सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-IV

Total Questions: 50

1. शमा भाटे (Shama Bhate) को निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार-2021 (फरवरी, 2023 में दिया गया) से सम्मानित किया गया? [MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) कथक
Solution:
  • शमा भाटे जिन्हें शमा ताई के नाम से भी जाना जाता है, भारत में 'कथक' की प्रमुख नृत्यांगनाओं में से एक हैं।
  • कथक नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार-2021 (फरवरी, 2023 में दिया गया) से सम्मानित किया गया।
  • पुरस्कार का विवरण
    • संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भारत का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान है
    • जो संगीत, नृत्य और नाटक के क्षेत्र में कलाकारों, गुरुओं और विद्वानों को दिया जाता है।
    • यह 1952 में स्थापित अकादमी द्वारा प्रदान किया जाता है और इसमें नकद पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र तथा ताम्रपत्र शामिल होता है।
    • शमा भाटे को कथक श्रेणी में यह पुरस्कार उनके निरंतर व्यक्तिगत योगदान के लिए मिला।
  • कथक नृत्य शैली
    • कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य के आठ प्रमुख रूपों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति उत्तर भारत के कथकारों (कहानीकार भाटों) से हुई।
    • इसमें जटिल पदचाप (तात्कार), घुमावदार चक्कर, भावपूर्ण हाव-भाव और चेहरे के भावों से रामायण-महाभारत की कथाएं व्यक्त की जाती हैं। शमा भाटे ने इस शैली को समृद्ध किया है।
  • शमा भाटे का योगदान
    • शमा भाटे (जन्म 6 अक्टूबर 1950), जिन्हें शमा ताई भी कहा जाता है, 4 वर्ष की आयु से कथक की प्रशिक्षण ले रही हैं।
    • वे पुणे स्थित नाद्रूप संस्था की संस्थापक-निदेशक हैं तथा कलाकार, कोरियोग्राफर, शिक्षिका और विचारक के रूप में 35+ वर्षों से सक्रिय हैं।
    • उन्होंने 'स्वाभिव्यक्ति' जैसे उत्सवों के माध्यम से कथक को नई दिशा दी और अनेक शिष्यों को प्रशिक्षित किया।
  • अन्य उपलब्धियां
    • शमा भाटे को महाराष्ट्र राज्य पुरस्कार (2011), बुंदेली गौरव (2018) तथा पुणे नगर निगम का रोहिणी भाटे पुरस्कार (2018) भी मिल चुका है।
    • संगीत नाटक अकादमी की आधिकारिक सूची में भी 2021 के कथक पुरस्कार विजेता के रूप में उनका नाम दर्ज है।
  • पुरस्कार वितरण संदर्भ
    • यह पुरस्कार 2021 का था, लेकिन महामारी के कारण फरवरी 2023 में प्रदान किया गया।
    • समान पुरस्कार जयलक्ष्मी ईश्वर को भरतनाट्यम के लिए भी मिला।
    • यह सम्मान उनके कथक के प्रचार-प्रसार और संरक्षण में योगदान को दर्शाता है।

2. 'कथक' शब्द की उत्पत्ति निम्नलिखित में से किस शब्द से हुई है? [MTS (T-I) 08 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) कथा
Solution:
  • 'कथक' शब्द की उत्पत्ति 'कथा' शब्द से हुई है, जिसका अर्थ एक कहानी से है।
  • कथक चार अलग-अलग रूपों में पाया जाता है, जिन्हें 'घराना' कहा जाता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • कथक की जड़ें प्राचीन कथाकारों या कहानीकारों में हैं
    • जो मंदिरों और गांवों में रामायण, महाभारत, भागवत पुराण जैसी पौराणिक कथाओं को नृत्य, संगीत और अभिनय के माध्यम से सुनाते थे।
    • समय के साथ इसमें हाव-भाव, मुद्राएं और लयबद्ध पदचाप जुड़ गए, जिससे यह एक पूर्ण शास्त्रीय नृत्य रूप बन गया।​
    • यह उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश (वाराणसी, लखनऊ) से उत्पन्न हुआ
    • भक्ति आंदोलन (15वीं शताब्दी) के दौरान फला-फूला, जिसमें भगवान कृष्ण की कथाओं पर जोर था।
  • शब्द का व्युत्पत्ति विवरण
    • संस्कृत में 'कथा' का直 अर्थ 'कहानी' है, और 'कथक' इससे व्युत्पन्न है, जिसका मतलब 'कहानी सुनाने वाला'।
    • कथाकार यात्रा करते हुए दंतकथाओं और महाकाव्यों की उपकथाओं को प्रस्तुत करते थे, जो नृत्य के सरल रूप में विकसित हुआ।
    • मध्यकाल में मुगल प्रभाव से फारसी तत्व (जैसे घुमाव और तबला की संगत) जुड़े, लेकिन मूल 'कथा' परंपरा बनी रही।
  • नृत्य की विशेषताएं
    • कथक में जटिल फुटवर्क (तात्कार), घुंघरू की लय, चक्कर (टर्न्स) और अभिनय (भाव) मुख्य हैं।
    • यह तबला, पखावज, हारमोनियम के साथ प्रस्तुत होता है और आठ प्रमुख भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में से एक है।

3. ....... नृत्य के प्रदर्शन में, एक तरफ महिलाओं द्वारा रास नृत्य किया जाता है, जबकि विपरीत तरफ वादक पुंग-चोलोम (ड्रम) और करताल (झांझ) बजाते हैं। [MTS (T-I) 08 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) मणिपुरी
Solution:
  • 'मणिपुरी' नृत्य के प्रदर्शन में, एक तरफ महिलाओं द्वारा रास नृत्य किया जाता है
  • जबकि विपरीत तरफ वादक पुंग-चोलोम (ड्रम) और करताल (झांझ) बजाते हैं। मणिपुरी नृत्य के अधिकांश विषय वैष्णव संप्रदाय से जुड़े हैं।
  • प्रदर्शन की संरचना
    • मणिपुरी नृत्य के प्रदर्शन में मंच को दो भागों में विभाजित किया जाता है। एक ओर महिलाएँ रास नृत्य करती हैं
    • जो भगवान कृष्ण और गोपियों की लीला पर आधारित होता है, जबकि विपरीत ओर पुरुष वादक पुंग चोलोम (ढोल या मृदंग) और करताल (झांझ या चिम्टा) बजाते हुए नृत्य करते हैं।​
    • यह संयोजन नृत्य को जीवंतता प्रदान करता है, जहाँ संगीत और नृत्य एक साथ प्रवाहित होते हैं। रासलीला की कोमलता के विपरीत, वादकों की ऊर्जा प्रदर्शन को संतुलित बनाती है।​​
  • पुंग चोलोम का विवरण
    • पुंग चोलोम मणिपुरी नृत्य की एक प्रमुख शैली है, जिसमें पुरुष कलाकार पारंपरिक ढोल (पुंग) बजाते हुए तेज़ और जटिल कदम उठाते हैं।
    • यह नृत्य धीमी शुरुआत से तेज़ गति तक पहुँचता है, जो कलाकारों की कुशलता दिखाता है।​
    • पुंग एक प्राचीन मृदंग जैसा वाद्य है, जिसे मणिपुर में विशेष रूप से बनाया जाता है
    • इसे बजाते समय नर्तक उछल-कूद और घुमावदार मुद्राएँ अपनाते हैं। यह प्रदर्शन धार्मिक अनुष्ठानों या उत्सवों में स्वतंत्र रूप से भी किया जाता है।
  • करताल चोलोम या नूपा पाला
    • कرتाल चोलोम (जिसे नूपा पाला भी कहते हैं) में पुरुष कलाकार सफेद गोलाकार पगड़ी पहनकर झांझ (कर्टल) बजाते हैं
    • गाते-नाचते हैं। नृत्य की शुरुआत शांत और कोमल होती है, जो धीरे-धीरे उत्साहपूर्ण हो जाती है।​​
    • ये कलाकार रासलीला के प्रोलॉग के रूप में प्रदर्शन करते हैं, जो प्रदर्शन को धार्मिक महत्व प्रदान करता है।
    • यह मणिपुरी संकीर्तन परंपरा का हिस्सा है, जो यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल है।​
  • ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
    • मणिपुरी नृत्य मणिपुर राज्य से उत्पन्न भारत का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है, जो वैष्णव भक्ति पर आधारित है।
    • रासलीला 18वीं शताब्दी में राजा भग्य चंद्र कीर्ति सिंह द्वारा विकसित हुई, जिसमें कृष्ण की कथाएँ नृत्य-नाट्य के माध्यम से चित्रित होती हैं।
    • यह प्रदर्शन संगीत, नृत्य और भक्ति का संगम है, जो सामुदायिक एकता को मजबूत करता है।
    • संकीर्तन जैसे अनुष्ठानों में पुंग और करताल का उपयोग मंदिरों या आंगन में होता है, जहाँ दर्शक भावुक हो उठते हैं।​

4. भारतीय नृत्य का ....... शब्द संस्कृत शब्द से लिया गया है और इसका शाब्दिक अर्थ है 'की ओर ले जाना' - (taking towards)1 [MTS (T-I) 08 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) अभिनय
Solution:
  • भारतीय नृत्य का 'अभिनय' शब्द संस्कृत शब्द से लिया गया है और इसका शाब्दिक अर्थ है 'की ओर ले जाना' (Taking - towards)।
  • अभिनय का अर्थ और उत्पत्ति
    • अभिनय संस्कृत धातु 'नी' (ले जाना) और उपसर्ग 'अभि' (की ओर) से मिलकर बना है
    • जिसका शाब्दिक अर्थ होता है 'किसी को किसी चीज की ओर ले जाना'।
    • भारतीय नृत्य संदर्भ में, यह दर्शकों को रस (भावनाओं) की ओर आकर्षित करने की कला को व्यक्त करता है।
    • भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में इसे विस्तार से वर्णित किया गया है, जो नृत्य का आधारभूत ग्रंथ है।​
  • नृत्य के चार मुख्य अंग
    • भारतीय शास्त्रीय नृत्य को नाट्यशास्त्र के अनुसार चार भागों में बांटा गया है:
    • आंगिक: शारीरिक गतियां और मुद्राएं।
    • वाचिक: स्वर और संवाद।
    • आहार्य: वेशभूषा और साज-सज्जा।
    • सात्विक: आंतरिक भाव और मनोभाग।​
    • अभिनय इनमें से प्रमुख है, खासकर नृत्य (अभिव्यंजक नृत्य) के रूप में
    • जो कथानक को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
    • यह नृत्त (शुद्ध नृत्य), नृत्य और नाट्य के साथ मिलकर पूर्ण प्रदर्शन बनाता है।​
  • नाट्यशास्त्र में अभिनय
    • नाट्यशास्त्र (लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी) में अभिनय के चार भेद बताए गए हैं:
    • आंगिक अभिनय: शरीर के अंगों द्वारा भाव व्यक्त करना, जैसे हस्तमुद्राएं (हाथों की 24 मूल मुद्राएं)।
    • वाचिक अभिनय: स्वर, उच्चारण और गान से।
    • आहार्य अभिनय: वस्त्र, आभूषण और रंग से।
    • सात्विक अभिनय: अंतर्मन के भाव, जैसे आंसू या कंपन।​
    • ये सभी दर्शकों को 'रसास्वादन' की ओर ले जाते हैं
    • जो नौ रसों (शृंगार, वीर आदि) पर आधारित है।
    • उदाहरणस्वरूप, भरतनाट्यम या कथक में अभिनय के माध्यम से रामायण की कथाएं जीवंत होती हैं।
  • भारतीय नृत्यों में अभिनय की भूमिका
    • भरतनाट्यम: अभिनय पदों में भावपूर्ण अभिनय प्रमुख।
    • कथक: अभिनय के साथ नृत्य बोल और तालबद्धता।
    • ओडिसी/मोहिनीअट्टम: कोमल अभिनय से स्त्री भाव व्यक्त।​

5. पंडित जानकी प्रसाद का संबंध निम्नलिखित में से किस कथक घराने से है? [MTS (T-I) 08 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) बनारस
Solution:
  • जानकी प्रसाद कथक के बनारस घराने से जुड़े हैं। इस घराने की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में हुई।
  • बनारस घराने की उत्पत्ति
    • बनारस घराना उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर से जुड़ा है, जहां जानकी प्रसाद ने इसे विकसित किया।
    • वे मूल रूप से राजस्थान के बीकानेर के निवासी थे और संभवतः प्राचीन श्यामलाल दास या सांवलदास घराने से प्रेरित होकर बनारस में बस गए।
    • इस घराने की नींव 19वीं-20वीं सदी के मोड़ पर पड़ी, जब कथक के अन्य घरानों जैसे लखनऊ और जयपुर के साथ प्रतिस्पर्धा में नई शैली उभरी।
    • जानकी प्रसाद ने लखनऊ के शंभू महाराज से भी प्रशिक्षण लिया, जिससे उनकी शैली में विविध प्रभाव दिखते हैं।​
  • विशेषताएं और शैली
    • यह घराना जटिल फुटवर्क, सुंदर चालाकियों (गतियां), लयकारी, तांडव (शक्तिशाली पुरुष प्रधान) और लास्य (कोमल स्त्रीलिंग) तत्वों के लिए प्रसिद्ध है।
    • फुटवर्क में निकास (nikas), शुद्ध बोल (bols), सात्विक भाव और तत्कार पर विशेष जोर दिया जाता है।
    • बनारस घराने की चालें तेज, ऊर्जावान और मार्शल आर्ट से प्रेरित होती हैं
    • जो इसे जयपुर घराने की तकनीकी सटीकता या लखनऊ की कोमलता से अलग करती हैं।
    • रचना में शुद्ध नृत्य लय पर बल मिलता है, जिसमें फुटवर्क से बोल निकालना प्रमुख है।
  • प्रमुख शिष्य और विस्तार
    • जानकी प्रसाद के तीन प्रमुख शिष्य थे: चुन्नीलाल, दुल्हा राम और गणेशीलाल।
    • चुन्नीलाल ने 15 वर्षों तक उनका प्रशिक्षण लिया और बाद में बीकानेर दरबार में प्रदर्शन किए।
    • इन शिष्यों ने घराने को फैलाया, हालांकि यह अन्य घरानों जितना व्यापक नहीं हुआ। यह घराना कभी-कभी "जानकी प्रसाद घराना" भी कहलाता है।
  • ऐतिहासिक संदर्भ
    • कथक की जड़ें मध्यकालीन कृष्ण कथाओं से हैं, जो उत्तर भारत और राजस्थान से फैला।
    • बनारस घराना मुगल प्रभाव के बाद शास्त्रीय रूप लेने वाले कथक का हिस्सा है।
    • आज बिरजू महाराज जैसे कलाकार कथक को जीवंत रखते हैं, लेकिन बनारस शैली की विशुद्धता कम देखने को मिलती है।
    • यह घराना कथक की विविधता को दर्शाता है, जहां प्रत्येक शैली क्षेत्रीय प्रभाव से समृद्ध हुई।

6. छउ नृत्य, जिसे संस्कृति मंत्रालय द्वारा शास्त्रीय नृत्य के रूप में पहचान दी गई है, पूर्वी भारत में प्रचलित है और इसके तीन अलग-अलग रूप हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा उनमें से एक नहीं है? [MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) छत्तीसगढ़ का मरवाही छउ
Solution:
  • छउ नृत्य मार्शल और लोक परंपराओं वाला एक अर्द्धशास्त्रीय भारतीय नृत्य है। यह तीन शैलियों में पाया जाता है
  • यानी पश्चिम बंगाल का पुरुलिया छउ, झारखंड का सरायकेला छउ और ओडिशा का मयूरभंज छउ।
  • वर्ष 2010 में छउ नृत्य को यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि में शामिल किया गया था।
  • छऊ नृत्य का परिचय
    • यह पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों में प्रचलित है।
    • संस्कृति मंत्रालय ने इसे शास्त्रीय नृत्य के रूप में पहचाना है, जिससे भारत के शास्त्रीय नृत्यों की संख्या नौ हो गई।
  • मान्यता प्राप्त तीन रूप
    • छऊ के तीन विशिष्ट और मान्यता प्राप्त रूप निम्नलिखित हैं:
    • सरायकेला छऊ (झारखंड): यह सबसे पुराना रूप माना जाता है, जिसमें जटिल मुद्राएँ और अभिनय पर जोर होता है। यह राजघराने से जुड़ा है।
    • पुरुलिया छऊ (पश्चिम बंगाल): इसमें चटकीले मुखौटे और ऊर्जावान नृत्य शैली प्रमुख है, जो चैत्र संक्रांति पर प्रस्तुत किया जाता है।
    • मयूरभंज छऊ (ओडिशा): यह त्रिभुजाकार मुखौटों और तेज गति वाली चालों के लिए जाना जाता है, जिसमें लोक संगीत का प्रभाव है।
    • ये तीनों रूप UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में भी शामिल हैं।​
  • कौन-सा रूप शामिल नहीं?
    • छत्तीसगढ़ का मरवाही छऊ छऊ नृत्य के इन तीन मानक रूपों में से एक नहीं है।
    • यह छत्तीसगढ़ में लोकप्रिय हो सकता है
    • लेकिन संस्कृति मंत्रालय द्वारा शास्त्रीय छऊ के रूप में मान्यता प्राप्त तीन रूपों (सरायकेला, पुरुलिया, मयूरभंज) में इसका उल्लेख नहीं है। प्रश्न के संदर्भ में यह सही उत्तर है।​
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • "छऊ" शब्द संस्कृत के "छाय" से आया है, जिसका अर्थ छाया या मुखौटा होता है।
    • प्राचीन काल में योद्धाओं द्वारा अभ्यास किया जाता था
    • जो अब नाट्य और कला का रूप ले चुका है। यह नृत्य वसंत पंचमी या छऊ संक्रांति पर आयोजित होता है।

7. छउ भारत की एक प्रमुख नृत्य परंपरा है। निम्नलिखित में से किस भारतीय राज्य में यह नृत्य शैली प्रचलित नहीं है? [MTS (T-I) 13 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) मध्य प्रदेश
Solution:
  • छउ नृत्य मार्शल और लोक परंपराओं वाला एक अर्द्धशास्त्रीय भारतीय नृत्य है। यह तीन शैलियों में पाया जाता है
  • यानी पश्चिम बंगाल का पुरुलिया छउ, झारखंड का सरायकेला छउ और ओडिशा का मयूरभंज छउ।
  • वर्ष 2010 में छउ नृत्य को यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि में शामिल किया गया था।
  • छऊ की प्रमुख शैलियाँ
    • सरायकेला छऊ (झारखंड): यह झारखंड के सरायकेला क्षेत्र से उत्पन्न है। इसमें नाजुक मुखौटों का उपयोग होता है
    • यह भावनाओं को सूक्ष्म हाव-भावों से व्यक्त करता है। मार्शल आर्ट, शास्त्रीय नृत्य और लोक तत्वों का संतुलित मिश्रण इसे विशेष बनाता है।​
    • मयूरभंज छऊ (ओडिशा): ओडिशा के मयूरभंज जिले की यह शैली बिना मुखौटे के की जाती है।
    • यह आदिवासी प्रभाव वाली है, जिसमें शारीरिक शक्ति, व्यावहारिक गतिविधियाँ और पौराणिक कथाओं का प्रदर्शन होता है। लोक नृत्य और मार्शल कला का प्रमुख उदाहरण।​​
    • पुरुलिया छऊ (पश्चिम बंगाल): पश्चिम बंगाल के पुरुलिया क्षेत्र की यह शैली अपने समृद्ध, रंगीन मुखौटों और सक्रिय आंदोलनों के लिए प्रसिद्ध है।
    • महाकाव्यों पर आधारित नाटकीय प्रस्तुतियाँ इसमें प्रमुख हैं, जो त्योहारों में रात भर चलती हैं।​
  • कहाँ प्रचलित नहीं है?
    • मध्य प्रदेश में छऊ नृत्य शैली प्रचलित नहीं है। यह नृत्य पूर्वी भारत तक सीमित है
    • मध्य भारत के राज्य जैसे मध्य प्रदेश में इसकी कोई परंपरा या प्रमुख उपस्थिति नहीं पाई जाती।
    • प्रश्न के संदर्भ में विकल्पों (संभवतः झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश) में से मध्य प्रदेश सही उत्तर है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • छऊ नृत्य की जड़ें 250-300 वर्ष पुरानी हैं, जो राजाओं की छावनी (सेना शिविर) से जुड़ी बताई जाती हैं।
    • मूल रूप से पुरुष कलाकार ही इसे प्रस्तुत करते थे, और इसमें ढोल, धम्सा, खड़क, मोहुरी व शहनाई जैसे वाद्यों का उपयोग होता है।
    • मुंडा, महतो जैसे आदिवासी समुदाय इसके प्रमुख प्रदर्शक हैं। यूनेस्को ने इसे अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी है।​
  • विशेषताएँ और महत्व
    • यह नृत्य ऊर्जावान चालों, सजे हुए मुखौटों और सामुदायिक भागीदारी के लिए जाना जाता है।
    • प्रदर्शन के दौरान नर्तकों को जबरदस्त सहनशक्ति चाहिए, क्योंकि यह रात भर चलता है।
    • आधुनिक समय में सरकारी प्रयासों से इसे संरक्षित किया जा रहा है
    • झारखंड जैसे राज्यों में सरकारी आयोजनों में इसका प्रदर्शन आम है। यह पूर्वी भारत की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।​

8. छउ नृत्य (Chhau dance) भारत के किस क्षेत्र का एक प्रसिद्ध नृत्य है? [CHSL (T-I) 13 मार्च, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 15 मई, 2023 (III-पाली), CHSL (T-I) 13 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) पूर्वी भारत
Solution:
  • 'छउ नृत्य' पूर्वी भारत की एक प्रमुख नृत्य परंपरा है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • जो महाभारत, रामायण, स्थानीय कथाओं और अमूर्त विषयों पर आधारित कथानक प्रस्तुत करता है।
    • इसके तीन प्रमुख शैलियाँ हैं: सरायकेला छऊ (झारखंड), मयूरभंज छऊ (ओडिशा) और पुरुलिया छऊ (पश्चिम बंगाल), जहाँ सरायकेला और पुरुलिया में मुखौटों का उपयोग होता है
    • जबकि मयूरभंज बिना मुखौटे के किया जाता है।
    • यह नृत्य चैत्र परब जैसे वसंत उत्सवों और गजान महोत्सव से गहराई से जुड़ा है, जो रात में खुले मैदान में प्रदर्शित होता है।
  • विशेषताएँ और शैलियाँ
    • नृत्य की भाषा में खेल (नकली युद्ध तकनीकें), चालिस और टोपका (पक्षियों व जानवरों की नकली चालें) तथा ऊफली (गाँव की महिलाओं के दैनिक कार्यों से प्रेरित गतियाँ) शामिल हैं।
    • संगीत में मोहुरी, शहनाई, ढोल, धुमसा और खरका जैसे वाद्ययंत्र प्रमुख हैं
    • इसे केवल पुरुष नर्तक (परंपरागत कलाकार परिवारों या स्थानीय समुदायों से) ही करते हैं।
    • सरायकेला छऊ सुंदर हाव-भाव और नाजुक मुखौटों पर जोर देता है
    • मयूरभंज शारीरिक गतिविधियों और पौराणिक कथाओं पर; जबकि पुरुलिया चटक आंदोलनों और विस्तृत मुखौटों से जाना जाता है।
  • इतिहास और संरक्षण
    • यह नृत्य शाही संरक्षण, जमींदारों और ब्रिटिश गवर्नरों से समर्थित रहा, जैसे मयूरभंज के महाराजा श्रीराम चंद्र भंज देवो ने 1912 में इसका सुधार किया।
    • यूनेस्को ने 2010 में इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया।
    • आज यह समुदायों जैसे मुंडा, महतो, कालिंदी आदि द्वारा मौखिक रूप से संचालित होता है, जो मुखौटे बनाने, संगीत और नृत्य की कला को जीवित रखता है।

9. रिखमपदा (Rikham pada) नृत्य का संबंध निम्नलिखित में से किस राज्य से है? [MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) अरुणाचल प्रदेश
Solution:
  • रिखमपदा (Rikham pada) अरुणाचल प्रदेश के निचले सुबनसिरी जिले की निशि जनजाति का पारंपरिक नृत्य है।
  • उत्पत्ति और जनजाति
    • यह नृत्य विशेषकर निचले सुबनसिरी जिले से जुड़ा हुआ है।
    • न्यीशी समुदाय पूर्वोत्तर भारत की विविध जनजातीय संस्कृति को दर्शाता है
    • जहां यह नृत्य सामुदायिक एकता और परंपराओं को जीवंत रखता है।
  • प्रदर्शन का अवसर
    • यह नृत्य मुख्यतः न्योकुम त्योहार (Nyokum Yullo) के दौरान प्रस्तुत किया जाता है, जो फरवरी-मार्च में मनाया जाता है।
    • न्योकुम अच्छी फसल, समृद्धि और देवताओं से आशीर्वाद प्राप्त करने का उत्सव है।
    • अन्य सामाजिक और सांस्कृतिक अवसरों पर भी इसका आयोजन होता है, जो जनजाति की सामूहिक भावना को मजबूत करता है।​​
  • पोशाक और आभूषण
    • नर्तक पारंपरिक हस्तनिर्मित पोशाकें पहनते हैं, जो रंग-बिरंगी होती हैं
    • स्थानीय सामग्री जैसे बांस, पंखों से सजाई जाती हैं।
    • पुरुष और महिलाएं दोनों ही सिर पर विशेष मुकुट, गले में माला और कलाई-टखनों पर आभूषण धारण करते हैं। ये पोशाकें प्रकृति से गहरा जुड़ाव दर्शाती हैं।​​
  • संगीत और गतिविधियां
    • नृत्य की खासियत इसकी लयबद्ध चालें हैं, जो समन्वित रूप से समूह में की जाती हैं।
    • इसे स्वदेशी वाद्ययंत्रों जैसे डमरू (छोटी ढोल), योकशा (बांसुरी) और अन्य लोक वाद्यों पर बजते पारंपरिक संगीत के साथ किया जाता है।
    • गतिविधियां कथावाचक होती हैं, जो मिथक, किंवदंतियों या सामुदायिक उत्सवों को चित्रित करती हैं।​​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • अरुणाचल प्रदेश, जो भूटान, चीन और म्यांमार से सटा हुआ है
    • अपनी 26 प्रमुख जनजातियों की विविध परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है।
    • रिखमपदा जैसे नृत्य सांस्कृतिक संरक्षण में सहायक हैं
    • जो जंगलों, नदियों और पहाड़ों से घिरे इस राज्य की प्राकृतिक-सांस्कृतिक समृद्धि को उजागर करते हैं।
    • यह नृत्य आधुनिक उत्सवों जैसे लोक्रंग महोत्सव में भी देखा जाता है।

10. निम्नलिखित नर्तकों में से किसका संबंध कथक के भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली से है? [MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) पंडित बिरजू महाराज
Solution:
  • पंडित बिरजू महाराज प्रसिद्ध भारतीय कथक नर्तक थे। वे शास्त्रीय कथक नृत्य के लखनऊ कालका-बिन्दादीन घराने के कलाकार थे।
  • वर्ष 1964 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  • कथक नृत्य का संक्षिप्त परिचय
    • कथक उत्तर भारत की उत्पत्ति वाली शास्त्रीय नृत्य शैली है, जो कथावाचकों (कथकारों) से विकसित हुई।
    • इसमें नृत्य, अभिनय, तालबद्ध चाल और घुंघरू की संगति प्रमुख हैं। लखनऊ, जयपुर और बनारस घराने इसके मुख्य रूप हैं।​
  • प्रमुख कथक नर्तक एवं उनका योगदान
    • कई नर्तक कथक को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने वाले हैं।
    • पंडित बिरजू महाराज: लखनऊ घराने के अग्रणी।
    • उन्होंने कथक को आधुनिक रूप दिया, फिल्मों (जैसे 'दरबार') में प्रदर्शन किया। पद्म विभूषण से सम्मानित।
    • सितारा देवी: जयपुर घराने की प्रख्यात नर्तकी। 'कथक की मलिका' कहलातीं, पुरुषवादी परंपरा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया।
    • पंडित शंभू महाराज: लखनऊ घराने के स्तंभ। नृत्य में भाव और अभिनय की गहराई लाई।
    • कुमुदिनी लखिया: कथक को समकालीन रूप दिया। कादंब केंद्र स्थापित कर नई पीढ़ी तैयार की।
    • शोवना नारायण: आधुनिक कथक प्रचारक। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त।​
  • अन्य शैलियों से भ्रमित होने वाले नर्तक
    • कुछ नर्तक अन्य शैलियों से जुड़े हैं, जैसे:
    • दर्शना झावेरी: भरतनाट्यम​
    • वेम्पति चिन्ना सत्यम: कुचिपुड़ी​
    • अमुबी सिंह: मणिपुरी​