सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-III

Total Questions: 50

31. वी. सत्यनारायण सरमा (V. Satyanarayana Sarma), जिन्हें 'सत्यम' के नाम से जाना जाता है, निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली से संबंधित हैं? [MTS (T-I) 17 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) कुचिपुड़ी
Solution:
  • वेदांतम सत्यनारायण सरमा, जिन्हें 'सत्यम' के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय शास्त्रीय नर्तक और कोरियोग्राफर थे
  • जिन्हें कई लोग कुचिपुड़ी के शास्त्रीय नृत्य के प्रमुख प्रतिपादकों में से एक मानते हैं।
  • वह कालिदास सम्मान, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप सहित कई सम्मानों के प्राप्तकर्ता थे। वर्ष 1970 में सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था।
  • जीवन परिचय
    • वी. सत्यनारायण सरमा (जन्म 1935 - मृत्यु 2012), जिन्हें वेदांतम सत्यनारायण सरमा या पॉपुलरली 'सत्यम' कहा जाता है
    • एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नर्तक, कोरियोग्राफर और गुरु थे। वे कुचिपुड़ी नृत्य को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित सरमा ने विशेष रूप से महिला भूमिकाओं (श्री-वेशम) में नृत्य के लिए ख्याति प्राप्त की।
  • कुचिपुड़ी नृत्य शैली
    • कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश के कुचिपुड़ी गाँव से उत्पन्न शास्त्रीय नृत्य है, जो संगीत नाटक अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त नौ शास्त्रीय नृत्यों में से एक है।
    • यह नृत्य-नाटक शैली जीवंत गतियों, जटिल फुटवर्क, तारंगम (पीतल की थाली पर नृत्य), अभिनय और भक्ति रस से भरपूर होती है।
    • सरमा ने इसकी शुद्धता बनाए रखते हुए आधुनिक कोरियोग्राफी जोड़ी, जिससे यह भरतनाट्यम या कथकली से अलग पहचान बनाई।
  • योगदान और विरासत
    • सरमा ने कुचिपुड़ी को एकल नृत्य से मंचीय प्रदर्शन तक विस्तार दिया। वे वेदांतम परिवार की परंपरा से थे
    • गुरु वेदांतम लक्ष्मीनारायण शर्मा के शिष्य। उन्होंने कई शिष्यों को प्रशिक्षित किया
    • जिनमें स्वर्ण कमल, शोभा नायडू जैसे नाम शामिल हैं।
    • उनकी कोरियोग्राफी ने हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित नृत्य नाटिकाओं को नया आयाम दिया।

32. कथक नृत्य का राष्ट्रीय संस्थान ....... में स्थित है। [MTS (T-I) 17 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) नई दिल्ली
Solution:
  • कथक नृत्य का राष्ट्रीय संस्थान, जिसे कथक केंद्र के नाम से भी जाना जाता है
  • नई दिल्ली में स्थित है। यह कथक के भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूप के लिए नृत्य संस्थान है।
  • स्थान और स्थापना
    • यह एक स्वायत्त संस्थान है जो कथक नृत्य के प्रशिक्षण, प्रदर्शन और संरक्षण पर केंद्रित है।
    • दिल्ली में होने के कारण यह राष्ट्रीय स्तर पर कथक को बढ़ावा देने का केंद्र बना हुआ है।​
  • कथक नृत्य का महत्व
    • कथक भारत के आठ शास्त्रीय नृत्य रूपों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति उत्तर भारत के मंदिरों और कथा वाचकों से मानी जाती है।
    • 'कथक' शब्द संस्कृत के 'कथा' से आया है, जो कहानी कहने को दर्शाता है।​
    • इसमें जटिल पदचाप (तात्कार), घुमावदार चाल (चक्कर), अभिनय (अभिनय) और भावपूर्ण मुद्राओं का समावेश होता है।
    • मुगल काल में इसका विकास हुआ, और यह लखनऊ, जयपुर तथा बनारस घरानों के लिए प्रसिद्ध है।
  • संस्थान की गतिविधियाँ
    • कथक केंद्र महत्वाकांक्षी नर्तकों के लिए गहन प्रशिक्षण कोर्स चलाता है, जिसमें डिप्लोमा और सीनियर कोर्स शामिल हैं।
    • यह वार्षिक प्रदर्शन, कार्यशालाएँ, सेमिनार और राष्ट्रीय स्तर के समारोह आयोजित करता है।
    • संस्थान अनुभवी कलाकारों को मंच प्रदान करता है तथा युवा प्रतिभाओं का संवर्धन करता है।
    • इसके अलावा, यह कथक की परंपराओं का दस्तावेजीकरण भी करता है।​
  • अन्य संबंधित संस्थान
    • ध्यान दें कि उत्तर प्रदेश में लखनऊ में एक अलग राष्ट्रीय कथक संस्थान (National Kathak Institute) है
    • जो 1988-89 में स्थापित हुआ। यह कथक के घरानों का अभिलेखीकरण, युवा प्रोत्साहन और प्रदर्शन पर फोकस करता है।
    • हालाँकि, प्रश्न में "राष्ट्रीय संस्थान" सामान्यतः दिल्ली के कथक केंद्र को ही संदर्भित करता है, जो अधिक प्रसिद्ध और केंद्रीय है।

33. कुमारी कमला को वर्ष 1970 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्हें किस शास्त्रीय नृत्य शैली के लिए जाना जाता था? [MTS (T-I) 16 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) भरतनाट्यम
Solution:
  • कुमारी कमला, भारत की एक प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना थीं।
  • इस नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1970 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
  • भरतनाट्यम से जुड़ाव
    • भरतनाट्यम भारत की सबसे पुरानी शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है
    • जिसकी उत्पत्ति तमिलनाडु के मंदिरों से मानी जाती है।
    • कुमारी कमला ने इस नृत्य को विशेष रूप से वाझुवूर शैली में अपनाया, जो तमिलनाडु के वाझुवूर गांव से विकसित हुई।
    • इस शैली के संस्थापक गुरु पांडानल्लूर मीनाक्षीसुंदरम पिल्लई और वाझुवूर रमैय्या पिल्लै थे
    • जिनकी शिष्या कमला ने इसकी कोमलता, जटिल फुटवर्क, अभिव्यंजक मुद्राओं और भावपूर्ण अभिनय को विश्व स्तर पर पहुंचाया।
  • वाझुवूर बानी की विशेषताएं
    • वाझुवूर भरतनाट्यम की यह शैली अपनी सुंदर चाल, लयबद्ध फुटवर्क, हस्त मुद्राओं, नेत्र और मुख की अभिव्यक्तियों के लिए प्रसिद्ध है।
    • यह सदीर नृत्य (मंदिर परंपरा) से विकसित होकर मंचीय प्रस्तुतियों के लिए अनुकूलित हुई।
    • कमला के प्रदर्शनों में पौराणिक कथाओं की कहानियां भावनाओं के माध्यम से जीवंत हो उठती थीं, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं।
  • जीवन और योगदान
    • कमला ने बचपन में फिल्मों में भी नृत्य किया, लेकिन शास्त्रीय नृत्य पर उनका मुख्य फोकस रहा।
    • वे गुरु वाझुवूर रमैय्या पिल्लै की प्रमुख शिष्या थीं और भरतनाट्यम को वैश्विक मंच प्रदान करने में अग्रणी रहीं।
    • 2025 में 91 वर्ष की आयु में कैलिफोर्निया में उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी विरासत नृत्य विद्यालयों और शिष्यों के माध्यम से जीवित है।
    • उन्होंने सदीर से आधुनिक भरतनाट्यम के संक्रमण काल को देखा और इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

34. सुधा चंद्रन एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और एक कुशल ....... नर्तकी हैं। [C.P.O.S.I. (T-I) 09 नवंबर, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) भरतनाट्यम
Solution:
  • सुधा चंद्रन एक प्रसिद्ध अभिनेत्री और एक कुशल भरतनाट्यम नर्तकी (नृत्यांगना) हैं।
  • प्रारंभिक जीवन
    • मात्र 3 साल की उम्र से उन्होंने भरतनाट्यम नृत्य सीखना शुरू कर दिया और 15 साल की उम्र तक 75 से अधिक नृत्य प्रदर्शन कर चुकी थीं।
    • उनके पिता के.डी. चंद्रन और माता सुधमनी थे, जो उन्हें नृत्य के प्रति प्रोत्साहित करते थे।​
  • दुर्घटना और संघर्ष
    • 1981 में, 16 साल की उम्र में तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के पास एक सड़क दुर्घटना में उनका दायां पैर गंभीर रूप से संक्रमित हो गया
    • जिसे काटना पड़ा। इस हादसे ने उनके नृत्य करियर को खतरे में डाल दिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
    • जयपुर फुट (कृत्रिम पैर) लगवाकर कठिन अभ्यास किया, जिसमें शुरुआत में खून बहना और दर्द जैसी परेशानियां आईं।​
  • नृत्य में वापसी
    • 28 जनवरी 1984 को मुंबई के साउथ इंडिया वेलफेयर सोसाइटी में उन्होंने प्रीति नामक नृत्यांगना के साथ पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया, जो जबरदस्त सफल रहा।
    • इसके बाद उन्होंने भारत और विदेशों जैसे सऊदी अरब, अमेरिका, यूके, कनाडा, यूएई आदि में सैकड़ों शो किए। वह सुधा चंद्रन एकेडमी चलाती हैं, जहां भरतनाट्यम सिखाया जाता है।​
  • अभिनय करियर
    • सुधा ने 1986 में मलयालम फिल्म मायूरी से डेब्यू किया, जो उनकी जिंदगी पर आधारित थी और राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
    • हिंदी सिनेमा में खड्गं जैसी फिल्में कीं, लेकिन टीवी पर क्योंकि सास भी कभी बहू थी
    • कहानी घर घर की, बिग बॉस आदि से घर-घर प्रसिद्ध हुईं। वह मोटिवेशनल स्पीकर भी हैं।
  • निजी जीवन
    • 1990 में उन्होंने लावण्या के निर्देशक रवि डांग से शादी की, जो अब उनके मैनेजर हैं।
    • उनका कोई जैविक बच्चा नहीं है, लेकिन उन्होंने एक बेटी को गोद लिया। वर्तमान में उनकी उम्र लगभग 60 वर्ष है।​
  • उपलब्धियां
    • भरतनाट्यम में विशेषज्ञता के लिए कई पुरस्कार।
    • फिल्म मायूरी के लिए विशेष राष्ट्रीय पुरस्कार।
    • प्रेरणादायक जीवन के लिए पद्म श्री की चर्चा, हालांकि मुख्य रूप से नृत्य और अभिनय में सम्मानित।
  • विरासत
    • सुधा चंद्रन दृढ़ता की मिसाल हैं
    • जिन्होंने अपंगता के बावजूद नृत्य और अभिनय में शिखर हासिल किया। उनका जीवन लाखों लोगों को प्रेरित करता है।​​

35. निम्नलिखित में से कौन-सा नृत्य भारत के जम्मू और कश्मीर का एक लोक नृत्य है? [MTS (T-I) 16 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) रऊफ
Solution:
  • रऊफ (Rauf), जम्मू और कश्मीर का प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जो रऊफ जनजाति द्वारा किया जाता है।
  • कश्मीरी लोगों के इस प्रसिद्ध लोक नृत्य को उमहल कहा जाता है। यह विशिष्ट अवसरों और निर्धारित स्थानों पर किया जाता है।
  • प्रमुख लोक नृत्य
    • जम्मू और कश्मीर के लोक नृत्य क्षेत्रीय विविधता को प्रतिबिंबित करते हैं
    • जैसे कश्मीर घाटी में रऊफ और डुमाल, जबकि जम्मू क्षेत्र में कूड और डोगरी।
    • रऊफ (Rouf): महिलाओं द्वारा किया जाने वाला प्राचीन नृत्य, जो ईद और विवाहों पर होता है
    • नर्तकियां कमर पकड़कर गोल घेरे बनाती हैं और चक्रि नामक जटिल पैरों की चाल दिखाती हैं।​​
    • डुमाल (Dumhal): वट्टल जनजाति द्वारा पुरुष नर्तक लंबे-लंबे बालों वाली मूर्तियों के साथ प्रस्तुत करते हैं; ध्वज लगाकर नृत्य होता है।
    • कूड (Kud): ग्रामीणों द्वारा फसल सुरक्षा के लिए ग्रामदेवता को धन्यवाद में किया जाता है; पुरुष सफेद कुर्ता-पाजामा और पगड़ी पहनते हैं।​​
    • ये नृत्य संतूर, ढोल, बांसुरी जैसे वाद्यों के साथ प्रस्तुत होते हैं।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ये नृत्य कश्मीरी संस्कृति की जीवंतता को जीवंत करते हैं, जहां रऊफ शांति और एकता का प्रतीक है
    • जबकि कूड प्रकृति के प्रति आभार दर्शाता है। विवाहों में हाफिजा और भांड जशन जैसे नृत्य खुशी बढ़ाते हैं।
    • क्षेत्रीय पहनावे जैसे फेरान, चुरidar और आभूषण इन्हें और आकर्षक बनाते हैं।​
  • प्रदर्शन विशेषताएं
    • नृत्यों में सहजता प्रमुख है; उदाहरणस्वरूप, रऊफ में कविताओं की ताल पर नर्तकियां आगे-पीछे हिलती हैं।
    • डोगरी नृत्य पंजाबी गिद्ढा जैसा है, जो जम्मू के डुग्गर क्षेत्र में लोकप्रिय।
    • वर्षा ऋतु में कूड का प्रदर्शन प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा हेतु होता है। ये नृत्य पर्यटन को भी बढ़ावा देते हैं।​

36. निम्नलिखित में से कौन-सा नृत्य, युद्ध के हिंदू देवता, मुरुगन की अनुष्ठानिक पूजा के दौरान भक्तों द्वारा किया जाने वाला एक नृत्य है? [MTS (T-I) 16 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) कावड़ी अट्टम
Solution:
  • कावड़ी अट्टम का त्योहार एक धार्मिक लोक नृत्य है, जिसे तमिलनाडु के हिंदू धर्म के लोग मनाते हैं। इस त्योहार में युद्ध के देवता भगवान मुरुगन की पूजा की जाती है।
  • भगवान मुरुगन का परिचय
    • भगवान मुरुगन (जिन्हें कार्तिकेय, स्कंद या सुब्रह्मण्य भी कहा जाता है) हिंदू धर्म में युद्ध, विजय और बुद्धि के देवता हैं.
    • तमिलनाडु में उनकी पूजा विशेष रूप से लोकप्रिय है, जहां वे मोर के वाहन के रूप में पूजे जाते हैं.
    • उनकी पूजा थाईपुसम और स्कंद शष्ठी जैसे त्योहारों में भव्य रूप से होती है, जिसमें भक्त कठोर तपस्या और नृत्य करते हैं.​
  • कावड़ी अट्टम क्या है?
    • कावड़ी अट्टम एक धार्मिक लोक नृत्य है, जिसका शाब्दिक अर्थ "कावड़ी बोझा लेकर नृत्य करना" है.
    • यह मुख्य रूप से पुरुष भक्तों द्वारा किया जाता है, जो कंधों पर कावड़ी (एक अर्धचंद्राकार सज्जित लकड़ी या धातु का बोझा) ढोते हुए नाचते हैं.
    • कावड़ी में दूध, चावल, फूल या मूर्तियां भरी जाती हैं, जो मुरुगन को समर्पित चढ़ावा होती हैं; इसे मंदिर तक ले जाते समय भक्त ट्रान्स में नृत्य करते हैं.​
  • प्रदर्शन का तरीका
    • भक्त शरीर पर हुक, भाले या स्पीयर चुभोकर या कावड़ी को कंधों से बांधकर तीर्थयात्रा करते हैं, फिर तेज़ ढोल, नगाड़े और शंख की ध्वनि पर नृत्य करते हैं.​
    • वेशभूषा में पीले वस्त्र, रंगीन पगड़ी, मोर पंखों वाली टोपी और शरीर पर भस्म लगाई जाती है, जो मुरुगन की शस्त्रों की नकल करती है.
    • नृत्य में घुमावदार कदम, कूदना और कावड़ी को हिलाना शामिल होता है, जो भक्ति की चरम अवस्था को दर्शाता है.​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • यह नृत्य तमिलनाडु के मुरुगन मंदिरों जैसे पलानी, तिरुच्चेंदूर और पचमलई में थाईपुसम उत्सव के दौरान किया जाता है.
    • मान्यता है कि इससे भगवान मुरुगन का आशीर्वाद मिलता है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं; यह तपस्या, समर्पण और सामुदायिक एकता का प्रतीक है.
    • इसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में मान्यता मिली है, जो द्रविड़ भक्ति परंपरा को जीवंत रखता है.​
  • अन्य संबंधित नृत्य
    • कुछ स्रोत मयिलाट्टम (मोर नृत्य) का भी उल्लेख करते हैं, जो मुरुगन के मोर वाहन की नकल करता है, लेकिन यह मुख्य रूप से महिलाओं या नर्तकियों द्वारा मंदिरों में किया जाता है.
    • कावड़ी अट्टम विशिष्ट रूप से "अनुष्ठानिक पूजा के दौरान भक्तों द्वारा" (devotees during ceremonial worship) कावड़ी ढोने से जुड़ा है, जबकि मयिलाट्टम अलग लोक नृत्य है.​
    • दोनों तमिलनाडु से हैं, लेकिन प्रश्न के संदर्भ में कावड़ी अट्टम सटीक उत्तर है.​

37. शोवना नारायण एक प्रसिद्ध ....... नृत्यांगना हैं। [MTS (T-I) 15 मई, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 17 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) कथक
Solution:
  • शोवना नारायण एक प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना हैं। शोवना नारायण को नृत्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले हैं, जिनमें पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार शामिल हैं।
  • प्रारंभिक जीवन
    • जो स्वयं एक प्रसिद्ध कथक गुरु थीं। बाद में उन्होंने कथक के महान गुरु पंडित बिरजू महाराज से गहन प्रशिक्षण लिया, जिसने उनकी नृत्य शैली को परिपक्वता प्रदान की।
  • नृत्य करियर
    • शोवना नारायण ने 1970 के दशक से कथक नृत्य में अपनी पहचान बनाई। वे न केवल एक उत्कृष्ट नर्तकी हैं
    • बल्कि कोरियोग्राफर, लेखिका और शिक्षिका के रूप में भी जानी जाती हैं। उन्होंने विश्व भर में प्रदर्शन किए
    • जिसमें अमेरिका, यूरोप और एशिया के प्रमुख नृत्य समारोह शामिल हैं। एक अनोखी उपलब्धि यह है
    • उन्होंने भारतीय सिविल सेवा (लेखा परीक्षा विभाग) में वरिष्ठ अधिकारी के रूप में पूर्णकालिक करियर के साथ-साथ नृत्य को समर्पित रखा और 2010 में सेवानिवृत्त हुईं।
  • प्रमुख योगदान
    • शोवना ने कथक की प्राचीनता को प्रमाणित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • संस्कृत और अभिलेखागार विशेषज्ञ डॉ. के.के. मिश्रा के सहयोग से उन्होंने सिद्ध किया कि कथक नृत्य चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से अस्तित्व में था।
    • उन्होंने 'खजुराहो मंदिरों का नृत्य' नामक वीडियो जारी किया और 'शकुंतला' में कथक की एकल कथा-वाचन परंपरा को पुनर्जीवित किया।
    • इसके अलावा, उन्होंने विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस, रामाना महर्षि और महात्मा गांधी जैसे आध्यात्मिक व्यक्तियों पर नृत्य रचनाएं बनाईं।
  • पुरस्कार और सम्मान
    • उनके योगदान के लिए शोवना नारायण को पद्म श्री, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए।
    • वे कथक को जटिल कदमताल, लयबद्ध गतियों और अभिनय के माध्यम से वैश्विक पहचान दिलाने में अग्रणी रहीं।
  • सामाजिक कार्य
    • शोवना सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील रही हैं। उन्होंने कारगिल शहीदों के परिवारों, सुनामी और बिहार बाढ़ प्रभावितों की सहायता की।
    • महिलाओं के खिलाफ हिंसा और विकलांग व्यक्तियों के मुद्दों पर भी उन्होंने सक्रिय योगदान दिया। आज भी वे कथक की शिक्षा और संवर्धन में लगी हुई हैं।

38. 'चरकुला (Charkula)' निम्नलिखित में से किस राज्य से संबंधित एक प्रसिद्ध नृत्य शैली है? [MTS (T-I) 15 मई, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 15 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) उत्तर प्रदेश
Solution:
  • चरकुला नृत्य उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र से संबंधित है।
  • इसमें नृत्यांगना अपने सिर पर जलते हुए ते हुए दीपकों का मुकुट सरीखा धारण कर जटिल भाव-भंगिमाओं को प्रदर्शित करती हैं।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • एक कथा के अनुसार, श्रीमती राधारानी के जन्म पर उनकी नानी मुखरा देवी ने सिर पर चरखी (दीपों वाली चाकरा) रखकर नृत्य किया था
    • जो होली के तीसरे दिन (राधा अष्टमी) मनाया जाता है। दूसरी कथा कृष्ण की गोवर्धन लीला से जोड़ती है
    • जहां नर्तकियां चरकुला को सिर पर उठाकर पहाड़ उठाने का प्रतीक चित्रित करती हैं।
    • 1845 में मुखरई के श्री प्यारे लाल जी ने इसे आधुनिक रूप दिया
    • लगभग 40 किलो वजनी, 5 स्तरों वाला लकड़ी का ढांचा जिसमें 108 दीपक जलाए जाते हैं।
  • प्रदर्शन शैली
    • महिलाएं ही यह नृत्य करती हैं, सिर पर भारी चरकुला संतुलित रखते हुए कृष्ण भक्ति गीतों पर जटिल चालें चलती हैं।
    • वेशभूषा में लंबी घाघरा, रंग-बिरंगा कढ़ाई वाला चोली और घूंघट होता है।
    • नृत्य में तेज घुमाव, पैरों की थाप और दीपकों की चमक दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती है, जो कौशल और अभ्यास की मांग करता है।
  • महत्वपूर्ण अवसर
    • यह मुख्यतः होली, राधा अष्टमी और ब्रज होली के अंतिम दिन मुखरई के मदन मोहन मंदिर के पास होता है।
    • ब्रज क्षेत्र के शुभ अवसरों पर लोकप्रिय, अब सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विदेशों (मॉरीशस से शुरू, 1992 में) में भी फैल चुका है।
    • उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक, यह जीवनशैली और कृष्ण कथाओं को जीवंत करता है।

39. लच्छू महाराज ....... के एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नर्तक और नृत्य-निर्देशक (choreographer) थे। [MTS (T-I) 12 मई, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 15 मई, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 12 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) कथक
Solution:
  • लच्छू महाराज एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नर्तक और कोरियोग्राफर थे, जिन्हें कथक के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए जाना जाता है।
  • जन्म और प्रारंभिक जीवन
    • पंडित लच्छू महाराज का असली नाम बैजनाथ प्रसाद (या बाजीनाथ प्रसाद) था।
    • उनका जन्म 1901 में लखनऊ (कुछ स्रोतों में वाराणसी का उल्लेख) में एक संगीत और नृत्य परिवार में हुआ था।
    • उन्हें नृत्य की शिक्षा अपने पिता कालिका प्रसाद, चाचा बिन्दादीन महाराज और बड़े भाई अच्छन महाराज से मिली।
    • बचपन से ही लखनऊ घराने की परंपरा में प्रशिक्षित होकर वे जल्दी ही प्रतिष्ठित कलाकार बन गए।​
    • लखनऊ में उनके प्रथम प्रदर्शन ने ही सबको प्रभावित कर दिया, जिससे उनका भविष्य उज्ज्वल दिखा।​
  • परिवार और गुरु
    • वे लखनऊ के प्रसिद्ध कथक घराने से थे, जहां उनके भाई शंभू महाराज और अच्छन महाराज भी प्रमुख नर्तक थे।​
    • गुरुओं में बिन्दादीन महाराज और अच्छन महाराज का विशेष स्थान था, जिन्होंने उन्हें जटिल कदमताल, चालें और अभिनय सिखाया।
    • यह परिवारीय परंपरा ने कथक को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।​
  • नृत्य शैली और विशेषताएं
    • लच्छू महाराज लखनऊ घराने के रत्न थे, जिनकी शैली में जटिल तालें, सुंदर चालें और मुख अभिनय का अनोखा समन्वय था।
    • वे कथक के प्रतिपादक (exponent) थे, जो प्रदर्शनों में भावपूर्णता और तकनीकी निपुणता का प्रदर्शन करते थे।​
    • उनके नृत्य में लयबद्धता और अभिव्यक्ति ऐसी थी जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती।​
  • प्रमुख कार्य और योगदान
    • मुंबई移移后 उन्होंने फिल्म उद्योग में प्रवेश किया, जहां कथक को आम दर्शकों तक पहुंचाया।​
    • उन्होंने फिल्मों जैसे महल (1949), मुग़ल-ए-आज़म (1960), छोटी छोटी बातें (1965) और पाकीज़ा (1972) में नृत्य दृश्यों की कोरियोग्राफी की।
    • इसके अलावा, गौतम बुद्ध, चंद्रावली और भारतीय किसान जैसे नाटकों में भी उनका योगदान रहा; वे उत्तर प्रदेश सरकार के कथक केंद्र के संस्थापक निदेशक भी थे।​
  • पुरस्कार और सम्मान
    • 1957 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।​
    • यह पुरस्कार उनके कथक क्षेत्र में अतुलनीय योगदान को मान्यता देता है।​
  • मृत्यु और विरासत
    • लच्छू महाराज का निधन 19 जुलाई 1978 (या 1978 में) को लखनऊ के मेंगई में हुआ।
    • उनकी विरासत आज भी फिल्मों के नृत्य दृश्यों और कथक की नई पीढ़ी में जीवित है, खासकर मुग़ल-ए-आज़म और पाकीज़ा जैसे क्लासिक्स में।​
    • उन्होने कई शिष्यों को प्रशिक्षित किया, जो कथक को आगे बढ़ा रहे हैं।

40. यक्षगान निम्नलिखित में से किस राज्य से संबंधित एक प्रसिद्ध लोकनृत्य है? [MTS (T-I) 12 मई, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) कर्नाटक
Solution:
  • 'यक्षगान' कर्नाटक राज्य से जुड़ा एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है। यक्षगान एक पारंपरिक नृत्य शैली है
  • जिसका आयोजन मुख्यतः कर्नाटक के तटीय जिलों में होती है। हालांकि इस लोकनृत्य का आयोजन केरल के कासरगोड जिले में भी होता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • यक्षगान की जड़ें कर्नाटक के तटीय जिलों जैसे उडुपी, दक्षिण कन्नड़ और मालेनाडु क्षेत्र में हैं।
    • यह लगभग 800 वर्ष पुरानी परंपरा है, जो रामायण, महाभारत और पुराणों की कहानियों पर आधारित है।
    • शुरुआत में केवल पुरुष कलाकार इसमें भाग लेते थे, लेकिन अब महिलाएं भी शामिल हो रही हैं।
  • प्रदर्शन शैली
    • यक्षगान रात्रि भर चलने वाला नाटकीय प्रदर्शन होता है, जिसमें 15-20 कलाकार, एक भागवत (कथाकार) और मत्ती (ड्रम वादक) शामिल होते हैं।
    • कलाकार चटकीले रंगों वाले विस्तृत वेशभूषा, विशाल मुकुट और श्रृंगार पहनते हैं, जो पात्रों को जीवंत बनाते हैं।
    • संगीत कर्नाटक शैली से प्रेरित लेकिन स्वतंत्र है, जिसमें चेंडा ड्रम प्रमुख भूमिका निभाता है।​
  • विशेषताएं
    • विषयवस्तु: देवताओं, राक्षसों और महाकाव्यों के युद्ध दृश्य; सूत्रधार और विदूषक मुख्य पात्र।
    • भाषा: मुख्यतः कन्नड़ या तुलु, संवादों में विनोद और विद्वता का मिश्रण।
    • मंच: खेतों, मंदिरों या गांवों के चौराहों पर, दर्शकों के बीच।
  • महत्व और लोकप्रियता
    • कर्नाटक में प्रतिवर्ष 10,000 से अधिक यक्षगान प्रदर्शन होते हैं, जो महोत्सवों, स्कूलों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचे हैं।
    • यह कथकली जैसा है लेकिन अधिक लोक-उन्मुख, और भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त शास्त्रीय रूप है।
    • आधुनिक समय में मुस्लिम कलाकार जैसे अर्शिया भी इसमें भाग ले रही हैं, जो समावेशिता दर्शाता है।