सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-III

Total Questions: 50

41. अरुणाचल प्रदेश का तापू नृत्य (Tapu dance) ....... के सदस्यों द्वारा किया जाता है। [MTS (T-I) 12 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) आदि जनजाति
Solution:
  • अरुणाचल प्रदेश का 'तापू नृत्य' (Tapu Dance) 'आदि जनजाति' के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
  • केवल पुरुष ही अरन के त्योहार के दौरान तापू युद्ध नृत्य करते हैं। यह नृत्य गांव से बुरी आत्माओं को दूर भगाने के लिए किया जाता है।
  • जनजाति और क्षेत्र
    • तापू नृत्य अरुणाचल प्रदेश की आदि जनजाति द्वारा किया जाता है, जो सियांग, ऊपरी सियांग और पूर्वी सियांग जिलों में मुख्य रूप से निवास करती है।
    • यह जनजाति अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है, और तापू नृत्य उनकी पहचान का प्रतीक है।​
  • इतिहास और उद्देश्य
    • मूल रूप से युद्ध नृत्य, तापू शिकार या युद्ध से पहले आशीर्वाद प्राप्त करने और सफलता के बाद विजय मनाने के लिए किया जाता है।
    • पुरुष नर्तक गांवों से बुरी आत्माओं को भगाने हेतु तलवार-ढाल लहराते हुए युद्ध दृश्यों का अभिनय करते हैं।
  • प्रदर्शन का समय
    • यह मुख्यतः अरण (उनयिंग अरान) उत्सव के दौरान मार्च में होता है, जो स्थानांतरित खेती की शुरुआत का प्रतीक है।
    • शिकार से लौटने पर परिवार के पुरुष सदस्य इसे प्रस्तुत करते हैं।​
  • शैली और वेशभूषा
    • नर्तक लंबी पंक्ति बनाकर जोरदार कदम, तलवार चलाने की मुद्राएं और युद्ध की गर्जनाएं प्रस्तुत करते हैं।
    • पारंपरिक युद्ध वेशभूषा में सिर की आकृति, रंगीन वस्त्र और हथियार पहने जाते हैं।​
  • संगीत और वाद्ययंत्र
    • ड्रम, झांझ, बांसुरी और गान के साथ लयबद्ध संगीत इसे और उत्साहपूर्ण बनाता है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • तापू आदि समुदाय की वीरता, इतिहास और एकता को दर्शाता है, जो अरुणाचल की जनजातीय विविधता को मजबूत करता है।

42. पंडित बिरजू महाराज को शास्त्रीय नृत्य की किस शैली के लिए पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था? [MTS (T-I) 11 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) कथक
Solution:
  • पंडित बिरजू महाराज कथक नृत्य से जुड़े थे। उन्हें पद्म विभूषण और फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • वर्ष 1964 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • कथक से जुड़ाव
    • पंडित बिरजू महाराज कथक नृत्य के लखनऊ घराने (कालका-बिंदादीन घराना) के प्रमुख प्रतिनिधि थे।
    • वे उत्तर भारत की इस शास्त्रीय नृत्य शैली के अग्रणी नर्तक, कोरियोग्राफर और गुरु थे
    • जिन्होंने कथक को जटिल कदमताल, तेज चक्कर, अंगविक्षेप और हावभाव के माध्यम से कहानी कहने की कला प्रदान की।
    • कथक की उत्पत्ति प्राचीन कथाकारों या कहानीकारों से मानी जाती है, और यह भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, मुख्यतः उत्तर प्रदेश से जुड़ा हुआ।
  • पद्म विभूषण पुरस्कार
    • उन्हें वर्ष 1986 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया
    • जो उनकी कथक नृत्य कला में अतुलनीय योगदान के लिए था।
    • यह पुरस्कार उनकी नृत्य प्रतिभा को मान्यता देता है, जिसमें ताल और घुँघुरुओं का अनोखा तालमेल शामिल था।
  • जीवन और विरासत
    • पंडित बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी 1938 को हुआ और उनका निधन 17 जनवरी 2022 को हुआ। वे महाराज परिवार से थे
    • जिसमें उनके चाचा शंभु महाराज और लच्छू महाराज जैसे कथक नर्तक शामिल थे।
    • उन्होंने चार वर्ष की आयु से नृत्य प्रारंभ किया और विश्व स्तर पर कथक को लोकप्रिय बनाया।
  • अन्य पुरस्कार
    • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1964): कथक के लिए।
    • राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (2013): सर्वश्रेष्ठ कोरियोग्राफी।
    • फिल्मफेयर पुरस्कार (2016): नृत्य कला के लिए।
    • कालिदास सम्मान और मानद डॉक्टरेट (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, खैरागढ़ विश्वविद्यालय)।

43. निम्नलिखित में से कौन 19वीं सदी में कथक नृत्य के प्रतिपादक हैं? [CHSL (T-I) 08 जून, 2022 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) कालिका प्रसाद
Solution:
  • 19वीं सदी में कथक नृत्य के प्रतिपादक कालिका प्रसाद हैं। इनके द्वारा लखनऊ में स्थापित घराने का नाम कालका-बिंदादीन घराना था
  • जिसे लखनऊ घराना कहा जाता है। पंडित बिरजू महाराज इसी घराने से संबंधित हैं।
  • कालका प्रसाद का योगदान
    • कालका प्रसाद ने बनारस में बसकर कथक नृत्य को बढ़ावा दिया और इसे ठुमरी गायन के साथ जोड़ा।
    • वे नृत्य के अलावा तबला, पखावज वादन और अभिनय में निपुण थे, खासकर श्रृंगार रस के प्रदर्शन में।
    • उनके प्रयासों से कथक कला-सौंदर्य के उच्च स्तर पर पहुंचा, जो मुगल काल के बाद अवध के नवाब वाजिद अली शाह के संरक्षण में चरम पर था।
  • कथक का ऐतिहासिक संदर्भ
    • कथक की उत्पत्ति कथाकारों से हुई, जो पौराणिक कथाएं नृत्य-गीत से सुनाते थे।
    • हां कालका प्रसाद जैसे कलाकारों ने लयकारी, भाव-प्रदर्शन और चक्कर जैसी तकनीकों को समृद्ध किया।
    • जयपुर घराने में पंडित बिंदा दीन महाराज जैसे समकालीनों ने भी योगदान दिया, लेकिन लखनऊ घराने में कालका प्रसाद का स्थान विशिष्ट है।
  • अन्य घराने और कलाकार
    • लखनऊ घराना: भाव और अभिनय प्रधान, वाजिद अली शाह के प्रभाव से।
    • जयपुर घराना: लयकारी पर जोर, पंडित कुंदन लाल गंगानी जैसे उत्तराधिकारी।
    • बनारस घराना: कालका प्रसाद से जुड़ा, ठुमरी का समावेश।
    • ये घराने कथक को यात्रा कथाकारों से शाही दरबारों तक ले गए
    • जहां 19वीं सदी में यह स्वर्ण युग था। कालका प्रसाद के बाद उनके वंशजों ने इसे और विस्तार दिया।​

44. कथकली ने ....... के संरक्षण में सत्रहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में आकार लिया था। [MTS (T-I) 11 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) कर्नाटक के राजकुमार
Solution:
  • कथकली एक शास्त्रीय नृत्य शैली है, जिसकी उत्पत्ति सत्रहवीं शताब्दी के दक्षिणी भारत के केरल राज्य में हुई थी।
  • इसका विकास कर्नाटक के राजकुमार के संरक्षण में किया गया था, जो कला एवं साहित्य के महान संरक्षक थे।
  • विकास का इतिहास
    • कथकली का मूल रूप रामनाट्टम से आया, जिसे कोट्टारक्करा थामपुरान (वीरा केरला वरमा) ने विकसित किया।
    • 17वीं शताब्दी में कोट्टायम थंपुरान ने इसे और नाटकीय बनाया, जिसमें नृत्य, संगीत, अभिनय और अनुष्ठान तत्व जोड़े गए। कर्नाटक के राजकुमार के प्रभाव से यह दक्षिणी केरल में परिपक्व हुआ
    • जहां मंदिरों में प्रदर्शन शुरू हुए।
  • प्रमुख विशेषताएं
    • वेशभूषा: चटकीले रंगों वाले विस्तृत वस्त्र, चेहरों पर चामायादी (प्राकृतिक रंगों का मेकअप)।
    • अभिनय: मुद्राओं (हाथों की भावभंगिमा), नेत्राभिनय (आंखों का उपयोग) और नृत्य पर आधारित, बिना संवाद के।
    • संगीत: मलयालम भाषा के पल्लवी और पदों पर आधारित, मृदंगम व इडक्का जैसे वाद्ययंत्र।
  • कला रूपों का संलयन
    • कथकली कूडियाट्टम, क्रिश्णनाट्टम और रामनाट्टम जैसे स्थानीय रूपों से प्रभावित है।
    • भरत मुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित, यह मार्शल आर्ट (कलारीपयट्टू) से भी प्रेरित है।
    • 20वीं शताब्दी में वल्लathol नारायण मेनन ने केरल कलामंडलम स्थापित कर इसका पुनरुद्धार किया।
  • आधुनिक स्थिति
    • आज कथकली वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त है, लेकिन पारंपरिक प्रशिक्षण चुनौतीपूर्ण है।
    • प्रमुख कलाकारों में कृष्णन कुट्टी और कलामंडलम रामंकर शामिल हैं। यह रात्रिकालीन प्रदर्शनों के लिए प्रसिद्ध है, जो 6-8 घंटे चलते हैं।

45. झिझिया किस राज्य का प्रसिद्ध लोकनृत्य है? [MTS (T-I) 11 मई, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 20 नवंबर, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 07 दिसंबर, 2020 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) बिहार
Solution:
  • 'झिझिया' बिहार राज्य के मिथिला क्षेत्र का प्रसिद्ध सांस्कृतिक लोक नृत्य है। झिझिया ज्यादातर दुर्गा, जो विजय की देवी हैं
  • उनके समर्पण में दशहरा (नवरात्रि) के समय किया जाने वाला नृत्य है। हालांकि बिहार के सिवान जिले का प्रमुख लोकनृत्य 'झिझिया', वर्षा के देवता इंद्र की स्मृति में मनाया जाता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • झिझिया भारतीय उपमहाद्वीप के मिथिला क्षेत्र का पारंपरिक सांस्कृतिक नृत्य है
    • जो मुख्य रूप से बिहार के उत्तरी भाग (मिथिलांचल) और नेपाल के तराई इलाके में देखा जाता है।
    • यह नृत्य दुर्गा पूजा और नवरात्रि के दौरान किया जाता है, जहां महिलाएं और कुंवारी कन्याएं भाग लेती हैं।
    • मिथिला की लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होने के कारण यह बिहार की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है।
  • प्रदर्शन की विधि
    • इस नृत्य में महिलाएं सिर पर छिद्रयुक्त मिट्टी के घड़े रखती हैं, जिनमें जलते दीपक होते हैं; घड़े के ऊपर भी एक दीपक रखा जाता है।
    • बिना हाथों का सहारा लिए वे गोलाकार घेरे में तालियां बजाते हुए थिरकती हैं, तेज गति के साथ पग घात और सामंजस्य बनाए रखती हैं।
    • संगीत में ढोलक, हारमोनियम, शहनाई, बांसुरी और ड्रम का उपयोग होता है
    • साथ ही लोकगीत गाए जाते हैं जो मायके की कामना और बुरी शक्तियों से रक्षा पर केंद्रित होते हैं।
  • सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व
    • झिझिया तंत्र-मंत्र से जुड़ा अनुष्ठानिक नृत्य है, जो शारदीय नवरात्रि के पहले से दसवें दिन तक चलता है।
    • यह देवी दुर्गा, लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को समर्पित है
    • नकारात्मक शक्तियों (जैसे डायन-जोगिन) से परिवार, खासकर बच्चों और मायके पक्ष की रक्षा के लिए किया जाता है।
    • लोक कथाओं में राजा चित्रसेन और उनकी रानी की प्रेम कथा से जुड़ा माना जाता है, जहां यह सुख-समृद्धि का प्रतीक बनता है।
  • लोक गीत और कथाएं
    • गीतों में मायके की भलाई की कामना प्रमुख होती है, जैसे "सबके दुअरिया झिझिया झकमक करई, भैया के दुअरिया अन्हार कुप हो ना।"
    • एक कथा के अनुसार, अष्टमी रात डायनें जादू से बच्चों को नुकसान पहुंचाती हैं
    • इसलिए यह नृत्य रक्षा का माध्यम है। सूखे या वर्षा के लिए भी प्रार्थना के रूप में गाया जाता है।​​
  • वर्तमान स्थिति
    • आजकल आधुनिक नृत्यों जैसे गरबा-डांडिया के प्रभाव से झिझिया विलुप्ति के कगार पर है
    • लेकिन मिथिला के ग्रामीण क्षेत्रों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जीवित है।
    • यह सामाजिक समरसता, महिला सशक्तिकरण और लोक आस्था को दर्शाता है।​​

46. झिझिया (Jhijhiya) बिहार का एक प्रसिद्ध लोक नृत्य है जिसे पौराणिक शहर मिथिला (Mithila) में किया जाता है। यह नृत्य केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है। संपूर्ण नवरात्रि में नौ रातों का यह त्योहार देवी ....... के तीन रूपों की पूजा करने के लिए मनाया जाता है। [MTS (T-I) 09 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती
Solution:
  • भारत के बिहार राज्य का झिझिया प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जिसे मिथिला क्षेत्र में किया जाता है।
  • यह नृत्य केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है। संपूर्ण नवरात्रि में नौ रातों का यह त्योहार देवी लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती के तीन रूपों की पूजा करने के लिए मनाया जाता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • झिझिया नृत्य मिथिला (मिथिलांचल) क्षेत्र में प्रचलित है, जो बिहार के मधुबनी, दरभंगा, सीतामढ़ी जैसे जिलों और नेपाल के कुछ भागों तक फैला हुआ है।
    • यह भोजपुरी क्षेत्रों में भी देखा जाता है और आश्विन मास (सितंबर-अक्टूबर) के दशहरा उत्सव के समय किया जाता है।​​
    • पौराणिक रूप से यह मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है, जहां महिलाएं इसे अनुष्ठानिक रूप से प्रस्तुत करती हैं।​​
  • नृत्य की विधि
    • महिलाएं और कुवारी लड़कियां 5 से 15 के समूह में सिर पर मिट्टी का घड़ा (झिझिया या झिझरी) रखकर नृत्य करती हैं।
    • घड़े में छोटे-छोटे छेद होते हैं, जिसमें जलता दीपक रखा जाता है, जो नृत्य के दौरान रोशनी बिखेरता है।​​
    • नृत्य रात्रि के दूसरे-तीनरे पहर में होता है, बारी-बारी से महिलाएं घड़ा संभालती हैं और लोकगीत गाते हुए ताल पर थिरकती हैं।​​
  • धार्मिक महत्व
    • यह नृत्य संपूर्ण नवरात्रि (नौ रातों) के दौरान देवी के तीन रूपों—लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती—की पूजा के लिए मनाया जाता है।
    • देवी दुर्गा को प्रसन्न करने, परिवार और बच्चों को बुरी शक्तियों, चुड़ैल, जादू-टोने से बचाने का उद्देश्य है।​
    • मान्यता है कि यदि कोई डायन घड़े के छेद गिन ले, तो नर्तकी को खतरा हो सकता है, इसलिए यह तांत्रिक सुरक्षा का प्रतीक है।
  • सांस्कृतिक विशेषताएं
    • झिझिया गीत भक्ति, लोककथाओं (जैसे राजा चित्रसेन-रानी प्रेमकथा) और जीवन संदेशों से भरे होते हैं।​​
    • यह महिला सशक्तिकरण, सामाजिक एकता और मिथिला संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम है।​​
    • नवरात्रि के अलावा छठ पूजा के समय भी इसका आयोजन होता है, जो समृद्धि और शांति लाता है।​
  • आधुनिक संदर्भ
    • आज झिझिया मिथिला की पहचान बन चुका है और उत्सवों में बड़े स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है।​
    • यह नृत्य बिहार की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है, जहां परंपरा और आस्था का संगम देखने को मिलता है।​

47. नवरात्रि के दौरान महिलाओं द्वारा किया जाने वाला एक प्रसिद्ध लोक नृत्य झिझिया, निम्नलिखित में से किस राज्य में एक लोकप्रिय त्योहार है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 3 दिसंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) बिहार
Solution:
  • भारत के बिहार राज्य का झिझिया प्रसिद्ध लोक नृत्य है, जिसे मिथिला क्षेत्र में किया जाता है।
  • यह नृत्य केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है। संपूर्ण नवरात्रि में नौ रातों का यह त्योहार देवी लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती के तीन रूपों की पूजा करने के लिए मनाया जाता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • झिझिया भारतीय उपमहाद्वीप के मिथिला क्षेत्र का पारंपरिक सांस्कृतिक नृत्य है
    • जो मुख्य रूप से बिहार राज्य (विशेषकर उत्तरी बिहार के मिथिला, कोशी और सीतामढ़ी क्षेत्रों) में प्रचलित है।
    • यह नृत्य कभी-कभी नेपाल के मिथिला क्षेत्र में भी देखा जाता है, लेकिन भारत में इसका सबसे प्रमुख केंद्र बिहार है।​
    • मिथिला को पौराणिक शहर के रूप में जाना जाता है, जहां यह नवरात्रि के नौ रातों तक चलने वाले उत्सव का अभिन्न अंग बन जाता है।
  • नवरात्रि से संबंध
    • नवरात्रि के दौरान झिझिया नृत्य देवी दुर्गा भैरवी (विजय की देवी), काली, लक्ष्मी, सरस्वती या पार्वती के रूपों की पूजा के लिए समर्पित होता है।
    • यह त्योहार नौ रातों तक चलता है और दशहरा या दुर्गा पूजा के समय चरम पर पहुंचता है; कभी-कभी छठ पूजा के आसपास भी किया जाता है।
    • सूखे के समय यह इंद्र देवता से वर्षा और अच्छी फसल की प्रार्थना के रूप में भी नृत्य किया जाता है, जो इसे कृषि-आधारित संस्कृति से जोड़ता है।
  • प्रदर्शन की विधि
    • महिलाएं और कुंवारी कन्याएं सिर पर मिट्टी के घड़े (झिझिया) रखकर नृत्य करती हैं, जिसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं और अंदर जलते दीपक रखे जाते हैं।
    • नृत्य तीव्र गति का होता है, जिसमें पारंपरिक वाद्ययंत्र जैसे ढोल, शहनाई, बांसुरी, हारमोनियम और ड्रम का उपयोग होता है।
    • लोकगीत मिथिला संस्कृति से जुड़े होते हैं, जो सामाजिक मुद्दों, आस्था, महिला सशक्तिकरण और बुरी शक्तियों से रक्षा की कामना व्यक्त करते हैं।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • झिझिया केवल नृत्य नहीं, बल्कि मिथिला-बिहार की लोक आस्था, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।​
    • यह अमीर-गरीब, पारंपरिक-आधुनिक सभी वर्गों को जोड़ता है और नर्तकियां देवी से सुरक्षा, आशीर्वाद व समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।​​
    • ग्रामीण क्षेत्रों में पूजा पंडालों और गांवों में यह उत्साहपूर्ण ढंग से मनाया जाता है, जो क्षेत्रीय लोकसंस्कृति को जीवंत रखता है।​​

48. कलामंडलम कल्याणिकुट्टी अम्मा (Kalamandalam Kaly-anikutty Amma) को वर्ष 1997-1998 के कालिदास सम्मान से सम्मानित किया गया था। वह किस भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली के लिए प्रसिद्ध थीं? [MTS (T-I) 11 मई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) मोहिनीअट्टम
Solution:
  • कलामंडलम कल्याणिकुट्टी अम्मा (Kalamandalam Kalyani Kutty Amma) को वर्ष 1997-1998 के कालिदास सम्मान से सम्मानित किया गया था।
  • वह दक्षिण भारत में केरल की एक मोहिनीअट्टम नृत्यांगना थीं।
  • प्रारंभिक जीवन
    • जहाँ संस्कृत ग्रंथों से प्रेरित होकर नृत्य सीखा और सिखाया।
    • उनके गुरु कोरट्टिक्कारा अप्पुरेदत्त कृष्ण पणिक्कर ने मोहिनीअट्टम की लगभग विलुप्त शैली में प्रशिक्षण दिया।
  • नृत्य प्रशिक्षण
    • कलामंडलम में उन्होंने मोहिनीअट्टम की कठोर शिक्षा प्राप्त की, जो केरल कलाओं को पुनर्जीवित करने के लिए स्थापित संस्थान था।
    • साथ ही, पत्तिक्कमथोदी रावुन्नी मेनन से कथकली भी सीखा, जिससे उनकी शैली में मजबूत भाव-भंगिमाएँ जुड़ीं।
    • 1940 में स्नातक होने के बाद चेन्नई और गुजरात में शिक्षण शुरू किया
    • मोहिनीअट्टम को लास्य (स्त्रीलिंग अनुग्रह), हस्त मुद्राओं, पदकम और अभिनय से औपचारिक रूप दिया।
  • मोहिनीअट्टम का पुनरुद्धार
    • 20वीं सदी की शुरुआत में मोहिनीअट्टम सामाजिक कलंक और राजकीय संरक्षण की कमी से ह्रास की ओर था।
    • कल्याणिकुट्टी अम्मा ने प्राचीन ग्रंथों से तकनीकों का पुनर्निर्माण कर इसे मुख्यधारा का शास्त्रीय नृत्य बनाया।
    • उन्हें आधुनिक मोहिनीअट्टम की माता कहा जाता है, जिन्होंने इसे आभूषण, रचना और महिला कलाकारों के लिए सम्मान प्रदान किया।
  • शिक्षण करियर
    • 1941 में कलामंडलम छोड़ने के बाद स्वतंत्र रूप से शिक्षण किया तथा 1952 में पति कलामंडलम कृष्णन नायर के साथ केरल कलालयम स्कूल स्थापित किया।
    • उनकी पोती स्मिथा राजन सहित कई पीढ़ियों ने उनसे प्रशिक्षण लिया। उन्होंने मोहिनीअट्टम के लहराते आंदोलनों पर जोर दिया
    • जो पौराणिक मोहिनी (विष्णु का अवतार) से प्रेरित है तथा केरल की भक्ति परंपरा पर आधारित।
  • पुरस्कार और विरासत
    • उन्हें 1997-98 में कालिदास सम्मान मध्य प्रदेश सरकार से भारतीय शास्त्रीय नृत्य के योगदान के लिए मिला।
    • अन्य सम्मान: पद्म श्री (1977), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1974)। 1999 में 84 वर्ष की आयु में त्रिपुनिथुरा में निधन हुआ।

49. सरोजा वैद्यनाथन (Saroja Vaidyanathan) को ....... में शास्त्रीय नृत्य के लिए कालिदास सम्मान मिला था। [MTS (T-I) 10 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) 2009-10
Solution:
  • सरोजा वैद्यनाथन को वर्ष 2009-10 के शास्त्रीय नृत्य के लिए कालिदास सम्मान प्राप्त हुआ था। यह पुरस्कार मध्य प्रदेश सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है।
  • पुरस्कार का विवरण
    • कालिदास सम्मान मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कला, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाने वाला प्रतिष्ठित वार्षिक पुरस्कार है।
    • यह प्राचीन संस्कृत कवि कालिदास के नाम पर 1980 से प्रदान किया जाता है
    • जो शुरू में द्विवाषिक रूप से शास्त्रीय संगीत, शास्त्रीय नृत्य, थिएटर और प्लास्टिक कला के चार क्षेत्रों में दिया जाता था।
    • 1986-87 से यह सालाना प्रदान होने लगा, और 2009-10 में सरोजा वैद्यनाथन को भरतनाट्यम में उनके योगदान के लिए यह सम्मान मिला, जो उसी वर्ष डॉ. एन. राजम के साथ साझा किया गया।
  • सरोजा वैद्यनाथन का जीवन और करियर
    • सरोजा वैद्यनाथन (जन्म: 19 सितंबर 1937) एक प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना, कोरियोग्राफर, गुरु और शिक्षिका थीं
    • जिन्होंने 1974 में दिल्ली में गणेश नाट्यालय की स्थापना की।
    • उन्होंने भरतनाट्यम को बढ़ावा देने के लिए अथक प्रयास किए, किताबें लिखीं जैसे "भारत के शास्त्रीय नृत्य: भरतनाट्यम - एक गहन अध्ययन" और कर्नाटक संगीत पर कार्य।
    • भारत सरकार ने उन्हें 2002 में पद्म श्री तथा 2013 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
    • वे संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और दिल्ली सरकार के साहित्य कला परिषद सम्मान की भी प्राप्तकर्ता रहीं। उनका निधन 2023 में हुआ।
  • पुरस्कार का महत्व
    • यह सम्मान सरोजा जी के भरतनाट्यम में महारत को रेखांकित करता है, जो तमिलनाडु से उत्पन्न भारत का सबसे पुराना शास्त्रीय नृत्य है
    • जिसमें जटिल पदकौतुक, अभिनय और कथा-कथन प्रमुख हैं।
    • 2009-10 का यह पुरस्कार उनके राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शनों, प्रशिक्षण और सांस्कृतिक प्रसार के माध्यम से नृत्य कला को समृद्ध करने वाले कार्य को मान्यता देता है।

50. इस प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना को पहचानिए। वह भरतनाट्यम और ओडिसी नृत्य शैली दोनों की गुरु हैं। उन्हें वर्ष 1987 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। [MTS (T-I) 10 मई, 2023 (I-पाली), CHSL (T-I) 17 मार्च, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) सोनल मानसिंह
Solution:
  • सोनल मानसिंह एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना हैं
  • जिन्हें भरतनाट्यम और ओडिसी नृत्य शैली के लिए जाना जाता है। उन्हें वर्ष 1987 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
  • प्रारंभिक जीवन
    • सोनल मानसिंह का जन्म 30 अप्रैल 1944 को मुंबई में हुआ था।
    • उन्होंने कम उम्र से ही नृत्य प्रशिक्षण शुरू किया, जिसमें भरतनाट्यम के लिए प्रमुख गुरुओं से सीखा।
    • बाद में ओडिसी में केलुचरण महापात्र जैसे गुरुओं से प्रशिक्षण लिया, जो इस शैली के पुनरुद्धारकर्ता थे।
  • नृत्य करियर
    • 1962 में मुंबई में अपने पहले मंच प्रदर्शन के साथ उन्होंने पेशेवर करियर शुरू किया।
    • वे भरतनाट्यम की कठोर मुद्राओं और ओडिसी की तरल अभिव्यक्ति दोनों में महारत रखती हैं।
    • 1977 में नई दिल्ली में केन्द्र फॉर इंडियन क्लासिकल डांस (CICD) की स्थापना की, जो शास्त्रीय नृत्यों को संरक्षित करने का प्रमुख केंद्र है।
  • पुरस्कार और सम्मान
    • 1987 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार ओडिसी और भरतनाट्यम में योगदान के लिए मिला।
    • 1992 में पद्म भूषण, 2003 में पद्म विभूषण जैसे उच्चतम नागरिक सम्मान प्राप्त हुए।
    • वे बालासरस्वती के बाद पद्म विभूषण पाने वाली दूसरी नृत्यांगना हैं; इसके अलावा राज्यसभा सांसद और अकादमी अध्यक्ष रह चुकी हैं।
  • योगदान और विरासत
    • उन्होंने तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम की अस्थायी नर्तकी के रूप में सेवा की।
    • कुचिपुड़ी में भी "मशाल वाहक" मानी जाती हैं।
    • CICD के माध्यम से सैकड़ों शिष्यों को प्रशिक्षित किया, भारतीय नृत्य को वैश्विक मंच पर ले जाया।