सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-III

Total Questions: 50

11. निम्न में से किस प्रसिद्ध भारतीय नर्तक का संबंध पंडवानी (Pandavani) नृत्य शैली से है? [MTS (T-I) 09 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) तीजन बाई
Solution:
  • 'पंडवानी' भारत के छत्तीसगढ़ की एक पारंपरिक प्रदर्शन कला है। तीजन बाई एक प्रसिद्ध भारतीय नर्तकी हैं
  • पंडवानी लोक गीत-नाट्य की प्रमुख महिला कलाकार हैं।
  • उन्हें भारत सरकार द्वारा वर्ष 1988 में पद्मश्री, वर्ष 2003 में पद्म भूषण और वर्ष 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
  • पंडवानी क्या है?
    • यह मुख्य रूप से दो शैलियों में होती है: कापालिक शैली, जहां कलाकार मंच पर घूमते हुए विभिन्न पात्रों का किरदार निभाते हैं
    • वेदमती शैली, जो शास्त्र-आधारित खड़ी भाषा में कथा वर्णन पर केंद्रित है।
    • कलाकार तंबूरा नामक वाद्ययंत्र बजाते हुए ऊर्जावान हाव-भाव, नृत्य गतिविधियों और संगीत के साथ दर्शकों को बांध लेते हैं, जो इसे एक जीवंत कहानी कहने की शैली बनाता है।​
  • तीजन बाई का योगदान
    • तीजन बाई (जन्म: 24 अप्रैल 1956) पंडवानी की पहली प्रमुख महिला कलाकार हैं
    • जिन्होंने कापालिक शैली को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
    • उन्होंने इस पुरुष-प्रधान कला को महिलाओं के लिए खोला और देश-विदेश में प्रदर्शन कर इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, खासकर अपनी ठोस आवाज, अभिनय और नृत्य के माध्यम से।
    • उन्हें पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले हैं, जो उनकी कला के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं।​
  • अन्य कलाकार और शैलियां
    • कापालिक शैली में शांतिबाई चेलकने और उषा बाई बारले जैसी अन्य गायिकाएं भी उल्लेखनीय हैं
    • जबकि वेदमती शैली के पुरुष कलाकारों में झाड़ूराम देवांगन, पुनाराम निषाद, पंचराम रेवाराम और ऋतु वर्मा प्रमुख हैं।
    • महिलाओं में लक्ष्मी बाई और प्रभा यादव ने भी योगदान दिया।
    • हालांकि, तीजन बाई सबसे प्रसिद्ध हैं, क्योंकि उन्होंने पंडवानी को वैश्विक मंच पर लाकर इसे लोकप्रिय बनाया।​
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • पंडवानी की जड़ें छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में हैं, जहां यह चौपालों और आंगनों में होती थी।
    • समय के साथ यह मंचीय कला बनी, लेकिन मूल रूप से यह मौखिक परंपरा पर आधारित है।
    • यह कला महाभारत के शांति पर्व जैसे हिस्सों को भी जीवंत करती है, जो इसे सांस्कृतिक धरोहर बनाती है।
    • आज यह छत्तीसगढ़ की पहचान है और सांस्कृतिक उत्सवों में प्रमुखता से दिखाई देती है।

12. सास्वती सेन (Saswati Sen) 2004 के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार की एक गौरवान्वित प्राप्तकर्ता हैं। वह किस नृत्य शैली के लिए पहचानी जाती हैं? [MTS (T-I) 09 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) कथक
Solution:
  • सास्वती सेन एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना और पंडित बिरजू महाराज की प्रमुख शिष्या हैं।
  • सास्वती सेन ने कथक के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनको वर्ष 2004 के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • प्रारंभिक जीवन और प्रशिक्षण
    • उन्होंने दिल्ली के कथक केंद्र में श्रीमती रेबा विद्यार्थी के मार्गदर्शन में प्रारंभिक प्रशिक्षण प्राप्त किया और राष्ट्रीय छात्रवृत्ति प्राप्त की।
    • बाद में वे कथक के महान आचार्य पंडित बिरजू महाराज की प्रधान शिष्या बनीं, जो लखनऊ घराने की शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    • कलाश्रम संस्थान (जोर बाग, नई दिल्ली) में वे गुरु बिरजू महाराज के साथ कार्यरत रहीं और अब गुलमोहर पार्क में इसकी परंपरा को जीवंत रख रही हैं।
  • कथक शैली में योगदान
    • लखनऊ घराने की कथक में सास्वती सेन की विशेषता लयबद्धता, ताल की सटीकता, तेज तत्कार (पैरों की घुंघरूयुक्त चाल), चक्कर (घुमाव) और अभिनय में निहित है।
    • वे पंडित बिरजू महाराज के साथ लखनऊ घराने की तकनीकों, संगीत संनादन और पुस्तकों के दस्तावेजीकरण में सहयोग करती रहीं।
    • उनकी अभिनय शैली खयाल, ठुमरी और ग़ज़ल से प्रेरित होकर काव्यात्मक भावनाओं को जीवंत करती है
    • जो दर्शकों को पूर्ण भाव यात्रा पर ले जाती है। वे कलाश्रम की सचिव हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन करती हैं
    • समूह रचनाएं तैयार करती हैं और विदेशी शिष्यों सहित नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करती हैं।​
  • कथक नृत्य का विस्तृत विवरण
    • कथक उत्तरी भारत (विशेषकर उत्तर प्रदेश) की शास्त्रीय नृत्य शैली है, जो प्राचीन कथावाचकों (कथकारों) से विकसित हुई। इसके प्रमुख अंग हैं:​
    • नृत्य (शुद्ध नृत्य): तीव्र चक्कर, घुंघरू बंधे पैरों से तबला की ताल पर तत्कार, तीनताल का चरमोत्कर्ष।
    • नृत्य (अभिनयपूर्ण): कृष्ण लीला, राम कथा आदि पौराणिक कथाओं का चित्रण, नेत्र, हस्त मुद्राओं और चेहरे के भावों से।
    • विशेषताएं: 108 मात्रा वाले बोल, हिंदुस्तानी संगीत का प्रभाव, सीधी मुद्रा, कविता-आधारित भाव।​
    • कुचिपुड़ी (आंध्र की ऊर्जावान लीप), मणिपुरी (मणिपुर की तरल कृष्ण लीला) या मोहिनीअट्टम (केरल की कोमल स्त्री-केंद्रित) से भिन्न, कथक में नृत्य-संगीत का सामंजस्य और नाटकीयता प्रधान है।
    • सास्वती इसे 'संस्कार' मानती हैं, न कि केवल तेजी प्रदर्शन।​​
  • प्रदर्शन और सम्मान
    • डांसेज ऑफ इंडिया' श्रृंखला में उनके प्रदर्शन प्रसार भारती अभिलेखागार में संग्रहीत हैं।
    • अन्य पुरस्कार: संस्कृति अवार्ड, श्रृंगार मणि अवार्ड, क्रिटिक्स रेकमेंडेशन अवार्ड।
    • न्यूयॉर्क कथक फेस्टिवल जैसे आयोजनों में योगदान। साक्षात्कारों में वे प्रामाणिक लय, गुरु परंपरा और सांस्कृतिक गहराई पर जोर देती हैं।
    • सास्वती सेन कथक की संप्रेषक, संरक्षक और वैश्विक दूत हैं।

13. रमा वैद्यनाथन को निम्नलिखित में से किस भारतीय नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए 2013 में देवदासी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था? [CHSL (T-I) 03 जून, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) भरतनाट्यम
Solution:
  • रमा वैद्यनाथन को भारतीय नृत्य शैली भरतनाट्यम में उनके योगदान के लिए वर्ष 2013 में देवदासी राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • पुरस्कार का संदर्भ
    • देवदासी राष्ट्रीय पुरस्कार को भारतीय शास्त्रीय नृत्य को प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाता है
    • विशेष रूप से देवदासी परंपरा से जुड़े रूपों को। रमा वैद्यनाथन एक प्रमुख भारतनाट्यम नृत्यांगना हैं
    • जिन्होंने इस शैली में पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक विषयों और समकालीन प्रस्तुतियों के माध्यम से समृद्धि प्रदान की।
    • विकल्पों में मोहिनीअट्टम (केरल), ओडिसी (ओडिशा) और कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश) शामिल थे, लेकिन उनका कार्य स्पष्ट रूप से भारतनाट्यम से जुड़ा।
  • रमा वैद्यनाथन की नृत्य यात्रा
    • रमा वैद्यनाथन ने पांच दशकों से अधिक समय से भारतनाट्यम में अभिनय किया है।
    • उन्होंने पारंपरिक मुद्राओं, भावाभिनय और आधुनिक कोरियोग्राफी का मिश्रण प्रस्तुत किया
    • जैसे "शृंगार रसामंजरी" और ऐतिहासिक स्थलों पर प्रदर्शन।
    • दिल्ली में स्थित गणेश नटयालय से जुड़ीं, वे नृत्य शिक्षिका और कोरियोग्राफर भी हैं।
  • अन्य उपलब्धियाँ
    • उन्हें 2017 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2018 में नृत्य कलानिधि और 2011 में कलैमामणि जैसे सम्मान मिले।
    • 2013 का कला श्री पुरस्कार भी केरल सरकार से भारतनाट्यम के लिए ही था। उनकी प्रस्तुतियाँ वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति का प्रचार करती हैं।
  • भारतनाट्यम की विशेषताएँ
    • भारतनाट्यम में नृत्य (नृत्य), अभिनय (नाट्य) और संगीत का समन्वय होता है।
    • यह 23 मुद्राओं, 120 तक हस्तमुद्राओं और भावपूर्ण आँखों से समृद्ध है।
    • देवदासियों द्वारा मंदिरों में की जाने वाली यह शैली आज वैश्विक पटल पर चमक रही।​

14. निम्नलिखित में से किस नृत्य को एकहार्य (Ekaharya) के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें एक नर्तक एक ही नृत्य प्रदर्शन में कई भूमिकाएं निभाता है? [MTS (T-I) 08 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) भरतनाट्यम
Solution:
  • भरतनाट्यम नृत्य को एकहार्य के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें एक नर्तक एक ही नृत्य प्रदर्शन में कई भूमिकाएं निभाता है।
  • एकहार्य क्या है?
    • एकहार्य भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक परंपरा है जहाँ एकल नर्तक अभिनय, भाव-भंगिमा और मुद्राओं के माध्यम से विभिन्न पात्रों को जीवंत करता है।
    • यह नृत्य रूप नाट्यशास्त्र की परंपरा से प्रेरित है और नर्तक को बहुमुखी प्रतिभा दिखाने का अवसर देता है। भरतनाट्यम में यह विशेषता प्रमुख है, जो इसे अन्य नृत्यों से अलग करती है।
  • भरतनाट्यम का इतिहास
    • भरतनाट्यम की उत्पत्ति तमिलनाडु से हुई, जो लगभग 2000 वर्ष पुरानी है और भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से जुड़ी है।
    • प्राचीन काल में इसे दासीअट्टम या सदिर कहा जाता था, जो मंदिरों में देवदासियों द्वारा किया जाता था।
    • 20वीं शताब्दी में रुक्मिणी देवी अरुंडेल और ई. कृष्णा अय्यर ने इसे पुनर्जनन देकर आधुनिक मंच पर लाया। चिदंबरम मंदिर के गोपुरम पर इसकी मुद्राएँ उकेरी गई हैं।
  • प्रदर्शन की संरचना
    • भरतनाट्यम के सात मुख्य अंग होते हैं: अलारिप्पु, जतिस्वरम, शब्दम, वर्णम, पदम, थिलाना और स्लोकम। वर्णम सबसे महत्वपूर्ण है
    • जहाँ एकहार्य का पूर्ण प्रदर्शन होता है—नर्तक शिव, विष्णु, कृष्ण या अन्य पात्रों की कहानियाँ अभिनीत करता है।
    • इसमें नृत्य (शुद्ध नृत्य), नृत्य (अभिनयपूर्ण) और नाट्य (नाटकीय तत्व) का समावेश होता है।
  • तकनीकी विशेषताएँ
    • नर्तक स्थिर धड़, मुड़े घुटने, जटिल पैरकर्म और अभिव्यंजक हस्तमुद्राओं का उपयोग करता है।
    • अभिनय के जरिए भावनाएँ व्यक्त होती हैं, जैसे करुणा, क्रोध या भक्ति। वेशभूषा सरल होती है
    • लाल या हरा साड़ी, चूड़ियाँ और घुंघरू—जो एकहार्य को संभव बनाते हैं, क्योंकि बदलाव मुख्यतः भावों से होता है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • यह नृत्य हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित है, जो भक्ति और आध्यात्मिकता सिखाता है।
    • आधुनिक समय में यह वैश्विक मंचों पर लोकप्रिय है और यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा माना जाता है।
    • प्रसिद्ध नर्तक जैसे बालासरस्वती और यामिनी कृष्णमूर्ति ने इसे नई ऊँचाइयों दीं।​

15. राउत नाच (Raut Nacha) भारत के ....... राज्य का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। [MTS (T-I) 08 मई, 2023 (I-पाली), CGL (T-I) 27 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) छत्तीसगढ़
Solution:
  • राउत नाच/राउत नाचा (Raut Nacha) भारत के 'छत्तीसगढ़' राज्य का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है।
  • यह नृत्य यादव/यदुवंशियों द्वारा किया जाता है, यह जाति खुद को कृष्ण का वंशज मानती है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • लोककथाओं के अनुसार, यह नृत्य कृष्ण की जीत मनाने के लिए शुरू हुआ और शुरू में केवल राउत (यादव) समुदाय तक सीमित था
    • लेकिन अब सभी समुदायों द्वारा किया जाता है। यह रासलीला से मिलता-जुलता है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही धार्मिक परंपरा को दर्शाता है।​
  • प्रदर्शन का समय
    • यह नृत्य दीवाली के बाद गोवर्धन पूजा से शुरू होकर देवउठनी एकादशी तक लगभग एक सप्ताह चलता है।
    • रात में किया जाने वाला यह नृत्य अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है। छत्तीसगढ़ के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में विशेष महत्व रखता है।​
  • वेशभूषा और सामान
    • नर्तक चमकीले रंगीन कपड़े पहनते हैं, कमर और टखनों में घुंघरू बांधते हैं।
    • हाथों में सजी हुई लाठियां, धातु के ढाल और कभी-कभी ठुमरी का उपयोग करते हैं, जो युद्ध दृश्य को जीवंत बनाते हैं। पुरुष और महिला दोनों भाग लेते हैं।​
  • संगीत और तकनीक
    • संगीत में तुलसीदास और कबीर के दोहे गाए जाते हैं, साथ ही पारंपरिक गड़वा बाजा बजाया जाता है।
    • समूह में नर्तक लाठियों और ढालों से कृष्ण-कंस युद्ध का अनुकरण करते हैं। कोई औपचारिक प्रशिक्षण केंद्र नहीं; यह मौखिक परंपरा से सिखाया जाता है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • राउत नाच छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है, जो सामुदायिक एकता और कृष्ण भक्ति को मजबूत करता है।
    • यह राज्य की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित रखता है और राष्ट्रीय युवा उत्सव जैसे आयोजनों में प्रदर्शित होता है।

16. मशहूर कलाकार सितारा देवी की 10वीं जयंती पर निर्माता राज सी. आनंद (Raj C. Anand) ने उनके जीवन पर एक चलचित्र बनाने की घोषणा की है। सितारा देवी एक प्रसिद्ध ....... नर्तकी थीं। [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 03 दिसंबर, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 01 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) कथक
Solution:
  • सितारा देवी एक प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना थीं। उनके मंत्रमुग्ध कर देने वाले प्रदर्शन ने उन्हें "नृत्य साम्राज्ञिनी" उपनाम दिया, जिसका अर्थ है
  • नृत्य की साम्राज्ञी। फिल्म निर्माता राज सी. आनंद ने उनकी 10वीं जयंती की याद में उनके जीवन पर एक चलचित्र बनाने की घोषणा की थी।
  • कत्थक में योगदान
    • सितारा देवी ने कत्थक को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने लखनऊ घराने की शैली को अपनाया और थumri, dadra, hori, bhajan जैसी विधाओं में अभिनयपूर्ण नृत्य प्रस्तुत किया।
    • वे तेज तालों जैसे 14-16 मात्रा वाले परंपरागत कत्थक के साथ-साथ फिल्मी गीतों पर भी नृत्य करती थीं। जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें "भारत की कोहिनूर" कहा।
  • फिल्मी करियर

    • 1935 में 'दुलारी' फिल्म से उन्होंने अभिनय और नृत्य की दुनिया में प्रवेश किया।
    • झनक झनक पायल बाजे' (1955) जैसी फिल्मों में उनके नृत्य को अमर माना जाता है।
    • उन्होंने 'नागिन', 'चौदहवीं का चांद' आदि फिल्मों में काम किया
    • लेकिन नृत्य को प्राथमिकता देकर फिल्मों से दूरी बना ली। उन्होंने मधुबाला, मीना कुमारी जैसी अभिनेत्रियों को नृत्य सिखाया।
  • राज्य सम्मान और विरासत

    • उन्हें पद्मश्री (1970), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1960) और कलामणि जैसे सम्मान मिले।
    • उनके बेटे रंजीत बरोट एक संगीतकार हैं। सितारा देवी का निधन 25 नवंबर 2014 को मुंबई में हुआ।​
  • बायोपिक की घोषणा

    • निर्माता राज सी. आनंद ने सितारा देवी की 101वीं जयंती (2021) पर उनके जीवन पर बायोपिक की घोषणा की।
    • प्री-प्रोडक्शन में शोध चल रहा है, और जल्द निर्देशक व कलाकारों का ऐलान होगा। यह फिल्म उनकी सशक्त छवि, नारीवाद और नृत्य यात्रा को दर्शाएगी।

17. निम्नलिखित नृत्य शैलियों में से कौन-सी मूल रूप से तमिलनाडु के मंदिरों में देवदासियों द्वारा की जाती थी और इसलिए इसे दासिअट्टम (Dasiattam) के नाम से जाना जाता है? [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) भरतनाट्यम
Solution:
  • दक्षिण भारत में तमिलनाडु के शास्त्रीय नृत्य 'भरतनाट्यम' को दासिअट्टम (Dasiattam) के नाम से जाना जाता था।
  • दासिअट्टम प्राचीन भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली है, जिसे नाट्यशास्त्र से लिया गया है।
  • उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • भरतनाट्यम की जड़ें प्राचीन नाट्यशास्त्र में हैं, जो द्रविड़ सभ्यता के पूर्व-आर्य काल से जुड़ी हैं।
    • यह नृत्य दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु के मंदिरों में देवदासियों द्वारा भगवान शिव को समर्पित होकर प्रस्तुत किया जाता था।
    • देवदासियां मंदिरों की समर्पित नर्तकियां होती थीं, जो नृत्य, संगीत और पूजा के माध्यम से देवताओं की सेवा करती थीं।
    • इसे दासिअट्टम इसलिए कहा जाता था क्योंकि "दासी" का अर्थ सेविका और "अट्टम" का अर्थ नृत्य होता है।
  • देवदासियों की भूमिका
    • देवदासियां बचपन से ही मंदिरों को अर्पित कर दी जाती थीं और नृत्य-संगीत में प्रशिक्षित होती थीं।
    • वे त्योहारों और पूजा के दौरान नृत्य प्रस्तुत करतीं, जो आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता था।
    • 19वीं शताब्दी तक राजाओं और जमींदारों का संरक्षण प्राप्त था
    • लेकिन ब्रिटिश काल में देवदासी प्रथा का पतन हुआ और 1947 के देवदासी निषेध अधिनियम से यह मंदिरों से लगभग लुप्त हो गई।
  • नाम परिवर्तन और पुनरुद्धार
    • 20वीं शताब्दी初 में रुकीनी देवी अरंडेल और अन्य कलाकारों ने इसे "भरतनाट्यम" नाम देकर मंच पर लाया, उच्च वर्ग की महिलाओं के लिए उपयुक्त बनाया।
    • पहले के नाम जैसे सादिर (राजदरबारी नृत्य) या दासिअट्टम (मंदिर नृत्य) से यह शुद्ध शास्त्रीय रूप में विकसित हुआ। आज यह भारत के आठ मान्यता प्राप्त शास्त्रीय नृत्यों में प्रमुख है।
  • नृत्य की विशेषताएं
    • भरतनाट्यम में नृत्य (नृत), अभिनय (नाट्य) और गायन का समन्वय है।
    • यह मुद्राओं, करणों और भावों पर आधारित है, जिसमें अलारिप्पू, जटिस्वरम, वर्णम जैसे भाग होते हैं। तमिल और संस्कृत में पदबंध होते हैं।

18. पद्म सुब्रह्मण्यम निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली की प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं? [MTS (T-I) 03 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) भरतनाट्यम
Solution:
  • पद्म सुब्रह्मण्यम एक भारतीय शास्त्रीय भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं। इन्हें वर्ष 1981 में पद्मश्री और वर्ष 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
  • जीवन परिचय
    • पद्म सुब्रहण्यम एक प्रमुख भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना, शोध विद्वान, कोरियोग्राफर, शिक्षिका, भारतविद्या विशेषज्ञ और लेखिका हैं।
    • उनका जन्म चेन्नई में हुआ था, और उन्होंने बचपन से ही भरतनाट्यम की शिक्षा ग्रहण की।
    • वे नट्य शास्त्र पर गहन शोध के लिए जानी जाती हैं, जो भरत मुनि द्वारा रचित प्राचीन ग्रंथ है।
  • नृत्य शैली: भरतनाट्यम और भरत नृत्यम
    • वे मुख्य रूप से भरतनाट्यम शैली की विशेषज्ञ हैं, जो तमिलनाडु की उत्पत्ति वाली शास्त्रीय नृत्य विधा है।
    • इस नृत्य में जटिल पदचालन, मूर्तिमय मुद्राएं (करण), हस्त मुद्राएं और अभिनय प्रमुख हैं।
    • उन्होंने नट्य शास्त्र में वर्णित 108 करणों (संक्रमणात्मक नृत्य मुद्राओं) का पुनर्निर्माण किया और अपनी अनूठी शैली भरत नृत्यम विकसित की
    • जो प्राचीन परंपराओं को आधुनिक भरतनाट्यम से जोड़ती है।
    • यह शैली शुद्ध नृत्य (नृत्य) और अभिनय (नाट्य) का सुंदर समन्वय दर्शाती है।
  • योगदान और उपलब्धियां
    • पद्म सुब्रहण्यम ने भरतनाट्यम को विश्व स्तर पर लोकप्रिय बनाया, विशेषकर जापान, ऑस्ट्रेलिया और रूस जैसे देशों में जहां उनके सम्मान में फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बनीं।
    • वे कलाक्षेत्रम नामक संस्थान की संस्थापिका हैं, जो नृत्य शिक्षा और शोध को समर्पित है।
    • उनके कार्य ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
    • भारत सरकार ने उन्हें 1981 में पद्म श्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।

19. रुक्मिणी देवी असंडेल किस नृत्य शैली की प्रसिद्ध नृत्यांगना थी? [MTS (T-I) 03 मई, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 08 सितंबर, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 30 नवंबर, 2023 (II-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 08 दिसंबर, 2020 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) भरतनाट्यम
Solution:
  • रुक्मिणी देवी अरुंडेल एक भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना थीं, जिन्होंने भरतनाट्यम नृत्य शैली के पुनर्जागरण का नेतृत्व किया।
  • इनको कला के क्षेत्र में वर्ष 1956 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
  • प्रारंभिक जीवन
    • रुक्मिणी देवी का जन्म 29 मार्च 1904 को मदुरै, तमिलनाडु में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
    • उनके पिता नीलकंठ शास्त्री थियोसोफिकल सोसाइट्री से जुड़े थे और एनी बेसेंट से प्रभावित थे
    • जिसने रुक्मिणी को आध्यात्मिकता और कला की ओर प्रेरित किया।
    • उन्होंने युवावस्था में ही नृत्य सीखना शुरू किया, लेकिन उस समय समाज में देवदासी प्रथा से जुड़े 'साधिर' नृत्य को हेय दृष्टि से देखा जाता था।
  • भरतनाट्यम से जुड़ाव
    • 1920 के दशक में रुक्मिणी ने मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम (तत्कालीन साधिर) की शिक्षा ली।
    • 1933 में उन्होंने मद्रास (वर्तमान चेन्नई) में अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया
    • जो उस समय क्रांतिकारी था क्योंकि नृत्य को निम्न माना जाता था।
    • उन्होंने नृत्य से 'शृंगार रस' हटाकर 'भक्ति भाव' जोड़ा, आकर्षक वेशभूषा, आभूषण और मंच सज्जा का परिचय दिया, तथा रामायण पर आधारित नृत्य-नाटक रचे।
  • कलाक्षेत्र की स्थापना
    • 1936 में उन्होंने चेन्नई के थिरुवनमियुर में कलाक्षेत्र फाउंडेशन की नींव रखी, जो भरतनाट्यम, कथकली, कुचिपुड़ी आदि शास्त्रीय कलाओं का प्रमुख केंद्र बना।
    • यहां उन्होंने सैकड़ों शिष्यों को प्रशिक्षित किया और नृत्य को वैश्विक मंच प्रदान किया। कलाक्षेत्र आज भी भारत की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।
  • अन्य योगदान
    • रुक्मिणी थियोसोफिस्ट थीं और पशु कल्याण के लिए सक्रिय रहीं—उन्होंने ब्लू क्रॉस ऑफ इंडिया की स्थापना की।
    • उन्होंने लोक कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक संगीत को भी प्रोत्साहित किया। 1977 में पद्म भूषण से सम्मानित हुईं और 24 जनवरी 1986 को उनका निधन हुआ।
    • उनका कार्य भारतीय शास्त्रीय नृत्य को पुनर्स्थापित करने वाला मील का पत्थर है।

20. सुग्गी (Suggi) भारत के ....... राज्य का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। [MTS (T-I) 03 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) कर्नाटक
Solution:
  • 'सुग्गी' या सुग्गी कुनीथा भारत के कर्नाटक राज्य का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है।
  • यह एक प्रकार का फसल उत्सव है, जिसे कृषक समुदाय द्वारा किया जाता है।
  • उत्पत्ति और समुदाय
    • सुग्गी कुनिथा कर्नाटक के ग्रामीण कृषि समुदायों से जुड़ा है।
    • यह पुरुषों द्वारा किया जाने वाला जनजातीय नृत्य है, जो फसल कटाई के त्योहार पर आधारित है।
    • हलाक्की समुदाय भगवान शिव के भक्त हैं और उनकी संस्कृति प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है।​
  • अवसर और समय
    • यह नृत्य मार्च माह में होली या पूर्णिमा के आसपास फसल उत्सव के दौरान होता है।
    • नर्तक सात दिनों तक घर-घर जाकर प्रदर्शन करते हैं, ताकि बीमारियां दूर रहें और समृद्धि बनी रहे।
    • यह फसल देवी सुग्गी को समर्पित है, जहां कन्नड़ में 'सुग्गी' का अर्थ फसल और 'कुनिथा' का अर्थ नृत्य है।​
  • पोशाक और सामान
    • नर्तक रंग-बिरंगी पगड़ी बांधते हैं, जिसमें मोर पंख, लकड़ी के पक्षी, लाल, हरा, पीला व सफेद रंग होते हैं।
    • माथे पर चंदन लगाते हैं, धोती-शर्ट पहनते हैं तथा ढोल, झांझ, बांसुरी पर थिरकते हैं।
    • महिलाएं कभी-कभी साड़ी-ब्लाउज में भाग लेती हैं, लेकिन मुख्य रूप से पुरुष नृत्य करते हैं।​
  • प्रदर्शन शैली
    • नर्तक जीवंत छलांगें, घुमावदार कदम और समन्वित चालों के साथ देवी सुग्गी की मूर्ति के चारों ओर घूमते हैं।
    • लोक गीतों पर ऊर्जावान नृत्य होता है, जो रात्रि भर चलता रहता है।​
    • यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि धार्मिक आभार और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • सुग्गी कर्नाटक की आदिवासी विरासत को संरक्षित करता है तथा मानव-प्रकृति के सामंजस्य को दर्शाता है।
    • कर्नाटक के अन्य लोक नृत्य: डोलू कुनिता, वीरगासे, कामसाले, करागा आदि।​
    • यह त्योहार आज भी जीवंत है, जैसा कि हालिया कार्यक्रमों में देखा गया।​