संविधान के अनुच्छेद (भारतीय राजव्यवस्था)

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11. भारतीय संविधान का निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद कहता है कि एक राज्य भारत के क्षेत्र के भीतर कानूनों की समान सुरक्षा से इनकार नहीं करेगा? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 23 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) अनुच्छेद 14
Solution:
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि "राज्य, भारत के क्षेत्र के भीतर किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
  • यह मौलिक अधिकार सुनिश्चित करता है कि सभी व्यक्ति, चाहे वे नागरिक हों या गैर-नागरिक, देश के कानूनी ढांचे के तहत समान व्यवहार के हकदार हैं।
  • 'कानूनों की समान सुरक्षा' सकारात्मक रूप से यह सुनिश्चित करती है कि समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के लिए समान कानून लागू हों।
  • संविधान का अनुच्छेद 14 ही वह अनुच्छेद है जो स्पष्ट रूप से कहता है कि राज्य भारत के क्षेत्र के भीतर कानूनों की समान सुरक्षा से किसी को इनकार नहीं करेगा।
  • इसे “कानून के समक्ष समानता और “विधियों का समान संरक्षण”के सिद्धांत के रूप में माना जाता है
  • अनुच्छेद 14 का मूल उद्देश्य नागरिकों के बीच कानूनी समानता सुनिश्चित करना है ताकि भिन्न-भिन्न आधारों पर भेदभाव न हो, जैसे धर्म, जाति, लिंग आदि। यह कहता है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा.​
  • “कानून के समक्ष समानता” का अर्थ है कि हर व्यक्ति पर एक ही कानून लागू होगा और उसकी प्रक्रिया, न्यायपूर्ण अवसर, और सुरक्षा समान होंगे.​
  • “विधियों का समान संरक्षण” का मतलब है कि समान परिस्थितियों में समान नियम लागू होंगे और कानूनों के भीतर भेदभावपूर्ण प्रावधानों से बचना चाहिए; यह सिद्धांत अमेरिकी प्रभाव से लिया गया माना जाता है और भारतीय अनुच्छेद 14 के साथ समाहित है.​
  • अनुच्छेद 14 मौलिक अधिकारों के भाग 3 में आता है और यह न्यायिक समीक्षा के आधार के रूप में कार्य करता है ताकि सरकारी दमन, भेदभाव या मनमाने कदमों पर रोक लगे.​
  • व्यावहारिक उदाहरण
    • अनुच्छेद 14 के अंतर्गत भेदभावपूर्ण कानूनों पर नियंत्रण है; उदाहरण के तौर पर किसी समूह के विरुद्ध कानून बनाकर या उसे विशेष अधिकार देकर अन्य नागरिकों के समान अधिकारों से रोकना असंगत माना जाएगा.​
    • न्यायिक फैसलों में भी अनुच्छेद 14 का मानक यह है कि कानून समान परिस्थितियों में समान व्यवहार करे और सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं के बावजूद न्याय के अवसर समान हों.​
    • अगर चाहें, अनुच्छेद 14 से जुड़े अदालतों द्वारा दिए गए प्रमुख निर्णयों और उसके पुराने स्वरूपों का भी विस्तृत विश्लेषण दे सकता हूँ, साथ में संबंधित स्रोत भी दे सकता हूँ.​

12. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में कहा गया है कि भारत का कोई भी नागरिक किसी अन्य राष्ट्र से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 14 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) अनुच्छेद 18 (2)
Solution:
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 में उपाधियों का उन्मूलन किया गया है। इसका खंड (2) स्पष्ट रूप से कहता है
  • भारत का कोई भी नागरिक किसी अन्य राष्ट्र से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा"।
  • यह प्रावधान भारत की संप्रभुता को बनाए रखने और नागरिकों के बीच समानता के सिद्धांत को सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया गया था
  • ताकि उपाधियाँ सामाजिक विषमता या विशेषाधिकार का कारण न बनें।
  • सम्बद्ध अनुच्छेद का सार
    • अनुच्छेद 18(1) का मुख्य बिंदु: राज्य राष्ट्र-स्तर पर कोई भी उपाधि  प्रदान करने से रोकता है, ताकि राजकीय आधिकारिक सत्ता के प्रति नागरिक की निष्ठा में कोई द्वंद्व न रहे.
    • अनुच्छेद 18(1) का एक अतिरिक्त उपबिंदु यह भी कहता है कि भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता. इसका उद्देश्य विदेशियों के प्रभाव और भारतीय नागरिक की विवेकपूर्ण वफादारी को सुनिश्चित करना है.
    • अनुच्छेद 18(2) और (3) में यह स्पष्ट किया गया है कि राजकीय पदों से जुड़ी विशिष्ट भूमिका में भी सुरक्षा और नैतिकता के दायरे में विदेश से उपाधि लेने पर रोक हो सकती है, और राष्ट्रपति की सहमति के बिना किसी विदेशी उपाधि को स्वीकार नहीं किया जा सकता.
  • उद्धरण और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • अनुच्छेद 18 भारतीय संविधान के प्रमुख नागरिक अधिकारों से संबंधित अनुच्छेदों में एक है जो राज्य के अधिकारों और नागरिकों के साथ नीतियों को निर्धारित करता है, ताकि उपाधियों के साथ राज्य की प्रतिष्ठा और प्रजातांत्रिक सिद्धांतों पर प्रश्न न आए.​
    • संविधान के अन्य प्रावधानों के साथ यह प्रावधान भी स्पष्ट करता है कि उपाधि प्राप्त करना और उसका स्वीकार भारतीय राष्ट्रीय अखंडता, समानता और कानून के शासन के अनुरूप होना चाहिए.​
  • कानूनी व्याख्या के प्रमुख बिंदु
    • उपाधि क्या मानी जाएगी: उपाधि से आशय ऐसी बाहरी सम्मान-प्राप्ति से है जो नागरिक का कर्तव्य और संविधान के प्रति उसकी वफादारी पर प्रभाव डाल सके। अनुच्छेद 18 इसका स्पष्ट संकेत देता है कि ऐसी उपाधियाँ पारित की नहीं जाएँगी और नागरिक को बाहरी नियंत्रण से मुक्त रखा जाएगा.​
    • विदेशी नागरिकता के साथ उपाधि: भारत का नागरिक किसी भी विदेशी राज्य से उपाधि नहीं ले सकता, ताकि नागरिकता के साथ संबद्ध दायित्व और परीक्षण देश के आंतरिक कानून के अनुरूप रहें.​
    • व्यक्तिगत फॉर्म और राष्ट्रपति की सहमति: यदि किसी विदेशी उपाधि का संबंध किसी पद-धारण या विशिष्ट राज्य-सेवा से है, तो उसे राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं किया जा सकता—यही कारण है कि स्वीकृति प्रक्रिया संविधानिक नियंत्रण के अंतर्गत है.​
  • महत्वपूर्ण दायरे और प्रभाव
    • नागरिकता के साथ संवैधानिक प्रतिबद्धता: अनुच्छेद 18 नागरिकों की नागरिकता के साथ जुड़े सम्मान-प्राप्ति के अधिकारों पर नियंत्रण रखता है ताकि राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध कभी भी बाहरी प्रभाव न आए.​
    • सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव: उपाधियों के जरिए होने वाले सम्मान-प्रेरित दबाव, सत्ता-प्रभाव और विदेशी प्रेरित भेदभाव से सुरक्षा मिलती है, जिससे देशभर में समानता और कानून-व्यवस्था मजबूत रहती है.​
    • विविध उपाधियाँ और ऐतिहासिक संदर्भ: ब्रिटिश काल के राय बहादुर, खान बहादुर जैसे अभिजात वर्ग के उपाधियाँ अब प्रचलन नहीं और संविधान इनके उन्मूलन की दिशा में भी संकेत देता है ताकि आधुनिक भारत में समानता, सम्मान और लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत हों.​
  • संक्षिप्त निष्कर्ष
    • अनुच्छेद 18 (भारत का संविधान) स्पष्ट कहता है कि राज्य उपाधि प्रदान नहीं करेगा और भारतीय नागरिक विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा, ताकि राष्ट्रीय इंतजाम, नैतिकता और संविधान के प्रति निष्ठा बनी रहे.​
    • यदि विदेशी उपाधि का स्वीकार किसी पद-धारण से जुड़ा हो या राष्ट्रपति की सहमति आवश्यक हो, तब भी यह प्रक्रिया संविधान के भीतर नियंत्रित रहती है ताकि विदेशी प्रभाव का खतरा कम हो.​
    • यदि चाहें, इन बिंदुओं के साथ अनुच्छेद 18 का संपूर्ण पाठ और संबंधित न्यायिक निर्णयों के उद्धरण भी नीचे के संदर्भों के साथ साझा कर सकता हूँ ताकि आप अकादमिक या कानूनी अध्ययन के लिए सीधे उद्धरण दे सकें.

13. भारतीय संविधान का निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद कुछ मामलों में कार्य, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता के अधिकार से संबंधित है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 14 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) अनुच्छेद 41
Solution:
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41 राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों (DPSP) से संबंधित है।
  • यह अनुच्छेद राज्य को अपनी आर्थिक क्षमता की सीमाओं के भीतर, कुछ मामलों में, जैसे बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता की स्थिति में, नागरिकों को कार्य, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता पाने के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी प्रावधान करने का निर्देश देता है।
  • इसका उद्देश्य एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है।
  •  वह अनुच्छेद जो काम करने, शिक्षा पाने और कुछ मामलों में सार्वजनिक सहायता पाने के अधिकार को स्थापित करने के लिए निर्देशित है, अनुच्छेद 41 है।
  •  राज्य को काम करने, शिक्षा पाने और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामलों में सार्वजनिक सहायता के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए प्रावधान
    करने का निर्देश देता है।
  •  यह राज्य की आर्थिक क्षमता और विकास पर निर्भर है।
    Other Information
  • अनुच्छेद 40
    • विषय: ग्राम पंचायतों का संगठन।
    • अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए कदम उठाने तथा उन्हें स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने हेतु शक्तियां और अधिकार प्रदान करने का निर्देश देता है।
    •  यह बेहतर शासन के लिए स्थानीय स्तर पर सत्ता के विकेन्द्रीकरण पर जोर देता है।
  • अनुच्छेद 42
    • विषय: कार्य की न्यायसंगत एवं मानवीय स्थिति तथा मातृत्व राहत का प्रावधान।
    • अनुच्छेद 42 के अनुसार राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियां उपलब्ध कराई जाएं तथा मातृत्व राहत के लिए प्रावधान किए जाए।
    •  यह श्रमिकों के कल्याण और महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण, विशेषकर मातृत्व लाभ से संबंधित है।
  •  अनुच्छेद 43
    • विषयः श्रमिकों के लिए जीवन निर्वाह मजदूरी आदि।
    • व्याख्या: अनुच्छेद 43 राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि श्रमिकों को जीविका मजदूरी, काम की उपयुक्त परिस्थितियां और जीवन का सभ्य मानक प्रदान किया जाए।
    • इसका उद्देश्य श्रमिकों के कल्याण में सुधार लाना तथा कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना है।

14. भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के परामर्श के बाद नियुक्त किया जाएगा, जैसा कि राष्ट्रपति इस उद्देश्य के लिए आवश्यक समझे ? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 14 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) अनुच्छेद 124 (2)
Solution:
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन का प्रावधान है। इसका खंड (2) न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित है।
  • यह कहता है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के तहत वारंट द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के परामर्श के बाद नियुक्त किया जाएगा, जैसा कि राष्ट्रपति इस उद्देश्य के लिए आवश्यक समझे।
  • संविधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी प्रमुख बात यह है कि यह धारा 124(2) में निर्धारित है। नीचे मुख्य बिंदु दिए जा रहे हैं:
  • अनुच्छेद 124(2):
    • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
    • राष्ट्रपति को अपने हस्ताक्षर और मुहर के साथ वारंट ( warrants/orders) जारी कर नियुक्ति करने का अधिकार है. यह नियुक्ति राष्ट्रपति की वैधता से होती है और इसी अनुच्छेद के आधार पर यह प्रक्रिया नियंत्रित होती है.​
  • परामर्श की भूमिका:
    • यह नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के साथ परामर्श करते हैं।
    • परामर्श की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 124(2) के साथ व्यापक रूप से उद्धृत है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश या अन्य प्रमुख न्यायाधीशों से विचार-विमर्श किया जाना सामान्य अभ्यास माना गया है।​
  • परामर्श का दायरा:
    • प्रमुख न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के समय विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश से परामर्श की आवश्यकता रहती है
    • उच्च न्यायालय के जजों के संबंध में भी परामर्श प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है। यह परामर्श राष्ट्रपति के निर्णय को सलाह के स्तर पर समर्थित बनाता है।​
  • न्यायाधीश की नियुक्ति का अधिकार:
    • राष्ट्रपति के पास सर्वोच्च न्यायालय केjudge नियुक्ति का अधिकार है, जो संविधान के अनुसार कार्यान्वित होता है।
    • इसे वह अपने निर्वाचन-हस्ताक्षर और मुहर के साथ करता है।​
    • संदर्भित अधिनियम/धारा की अनुच्छेद 124(2) ही वह धारा है जिसने यह स्पष्ट किया है
    • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी, और इस प्रक्रिया में परामर्श शामिल है।

15. कौन-सा अनुच्छेद सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी पूर्व-संवैधानिक कानून के तहत संघीय अदालत के अधिकार क्षेत्र और शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार देता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) अनुच्छेद 135
Solution:
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 135 सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी पूर्व-संवैधानिक कानून (pre-constitutional law) के तहत संघीय अदालत (Federal Court - जो 1950 से पहले कार्य करती थी) के अधिकार क्षेत्र और शक्तियों का प्रयोग करने का अधिकार देता है। इसका अर्थ है।
  • यदि कोई मामला सर्वोच्च न्यायालय के गठन से पहले संघीय अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता था
  • तो सर्वोच्च न्यायालय अब भी उस मामले की सुनवाई कर सकता है, बशर्ते संसद द्वारा कोई विपरीत प्रावधान न बनाया गया हो।
  • यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि सर्वोच्च न्यायालय उन मामलों में अधिकार क्षेत्र बनाए रखता है
  • जहाँ संविधान के लागू होने से पहले भारत के संघीय न्यायालय द्वारा शक्तियों का प्रयोग किया जाता था।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत स्थापित भारत का संघीय न्यायालय, भारत के सर्वोच्च न्यायालय का पूर्ववर्ती था।
  • अनुच्छेद 135 सर्वोच्च न्यायालय को पूर्व-संवैधानिक विधियों से संबंधित मामलों की सुनवाई करने की अनुमति देता है जब तक कि उन्हें संसद द्वारा निरस्त या संशोधित नहीं किया जाता है।
  • यह अनुच्छेद औपनिवेशिक से स्वतंत्र शासन में संक्रमण के दौरान भारत के विधिक ढांचे में निरंतरता और स्थिरता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    Other Information
  •  भारत का संघीय न्यायालय (1937-1950) :
  • यह भारत सरकार अधिनियम, 1935 के तहत स्थापित किया गया था, जो प्रांतों के बीच विवादों को सुलझाने और उच्च न्यायालयों के निर्णयों के खिलाफ अपील सुनने के लिए था।
  • 1950 में संविधान को अपनाने पर भारत के संघीय न्यायालय को भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था।
  •  भारत सरकार अधिनियम, 1935:
  • यह ब्रिटिश संसद द्वारा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार था जिसने भारत की संघीय संरचना के लिए एक खाका के रूप में काम किया।
  • इसने ब्रिटिश भारत में प्रांतीय स्वायत्तता और एक संघीय न्यायालय प्रणाली शुरू की।
  • सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र:
  • सर्वोच्च न्यायालय के पास संविधान के अनुच्छेद 131-136 और अनुच्छेद 143 के तहत मूल, अपीलीय और सलाहकार अधिकार क्षेत्र है।
  • अनुच्छेद 135 पूर्व-संवैधानिक विधिक मामलों पर न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विस्तार करके इन शक्तियों का पूरक है
  • विधिक ढोचे की निरंतरता:
  • संविधान का अनुच्छेद 372 यह भी सुनिश्चित करता है कि संविधान को अपनाने से पहले लागू कानून तब तक जारी रहते हैं
  • जब तक कि उन्हें निरस्त या संशोधित नहीं किया जाता है।
  • अनुच्छेद 135 के साथ मिलकर, यह भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में संक्रमण के दौरान निर्बाध विधिक निरंतरता सुनिश्चित करता है।

16. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुच्छेद निर्देशक सिद्धांतों को 'देश के शासन में मौलिक' के रूप में निहित करता है और 'कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू' करने की राज्य से अपेक्षा करता है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 16, 20 नवंबर, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 28 नवंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) अनुच्छेद 37
Solution:
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 37 राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों  की प्रकृति और महत्व को परिभाषित करता है।
  • यह स्पष्ट रूप से कहता है कि ये सिद्धांत "देश के शासन में मौलिक" हैं और "कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा"
  • यह अनुच्छेद को कानूनी रूप से गैर-प्रवर्तनीय बताते हुए भी उन्हें शासन के लिए नैतिक और वैधानिक महत्व प्रदान करता है।
  • हालांकि न्यायालय में यह स्वतंत्र रूप से न्यायसंगत अधिकार नहीं ठहरते (मौलिक अधिकार नहीं होते)।
  • इसकी भूमिका संविधान के भाग IV (अनुच्छेद 36-51) में स्पष्ट की गई है, जो सरकार की नीतियाँ और कानून बनाने के दिशानिर्देश प्रस्तुत करता है.​
  • परिचय और दायरा:
    • संविधान द्वारा निर्धारित ऐसे सिद्धांत हैं जो सामाजिक-आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए राज्य को आदर्श और मार्गदर्शक निर्देश देते हैं
    • ये नागरिकों के मौलिक अधिकारों की तरह न्यायालय में सीधे लागू नहीं होते परन्तु शासन के नीति-निर्माण में अहम होते हैं.​
  • मौलिकता:
    • देश के शासन के मौलिक तत्व माना गया है, और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को अपनाने की राज्य से अपेक्षा की जाती है
    • इस दायरे में नीति-निर्देशक सिद्धांतों का पालन न करना संविधानिक निगरानी में आ सकता है
    • न्यायालय उन्हें मौलिक अधिकारों के समान अधिकारशास्त्रीय तौर पर रद्द नहीं कर सकता है (कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट इनके अनुसार निर्णय लेते हैं).​
  • संरचना और उपक्रम:
    • भाग IV में अनुच्छेद 36-51 के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं और इन्हें लागू करना सरकार का कर्तव्य माना गया है ताकि भारत एक कल्याणकारी राज्य बन सके.​
  • संदर्भित स्रोत (उद्धरण)
    • राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत देश के शासन के मौलिक हैं और कानून बनाने में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य है.​
  • Drishti IAS/:
    • भाग IV (अनुच्छेद 36-51) में स्थित हैं; इनका उद्देश्य सामाजिक-आर्थिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की स्थापना है.​
  • नीति तुलना:
    • मौलिक अधिकारों के विपरीत का दायरा व्यापक है और इन सिद्धांतों के अनुसार नीति बननी चाहिए.​

17. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद संसद को अपने द्वारा बनाए गए कानूनों के बेहतर प्रशासन के लिए अतिरिक्त अदालतें स्थापित करने की शक्ति देता है? [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) अनुच्छेद 247
Solution:
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 247 संसद को यह शक्ति देता है कि वह अपने द्वारा बनाए गए कानूनों के बेहतर प्रशासन के लिए, या किसी मौजूदा कानून के संबंध में, अतिरिक्त अदालतें स्थापित करने का प्रावधान कर सकती है।
  • यह अनुच्छेद केंद्र सरकार को केंद्र के कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए न्यायिक प्रणाली को मजबूत करने की विधायी शक्ति प्रदान करता है।
  • भारतीय संविधान, त्रिस्तरीय न्यायपालिका प्रणाली का प्रावधान देता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय शामिल हैं।
  • संसद के पास विशिष्ट प्रकार के मामलों से निपटने या किसी विशेष क्षेत्र अथवा समुदाय की जरूरतों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त न्यायालयों को स्थापित करने की शक्ति होती है।
  • संविधान का अनुच्छेद 247 संसद को अपने द्वारा बनाए गए कानूनों के बेहतर प्रशासन के लिए ऐसी न्यायालयों को स्थापित करने का अधिकार देता है।
  • इसमें न्यायाधिकरण के निर्माण की शक्ति शामिल है, ये विशेष निकाय हैं जो कराधान, श्रम विवाद और पर्यावरणीय मुद्दों जैसे विशिष्ट मामलों पर निर्णय लेते हैं।
    Other Information
  • अनुच्छेद 246 संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के वितरण से संबंधित है।
  • यह निर्दिष्ट करता है कि संसद के पास संघ सूची में सूचीबद्ध मामलों पर कानून बनाने की विशेष शक्ति होती है, जबकि राज्य विधानसभाओं के पास राज्य सूची में
    सूचीबद्ध मामलों पर कानून बनाने की विशेष शक्ति होती है।
  • संघ और राज्य विधानसभा दोनों समवर्ती सूची में सूचीबद्ध मामलों पर कानून बना सकते हैं।
  • अनुच्छेद 248, विधान की अवशिष्ट शक्तियों, अर्थात, तीनों सूचियों में शामिल नहीं किए गए किसी भी मामले पर कानून बनाने की शक्ति का प्रावधान देता है।
  • यह शक्ति संविधान के प्रावधानों के अधीन संसद में निहित होती है।
  • अनुच्छेद 253 संसद को किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते, संधि या सम्मेलन को लागू करने के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।
  • अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत के दायित्वों को पूरा करने और पूरे देश में ऐसे समझौतों के कार्यान्वयन में एकरूपता को सुनिश्चित करने के लिए यह शक्ति आवश्यक है।
  • संविधान का वह अनुच्छेद जो संसद को अपने बनाए कानूनों के बेहतर प्रशासन के लिए अतिरिक्त अदालतें स्थापित करने की शक्ति देता है, वह अनुच्छेद 247 है।
  • तत्वगत विवरण
    • अनुच्छेद 247 संसद को ऐसी विशेष न्यायापालिकाओं या ट्रिब्यूनलों की स्थापना की शक्ति देता है जो विशिष्ट क्षेत्रों या मुद्दों के लिए कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन और प्रशासन में सुविधा प्रदान करें, ताकि कानूनों के बेहतर पालन और प्रशासन संभव हो सके.​
    • यह भाग संसद के व्यावहारिक और प्रशासनिक पहलुओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए बनाये गए संस्थागत उपायों का हिस्सा है
    • ताकि त्रिस्तरीय न्याय व्यवस्था में नए प्रकार के न्यायालय/न्यायाधिकरण बन सकें.​
    • अनुच्छेद 246, अनुच्छेद 248 आदि आम विधायी शास्त्र के अंतर्गत संसद की विधायी शक्तियों की वितरित भूमिका से जुड़ते हैं
    • विशेष प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना सीधे अनुच्छेद 247 के दायरे में आती है.​
    • संसद के पास इन विशेष न्यायाधिकरणों या Panels को स्थापित करने की शक्ति एकीकृत कानून-व्यवस्था के अनुरूप कार्य करने, कराधान, श्रम, पर्यावरण आदि विशिष्ट क्षेत्रों के व्यवहार्य समाधान बनाने में सहायक हो सकती है (अनुच्छेद 247 के साथ इन सूचनाओं की संगति के साथ).​
    • अनुच्छेद 118(1) आदि अन्य अनुच्छेदों के बारे में भी अध्ययन किया जाता है, पर प्रश्न में निर्दिष्ट "अतिरिक्त अदालतें स्थापित करने की शक्ति" के स्पष्ट उत्तर के लिए अनुच्छेद 247 सबसे उपयुक्त और सामान्यतः मान्य संदर्भ है.​

18. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 323 ....... से संबंधित है। [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) लोक सेवा आयोगों की रिपोर्टों
Solution:
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 323 लोक सेवा आयोगों (संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC)) की रिपोर्टों से संबंधित है।
  • यह कहता है कि संघ आयोग राष्ट्रपति को और राज्य आयोग राज्यपाल को अपने कार्य के बारे में वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
  • ये रिपोर्टें संसद या राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती हैं, जिसमें आयोग की सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार करने के कारण भी बताए जाते हैं।
  • लोक सेवा आयोग विभिन्न सरकारी विभागों के लिए कर्मियों की भर्ती और चयन करने के लिए स्थापित संवैधानिक निकाय हैं।
  • लोक सेवा आयोगों की रिपोर्ट, जैसा भी मामला हो, राष्ट्रपति या राज्यपाल को सौंपी जाती है, और उन्हें राज्य विधानमंडल या संसद के समक्ष रखा जाना आवश्यक है।
  • रिपोर्ट में वर्ष के दौरान आयोग द्वारा किए गए कार्यों, प्राप्त आवेदनों की संख्या, चयनित उम्मीदवारों की संख्या और अन्य प्रासंगिक विवरण की जानकारी होती है।
    Other Information
  • लोक सेवा आयोगों का खर्च, जैसा भी मामला हो, राज्य या संघ की संचित निधि पर लगाया जाता है और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा ऑडिट किया
    जाता है।
  •  लोक सेवा आयोगों के कार्य" इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन आयोगों के कार्य संविधान में निर्दिष्ट हैं और इसमें परीक्षा और साक्षात्कार आयोजित करना, नियुक्तियाँ
    करना और भर्ती और चयन से संबंधित मामलों पर सरकार को सलाह देना शामिल है।
  • संविधान संसद या राज्य विधानमंडल को सरकार के तहत किसी भी पद के लिए भर्ती और चयन को शामिल करने के लिए इन आयोगों के कार्यों का विस्तार करने का अधिकार देता है।
  • अनुच्छेद 323 का विषय:
    • लोक सेवा आयोगों की रिपोर्ट और आयोगों के कार्य-क्षेत्र से जुड़े मामले। यह अनुच्छेद आयोगों द्वारा केंद्र/राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के लिए भर्ती, चयन, पदोन्नति आदि से जुड़े व्यावहारिक और प्रशासनिक कार्यों पर प्रकाश डालता है
    • इनके कार्यवृत्ति पर संसद/राज्य विधानमंडल के सामने रिपोर्टिंग के मानक निर्धारित करता है। [आंशिक संदर्भ: सामान्य हिन्दी स्रोत जहां अनुच्छेद 323 के बारे में इसी प्रकार के विवरण दिए जाते हैं] {संदर्भ बाद में जोड़े जा सकते हैं}
  • उपबंध एवं प्रवर्तन:
    • अनुच्छेद 323 के तहत लोक सेवा आयोगों की रिपोर्टिंग जिम्मेदारियाँ और उनके खर्च के नीति-निर्देश भी शामिल होते हैं
    • ताकि सरकार के भर्ती-नियोजन के प्रक्रियाओं पर पारदर्शिता बनी रहे। [संदर्भ स्रोत पर निर्भर]
  • ध्यान देने योग्य विशिष्ट प्वाइंट्स
    • लोक सेवा आयोग (एसएससी और अन्य राज्य/केंद्र आयोग) की रिपोर्ट सरकार के समक्ष रखने की जिम्मेदारी होती है; यह रिपोर्ट वर्ष के दौरान किए गए कार्यों, आवेदनों की संख्या, चयनित उम्मीदवारों आदि का विवरण दे सकती है। [आमीकृत पाठ्य-संदर्भ]
    • अनुच्छेद 323 के अंतर्गत आयोगों के कार्य-क्षेत्र का विस्तार करने के लिए संसद/राज्यों का विधि-निर्माण पर्याप्त अधिकार देता है; साथ ही प्रशासनिक अयोग, विभागों, और अन्य संस्थाओं के साथ भर्ती-चयन के मामलों में आयोगों के निर्णयों को प्रभावी बनाने के उपाय भी समाहित हो सकते हैं। [संदर्भ-उद्धरण]
    • अगर चाहें तो आप इस अनुच्छेद की सटीक, आधिकारिक भाषा में परिशोधित हिंदी/अंग्रेजी पाठ (अनुच्छेद 323 का कॉपी-टेक्स्ट) या संबंधित अध्याय/खंड के वित्तीय-प्रशासनिक प्रावधानों के उद्धरणों के साथ विस्तृत संक्षेप चाह सकते हैं।
    • इसके लिए मैं विश्वसनीय स्रोतों से नवीनतम और विशिष्ट उद्धरण निकालकर दे सकता हूँ, साथ ही हिन्दी/अंग्रेजी दोनों संस्करणों में तुलना भी प्रस्तुत कर दूँगा।

19. भारतीय संविधान में मूलतः ....... अनुच्छेद थे। [CGL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) 395
Solution:
  • भारतीय संविधान को जब 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था, तब मूलतः इसमें 395 अनुच्छेद थे। ये अनुच्छेद 22 भागों और 8 अनुसूचियों में विभाजित थे।
  • समय के साथ विभिन्न संशोधनों के माध्यम से नए अनुच्छेद जोड़े गए हैं और कुछ हटाए गए हैं
  • जिससे वर्तमान में गणना के आधार पर अनुच्छेदों की संख्या लगभग 470 से अधिक हो गई है, हालांकि अंतिम क्रमांक 395 ही बना हुआ है।
  • संविधान का निर्माण काल:
    • भारतीय संविधान 1949 में पारित हुआ था और 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। प्रारम्भिक दस्तावेज़ में 395 अनुच्छेद थे और वे 22 भागों में विभाजित थे (अनुच्छेद 1–395; भाग I–22) [जगरण/हिंदी संदर्भ देखें]। इससे यह स्पष्ट होता है
  • मूलतः
    • अनुच्छेद थे” का उत्तर 395 है, जैसे कि प्रारम्भिक संविधान में गिने जाते थे ।​
  • वर्तमान स्थिति:
    • समय के साथ अनेक संशोधनों (amendments) के कारण अनुच्छेदों की कुल संख्या बढ़कर 448 तक पहुँची है और भागों की संख्या 25 हो चुकी है (12 अनुसूचियाँ, कुछ परिशिष्ट सहित) ।
  • इसलिए अगर पूछा जाए “वर्तमान में मूलतः
    • अनुच्छेद कितने थे,” तो सही उत्तर संदिग्ध है क्योंकि यह प्रश्न संदर्भ पर निर्भर है—अगर आप “मूल संविधान” के समय की बात कर रहे हैं तो 395 अनुच्छेद; अगर “वर्तमान भारतीय संविधान” की गणना पूछी जाए तो 448 अनुच्छेद हैं।​
  • अनुच्छेदों की प्राथमिक सूची/महत्वपूर्ण अनुच्छेद:
    • संविधान के प्रमुख प्रावधानों के तहत अनुच्छेद 1 से 4 संघ-क्षेत्र, अनुच्छेद 5–11 नागरिकता, अनुच्छेद 12–35 मौलिक अधिकार आदि प्रमुख धाराएं प्रस्तुत हैं; साथ ही धारा-आधारित संरचना भी दर्शायी जाती है (भाग I, II, III आदि) ।​
  • सम्पूर्ण संरचना विवरण
    • भागों और अनुच्छेदों की योजना (प्रारम्भिक संस्करण बनाम वर्तमान संरचना):
    • प्रारम्भिक संविधान (1950 में लागू): 22 भाग, 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियाँ [जगह-जगह संदर्भ देखें]। यह संरचना संविधान सभा द्वारा 1946–1949 के दौरान तैयार हुई थी ।​
    • वर्तमान संविधान: भागों की संख्या बढ़कर 25 हो गई है; अनुच्छेद 448 तक पहुँचे हैं; 12 अनुसूचियाँ भी अभी मौजूद हैं ।​
  • प्रमुख भागों का संक्षिप्त परिचय:
    • भाग I: संघ और उसका क्षेत्र (अनुच्छेद 1–4) ।​
    • भाग II: नागरिकता (अनुच्छेद 5–11) ।​
    • भाग III: मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12–35) ।​
    • अन्य भाग: नीति निदेशक तत्व (भाग IV), मौलिक कर्तव्य (भाग IV A), संघ (भाग V), राज्य (भाग VI), पंचायत/नगरपालिकाएँ (भाग IX/IXA), वित्त/विकल्प आदि (भाग XII–XX) और संविधान संशोधन (भाग XX) आदि ।​
  • उद्धृत समझ: क्यों फर्क पड़ता है
  • प्रश्न के संदर्भ पर निर्भर रहता है कि “मूलतः
    • अनुच्छेद थे” से क्या संकेत लिया जाए—अगर इतिहासिक संदर्भ चाहिए तो 395 अनुच्छेद उत्तर है; अगर वर्तमान संरचना चाहिए तो 448 अनुच्छेद उत्तर होगा। दोनों ही संख्याएँ प्रमाणित हैं और अलग-अलग समय-परिप्रेक्ष्यों को दर्शाती हैं ।​
    • अनुसूचियाँ और भाग भी समय के साथ संशोधित होते रहे हैं, जिससे संख्यात्मक परिवर्तन सुनिश्चित होते रहे हैं; इस परिवर्तन की दस्तावेज़ी प्रविष्टियाँ भी स्पष्ट हैं, जैसे कि भागों की संख्या और अनुच्छेद वृद्धि ।​
  • संक्षिप्त निष्कर्ष
    • मूल संविधान के समय कुल अनुच्छेद: 395 (22 भागों में) ।​
    • वर्तमान संविधान के अनुसार कुल अनुच्छेद: 448 (25 भागों में; 12 अनुसूचियाँ) ।​

20. अनुच्छेदों का निम्नलिखित में से कौन-सा समुच्चय भारतीय संविधान में आपातकालीन प्रावधानों की विशेषता से संबंधित है? [CHSL (T-I) 9 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) 352 से 360
Solution:
  • भारतीय संविधान में आपातकालीन प्रावधानों की विशेषता भाग XVIII में निहित है, जिसका समुच्चय अनुच्छेद 352 से 360 तक है।
  • ये अनुच्छेद तीन प्रकार के आपातकालों से संबंधित हैं:
  • अनुच्छेद 352: राष्ट्रीय आपातकाल (युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह)।
  • अनुच्छेद 356: राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता (राष्ट्रपति शासन)।
  • अनुच्छेद 360: वित्तीय आपातकाल
    • ये प्रावधान केंद्र सरकार को किसी भी असामान्य स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने की शक्ति प्रदान करते हैं
    • ये प्रावधान केंद्र सरकार को युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह जैसी आपातकालीन स्थिति के मामले में राज्य सरकार का नियंत्रण लेने की अनुमति देते हैं।
    • अनुच्छेद 352 आपातकाल की घोषणा से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 353 से 355 केंद्र सरकार, राज्य सरकार की शक्तियों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर
      आपातकाल के प्रभाव को रेखांकित करते हैं।
    • अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति को राज्य सरकार को बर्खास्त करने और किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाने का अधिकार देता है।
      Other Information
  • अनुच्छेद 309 से 312 संघ या राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों की भर्ती और सेवा की शर्तों से संबंधित प्रावधानों से संबंधित हैं।
  • अनुच्छेद 343 से 351 संघ और राज्यों की आधिकारिक भाषा से संबंधित प्रावधानों से संबंधित हैं।
  • अनुच्छेद 330 से 342 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधानों से संबंधित है।
  • किन अनुच्छेदों को सम्मिलित किया गया है:
    • अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल), अनुच्छेद 353-355 (डायरेक्शन और नियंत्रण के प्रावधान, कुछ उपबंधों के प्रसार के साथ), अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन का प्रावधान), अनुच्छेद 360 (वित्तीय आपातकाल/आर्थिक आपातकाल) आदि उप-प्रावधान भी शामिल होते हैं।
  • प्रकार:
    • तीन प्रकार की आपात स्थितियाँ घोषित की जा सकती हैं — राष्ट्रीय आपातकाल (Article 352), राज्य आपातकाल (Article 356) और वित्तीय आपातकाल (Article 360) जिसे कक्षीय या वित्तीय स्थिति के अनुरूप लागू किया जाता है। साथ ही संहिता में केंद्र के अधिकारों और राज्यों के ऊपर नियंत्रण के उपाय भी बताए गए हैं।
  • उद्देश्य और प्रभाव:
    • ये प्रावधान केंद्रीय सरकार को असामान्य परिस्थितियों में विशेष शक्तियाँ देता है ताकि सुरक्षा, राज्य की अखंडता और प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखा जा सके; संघीय संरचना पर प्रभाव पड़ सकता है और मौलिक अधिकारों पर निलंबन/सीमाएँ आ सकती हैं, विशेष परिस्थितियों में न्यायिक नियंत्रण के साथ।
  • नियंत्रण-तंत्र:
    • राष्ट्रपति के proclamation के माध्यम से इन प्रावधानों के क्रियान्वय की शुरूआत होती है; उनके बाद संसद की मंजूरी, न्यायपालिका के दायित्व और अधिकारों के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ नियंत्रण कटाक्ष भी होते हैं।