सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-II

Total Questions: 50

31. कोट्टक्कल नंदकुमारन नायर (Kottakkal Nandaku-maran Nair) ....... नृत्य शैली में अपने योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 2019 की विजेता हैं। [CHSL (T-I) 9 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) कथकली
Solution:
  • 'कथकली' नृत्य शैली में अपने योगदान हेतु कोट्टक्कल नंदकुमारन नायर (Kottakkal Nandakumaran Nair) को वर्ष 2019 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया।
  • कथकली में योगदान
    • वे केरल के कोट्टक्कल से संबंधित हैं और कथकली की कालरीदासपुरम शैली के प्रमुख प्रतिनिधि माने जाते हैं।
    • नंदकुमारन नायर ने नृत्य, अभिनय और मुद्राओं के माध्यम से कथकली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, विशेष रूप से पौराणिक कथाओं के चरित्र चित्रण में उनकी सूक्ष्म अभिव्यक्तियां सराही जाती हैं।
    • उन्होंने परंपरागत कथकली को आधुनिक मंचों पर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • प्रमुख पुरस्कार
    • 2019 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार कथकली श्रेणी में।
    • पद्म श्री पुरस्कार, जो उनके समग्र योगदान को मान्यता देता है।​
    • केरल संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार।​
    • ये पुरस्कार उनके दशकों लंबे करियर को दर्शाते हैं
    • जिसमें उन्होंने गुरुकुल परंपरा के माध्यम से कई शिष्यों को प्रशिक्षित भी किया।​
  • कथकली का संक्षिप्त परिचय
    • कथकली केरल की शास्त्रीय नृत्य-नाट्य शैली है
    • जिसमें विस्तृत मेकअप, रंगीन वेशभूषा और चेहरे की भाव-भंगिमाओं का उपयोग होता है।
    • यह रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों पर आधारित होता है
    • नंदकुमारन नायर जैसे कलाकारों ने इसे वैश्विक पटल पर स्थापित किया।
  • करियर हाइलाइट्स
    • नंदकुमारन नायर ने कोट्टक्कल कथकली संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त किया और गुरु-केदनमोल के वंशज हैं।
    • वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन कर चुके हैं तथा कथकली के संरक्षण और प्रचार के लिए कार्यरत हैं।
    • उनका जन्म कोट्टक्कल में हुआ, जो कथकली का केंद्र रहा है।

32. पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित गुरु कीजपदम कुमारन नायर भारत के किस शास्त्रीय नृत्य के नर्तक थे? [CHSL (T-I) 06 जून, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) कथकली
Solution:
  • पद्मश्री सम्मान से सम्मानित गुरु कीजपदम कुमारन नायर मुख्यतः कथकली नर्तक थे।
  • उन्हें वर्ष 2004 के पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • जीवनी
    • कीझपदम कुमारन नायर का जन्म 1916 में केरल के वेलिनेझी में हुआ था और उनका निधन 2007 में हुआ।
    • उन्होंने कथकली के अलावा भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी जैसे अन्य शास्त्रीय नृत्यों में भी प्रशिक्षण लिया, जो उन्हें विशिष्ट बनाता था।
    • 2004 में उन्होंने मंच से संन्यास ले लिया और अंतिम वर्ष अपने पैतृक स्थान पर एकांतवास में बिताए।​
  • पुरस्कार
    • 2004 में उन्हें कला के क्षेत्र में पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया।​​
    • इसके अलावा उन्हें केरल संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1976), फैलोशिप (1996) और कलामंडलम पुरस्कार जैसे सम्मान मिले।​​
    • केंद्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी उनकी उपलब्धियों का प्रमाण है।​
  • कथकली में योगदान
    • कथकली केरल की 400 वर्ष पुरानी शास्त्रीय नृत्य शैली है
    • जो महाभारत, रामायण और पुराणों की कथाओं को विस्तृत वेशभूषा, मेकअप और मुद्राओं से प्रस्तुत करती है।​
    • नायर ने पात्र चित्रण, हस्त मुद्राओं और नृत्य में उत्कृष्टता हासिल की तथा कई पीढ़ियों को प्रशिक्षित किया।
    • उनकी अन्य नृत्यों से प्रेरणा ने कथकली को समृद्ध किया और इसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया।​
  • विरासत
    • नायर ने कथकली को वैश्विक मंच पर पहुँचाया, मंदिर-प्रासाद परंपराओं को बनाए रखते हुए आधुनिक विषयों को अपनाया।​
    • वे कथकली के लिए पद्मश्री प्राप्त करने वाले चुनिंदा कलाकारों में से एक हैं, जो आज भी नर्तकों को प्रेरित करते हैं।

33. पारंपरिक गायन 'नट' (Nat) का संबंध ....... नृत्य से है। [CHSL (T-I) 4 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) मणिपुरी
Solution:
  • पारंपरिक गायन 'नट' (Nat) का संबंध 'मणिपुरी' नृत्य से है, जो पूर्वोत्तर भारत के राज्य मणिपुर का एक लोक नृत्य है
  • नट गायन की उत्पत्ति और विशेषताएँ
    • नट गायन मणिपुरी संस्कृति का पारंपरिक लोक-शास्त्रीय गायन रूप है, जो भक्ति रस प्रधान होता है।
    • यह विशेषकर रासलीला नृत्य के साथ प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें भगवान कृष्ण और राधा-गोपियों की कथाओं को गाया जाता है।
    • इसकी धुनें कोमल, तरल और लयबद्ध होती हैं, जो नृत्य की graceful गतियों को पूर्णता प्रदान करती हैं।
    • मणिपुरी नृत्य में नट गायन का उपयोग पेंचक (पांच मुख्य तत्वों) के साथ होता है, जो प्रदर्शन को आध्यात्मिक गहराई देता है।
  • मणिपुरी नृत्य से संबंध
    • मणिपुरी नृत्य, जिसे रासलीला या जगोई के नाम से भी जाना जाता है
    • 18वीं शताब्दी में राजा भग्य चंद्र की कृपा से विकसित हुआ।
    • नट गायन इसमें नर्तकों की mudras (हस्ताक्षर) और भावों को संगीतमय रूप से समर्थन देता है।
    • उदाहरणस्वरूप, रासलीला के विभिन्न भागों जैसे नृत्य रास, तन्मन्न रास और गोपाल रास में नट की स्वर लहरियाँ नृत्य को जीवंत बनाती हैं।
    • यह गायन मणिपुरी लोक संगीत की पुष्पित वाली धुनों पर आधारित है
    • जो वाद्ययंत्रों जैसे pung (ढोलक जैसा),笛子 (बाँसुरी) और cymbals के साथ बजाया जाता है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • नट गायन मणिपुर की वैष्णव भक्ति परंपरा को दर्शाता है, जो सामूहिक उत्सवों जैसे लीला दिवस में जीवंत होता है।
    • आधुनिक काल में यह सांस्कृतिक उत्सवों, जैसे खजुराहो या दिल्ली के मणिपुरी फेस्टिवल में देखा जाता है।
    • नट समुदाय (नट जाति) की परंपराएँ भी नृत्य-गीत से जुड़ी हैं
    • लेकिन शास्त्रीय संदर्भ में मणिपुरी ही प्रधान है।
    • यह भारतीय शास्त्रीय संगीत की विविधता को रेखांकित करता है।

34. सत्रिया नृत्य शैली की उत्पत्ति निम्नलिखित में से किस भारतीय राज्य में हुई थी? [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (IV-पाली), CHSL (T-I) 17 अगस्त, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 14 सितंबर, 2023 (I-पाली), CHSL (T-I) 03 जून, 2022 (II-पाली), CGL (T-I) 18 अप्रैल, 2022 (III-पाली), MTS (T-II) 06 जुलाई, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) असम
Solution:
  • 'सत्रिया' भारत के असम राज्य का एक पारंपरिक हिंदू शास्त्रीय नृत्य है।
  • 15वीं-16वीं शताब्दी ई. में असम के महान वैष्णव संत और सुधारक श्रीमंत शंकरदेव द्वारा 'सत्रिया' नृत्य को वैष्णव धर्म के प्रचार हेतु एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में प्रचलित कराया गया।
  • वर्ष 2000 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा इस नृत्य को भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में शामिल किया गया था।
  • परंपरागत हस्त मुद्राओं, पाद कार्यों, आहार्य संगीत आदि के संबंध में सख्ती से बने सिद्धांतों के द्वारा सत्रिया नृत्य की परंपरा संचालित होती है।
  • सत्रिया नृत्य शैली बिहू, बोडो आदि लोक नृत्य से प्रभावित है।
  • शैली और विशेषताएं
    • सत्रिया नृत्य में नृत्य (नृत्य), अभिनय (अभिनय) और गायन (गायन) का सुंदर समन्वय होता है
    • जो नाट्यशास्त्र पर आधारित है। इसमें मुद्राएं (हाथों की भाव-भंगिमाएं), करवास (चलन) और पैरों की थापें प्रमुख हैं।
    • पुरुष नर्तक "मुखीया" कहलाते हैं और महिलाएं "किजी", लेकिन अब महिलाएं भी पुरुष भूमिकाएं निभाती हैं।
    • वेशभूषा में असमिया साड़ी, सोने के आभूषण और मुकुट प्रमुख हैं।​
    • प्रदर्शन में वाद्ययंत्र जैसे मृदंग, खोल (ढोल), ताल (झांझ), बांसुरी और वीणा का उपयोग होता है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • सत्रिया असम की वैष्णव संस्कृति का प्रतीक है, जो कृष्ण भक्ति, राम कथा और भागवत पुराण पर आधारित है।
    • यह भक्ति आंदोलन के माध्यम से असम की लोक संस्कृति को शास्त्रीय ऊंचाई प्रदान करता है।
    • आज यह मठों से बाहर मंच प्रदर्शनों तक फैल चुका है और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाता है।
    • असम के बिहू जैसे लोक नृत्यों से भिन्न, यह शास्त्रीय शुद्धता बनाए रखता है।​​

35. निम्नलिखित में से कौन-सी नृत्य शैली बिहू नृत्य से प्रभावित है? [C.P.O.S.I. (T-I) 10 नवंबर, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) सत्रिया
Solution:
  • 'सत्रिया' भारत के असम राज्य का एक पारंपरिक हिंदू शास्त्रीय नृत्य है।
  • 15वीं-16वीं शताब्दी ई. में असम के महान वैष्णव संत और सुधारक श्रीमंत शंकरदेव द्वारा 'सत्रिया' नृत्य को वैष्णव धर्म के प्रचार हेतु एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में प्रचलित कराया गया।
  • वर्ष 2000 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा इस नृत्य को भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में शामिल किया गया था।
  • परंपरागत हस्त मुद्राओं, पाद कार्यों, आहार्य संगीत आदि के संबंध में सख्ती से बने सिद्धांतों के द्वारा सत्रिया नृत्य की परंपरा संचालित होती है।
  • सत्रिया नृत्य शैली बिहू, बोडो आदि लोक नृत्य से प्रभावित है।
  • बिहू नृत्य का परिचय
    • बिहू नृत्य असम का सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो बिहू त्योहार से जुड़ा हुआ है।
    • यह युवा लड़के-लड़कियों द्वारा किया जाता है और इसमें तेज़ कदम, हाथों की फुर्तीली गतियाँ, कूल्हों की मटक और चुटकी बजाना प्रमुख विशेषताएँ हैं।
    • नृत्य धीमी गति से शुरू होकर तेज़ हो जाता है, जिसमें ढोल और पेपा जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग होता है। पारंपरिक वेशभूषा जैसे धोती, गमछा, चादर और मेखला पहनी जाती है।​
    • यह फसल कटाई, वसंत के आगमन और जीवन शक्ति का प्रतीक है, जिसमें गोलाकार या समांतर पंक्तियों में नृत्य होता है।
  • सत्त्रिया नृत्य का इतिहास
    • सत्त्रिया नृत्य 15वीं शताब्दी में असम के वैष्णव संत शंकरदेव द्वारा विकसित किया गया था
    • जो वैष्णव भक्ति के प्रसार के लिए था। यह मूल रूप से नाट्य शैली थी जो मठों (सत्रों) में प्रस्तुत होती थी।​
    • 2000 में भारत सरकार ने इसे आठवीं शास्त्रीय नृत्य शैली के रूप में मान्यता दी।
    • इसमें राधा-कृष्ण की लीला, भक्ति रस और आध्यात्मिक तत्व प्रमुख हैं।
    • यह मणिपुरी नृत्य से जुड़ा माना जाता है, लेकिन असम की सांस्कृतिक जड़ों से प्रेरित है।​
  • बिहू से प्रभाव का विवरण
    • सत्त्रिया नृत्य में बिहू के लोक तत्व स्पष्ट दिखते हैं, जैसे फुर्तीले पैरों के हावभाव, हाथों की तीव्र गतियाँ और ऊर्जावान स्टेप्स।
    • बिहू की युवा जुनून और प्रजनन आग्रह वाली अभिव्यक्ति सत्त्रिया के कुछ भागों में मिश्रित है।
    • शंकरदेव ने स्थानीय लोक परंपराओं को शास्त्रीय रूप देने के लिए बिहू जैसे नृत्यों से प्रेरणा ली, जिससे सत्त्रिया में लोक-शास्त्रीय संयोजन हुआ।
    • उदाहरणस्वरूप, बिहू की तेज़ चाल और कूल्हे की हलचल सत्त्रिया के 'चाली' और 'जुमुरा' जैसे अंगों में परिलक्षित होती है।​
    • NCERT कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक 'मल्हार' के अध्याय 8 में भी सत्त्रिया और बिहू के बीच संबंध वर्णित है, जो उनकी साझा असमिया जड़ों को रेखांकित करता है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • बिहू असम के रोंगाली, कोंगाली और भोगली बिहू त्योहारों का हिस्सा है
    • जबकि सत्त्रिया ने इसे शास्त्रीय ऊँचाई प्रदान की। दोनों असमिया संस्कृति की जीवन शक्ति को दर्शाते हैं।
    • आजकल सत्त्रिया वैश्विक मंचों पर प्रस्तुत होती है, लेकिन इसकी जड़ें बिहू जैसे लोक नृत्यों में ही हैं।​

36. ......., 500 साल से अधिक पुराना नृत्य रूप, एक भारतीय शास्त्रीय नृत्य है जो असम के वैष्णव मठों से विकसित हुआ है। [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) सत्रिया
Solution:
  • सत्रिया लगभग 500 वर्ष से अधिक पुराना नृत्य रूप है, जो असम के वैष्णव मठों में विकसित हुआ।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • सत्रिया नृत्य की शुरुआत 15वीं-16वीं शताब्दी में असम के भक्ति आंदोलन से हुई
    • जब शंकरदेव ने 'अनकिया नाट' या 'भवना' नामक नाट्य प्रदर्शन के लिए इसे बनाया।
    • मूल रूप से सत्र मठों में भिक्षुओं द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता था
    • यह नृत्य नाट्यशास्त्र और स्थानीय लोक तत्वों का मिश्रण है।
    • 2000 में संगीत नाटक अकादमी ने इसे भारत का आठवां शास्त्रीय नृत्य घोषित किया।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • सत्रिया में नृत्य (शुद्ध नृत्य), नृत (अभिनययुक्त नृत्य) और नाट्य (नाटक) का समावेश है
    • जिसमें लचीली मुद्राएँ, जटिल पदताल और 64 प्रकार के हस्त मुद्राएँ प्रमुख हैं।
    • विषय वस्तु कृष्ण लीला, रामायण-महाभारत और प्रकृति (जैसे मयूरी या मोर नृत्य) से ली जाती है
    • जो बोरगीत भजनों पर आधारित होती है।
    • वेशभूषा में रेशमी घोम्टा-पट (महिलाओं के लिए) और धोती-कुर्ता (पुरुषों के लिए) का उपयोग होता है।
  • प्रदर्शन शैलियाँ
    • मुख अभिनय: चेहरे के भावों पर आधारित एकल प्रदर्शन।
    • पखिल नृत्य: समूह नृत्य संगत पैटर्न के साथ।
    • चाली नृत्य: तलवार जैसे भावों वाले पुरुष एकल।​
    • संगीत में खोल ढोल, मंजीरा, बाँसुरी और वायलिन प्रमुख हैं
    • जो असमिया राग-ताल पर आधारित होते हैं।
    • पहले केवल पुरुष भिक्षु करते थे, अब महिलाएँ भी मंच पर प्रस्तुत करती हैं।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • असम की वैष्णव संस्कृति का अभिन्न अंग, सत्रिया सामुदायिक भक्ति को बढ़ावा देता है
    • माजुली जैसे सत्रों में जीवंत है।
    • आधुनिक समय में यह वैश्विक मंचों पर पहुँच चुका है, परंपरा को संरक्षित रखते हुए।

37. श्रीमंत शंकरदेव को आमतौर पर नए संगीत, नाटकीय और भाषायी शैली का पथप्रदर्शक माना जाता है। वह निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली से संबंधित हैं? [MTS (T-I) 10 मई, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 3 दिसंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) सत्रिया
Solution:
  • श्रीमंत शंकरदेव 15वीं-16वीं सदी के असम के संत, कवि और समाज सुधारक थे।
  • उन्हे सत्रिया नृत्य शैली का जनक माना जाता है।
  • श्रीमंत शंकरदेव को आमतौर पर नए संगीत, नाटकीय और भाषायी शैली का पथप्रदर्शक माना जाता है।
  • सत्रिया नृत्य शैली
    • सत्रिया नृत्य भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, जिसकी स्थापना 15वीं शताब्दी में श्रीमंत शंकरदेव ने की।
    • उन्होंने इसे असम के वैष्णव मठों (सत्रों) में भक्ति प्रचार के लिए विकसित किया
    • जहां यह नृत्य, संगीत और नाटक का संयोजन बन गया।
    • 2000 ई. में संगीत नाटक अकादमी ने इसे शास्त्रीय नृत्य का दर्जा दिया।
  • उत्पत्ति और विकास
    • शंकरदेव ने स्थानीय लोक नृत्यों जैसे ओजा पल्लि और शास्त्रीय तत्वों को मिलाकर सत्रिया की रचना की।
    • यह मूल रूप से सत्रों में पुरुष भाटिमों (महंतों) द्वारा किया जाता था, बाद में स्त्री भंगी भी विकसित हुई।
    • दो मुख्य शैलियां हैं: पौराणिक भंगी (तांडव या मर्दाना) और स्त्री भंगी (लेश्या)।
  • विशेषताएं
    • सत्रिया की खासियत है सुंदर मुद्राएं (32 मूल हस्तमुद्राएं), जटिल फुटवर्क, तरल गतियां और कृष्ण भक्ति पर आधारित अभिनय।
    • इसमें अंकिया नाट (शंकरदेव के नाटक) का नृत्य हिस्सा शामिल है
    • जो राम-कृष्ण कथाओं पर आधारित हैं। वेशभूषा में असमिया साड़ी, गहने और मुखौटे प्रमुख हैं।
  • शंकरदेव का योगदान
    • शंकरदेव (1449-1568) ने 'एक सरनिया नाम धर्म' की स्थापना की और बोरगीत, कीर्तन घोषा जैसी रचनाएं लिखीं।
    • वे नए संगीत, नाट्य (अंकिया नाट) और भाषाई शैलियों (असमिया भाषा सुधार) के पथप्रदर्शक थे।
    • सत्रिया को धार्मिक माध्यम बनाकर उन्होंने असम की संस्कृति को समृद्ध किया।

38. महाराष्ट्र की महिलाओं द्वारा कौन-सा नृत्य किया जाता है? [CHSL (T-I) 21 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (c) लावणी नृत्य
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्पों में 'लावणी नृत्य' महाराष्ट्र में लोकप्रिय नृत्य की एक शैली है। यह महिलाओं द्वारा किया जाता है
  • अपनी शक्तिशाली लय के लिए जाना जाता है। लावणी नृत्य शैली ने मराठी लोक रंगमंच के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • लावणी का इतिहास
    • लावणी की उत्पत्ति 18वीं शताब्दी के पेशवा काल में हुई, जब यह तमाशा लोकनाट्य का हिस्सा बनी।
    • शुरू में योद्धाओं का मनोरंजन करने के लिए विकसित हुई
    • लेकिन बाद में सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य और प्रेम कथाओं पर आधारित गीतों के साथ लोकप्रिय हुई।
    • 'लावणी' शब्द का अर्थ 'लावण्य' यानी सुंदरता से है
    • यह ढोलकी की तेज धुन पर प्रस्तुत किया जाता है।
  • प्रदर्शन शैली
    • महिलाएं नौवारी साड़ी (नौ गज की साड़ी), भारी गहने, घुंघरू और चमकीले श्रृंगार में नृत्य करती हैं।
    • नृत्य में कमर की थिरकन, तेज चाल और नेत्र अभिनय प्रमुख हैं, जो कामुकता और शक्ति का मिश्रण दर्शाते हैं।
    • दो मुख्य प्रकार हैं: शृंगारिक लावणी (प्रेमपूर्ण) और निरगुली लावणी (व्यंग्यात्मक)।
  • अन्य प्रमुख नृत्य
  • लेजिम
    • यह महिलाओं का समूह नृत्य है, जिसमें लेजिम नामक झांझरयुक्त वाद्य यंत्र हाथों में थामकर 20+ नर्तकियां घेरे में नाचती हैं। त्योहारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लोकप्रिय।​
  • कला डांड्या
    • नवरात्रि पर डंडियों के साथ किया जाने वाला नृत्य, गुजराती डांडिया जैसा लेकिन ढोल-तबले की ताल पर। महिलाएं घेरा बनाकर डंडियां आपस में टकराती हैं।​
  • तमाशा
    • लावणी का हिस्सा, जिसमें नृत्य, गायन, अभिनय और वाद्य (ढोलकी, तुनतुनी, मंजीरा) का मेल है। 16वीं-17वीं शताब्दी से चला आ रहा।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ये नृत्य शादियों, त्योहारों जैसे गणेश चतुर्थी और नवरात्रि में प्रस्तुत होते हैं।
    • लावणी ने मराठी रंगमंच को प्रभावित किया और आज भी फिल्मों व स्टेज शोज में जीवंत है।
    • कोली नृत्य में भी महिलाएं भाग लेती हैं, लेकिन यह मछुआरों का समूह नृत्य है।

39. निम्नलिखित में से कौन-सा नृत्य महाराष्ट्र का एक लोकप्रिय लोक नृत्य है? [MTS (T-I) 09 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) लावणी
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्पों में 'लावणी नृत्य' महाराष्ट्र में लोकप्रिय नृत्य की एक शैली है। यह महिलाओं द्वारा किया जाता है
  • अपनी शक्तिशाली लय के लिए जाना जाता है। लावणी नृत्य शैली ने मराठी लोक रंगमंच के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • लावणी नृत्य का इतिहास
    • लावणी महाराष्ट्र की लोक नाट्य शैली तमाशा का अभिन्न हिस्सा है, जो 18वीं शताब्दी में विकसित हुआ।
    • 'लावण्य' शब्द से प्रेरित यह नृत्य सुंदरता और भावनाओं का प्रतीक है
    • जिसमें वीरता, प्रेम, भक्ति और वियोग जैसे विषय प्रमुख हैं।
    • निर्गुणी लावणी आध्यात्मिक होती है, जबकि श्रृंगारी लावणी श्रृंगार रस प्रधान है।​
    • यह मंदिरों से उत्पन्न माना जाता है
    • जहां देवताओं को प्रसन्न करने के लिए गीत-संगीत के साथ नृत्य होता था। आज यह बॉलीवुड फिल्मों में भी लोकप्रिय है।​
  • प्रस्तुति शैली
    • लावणी में नृत्यांगनाएं 9 मीटर लंबी रंग-बिरंगी साड़ी, सोने के गहने और घुंघरू पहनकर ढोलकी की थिरकती धुन पर नाचती हैं।
    • नाटकीय मुद्राएं, नेत्र अभिनय और शरीर की लहराती गतियां दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। पुरुष भी भाग लेते हैं, लेकिन महिलाओं की भूमिका प्रमुख है।​​
    • संगीत में ताल वाद्य जैसे ढोलकी, हारमोनियम और मंजीरा का उपयोग होता है, जो नृत्य को ऊर्जावान बनाता है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • लावणी और अन्य नृत्य सामाजिक एकता, त्योहारों (जैसे नवरात्रि, गणेश चतुर्थी) और धार्मिक आयोजनों में महत्वपूर्ण हैं।
    • वे ग्रामीण संस्कृति को जीवित रखते हैं और पर्यटन को बढ़ावा देते हैं। आधुनिक समय में ये राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शित होते हैं।​​
    • महाराष्ट्र के लोक नृत्य राज्य की समृद्ध विरासत के प्रतीक हैं, जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं।​

40. निम्नलिखित में से किस नर्तक का संबंध ओडिसी नृत्य से है? [CHSL (T-I) 17 मार्च, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) सुजाता महापात्रा
Solution:
  • सुजाता महापात्रा एक प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना और नृत्य प्रशिक्षिका हैं
  • जिन्होंने ओडिसी नृत्य शैली में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • इन्हें वर्ष 2017 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • ओडिसी नृत्य का परिचय
    • ओडिसी नृत्य ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर की महारियों (मंदिर नर्तकियों) से विकसित हुआ
    • जिसमें भक्ति, लास्य और तांडव का मिश्रण है।
    • यह नृत्य नृत्य (शारीरिक गतिविधि), नृत (अभिनय) और अभिनय (भाव-भंगिमा) पर आधारित है
    • जो नाट्यशास्त्र से प्रेरित है। इसकी विशेषता है
    • त्रिभंग मुद्रा—शरीर के तीन भागों का वक्रता से मोड़ना, जो मूर्तियों जैसा सौंदर्य प्रदान करता है।
  • प्रमुख नर्तक: सुरupa सेन
    • सुरupa सेन (सुरूपा सेन) ओडिसी की अग्रणी नर्तक और कोरियोग्राफर हैं
    • जो भारत में इस नृत्य को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण रही हैं।
    • वह गुरु कालानिधि नारायण और केलुचरण मोहapatra की शिष्या हैं
    • 'नृत्यग्राम' से जुड़ी प्रस्तुतियों के लिए प्रसिद्ध हैं।
    • सुरupa ने ओडिसी को आधुनिक मंचों पर ले जाकर वैश्विक पहचान दिलाई, जिसमें भक्ति रस प्रधान रचनाएँ शामिल हैं।​
  • अन्य प्रसिद्ध ओडिसी नर्तक
    • केलुचरण महापात्र: ओडिसी के पुनरुद्धारक, जिन्होंने 20वीं सदी में इसे शास्त्रीय मान्यता दिलाई और पद्म भूषण प्राप्त किया।​
    • सुजाता महापात्र: संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता, ओडिसी में योगदान के लिए 2017 में सम्मानित।​
    • रवीन्द्र अतिबुद्धि: ओडिसी में विशेष योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त।​
    • सुप्रिया नायक: किरण सेगल और अन्य गुरुओं की शिष्या, भारत-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय।