम नहीं है जो सभी जगहों के लिए मान्य हो।
  • सम्भावित भ्रम: कभी-कभी लोग हिमनद-उत्पन्न संरचनाओं को आसान समझाने के लिए “oval mountains belt” या “elliptical range” जैसे शब्दों का प्रयोग कर लेते हैं
  • यह अधिकतर क्षेत्र-विशिष्ट वर्णन है और किसी एक ठोस नाम की जगह नहीं लेता।
  • यदि संभव हो, कृपया क्षेत्र/भू-आवृत्ति (जैसे देश/प्रदेश), या आप जिस अंडाकार श्रृंखला की बात कर रहे हैं
  • उसका संदर्भ (उदा. हिमालयी फ्रेमवर्क के भीतर की कोई उप-श्रृंखला, या स्थानीय स्थल-नाम) साझा करें।
  • तब अधिक सटीक नाम और पूर्ण विवरण (उत्पत्ति, निर्माण प्रक्रिया, भौगोलिक वितरण, प्रमुख चोटियाँ/स्थल-नकाशा) दे सकूँगा।
  • संक्षिप्त सार:
    • किसी विशिष्ट “हिमनद प्रवाह द्वारा उत्कीर्ण अंडाकार श्रृंखला” का सार्वभौमिक मान्य नाम भूगोल में नहीं माना गया है
    • आम तौर पर ऐसी संरचनाओं को क्षेत्र विशेष के हिसाब से वर्णित किया जाता है
    • उन्हेंU-आकारीय घाटियों/ग्लेशियर-निर्मित संरचनाओं के समूह के रूप में देखा जाता है.​

3. अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) क्या है? [CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) विषुवत वृत्त पर स्थित एक निम्न वायुदाब वाला क्षेत्र
Solution:
  • विषुवत वृत्त पर स्थित एक निम्न वायुदाब वाला क्षेत्र अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र है।
  • अंतः उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र या ITCZ पृथ्वी पर स्थित ऐसा क्षेत्र है
  • जहां उत्तरी और दक्षिणी गोलार्दों की व्यापारिक हवाएं मिलती हैं।
  • परिभाषा
    • ITCZ वह क्षेत्र है जहाँ पृथ्वी के दो उपघट पश्चिमी व्यापारिक हवाएँ आपस में मिलती हैं
    • सहयोगी तौर पर कुल मिलाकर कम दाब बनाती हैं
    • जिसके कारण वहाँ ऊँची आर्द्र हवा उठकर बादलों और वर्षा को जन्म देती है ।​
    • यह क्षेत्र भूमध्यरेखा के आसपास पाया जाता है
    • समय के साथ इसकी स्थिति उत्तर या दक्षिण की ओर परिवर्तित हो सकती है
    • खासकर भूमि और समुद्री क्षेत्रों के तापमान में भिन्नता के कारण ।​
  • स्थान और अवधि
    • सामान्यतः ITCZ भूमध्यरेखा के आस-पास दायरे में रहता है
    • लेकिन बारिश के मॉनसून-जोन से जुड़ी गतिविधियों के चलते उसके स्थान में वार्षिक परिवर्तन होता है
    • कभी-कभी कुछ डिग्री उत्तर या दक्षिण की ओर बढ़ सकता है ।​
    • कुछ क्षेत्रों में ITCZ सितंबर-अक्टूबर तक दक्षिणी भाग की ओर और फरवरी-मार्च के दौरान उत्तरी भाग की ओर आ सकता है
    • जिससे मौसमी वर्षा के पैटर्न में बदलाव आता है ।​
  • प्रभाव
    • ITCZ के ऊपर उठने वाली हवा और वर्षा का निर्माण मानसून के गर्त/मानसून-गर्त के क्षेत्र में भारी वर्षा और चक्रवाती मौसमी घटनाओं को प्रेरित करता है
    • विशेषकर भारत के मानसून दौर में जब यह उत्तर में स्थित होता है तो गर्म निम्नदाब बनाकर मानसून को सक्रिय बनाता है ।​
    • ITCZ के कारण उष्णकटिबंधीय मौसम में आर्द्रता और वर्षा वितरण में भारी परिवर्तन आ सकता है
    • इसके स्थान में परिवर्तन से पड़ने वाले क्षेत्रीय जलवायु पर भी असर पड़ता है ।​
  • महत्वपूर्ण तथ्य
    • ITCZ कब और कहाँ बईठता है
    • यह सूर्य की स्थिति और पृथ्वी के अक्षीय झुकाव, तथा भूमि-समुद्र वितरण के कारण साल भर स्थिर नहीं रहता
    • यह एक गतिशील तंत्र है ।​
    • इसे मानसून प्रणाली के साथ जोड़ा गया है
    • क्योंकि यह मौसम के चक्रों के केंद्र में होता है और स्थानीय मौसम के लिए प्रमुख निर्धारणकारक है ।​

4. विश्व में कॉफी के उत्पादन में अग्रणी देश कौन-सा है? [MTS (T-I) 16 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) ब्राजील
Solution:
  • विश्व में कॉफी के उत्पादन में ब्राजील अग्रणी देश है।
  • कॉफी दुनियाभर में सबसे अधिक खपत किए जाने वाले गर्म पेय पदार्थों में से एक है।
  • FAO के वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, कॉफी (ग्रीन) के तीन शीर्ष उत्पादक देश क्रमशः ब्राजील, वियतनाम तथा इंडोनेशिया हैं।
  • ब्राजील का स्थान और महत्व
    • ब्राजील विश्व स्तर पर सबसे बड़े कॉफी उत्पादक देश के रूप में पहचाना जाता है।
    • इसकी उत्पादन मात्रा विश्व के कुल कॉफी उत्पादन का लगभग एक बड़े हिस्से को कवर करती है
    • जिससे वैश्विक आपूर्ति पर इसका प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है.​
    • ब्राजील में कॉफी उद्योग मुख्यतः अरबी बीन्स (Arabica) के लिए प्रसिद्ध है
    • जबकि रोबस्टा भी कुछ क्षेत्रों में उगाया जाता है; यह देश वैश्विक कॉफी उत्पादन का लगभग 40% तक योगदान करता है
    • (सूत्रों के अनुसार आंकड़े वर्षों के हिसाब से थोड़ा भिन्न हो सकते हैं).​
  • अन्य बड़े उत्पादक देश
    • विएतनाम: ब्राजील के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक है
    • खासकर रोबस्टा कॉफी में यह प्रमुख भूमिका निभाता है और वैश्विक उत्पादन में उल्लेखनीय हिस्सेदारी रखता है.​
    • कोलंबिया: विश्व के तीसरे नंबर पर रहता है और विशेषकर उच्च-गुणवत्ता वाली अजेरिबिका कॉफी के लिए जाना जाता है
    • वैश्विक उत्पादन में इसका भी महत्वपूर्ण योगदान है.​
    • इंडोनेशिया: प्राचीन समय से ही विश्व कॉफी उत्पादन में एक प्रमुख देश रहा है
    • यहाँ भी बड़ी मात्रा में कॉफी उगाई जाती है और वैश्विक आपूर्ति में योगदान देता है.​
  • चीन, भारत आदि के बारे में नोट
    • भारत कॉफी उत्पादन में अग्रणी होने की स्थिति पर बहुत पीछे नहीं है और एशिया महाद्वीप में एक प्रमुख उत्पादक है
    • विश्व स्तर पर शीर्ष 5–10 देशों में ब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया और इंडोनेशिया के साथ होता है.​
  • क्यों यह जानकारी बदल सकती है
    • दशकों के दौरान उत्पादन-आयाम में वार्षिक उतार-चढ़ाव, जलवायु प्रभाव, रोग-प्रवृत्ति और बाज़ार की मांग इन देशों के क्रम में हलचल बना सकते हैं।
    • इसलिए नवीनतम वर्ष-वार आंकड़े संदर्भित रहते हैं ताकि सही क्रम और प्रतिशत समझा जा सके.​
  • उद्धरण
    • ब्राजील विश्व का सबसे बड़ा कॉफी उत्पादक है और वैश्विक आपूर्ति में बड़ा हिस्सेदार है.​
    • वियतनाम, कोलंबिया और इंडोनेशिया शीर्ष क्रम के अन्य बड़े उत्पादक हैं.​
    • ब्राजील के उत्पादन में अरबिका प्रमुख होते हैं, कुछ क्षेत्रों में रोबस्टा भी उगाया जाता है
    • वैश्विक उत्पादन में इसका लगभग 40% हिस्सा दर्शाया गया है (उद्धरण वर्ष-अनुसार बदलाव संभव).​

5. एंसो (ENSO) दाब की अवस्था में परिवर्तन से संबंधित परिघटना है। ENSO का पूर्ण रूप क्या है? [MTS (T-I) 12 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन
Solution:
  • ENSO का पूर्ण रूप एल नीनो सदर्न ऑसिलेशन है। यह दाब की अवस्था में परिवर्तन से संबंधित परिघटना है।
  • क्या है ENSO
    • जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्री सतह के तापमान और वायुमंडलीय दाब/आवेश (wind) के वर्षों-में-वर्ष परिवर्तन से बनता है।
    • यह प्राकृतिक चक्र है और वैश्विक मौसमी पैटर्नों को प्रभावित करता है।​
    • ENSO के तीन मुख्य चरण होते हैं: El Niño (उष्ण-करण), La Niña (ठंडा/नीना), और Neutral (तटस्थ) अवस्था।
    • El Niño के दौरान पूर्वी प्रशांत के तापमान बढ़ जाते हैं जबकि La Niña में तापमान घटते हैं
    • Neutral अवस्था में तापमान औसत के करीब रहता है।​
  • El Niño (El Niño)
    • El Niño में प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से में सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म रहता है।
    • इससे Walker circulation कमजोर पड़ती है और वैश्विक वर्षा-वितरण में असामान्य परिवर्तन आते हैं
    • कुछ स्थानों पर सूखा, तो कुछ जगहों पर अत्यधिक वर्षा हो सकती है।
    • India सहित कई क्षेत्र भी मानसून पर प्रभाव महसूस करते हैं।​
    • इसका प्रभाव मौसम-मानसून पैटर्न, गर्मी-मानसून की तीव्रता और कृषि-उपज पर देखा गया है।​
  • La Niña (La Niña)
    • La Niña में प्रशांत के सतह तापमान सामान्य से कम होता है।
    • यह भी वैश्विक वर्षा वितरण और मौसमी पैटर्न को प्रभावित करता है
    • अनेक क्षेत्रों में वर्षा बढ़ सकती है, कुछ में कमी आ सकती है।
    • भारत आदि क्षेत्रों पर इसका प्रभाव भी नज़र आता है।​
  • ENSO का वैश्विक प्रभाव
    • ENSO अवस्था पृथ्वी के मौसम-चक्रों को संचालित करने वाले कई प्रमुख पैटर्न में बदलाव लाती है
    • तापमान, वर्षा, धूप-छाया के वितरण, और कुछ क्षेत्र में बर्फबारी/सूखा जैसी परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं।​
    • ENSO घटना के दौरान मौसम पूर्वानुमान और जोखिम प्रबंधन आवश्यक हो जाते हैं
    • ताकि कृषि, जल संसाधन, और आपदा-प्रबंधन को उचित तरीके से समायोजित किया जा सके।​
  • मुख्य बिंदु (संक्षेप)
    • ENSO का पूर्ण नाम: El Niño-Southern Oscillation (El Niño-Southern Oscillation)
    • तीन अवस्थाएँ: El Niño, La Niña, Neutral
    • प्रभाव: प्रशांत सतह तापमान के बदलाव से वैश्विक जलवायु पैटर्न में परिवर्तन; विशेषकर मानसून, बारिश और कृषि-जोखिम पर प्रभाव

6. महासागर की पर्पटी मुख्यतः ....... एवं ....... की बनी है। [MTS (T-I) 11 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) सिलिकॉन, मैग्नीशियम
Solution:
  • महासागरीय भूपर्पटी को 'सिमा' (SIMA) कहा जाता है, जिसका अर्थ सिलिकॉन और मैग्नीशियम है।
  • जबकि महाद्वीपीय पर्पटी को सियाल (SIAL) कहा जाता है, जिसका अर्थ सिलिका तथा एल्युमिना है।
  •  जबकि सिलिका भी पर्पटी में पाई जाती है लेकिन मुख्य घटक नहीं मानी जाती है।
  • पर्पटी की मोटाई औसतन लगभग 5–10 किलोमीटर के बीच हो सकती है
  • यह उपर्युक्त बेसाल्ट से बनी क्रस्ट पर स्थित होती है, जिसमें समय के साथ यह ठंडी होकर ठोस रूप लेती है।
  • महासागरीय पर्पटी की आयु पुराने समय तक जाती है
  • तलछट के साथ मिलकर एक विशिष्ट परत बनाती है
  • जो महाद्वीपों के पास पायी जाने वाली सबसे पुरानी पर्पटी से जुड़ी होती है।
  • इसके प्रमुख उदाहरण बेसाल्ट क्रस्ट में मौजूद फेल्डस्पार–पायरॉक्सीन सिलिकेट समूह हैं।
  • आपके प्रश्न के साथ-साथ एक संपूर्ण विवरण के लिए नीचे मुख्य बिंदु दिए गए हैं:
    • संरचना: पर्पटी बेसाल्ट से निर्मित, फेल्डस्पार के साथ पायरॉक्सीन-मैग्नेशियम-आधारित सिलिकेट खनिज
    • प्रमुख तत्व: मैग्नीशियम, लोहे (Fe), सिलिकेट समूह
    • मोटाई: लगभग 5–10 किमी (परत-स्तर पर निर्भर)
    • उत्पत्ति: महासागर के मध्य-घाटियों में नया पर्पटी बनने की प्रक्रिया (उत्पादन और क्रमिक ठंडन)
    • आयु: धीरे-धीरे पुरानी होने के साथ महासागरीय पर्पटी महाद्वीपीय किनारों के पास सबसे पुरानी परतें दर्शाती हैं
    • सामान्य उदाहरण: बेसाल्ट चट्टान के भीतर पाइरॉक्सीन-फेल्डस्पार सिलिकेट
  • उद्धरण/सूचनाओं के स्रोत:
    • महासागर पर्पटी के खनिज घटक और बेसाल्ट-आधारित संरचना पर विवरण,.​
    • महासागर पर्पटी के भू-विज्ञानात्मक निर्माण और परत-गठन पर सामान्य जानकारी

7. 'उर्वरक' के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है? [MTS (T-I) 10 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) ये मृदा को ह्यूमस प्रदान नहीं करते।
Solution:
  • उर्वरक कृषि में उपज बढ़ाने के लिए प्रयुक्त रसायन है
  •  जो पेड़-पौधों की वृद्धि में सहायता के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं साथ ही ये मृदा को ह्यूमस प्रदान करते हैं।
  • अतः विकल्प (b) गलत है। शेष विकल्प सही हैं।
  • मुख्य विचार (उर्वरकों के बारे में आम बातें जो अक्सर पूछी जाती हैं)
    • उर्वरक नमक या रसायनिक यौगिक होते हैं, जो मिट्टी में पोषक तत्वों को सरल रूपों में उपलब्ध कराते हैं।
    • अधिकांश उर्वरक मिट्टी में सूक्ष्मजीवों पर सीधे प्रभाव डालने की बजाय पौधों के पोषक तत्व पूर्ति पर केन्द्रित होते हैं।​
    • अधिक उर्वरक उपयोग से मिट्टी की संरचना या ह्यूमस (जैतुन) आदि पर प्रत्यक्ष लाभ कम और नुकसान अधिक हो सकता है
    • जैसे मृदा में खनिज लवणों की अधिकता और सूक्ष्मजीव क्रियाओं पर नकारात्मक प्रभाव।​
    • कुछ कथन, जैसे “उर्वरक मिट्टी में ह्यूमस प्रदान करते हैं” या “उर्वरक से सीधे मृदा जलधारण बढ़ती है
    • आदि, सामान्यीकृत और गलत हो सकते हैं—क्योंकि उर्वरक मुख्यतः खनिज पोषक तत्व संतुलित करते हैं
    • जलधारण में वृद्धि जैविक संशोधन (जैसे कम्पोस्ट) से अधिक होता है।​
  • विस्तृत विश्लेषण
    • कथन 1: “उर्वरक फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए utilisé होते हैं।” यह सही है
    • क्योंकि उर्वरक पौधों को आवश्यक पोषक तत्व दे कर उपज बढ़ाने में सहायक होते हैं।​
    • कथन 2: “भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उर्वरक प्रयोग करने वाला देश है।
    • यह एक सामान्य दावा है जो स्रोत के अनुसार सत्य माना जा सकता है
    • समय के साथ आंकड़े परिवर्तनशील हो सकते हैं; सामान्य पाठ्यक्रम में इसे सही माना जाता है।​
    • कथन 3: “उर्वरक पानी में जल्दी घुलते हैं और पौधों में पोषक तत्वों की कमी को पूरी करते हैं
    • यह सही रूप से बताता है कि उर्वरक पोषक तत्वों को तुरंत उपलब्ध कराते हैं, खासकर नाइट्रोजन आदि के लिए।​
    • कथन 4: “उर्वरक के अधिक प्रयोग से मिट्टी में हानिकारक रसायनों की मात्रा बढ़ने लगती है।
    • यह सही है: अत्यधिक उपयोग से खनिज लवण buildup और मृदा रसायनों में असंतुलन आ सकता है, जिससे नुकसान हो सकता है।​
    • कथन 5: “खाद के मुकाबले उर्वरकों में विशिष्ट पोषक तत्व अधिक होते हैं।
    • उर्वरक पोषक तत्वों को विशेष रूप से प्रदान करने के लिए बनाए जाते हैं; खाद/जीव संशोधन सामान्यतः जैविक पोषक भी देते हैं
    • तत्वों के ढांचे में भिन्नता रहती है। (यह बिंदु अक्सर सही मापदंडों में माना जाता है।)​
    • कथन 6: “उर्वरक मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करते हैं।” यह गलत है: उर्वरक मुख्यतः खनिज पोषक तत्वों को प्रदान करते हैं
    • सामान्यतः ह्यूमस नहीं बनाते; ह्यूमस मिट्टी की जैविक अवशेषों से बनती है, जिसे जैविक पदार्थ/कम्पोस्ट आदि से बढ़ाया जा सकता है।​
    • कथन 7: “उर्वरक मृदा की जलधारण बढ़ाते हैं।” यह गलत है
    • सामान्य रासायनिक उर्वरक जलधारण में सीधे भूमिका नहीं निभाते; जलधारण बढ़ाने के लिए जैविक संशोधन/कम्पोस्ट आदि अधिक प्रभावी होते हैं।​
    • कथन 8: “उर्वरक से सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भरपाई हो जाती है।” कुछ उर्वरक सूक्ष्म पोषक तत्व भी प्रदान कर सकते हैं
    • यह हर उर्वरक के लिए सत्य नहीं होता; अधिकांश प्रमुख पोषक तत्व N, P, K हैं
    • जबकि सूक्ष्म पोषक तत्व उपयुक्त मिलने पर जोड़े जाते हैं। यह आंशिक रूप से सही है लेकिन व्यापक नहीं है।​
  • निष्कर्ष: सही-सही कथन के आधार पर “गलत” कथन कौन-सा है
    • स्पष्ट रूप से गलत कथन वे हैं जो कहते हैं कि उर्वरक मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करते हैं
    • उर्वरक सीधे जलधारण बढ़ाते हैं। इन दावों को आम तौर पर गलत माना जाता है
    • क्योंकि ह्यूमस मिट्टी का लक्षित अनुपात जैविक संशोधनों से बनता है
    • उर्वरक से, और जलधारण बढ़ना जैविक/मृदा संरचना सुधार पर निर्भर करता है, न कि केवल उर्वरक पर।​
  • टिप्पणियाँ/संदर्भ
    • उर्वरक के फायदे, नुकसान और तत्वों के बारे में विस्तृत व्याख्या: उर्वरक में मौजूद तत्व, उर्वरक के फायदे एवं नुकसान​
    • उर्वरक-खाद तुलना और मृदा संरचना पर प्रभाव पर विश्लेषण: उर्वरक क्या होते हैं? (स्थिति); उर्वरक: विकिपीडिया/उल्लेखित दावों का सार​

8. उर्वरकों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं हैं? [MTS (T-I) 14 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) ये मानव निर्मित अकार्बनिक नमक हैं।
Solution:
  • उर्वरक कृषि में उपज बढ़ाने के लिए प्रयुक्त रसायन हैं
  • जो पेड़-पौधों की वृद्धि में सहायता के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।
  • ये मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करने का भी काम करते हैं। अतः विकल्प (d) सही नहीं है। शेष सारे विकल्प सही हैं।
  • उर्वरकों के बारे में सामान्य बिंदु
    • उर्वरकें मिट्टी में विशेष पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाती हैं
    • उर्वरक अक्सर खनिज/रासायनिक संरचना के रूप में आते हैं
    • इनका उद्देश्य फसल वृद्धि और उत्पादकता बढ़ाना है
    • इनका अत्यधिक प्रयोग मिट्टी में सूक्ष्मजीव क्रियाकलापों पर प्रभाव डाल सकता है
    • जैविक पदार्थों के साथ संरचना-सम्भावनाओं पर असर डाल सकता है.​
    • खाद (organic manure) में पोषक तत्व अधिक विविध रूपों में होते हैं
    • जल धारण क्षमता, संरचना आदि पर जैविक लाभ दे सकता है
    • जबकि उर्वरक सीधे पोषक तत्वों की मौजूदगी बढ़ाते हैं
    • परंतु वे ह्यूमस बनवाने में सीधे योगदान नहीं करते, यह सामान्य पारंपरिक ज्ञान है.​
  • कौन-से कथन सही/गलत हो सकते हैं?
    • कथन: “खाद के मुकाबले उर्वरकों में विशिष्ट पोषक तत्व अधिक मात्रा में होते हैं।
    • यह सामान्यतः सही है, क्योंकि उर्वरक विशेष पोषक तत्वों को उच्च घनत्व में उपलब्ध कराते हैं
    • (जैसे NPK यौगिक) जबकि खाद में पोषक तत्व अधिक व्यापक Range में होते हैं परंतु प्रति घटक की सघनता कम हो सकती है.​
    • कथन: “उर्वरक मृदा की जल धारण क्षमता में वृद्धि करते हैं।” यह गलत है
    • उर्वरक सीधे जल धारण क्षमता नहीं बढ़ाते; कुछ जैविक संशोधनों जैसे गौबर/जैविक खाद इस गुण को प्रभावित कर सकते हैं
    • उर्वरक का प्राथमिक कार्य पोषक तत्व देना है.​
    • कथन: “उर्वरक मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करते हैं।” यह गलत है; ह्यूमस मिट्टी का एक कार्बनिक घटक है
    • जो खाद-गोबर आदि जैविक पदार्थों से बनता है; उर्वरक आम तौर पर खनिज पोषक तत्व होते हैं जो सीधे ह्यूमस बनाते नहीं हैं.​
    • कथन: “उर्वरक पोषक तत्वों के लिए उच्च केंद्रित स्रोत होते हैं
    • पौधों के लिए उपलब्ध कराते हैं।” यह सही है; उर्वरक अक्सर NPK जैसे पोषक तत्वों को उपलब्ध कराते हैं और फसल वृद्धि को बढ़ाते हैं.​
  • निष्कर्ष
  • गलत कथन जो पूर्ण रूप से सही नहीं हैं:
    • “उर्वरक मृदा की जल धारण क्षमता में वृद्धि करते हैं।” गलत है.​
    • “उर्वरक मिट्टी को ह्यूमस प्रदान करते हैं।” गलत है.​
    • “उर्वरक मृदा में मित्रवत सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाते हैं।
    • यह प्रकार्य अक्सर प्रभावित नहीं होता; कुछ मामलों में रासायनिक उर्वरक सूक्ष्मजीव क्रियाकलाप पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है
    • अतः यह सामान्यीकृत कथन गलत माना जा सकता है.​

9. जेट प्रवाह किसका एक विशेष रूप है? [MTS (T-I) 12 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) भूविक्षेपी पवनें
Solution:
  • जेट प्रवाह भूविक्षेपी पवनों का एक विशेष रूप है।
  • पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाह: अधिकांश जेट धाराएं पश्चिम-पूर्व की दिशा में चलती हैं
  • हालांकि घुमावदार पथ और त्रि-आयामी प्रवाह कारणों से उनके भीतर उत्तर-दक्षिण घटक भी होता है।​
  • उच्च दबाव और ताप अंतर का परिणाम: जेट स्ट्रीम गर्म और ठंडी हवा के बीच ऊष्मीय/दबावी अंतर के कारण बनती है
  • जिससे उच्च-चाप-घट के स्थानों पर तेज़ धारा बनती है।​
  • चौड़ाई और लंबाई: सामान्य रूप से हजारों किलोमीटर लंबी और कुछ सौ किलोमीटर चौड़ी, मोटाई कुछ-किमी।​
  • मौसमीय प्रभाव: जेट प्रवाह क्षोभमंडल के ऊपर अभिसरण/अपसरण को प्रेरित कर सकती है
  • जिससे चक्रवातों/घूर्णनों के मार्ग को संचालित या बाधित कर सकती है।​
  • जेट प्रवाह के प्रकार (उपयोगी विभाजन)
    • परिध्रुवीय जेट स्ट्रीम: परिध्रुवीय क्षेत्र में बहती प्रमुख धाराएं, उच्च अक्षांशों के पास स्थित होती हैं और अक्सर सर्द मौसम के साथ तीव्र रहती हैं।​
    • उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट: उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में प्रमुख पश्चिम-पूर्व धारा, जो गर्म-ठंडे किनारों के बीच की सीमाओं के साथ जुड़ी होती है।​
    • तटरेखा/स्थानीय मार्गों के कारण বিভाज: तिब्बती उच्चभूमियों आदि भू-भौगोलिक संरचनाओं के कारण जेट प्रवाह के मार्ग में विभाजन या मार्ग परिवर्तन देखा जा सकता है; यह क्षेत्रीय मौसम पर प्रभाव डालता है।​
  • जेट प्रवाह के कारण और प्रभाव
    • उत्पत्ति के कारण: ध्रुवीय-अंतर और भूमध्य रेखा के पास तापमान/दाब में भिन्नता, पृथ्वी के घूर्णन (कोरियोली प्रभाव) आदि कारण मिलकर जेट धाराओं की सृष्टि करते हैं।​
    • मौसमीय प्रभाव: ऊपरी वायुमंडल में जेट प्रवाह के कारण ऊपरी क्षोभमंडल में अभिसरण और अपसरण संभव होता है
    • जिससे ऊर्ध्व पवनाकर्षण और चक्रवातों के गठन-निर्माण में भूमिका रहती है।​
    • ऋतुगत बदलाव: ठंडे माह में तापमान अंतर अधिक होने से जेट धाराएं अक्सर तेज रहती हैं
    • जिससे मौसम परिवर्तन अधिक तीव्र होते हैं।​
  • जैमिर्देश/योग्य संदर्भ (फैक्ट-चेक के लिए)
    • जेट प्रवाह सामान्यतः ऊपरी वायुमंडल में तेज हवाएं होती हैं जो पश्चिम से पूर्व की ओर बहती हैं
    • उसकी चौड़ाई-संकरण (केंद्रीय भाग) बहुत संकीर्ण होता है।​
    • इनमें गति 120–300 किमी/घंटा तक हो सकती है और ऊँचाई 9–12 किमी से ऊपर हो सकती है
    • भिन्न-भिन्न स्रोतों में यह सीमा थोड़ा अलग बताई जाती है।​
    • जेट प्रवाह के मार्ग में भू-राजनीतिक संरचनाओं (जैसे तिब्बतीय उच्चभूमि) बाधा बन सकते हैं
    • विभाजन/संयोजन के कारण अलग शाखाएं निकल सकती हैं।​

10. 1887 में इनमें से किसके द्वारा किया गया प्रयोग, काल्पनिक प्रकाशवाही (luminiferous) ईथर के संबंध में पृथ्वी के वेग को खोजने का एक प्रयास था? [Phase-XI 30 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) माइकलसन और मॉर्ले
Solution:
  • माइकलसन और मॉर्ले (1987) द्वारा किया गया प्रयोग, काल्पनिक प्रकाशवाही ईथर के संबंध में पृथ्वी के वेग को खोजने का प्रयास था।
  • माइकलसन-मॉर्ले प्रयोग ने ईथर में घूमती हुई पृथ्वी का वेग ज्ञात करने का प्रयास इस पूर्वानुमान पर किया कि पृथ्वी के वेग का प्रभाव प्रकाश के वेग पर पड़ता है
  • किंतु ये प्रकाश के वेग पर पृथ्वी के वेग का कोई भी प्रभाव ज्ञात करने में असफल रहे।
  • ख़ास बात क्या हुआ
    • डेट: 1887
    • वैज्ञानिकों: अल्बर्ट माइकलसन और एडवर्ड मॉर्ले
    • उद्देश्य: luminiferous ether (प्रकाश के लिए कल्पित माध्यम) के अस्तित्व के आधार पर पृथ्वी की गति को अलग-अलग दिशा में मापना
    • परिणाम: प्रकाश की गति सभी दिशाओं में एक जैसी पाई गई—यही माइकलसन– मॉर्ले परिणाम के प्रमुख निष्कर्ष थे
    • प्रभाव: इस परिणाम نے prevailing ether theory (ईथर के अस्तित्व) को चुनौती दी और बाद में आइंस्टीन के विशेष सापेक्षता सिद्धांत के विकास के रास्ते खोले
  • तथ्य-आधार और विस्तृत पृष्ठभूमि
    • ईथर के विचार के अनुसार विद्युतचुम्बकीय तरंगों के संचरण के लिए एक विशिष्ट मीडिया चाहिए था
    • पृथ्वी की गति के साथ इस माध्यम के सापेक्ष परिवर्तन की आशा की गई थी
    • ताकि तरंग-गतिकी में दिशा-निर्देशीय भिन्नता दिखे. यह पृष्ठ इस ऐतिहासिक संदर्भ को समझाता है
    • माइकलसन–मॉर्ले प्रयोग की भूमिका स्पष्ट करता है.​
    • 1887 का प्रयोग विशेष रूप से Mercury-स्तर के उपकरण के साथ किया गया था
    • ताकि पृथ्वी के चारों ओर घूमते हुए ईथर के सापेक्ष पृथ्वी की गति के संकेत मापक जाएँ
    • इसका रिकॉर्ड और प्रकाशन उसी वर्ष के संस्करणों में प्राप्त किया गया था.​
    • इस प्रयोग के परिणामों ने "ईथर की उपस्थिति" के विचार को कठोर चुनौती दी और प्रस्तावित किया कि संभवतः प्रकाशगति सच में सभी दिशाओं में समान हो सकती है
    • जो बाद के विश्लेषणों में विशेष सापेक्षता सिद्धांत के मार्ग को खोलती है.​
  • महत्वपूर्ण संदर्भ
    • माइकलसन–मॉर्ले प्रयोग 1887: इस प्रयोग ने प्रकाश के वेग में दिशा-विशिष्ट परिवर्तन की खोज करने का प्रयास किया
    • परिणाम एक समान गति दर्शाते हैं, जिससे ईथर के अस्तित्व पर प्रश्न उठे.​
    • इस प्रयोग की ऐतिहासिक महत्ता: यह ईथर-उपस्थिति के सैद्धांतिक ढांचे को चुनौती देता है
    • आधुनिक الفيزياء में प्रकाश के गुणों को समझने के लिए नया ढांचा प्रस्तुत करता है
    • जिसमें बाद के गूढ़ विचार जैसे संकेतन-सम्बन्धी सिद्धांत और विशिष्ट सापेक्षता के विचार विकसित हुए.​
  • यदि चाहें तो:
    • मैं इस विषय पर एक संग्रहीत-रेखा (timeline) बनाकर 19वीं सदी के अन्यExperiments और उनके नतीजों को भी जोड़ सकता हूँ।
    • चाहत हो तो माइकलसन–मॉर्ले प्रयोग से जुड़े मूल पन्नों/पीडीएफ के उद्धरण भी दे सकता हूँ ताकि आप प्राथमिक स्रोतों से पढ़ सकें।