सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-III

Total Questions: 50

21. भूत आराधना अनुष्ठानिक नृत्य "भूत कोला" का संबंध किस राज्य से है? [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) कर्नाटक
Solution:
  • भूत आराधना अनुष्ठानिक नृत्य "भूत कोला" का संबंध मुख्यतः कर्नाटक राज्य से है। भूत कोला एक प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा किया जाता है, जो अस्थायी रूप से स्वयं एक देवता बन जाता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • भूत कोला कर्नाटक के दक्षिण-पश्चिमी तटीय जिलों जैसे उडुपी, दक्षिण कन्नड़ (मंगलुरु क्षेत्र) और इसके आसपास के इलाकों में किया जाता है।
    • यह तुलु समुदाय की सांस्कृतिक धरोहर है, जहां "भूत" का अर्थ आत्मा या स्थानीय देवता से है
    • "कोला" का मतलब नृत्य या प्रदर्शन। परंपरा 700-800 ईसा पूर्व तक जाती है
    • जो तुलु जनजातियों के आगमन से जुड़ी मानी जाती है।
    • नवंबर से मार्च तक, खासकर सर्दियों में, यह आयोजन गांव के देवता मंदिरों के पास खुले मैदानों में होते हैं।​​
  • अनुष्ठान प्रक्रिया
    • यह नृत्य एक प्रशिक्षित कलाकार (दारू या व्हिपमैन) द्वारा किया जाता है, जो देवता या भूत की आत्मा से प्रवेशित हो जाता है।
    • शाम 7-8 बजे शुरू होने वाला अनुष्ठान पहले पूजा, संगीत (ढोल, मोहरा आदि वाद्ययंत्रों) से प्रारंभ होता है।
    • कलाकार चेहरा रंग-बिरंगे चित्रों से सजाता है, भारी वस्त्र धारण करता है, और आक्रामक मुद्राओं में नाचता-कूदता है।
    • "कट्टुनी" क्षण में देवता का आगमन होता है, जहां वह गांववालों के विवाद सुलझाता, भविष्य बताता, आशीर्वाद देता या बीमारियों का उपचार करता है। उसके शब्दों को अंतिम माना जाता है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • भूत कोला केवल नृत्य नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, एकता और आध्यात्मिक संतुलन का माध्यम है।
    • यह यक्षगान लोक नाट्य से प्रभावित है, जहां कलाकार लोककथाओं, पौराणिक कथाओं का अभिनय करते हैं।
    • यह खानदानी परंपरा है—एक बार चुना गया नर्तक, उसके वंशज ही इसे जारी रखते हैं।
    • कर्नाटक की समृद्ध लोककला का प्रतीक, यह भूत पूजा की जीवित परंपरा है।​
  • प्रसिद्धि और आधुनिक संदर्भ
    • फिल्म "कांतारा" (2022) ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया, जहां ऋषभ शेट्टी ने भूत कोला का जीवंत चित्रण किया।
    • यह परंपरा पंजुरी, बेर्मेरु जैसे 30-40 स्थानीय देवताओं से जुड़ी है।
    • पर्यटक अब इसे सांस्कृतिक उत्सव के रूप में देखते हैं, लेकिन मूल रूप से यह धार्मिक है।​

22. निम्नलिखित में से अरुणाचल प्रदेश का पुरस्कार विजेता लोक नर्तक/नर्तकी कौन है? [CHSL (T-I) 17 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) संग जंगमू
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्पों में अरुणाचल प्रदेश के संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार विजेता संग जंगमू (Sang Jangmu) एक लोक नर्तक हैं।
  • परिचय
    • संग जांगमू अरुणाचल प्रदेश की प्रसिद्ध लोक नर्तकी हैं
    • जो राज्य के समृद्ध आदिवासी सांस्कृतिक विरासत को अपनी नृत्य प्रस्तुतियों के माध्यम से विश्व पटल पर लाती हैं।
    • उनका जन्म 14 जून 1946 को अरुणाचल प्रदेश के सांगती गाँव में मोनपा जनजाति में हुआ था।
    • वे 57 वर्षों से अधिक समय से लोक नृत्यों जैसे लेकी डक्पा से अजी ल्हामू का प्रदर्शन कर रही हैं, जो राज्य की विविध जनजातियों की परंपराओं को जीवंत बनाते हैं।
  • प्रमुख उपलब्धियाँ
    • संग जांगमू को 2023 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो भारत के सबसे प्रतिष्ठित कला पुरस्कारों में से एक है।
    • यह पुरस्कार उनके लोक नृत्य में योगदान के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा प्रदान किया गया।
    • इसके अलावा, उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लोक नृत्य प्रतियोगिताओं में कई पुरस्कार जीते हैं, जहाँ उनकी ऊर्जावान और सुंदर प्रस्तुतियाँ सराही गईं।
  • सांस्कृतिक योगदान
    • अरुणाचल प्रदेश में 26 से अधिक प्रमुख जनजातियाँ हैं, जैसे आदि, न्यishi, मोनपा, गालो आदि, और प्रत्येक की अपनी अनूठी नृत्य शैलियाँ हैं
    • जैसे पूनुंग, बुइया, पॉपिर या थोंगका मनाउ। संग जांगमू इन नृत्यों को संरक्षित करने और युवा पीढ़ी तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
    • उनकी प्रस्तुतियाँ रंग-बिरंगे पारंपरिक वेशभूषा, तालबद्ध पैरों की थाप और कहानी कहने वाले भावों से भरपूर होती हैं, जो आधुनिकीकरण के दौर में इन कलाओं को जीवित रखती हैं।
  • प्रतियोगी परीक्षाओं में संदर्भ
    • SSC CHSL जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है
    • जहाँ विकल्पों में मीना नायक (ओडिशा की ओडिसी नर्तकी), बलकार सिद्धू (पंजाबी गायिका-अभिनेत्री) या तरूबाला देब्बरमा (त्रिपुरा की लोक नर्तकी) जैसे नाम होते हैं
    • लेकिन सही उत्तर संग जांगमू ही है। हाल के वर्षों में राज्य स्तर पर भी जैसे 2025 स्टेट यूथ फेस्टिवल में सिंगफो समूह की थोंगका मनाउ ने प्रथम पुरस्कार जीता, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व करेगा।
  • वर्तमान प्रासंगिकता
    • फरवरी 2026 तक, अरुणाचल प्रदेश के लोक नृत्य दलों जैसे सिंगफो और पुरोइक ग्रुप्स नेशनल यूथ फेस्टिवल में भाग ले रहे हैं
    • जो संग जांगमू जैसे कलाकारों के प्रयासों की निरंतरता दर्शाता है।
    • उनकी कला न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला माध्यम भी है।​

23. गोपिका वर्मा ....... की एक शास्त्रीय नर्तकी हैं। [CHSL (T-I) 11 मार्च, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) मोहिनीअट्टम
Solution:
  • गोपिका वर्मा 'मोहिनीअट्टम' की एक शास्त्रीय नर्तकी हैं। मोहिनीअट्टम के लिए वर्ष 2018 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया था।
  • प्रशिक्षण और करियर
    • उन्होंने मोहिनीअट्टम के प्रख्यात गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसमें कलामंडलम कल्याणी कुट्टी अम्मा, सुनंदा नायर और पल्लवी कृष्णन शामिल हैं।
    • वे चेन्नई और बेंगलुरु में "DASYAM" नामक मोहिनीअट्टम डांस स्कूल चलाती हैं
    • जहां वे नृत्य शिक्षिका के रूप में भी सक्रिय हैं। गोपिका ने सोपाना शैली में प्रदर्शन प्रशिक्षण भी श्री कवलम नारायण पणिकर से लिया।
    • उन्होंने अयोनिजा पंचकन्या जैसे उल्लेखनीय नृत्य सादर किए, जो भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं।
  • पुरस्कार और सम्मान
    • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (2018)।
    • कलैमामणी पुरस्कार (2004) – मोहिनीअट्टम के लिए पहली प्राप्तकर्ता।
    • नृत्य चुड़ामणी पुरस्कार (2010) – कृष्ण गण सभा से।
    • अभिनय कला रत्न उत्कृष्टता पुरस्कार।
    • ये सम्मान उनकी कला के प्रति समर्पण को दर्शाते हैं। वे दूरदर्शन की सर्वोच्च श्रेणी की कलाकार भी हैं।
  • मोहिनीअट्टम में योगदान
    • मोहिनीअट्टम केरल का शास्त्रीय नृत्य है, जो भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार पर आधारित है।
    • गोपिका इसे महिलाओं की कोमलता और भावाभिव्यक्ति से प्रस्तुत करती हैं।
    • इस नृत्य में कर्नाटक संगीत का प्रयोग होता है
    • यह नाट्य शास्त्र के नृत्त व नृत्य का पालन करता है। उन्होंने चयमुखी मोहिनीअट्टम जैसे प्रदर्शनों से इसे जीवंत रखा।
  • उल्लेखनीय प्रदर्शन
    • गोपिका ने एनसीपीए मुंबई जैसे मंचों पर सुचेता भिड़े चापेकर के साथ सह-प्रदर्शन किया।
    • चक्रधर महोत्सव में उन्होंने भाव और रसों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
    • उनके नृत्य में परंपरागत तत्वों के साथ आधुनिक संवेदनशीलता का मिश्रण है।

24. निम्नलिखित में से कौन-सी नृत्य शैली छत्तीसगढ़ से संबंधित नहीं है? [MTS (T-I) 19 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) कजरी
Solution:
  • 'कजरी' छत्तीसगढ़ से संबंधित नहीं है, क्योंकि यह बिहार और उत्तर प्रदेश में लोकप्रिय नृत्य शैली है।
  • भगोरिया नृत्य छत्तीसगढ़ से संबंधित नहीं है।
    • यह नृत्य मुख्य रूप से मध्य प्रदेश (भील समुदाय द्वारा) और महाराष्ट्र से जुड़ा है
    • जबकि छत्तीसगढ़ की प्रमुख नृत्य शैलियाँ स्थानीय जनजातियों की परंपराओं पर आधारित हैं।​
  • छत्तीसगढ़ की प्रमुख नृत्य शैलियाँ
    • छत्तीसगढ़ आदिवासी संस्कृति का केंद्र है, जहाँ पंथी, राउत नाचा, कर्मा, सैला, सूवा जैसी शैलियाँ प्रचलित हैं।
    • इनमें से अधिकांश गोंड, बैगा, मुरिया और उरांव जनजातियों द्वारा त्योहारों, विवाहों या धार्मिक अनुष्ठानों पर की जाती हैं।
    • पंथी: सतनामी समाज का नृत्य, जो धार्मिक भक्ति और समूह ऊर्जा पर केंद्रित है; मांदर और टिमकी वाद्यों के साथ किया जाता है।​
    • राउत नाचा: गोंड जनजाति का, भगवान राउत देव की पूजा से जुड़ा; रंग-बिरंगे वेशभूषा और ढोल-मंजीरा के साथ।
    • कर्मा: कई जनजातियों (जैसे गोंड, हल्बा) द्वारा कर्मा वृक्ष की पूजा में; महिलाएँ वृत्ताकार घेरा बनाकर नाचती हैं।​
    • ये नृत्य राज्य की 35+ जनजातियों की विविधता को दर्शाते हैं, जो साल भर चलने वाले उत्सवों में जीवंत रूप लेते हैं।​
  • भगोरिया क्यों नहीं है छत्तीसगढ़ी?
    • भगोरिया एक आदिवासी त्योहार और नृत्य है, जो होली से पहले मनाया जाता है
    • लेकिन यह मुख्यतः मध्य प्रदेश के झाबुआ-ढाबा क्षेत्र की भील, भिलाला और पटेलिया जनजातियों से संबंधित है।​
    • महिलाएँ रंग लगाकर और पुरुष वाद्ययंत्र बजाकर नृत्य करते हैं, जो विवाह योग्य युवाओं के लिए सामाजिक मेलजोल का माध्यम है।
    • यह छत्तीसगढ़ के बजाय पश्चिमी भारत की परंपरा है, हालाँकि सीमावर्ती प्रभाव संभव है।​
  • अन्य छत्तीसगढ़ी नृत्यों का विस्तार
    • राज्य के नृत्य वाद्यों (ढोल, मंजीरा, बांसुरी, मांदर) और गीतों (सदरी बोली) से समृद्ध हैं।
    • सैला (डंडा नृत्य): जनजातीय पुरुषों द्वारा लाठियों पर ताल के साथ; विवाहों में लोकप्रिय।
    • सूवा: गाय चराने की नकल; युवा भाग लेते हैं।​
    • गेंदी/कक्सार: मुरिया जनजाति के सामूहिक वृत्ताकार नृत्य, साल के विशेष अवसरों पर।
    • खड़ा नाचा: गोंड-बैगा द्वारा स्थिर मुद्राओं में; त्योहारों पर ढोल के साथ।
    • चेरचेरा: युवाओं का लचीलापन दिखाने वाला।​
    • ये नृत्य सामाजिक एकता, प्रकृति पूजा और जीवन चक्र को प्रतिबिंबित करते हैं।​
  • सांस्कृतिक संदर्भ
    • छत्तीसगढ़ के नृत्य राज्य की 44% आदिवासी आबादी से प्रेरित हैं, जो बस्तर, सरगुजा जैसे क्षेत्रों में केंद्रित हैं।
    • भगोरिया जैसे बाहरी नृत्य कभी-कभी भ्रम पैदा कर सकते हैं
    • क्योंकि भारत के मध्य भाग में सांस्कृतिक आदान-प्रदान आम है, लेकिन स्रोत स्पष्ट रूप से इन्हें अलग करते हैं।
    • ऐसे प्रश्न प्रतियोगी परीक्षाओं (CGPSC, Vyapam) में लोकप्रिय हैं, जहाँ भगोरिया विकल्प के रूप में आता है।​

25. मणिपुरी नृत्य का प्रमुख विषय ....... है। [MTS (T-I) 19 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) भक्ति
Solution:
  • मणिपुरी नृत्य का प्रमुख विषय भक्ति है। इस नृत्य शैली की उत्पत्ति मणिपुर में हुई।
  • प्रमुख विषय: भक्ति रस
    • इस नृत्य का मूल केंद्र बिंदु भक्ति भाव है, जो राधा-कृष्ण के प्रेम, गोपियों की विरह व्यथा और दिव्य मिलन को दर्शाता है।
    • रासलीला जैसे प्रदर्शनों में पांच मुख्य प्रकार के रास (महारास, बसंत रास आदि) होते हैं, जो ऋतु-आधारित होते हैं।
    • प्रकृति के तत्व जैसे फूल, पक्षी और नदी भी इसमें घुलमिल जाते हैं
    • जो भक्ति को और गहन बनाते हैं। भक्ति के अलावा, संकीर्तन में भक्ति गीतों के साथ सामूहिक नृत्य होता है।
  • नृत्य शैलियाँ
    • रासलीला: राधा-कृष्ण और गोपियों का समूह नृत्य, कोमल लय और अभिनय प्रधान।
    • संकीर्तन: पुरुष नर्तक पुंग (ढोल) और करताल बजाते हुए भक्ति गान पर नृत्य करते हैं।
    • थंग-ता: मार्शल आर्ट प्रभावित, जिसमें तलवार और ढाल का उपयोग होता है, लेकिन भक्ति संदर्भ में।
    • लाई हरोबा: सृष्टि रचना की कथा, पुजारी-पूजारिनों द्वारा अनुष्ठानिक।
    • ये शैलियाँ तांडव (वीर रस) और लास्य (कोमल रस) दोनों को समेटती हैं।​
  • वेशभूषा और संगीत
    • स्त्री वेश में कठोर घाघरा, मलमल का ओढ़नी और केश-सज्जा प्रमुख है
    • जो नृत्य में घूमते हुए फूलों जैसा प्रभाव पैदा करती है। पुरुषों में धोती और पगड़ी होती है।
    • संगीत में पुंग, मृदंग,笛子和 भक्ति भजनों का उपयोग होता है, जो मणिपुरी रागों पर आधारित है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • मणिपुर की भौगोलिक अलगाव ने इसे बाहरी प्रभाव से बचाया, जिससे यह शुद्ध वैष्णव भक्ति का प्रतीक बना।
    • यह धार्मिक त्योहारों, सामाजिक समारोहों और राष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत होता है।
    • आधुनिक संदर्भ में, यह भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में शामिल है और वैश्विक स्तर पर सराहा जाता है।

26. कुचिपुड़ी किस राज्य का शास्त्रीय नृत्य है? [MTS (T-I) 17 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) आंध्र प्रदेश
Solution:
  • कुचिपुड़ी नृत्य शैली की उत्पत्ति आंध्र प्रदेश राज्य में हुई। कुचिपुड़ी नृत्य का नाम आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित कुचिपुड़ी से लिया गया है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • कुचिपुड़ी की उत्पत्ति आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के दिवि तालुक में स्थित कुचिपुड़ी गाँव से हुई, जिसके नाम पर ही इसका नाम पड़ा।
    • 15वीं-17वीं शताब्दी में सिद्धेंद्र योगी ने इसे औपचारिक रूप दिया, जब ब्राह्मण पुरुष कलाकार मंदिरों में नृत्य-नाटक के माध्यम से भक्ति रस पूर्ण कथाएँ प्रस्तुत करते थे।
    • शुरू में यह पुरुष-प्रधान था, लेकिन 20वीं शताब्दी में बालासरस्वती और यामिनी कृष्णमूर्ति जैसी नर्तकियों ने इसे महिलाओं तक लोकप्रिय बनाया।
  • विशेषताएँ और शैली
    • यह नृत्य नृत्य, नाटक, संगीत और अभिनय का अनूठा संगम है, जिसमें भरतनाट्यम से प्रेरित सुंदर मुद्राएँ, जटिल फुटवर्क और तेज़ घुमाव शामिल हैं।
    • प्रदर्शन कर्नाटक शास्त्रीय संगीत पर आधारित होता है, जिसमें नृत्य (नृत्य), अभिनय (नाट्य) और शाब्दिक गायन (नृत्य) का मिश्रण होता है।
    • विशिष्ट आइटम जैसे तरंगम (गीत पर चित्रण), मंडुक शब्दम (मेंढक की भाँति फुटवर्क) और भामा कलापम (नाटकीय संवाद) इसे जीवंत बनाते हैं।
    • कलाकार अक्सर मंच पर तेल के दिए जलाते हुए प्रवेश करते हैं।
  • प्रदर्शन तत्व
    • संगीत: कर्नाटक राग और ताल पर आधारित, तिल्लाना और पदम जैसे रूपों के साथ।
    • वेशभूषा: पुरुष चमकीले पगड़ी और धोती, महिलाएँ चटकीले घाघरा, आभूषण और मेकअप के साथ।
    • मुद्राएँ: हस्तमुद्राएँ रामायण-महाभारत की कथाओं को अभिव्यक्त करती हैं।
    • थीम्स: विष्णु अवतार, कृष्ण लीला और भक्ति रस प्रधान।
  • प्रसिद्ध कलाकार
    • राधा रेड्डी, चित्रलेखा, यामिनी कृष्णमूर्ति और स्वप्नसुंदरी ने इसे वैश्विक पहचान दिलाई।
    • आधुनिक समय में शोभा नायडू और यंदुमूर्ति परिवार ने परंपरा को जीवित रखा।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • कुचिपुड़ी वैष्णव भक्ति से जुड़ा है और मंदिर उत्सवों से मंच कला तक विकसित हुआ।
    • कुचिपुड़ी गाँव आज भी वार्षिक उत्सव आयोजित करता है
    • जो इसे जीवंत रखता है। यह नृत्य भारतीय कला की एकता का प्रतीक है।

27. कुचिपुड़ी नृत्य शैली की उत्पत्ति भारत के निम्नलिखित में से किस राज्य में हुई? [CGL (T-I) 13 दिसंबर, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) आंध्र प्रदेश
Solution:
  • कुचिपुड़ी नृत्य शैली की उत्पत्ति आंध्र प्रदेश राज्य में हुई। कुचिपुड़ी नृत्य का नाम आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में स्थित कुचिपुड़ी से लिया गया है।
  • उत्पत्ति और स्थान
    • इसका नाम इसी गाँव के नाम पर पड़ा, जो कृष्णा जिले के दिवि तालुक में स्थित है।​
    • प्रारंभ में यह वैष्णव भक्ति से प्रेरित था
    • जिसमें भागवत पुराण की कथाएँ, विशेषकर भगवान कृष्ण की लीलाओं को अभिनय के माध्यम से दर्शाया जाता था।​
  • ऐतिहासिक विकास
    • सिद्धेंद्र योगी को कुचिपुड़ी को औपचारिक रूप देने का श्रेय दिया जाता है
    • जिन्होंने 17वीं शताब्दी में 'भामाकलापम' नामक नृत्य-नाटक की रचना की।​
    • शुरुआत में पुरुष-प्रधान यह शैली मंदिर अनुष्ठानों तक सीमित थी
    • लेकिन 20वीं शताब्दी में यामिनी कृष्णमूर्ति, रागा रेड्डी-राजा रेड्डी जैसे कलाकारों ने इसे मंचीय रूप दिया और महिलाओं को भी इसमें शामिल किया।​​
    • आज यह नृत्य संगीत, अभिनय और जटिल फुटवर्क का संगम है, जो नृत्य (नृत्य), अभिनय (नाट्य) और शुद्ध नृत्य (नृत) को जोड़ता है।
  • विशेषताएँ
    • आंदोलन शैली: तेज़ फुटवर्क, घूर्णन, मुद्राएँ और अभिव्यंजक हस्तांगों का प्रयोग; कलाकार कभी घंटी-बंधे पैरों पर संतुलन बनाते हैं।​
    • संगीत: तेलुगु पद्य, मृदंगम, वीणा और मंडलिन जैसे वाद्यों पर आधारित।​
    • विषयवस्तु: रामायण, महाभारत और कृष्ण लीला की कथाएँ, जैसे सत्यभामा की भूमिका।

28. कुचिपुड़ी शास्त्रीय नृत्य किस प्रकार के संगीत से संबंधित है? [CGL (T-I) 02 दिसंबर, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) कर्नाटक संगीत
Solution:
  • प्रश्नगत विकल्पों में कुचिपुड़ी शास्त्रीय नृत्य कर्नाटक संगीत से संबंधित है।
  • कर्नाटक संगीत का महत्व
    • कुचिपुड़ी के हर प्रदर्शन में कर्नाटक संगीत का उपयोग अनिवार्य होता है, जो दक्षिण भारत की प्राचीन परंपरा पर आधारित है।
    • यह संगीत रागों (मेलodic स्वर संयोजनों) और तालों (लयबद्ध चक्रों) पर केंद्रित होता है
    • जैसे आदि ताल या मिश्र चापु, जो नर्तक के जटिल फुटवर्क और मुद्राओं को सहारा देते हैं।
    • कर्नाटक संगीत की तात्कालिक (improvisational) प्रकृति नृत्य को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है
    • विशेषकर भक्ति रस वाली कृष्ण लीला या भागवत पुराण की कथाओं में।
    • इस संगीत का मूल सामवेद और नाट्यशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों से लिया गया है
    • जो इसे हिंदुस्तानी संगीत से अलग करता है—जहाँ उत्तर भारतीय नृत्य जैसे कथक इसका उपयोग करते हैं।
    • कुचिपुड़ी में संगीत न केवल पृष्ठभूमि होता है, बल्कि नाटकीय संवादों और अभिनय को भी समर्थन देता है।
  • संगीत वाद्ययंत्र
    • कुचिपुड़ी प्रदर्शन में कर्नाटक संगीत के लिए एक पूर्ण संगीत मंडली होती है:
    • मृदंगम: मुख्य ताल वाद्य, जो लय की जटिलताएँ पैदा करता है।
    • वायलिन: स्वरों को मधुरता से जोड़ता है, अक्सर गायक की सहायता करता है।
    • बांसुरी (वीणा या पुल्लांकल): हल्के, प्रवाहमयी स्वर जो कृष्ण भक्ति के भाव जगाते हैं।
    • घटम या मोरिसिंग: अतिरिक्त लय के लिए।
    • गायक (नाथस्वरम या पदम) पदचिंतनई या जवली जैसे गीत गाता है
    • जो नृत्य के tarangam (बाल संतुलन पर नृत्य) या sabdam (कथात्मक भाग) को निर्देशित करते हैं।
    • यह संयोजन नृत्य को एक समग्र नाट्य अनुभव बनाता है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ
    • कुचिपुड़ी की उत्पत्ति 17वीं शताब्दी में वैष्णव ब्राह्मणों से जुड़ी है, जब भगवत मेला नामक नृत्य-नाटक मंदिरों में किए जाते थे।
    • सिद्धेंद्र योगी ने इसका प्रथम ग्रंथ "भामाकलापम" रचा, जो कर्नाटक संगीत पर आधारित था।
    • आधुनिक कुचिपुड़ी में वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री जैसे गुरुओं ने संगीत को और परिष्कृत किया, इसे solo प्रदर्शनों के लिए ढालते हुए।
    • यह संगीत नृत्य की नारीय शैली (लास्य) और पुरुष प्रधान ऊर्जा (तांडव) दोनों को समाहित करता है, जैसे शिषु पांडवम में।​
  • प्रदर्शन संरचना में संगीत
    • एक पूर्ण कुचिपुड़ी recital इस प्रकार होता है:
    • पुष्पांजलि: मंगलाचरण, सरल राग-ताल में।
    • स्वरारोहण-अवरोहण: संगीत की आधारशिला स्थापित करना।
    • जातिस्वरम: शुद्ध नृत्य, ताल पर केंद्रित।
    • शब्दम: अभिनय प्रधान, संवादों सहित।
    • tarangam: बाल पर नृत्य, तेज लय में।

29. धनगर नृत्य ....... के धनगर समुदाय से संबंधित है। [MTS (T-I) 17 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) गोवा
Solution:
  • धनगर नृत्य एक लोक नृत्य है, जिसकी उत्पत्ति गोवा के धनगर चरवाहा समुदाय से हुई है।
  • यह नृत्य एक घेरे में किया जाता है और ढोल, ताशा और अन्य पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों की धुन के साथ किया जाता है।
  • उत्पत्ति और समुदाय
    • यह समुदाय महाराष्ट्र और गोवा में फैला हुआ है, लेकिन गोवा में यह नृत्य विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
    • नृत्य की जड़ें समुदाय की घुमंतू जीवनशैली, प्रकृति पूजा और स्थानीय देवताओं जैसे बिरूआ या बिरोबा के प्रति भक्ति में निहित हैं।
  • प्रदर्शन का समय और अवसर
    • यह नृत्य मुख्य रूप से जनवरी या फरवरी में आयोजित होने वाले वार्षिक धनगर मेले के दौरान प्रस्तुत किया जाता है।
    • इसके अलावा, नवरात्रि उत्सवों, ग्रामदेवताओं की पूजा (जैसे बिरोबा, खंडोबा, भैरोबा) और नवस फेड़ी (प्रतिज्ञा पूरी करने) के अवसरों पर भी किया जाता है।
    • समुदाय इसका उपयोग देवताओं का सम्मान करने, आशीर्वाद लेने, अच्छी फसल, वर्षा और गांव पर संकट टालने के लिए करता है।​
  • नृत्य शैली और तकनीक
    • नृत्य वर्तुलाकार घेरे में किया जाता है, जहां नर्तक एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर या कमर पर हाथ लपेटकर नाचते हैं।
    • पुरुषों की पोशाक: धोती, पगड़ी (फेटा), वास्कट या नेहरू शर्ट, गुडघों तक विजार (पैंट), रंगीन रूमाल या पट्टा हाथों और कमर में।
    • संगीत वाद्य: ढोल, ताशा, सनई, सूर, तुतारी, झांज, परडी आदि। ढोलवादक नृत्य का नेतृत्व करता है और उसकी ताल (टिपरी) पर नृत्य की गति बदलती है।
    • नृत्य में पदन्यास (पैरों की चाल) पर जोर होता है
    • जिसमें डावे-उजवे मोड़, रूमाल लहराना और गुणगुणाते हुए चाल शामिल है। यह जोशीला और तालबद्ध होता है, तीन घंटे तक चल सकता है।​
  • विभिन्न प्रकार और विशेषताएं
    • धनगर नृत्य के कई रूप हैं, जैसे धनगरी घाय, कापसी घाय, थोरली घाय, गळा मिठी घाय, रिंगन घाय, घोड घाय आदि।
    • प्रत्येक घाय 12-15 मिनट की होती है। कुल 50 से अधिक प्रकार बताए जाते हैं, लेकिन मुख्य 9-10 प्रचलित हैं।
    • यह केवल पुरुषों द्वारा किया जाता है और यात्रा-जात्राओं में स्पर्धाओं के रूप में प्रस्तुत होता है।
    • महाराष्ट्र के सांगोला तालुका में गजीढोल नाम से जाना जाता है, जो धनगर समाज का अभिन्न हिस्सा है।

30. ठुमरी गायकी की विशेषताओं के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा/से युग्म सुमेलित है/हैं? [C.P.O.S.I. (T-I) 09 नवंबर, 2022 (I-पाली)]

I. पूरब - मृदु और गंभीर

II. पंजाब - अत्यधिक चपल

Correct Answer: (b) I और II दोनों
Solution:
  • मुख्य रूप से ठुमरी गायन की दो शैलियां हैं-
  • पूर्वी (पूरब) बनारस शैली-मृदु और गंभीर (धीमी और स्थिर)
  • पंजाब शैली-अत्यधिक चपल (चंचल)
  • ठुमरी के मुख्य घराने बनारस और लखनऊ में स्थित हैं और ठुमरी गायन में सबसे प्रसिद्ध स्वर बेगम अख्तर का है।
  • ठुमरी की उत्पत्ति और प्रकृति
    • ठुमरी का उद्भव 18वीं-19वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के लखनऊ घराने से माना जाता है
    • जहां इसे नृत्य के साथ जोड़कर विकसित किया गया। यह खयाल या ध्रुपद जैसी शुद्ध शास्त्रीय शैलियों से भिन्न है
    • क्योंकि यहां राग की शुद्धता से अधिक कविता के बोलों, श्रृंगार रस और भावपूर्ण अभिनय पर जोर दिया जाता है।
    • ठुमरी में रागों का मिश्रण संभव होता है, जैसे खमाज, काफी, भैरवी, पीलू, झिजोटी आदि चपल रागों का प्रयोग आम है, और एक राग से दूसरे में संक्रमण की छूट मिलती है।
  • प्रमुख विशेषताएं
    • ठुमरी गायकी चपल, लयबद्ध और अभिनयपूर्ण होती है, जिसमें कम शब्दों वाले बोल होते हैं लेकिन इन्हें हाव-भाव, मींड, कण्ट स्वरों और बोल-तानों से विस्तार दिया जाता है।
    • भाव प्रधानता: श्रृंगार रस (रोमांटिक या भक्ति-रस में रूपांतरित) प्रमुख है; गीत प्रायः राधा-कृष्ण, विरहिणी की व्यथा या भक्ति पर आधारित होते हैं।
    • ताल और लय: दीपचंदी ताल, जट ताल, कहरवा या पंजाबी त्रिताल का प्रयोग; गति मध्यम से द्रुत होती है
    • लेकिन अति द्रुत नहीं। अंतरा से स्थायी लौटते समय लय परिवर्तन (जैसे कहरवा ताल में बोल-बनाव) आम है।
    • अंग शैलियां: पूरब अंग (लखनऊ घराना: सरल बोल-तानें, अभिनयपूर्ण), बनारस अंग (तीव्र गति, कम अभिनय), पंजाब अंग (टेढ़ी-मेढ़ी तानें)।​
    • संगत: तबला, पखावज, सारंगी, हारमोनियम; नृत्य (कथक) के साथ संयोजन।​
  • प्रसिद्ध गायक और उदाहरण
    • बेगम अख्तर, गिरिजा देवी, Rasoolan Bai (पूरब अंग), भाकजी, नाजिर अकबराबादी के बोल।
    • उदाहरण: "प्रिया चलो नंद के घर जाओ" (खमाज राग)। यह शैली स्त्री-प्रधान मानी जाती है लेकिन पुरुष भी गाते हैं।