सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-IV

Total Questions: 50

11. भारती शिवाजी और कनक रेले ....... के व्याख्याता हैं [MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) मोहिनीअट्टम
Solution:
  • भारती शिवाजी और कनक रेले 'मोहिनीअट्टम' के व्याख्याता हैं।
  • कनक रेले को वर्ष 2013 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, जबकि भारती शिवाजी को वर्ष 2004 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
  • मोहिनीअट्टम का परिचय
    • मोहिनीअट्टम भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से प्रेरित है, जहां 'मोहिनी' का अर्थ मोहक स्त्री और 'अट्टम' का अर्थ नृत्य है।
    • यह नृत्य तरल गतियों, सूक्ष्म हस्तमुद्राओं और भावपूर्ण चेहरे की अभिव्यक्तियों पर आधारित है, जो मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है।
    • इसकी वेशभूषा सफेद या ऑफ-व्हाइट साड़ी होती है जिसमें सुनहरी जरी का बॉर्डर होता है, जो नृत्य को एक आकर्षक रूप देता है।
    • प्रदर्शन में चोलकेट्टू, वर्णम, पदम और तिल्लाना जैसे तत्व शामिल होते हैं, जो प्रेम, भक्ति और प्रकृति को दर्शाते हैं।​
  • भारती शिवाजी का योगदान
    • भारती शिवाजी का जन्म 1948 में तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था।
    • उन्होंने मोहिनीअट्टम के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेषकर केरल के बाहर इसे लोकप्रिय बनाने में।​
    • उन्होंने संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप प्राप्त कर कोवलम नारायण पणिकर के मार्गदर्शन में शोध किया।
    • 2004 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया, साथ ही संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और साहित्य कला परिषद सम्मान भी मिला।
    • वे "आर्ट ऑफ मोहिनीअट्टम" और "मोहिनीअट्टम" पुस्तकों की सह-लेखिका हैं।
  • कनक रेले का योगदान
    • कनक रेले (11 जून 1937 - 22 फरवरी 2023) मुंबई में नालंदा नृत्य अनुसंधान केंद्र और नालंदा नृत्य कला महाविद्यालय की संस्थापक थीं।
    • उन्होंने मोहिनीअट्टम को विद्वतापूर्ण और शोध-आधारित रूप दिया, जिससे इसे अकादमिक दर्जा मिला।
    • पद्म भूषण से सम्मानित रेले ने नृत्य को पुनर्जीवित किया और विश्व स्तर पर इसकी समझ बढ़ाई।
    • उनके कार्यों में शोध, पुस्तकें और प्रदर्शन शामिल हैं, जो मोहिनीअट्टम को आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुए।
  • दोनों का संयुक्त प्रभाव
    • दोनों कलाकारों ने मिलकर मोहिनीअट्टम को संगीत नाटक अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त शास्त्रीय नृत्य के रूप में मजबूत किया।
    • भारती शिवाजी ने इसे प्रदर्शन स्तर पर समृद्ध किया, जबकि कनक रेले ने शोध और संस्थागत समर्थन प्रदान किया।

12. ....... का सोंगी मुखवटे नृत्य (Songi Mukhawate Dance) असत्य पर सत्य की जीत का जश्न मनाता है। इस नृत्य का नाम दो नृत्य कलाकारों द्वारा पहने जाने वाले दो शेर के मुखौटों से लिया गया है, जो भगवान विष्णु के एक पहलू, नरसिंह को दर्शाता है। [MTS (T-I) 06 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) महाराष्ट्र
Solution:
  • सोंगी मुखवटे नृत्य महाराष्ट्र में किया जाता है। इस नृत्य में दो कलाकार नरसिंह रूप धारण कर नृत्य करते हैं। महाराष्ट्र में होली के बाद यह उत्सव मनाया जाता है।
  • उत्पत्ति और पौराणिक आधार
    • यह नृत्य गुजरात-महाराष्ट्र सीमा पर नासिक से लगभग 40 किमी दूर आदिवासी समुदायों द्वारा किया जाता है
    • जो चैत्र पूर्णिमा (मार्च-अप्रैल) पर देवी पूजा के दौरान बुरी शक्तियों को भगाने के लिए प्रस्तुत होता है।
    • नरसिंह ने राक्षस हिरण्यकशिपु का वध कर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी, जो इस नृत्य का मूल संदेश है
    • सत्य की सदा जीत होती है। कभी-कभी यह 12वीं शताब्दी के बाली राजा लोककथाओं से भी जुड़ा माना जाता है।​
  • प्रदर्शन का विवरण
    • दो मुख्य नर्तक 'सोंगी' (शेर) मुखौटे धारण कर नरसिंह का अभिनय करते हैं
    • जबकि अन्य काल भैरव (शिव का उग्र रूप) और वेताल (भूतिया सहायक) के मुखौटे पहनते हैं।
    • सभी कलाकार हाथ में छोटी डंडियाँ (लाठियाँ) पकड़कर तालबद्ध तरीके से थप्पड़ मारते हुए जोरदार चाल-ढाल दिखाते हैं
    • कभी मुकाबला तो कभी उत्सव का आभास कराते हुए। पावरी वादक हरे चोंगे और मोर पंखों से सजे होते हैं, जो नृत्य को नाटकीय बनाते हैं।​
  • संगीत और वाद्ययंत्र
    • नृत्य ढोल की गर्जना, पावरी (नाद वायु वाद्य) की मधुरता और संबल (झांझ) की ताल से गूंजता है
    • जो उत्साहपूर्ण वातावरण बनाता है। कभी शहनाई या बांसुरी भी जुड़ती है
    • जो महाराष्ट्र की लोक परंपराओं की तरह फसल कटाई और सामुदायिक एकता को दर्शाती है। ये वाद्य नृत्य को ट्रांस जैसा रोमांच देते हैं।​
  • अवसर और सांस्कृतिक महत्व
    • यह मुख्यतः चैत्र पूर्णिमा, होली पर्व, गूड़ी पड़वा, शादियों, दिवाली और आदिवासी मेलों पर होता है
    • जहाँ कभी बकरी की बलि भी देवताओं को चढ़ाई जाती है। यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान है
    • बल्कि समुदाय को जोड़ने वाला माध्यम भी, जहाँ युवाओं को प्रशिक्षित कर परंपरा जीवित रखी जाती है।
    • 2025 के बहुरूपी महोत्सव, मैसूर में इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित किया गया।​
  • वर्तमान स्थिति
    • सोंगी मुखवटे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है, जो भक्ति, नाटक और नृत्य का मिश्रण है
    • शहरीकरण से विलुप्ति का खतरा है। सांस्कृतिक केंद्रों, डॉक्यूमेंट्री और परेड जैसे प्रयास इसे संरक्षित कर रहे हैं।
    • यह छऊ जैसे अन्य मुखौटा नृत्यों से अलग, नरसिंह की उग्रता और कृपा पर केंद्रित है।​

13. ....... के सिद्धियों की सांस्कृतिक विरासत लगभग 300 वर्ष पुरानी है और उनका सिद्धि धमाल नृत्य (Siddhi Dhamal Dance) एक उत्कृष्ट कला शैली है। [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) गुजरात
Solution:
  • 'गुजरात' के सिद्धियों की सांस्कृतिक विरासत लगभग 300 वर्ष पुरानी है
  • उनका सिद्धि धमाल नृत्य एक उत्कृष्ट कला शैली है। यह नृत्य सिद्धियों के शिकार के प्रति जुनून को दर्शाता है।
  • सिद्धि समुदाय का इतिहास
    • सिद्धि (या सिद्दी) समुदाय अफ्रीका के बंटू भाषी क्षेत्रों से भारत आए लोगों के वंशज हैं
    • जिन्हें मुख्य रूप से पुर्तगाली व्यापारियों ने 17वीं शताब्दी में दास के रूप में गुजरात लाया था।
    • वे गुजरात के जिलों जैसे जामनगर, जूनागढ़, भरूच और अहमदाबाद के आसपास बसे, जहां उन्होंने अपनी अफ्रीकी संस्कृति के तत्वों को संरक्षित रखा
    • हालांकि स्थानीय भाषा और रीति-रिवाज अपना लिए। अधिकांश सिद्धि मुस्लिम हैं
    • हजरत बाबा गौर जैसे सूफी संतों की पूजा करते हैं, जिनकी याद में वार्षिक उत्सव आयोजित होते हैं।
  • धमाल नृत्य की उत्पत्ति
    • सिद्धि धमाल नृत्य (जिसे धमाल या मशिरा नृत्य भी कहा जाता है) शिकार के उत्सव से जुड़ा है
    • पुराने समय में सफल शिकार के बाद सिद्धि समुदाय इस नृत्य से खुशी मनाता था।
    • यह लगभग 300 वर्ष पुराना है, हालांकि कुछ स्रोत 700 वर्ष पुराना भी बताते हैं
    • जो अफ्रीकी जंगलों की आदिवासी परंपराओं को प्रतिबिंबित करता है।
    • गुजरात के राजाओं के शासनकाल में यह शाही मनोरंजन का प्रमुख साधन था
    • अब यह धार्मिक समारोहों, विशेषकर 28 अक्टूबर को बाबा गौर के उर्स पर किया जाता है।​
  • नृत्य की विशेषताएं
    • यह एक एक्शन से भरपूर नृत्य है, जिसमें नर्तक तेज़ ढोल (जिसे सिद्धि भाषा में धमाल कहते हैं
    • मशिरा और छोटे ढोलकियों की थाप पर मस्ती भरा प्रदर्शन करते हैं। नर्तक मोर के पंखों से सजे वेशभूषा (कमर और सिर पर) पहनते हैं
    • हवा में नारियल उछालकर सिर पर गिराते हैं जो टूट जाते हैं
    • कभी ट्रांस में चले जाते हैं। समुदायिक भागीदारी प्रमुख है, जो अफ्रीकी सामूहिक उत्सव की याद दिलाती है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • धमाल नृत्य सिद्धियों की अफ्रीकी विरासत को जीवित रखता है, जिसमें सूफी भक्ति और पूर्वी अफ्रीकी कोस्मोलॉजी का मेल है।
    • यह गुजरात की सांस्कृतिक विविधता में योगदान देता है, हालांकि अब कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा में भी सिद्धि बस्तियां हैं।
    • वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध हो चुका यह नृत्य भारत-अफ्रीका संबंधों का प्रतीक है।
  • आधुनिक संदर्भ
    • आज धमाल लोकोत्सवों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पर्यटन में प्रदर्शित होता है
    • जैसे लोकोत्सव 2023 में। यह सिद्धियों की संघर्षपूर्ण यात्रा और सांस्कृतिक संरक्षण की कहानी बयां करता है।​​

14. किस नृत्य के ठीक शुरू किए जाने से पहले सेवाकली (sevakalli) नामक एक अभ्यास सत्र किया जाता था, जो एक मंदिर के परिसर में किया गया था? [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) कथकली
Solution:
  • 'कथकली' नृत्य के ठीक शुरू किए जाने से पहले सेवाकली (Sevakalli) नामक एक अभ्यास सत्र किया जाता था, जो एक मंदिर के परिसर में किया गया था।
  • सेवकली क्या है?
    • सेवकली कथकली प्रदर्शन से पहले का एक प्रारंभिक अनुष्ठानिक अभ्यास सत्र है
    • जो देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता था। यह केरल के मंदिर परिसरों में आयोजित होता था
    • जहाँ कलाकार अपनी तैयारी पूरी करते थे। यह नृत्य की पवित्रता और धार्मिक महत्व को रेखांकित करता है।
  • कथकली का इतिहास और विशेषताएँ
    • कथकली केरल का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है, जो रामायण, महाभारत आदि महाकाव्यों की कहानियाँ प्रस्तुत करता है।
    • इसमें विस्तृत मेकअप, रंगीन वेशभूषा, आँखों की अभिव्यक्ति और मुद्राओं का उपयोग होता है।
    • परम्परागत रूप से यह मंदिरों या गुरुकुलों में रात्रि भर चलने वाले प्रदर्शनों के रूप में होता था।

15. नृत्यांगना पद्मा सुब्रह्मण्यम, अलार्मेल वल्ली, यामिनी कृष्णमूर्ति और अनीता रत्नम ....... की महान प्रतिपादक हैं। [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) भरतनाट्यम
Solution:
  • नृत्यांगना पद्मा सुब्रह्मण्यम, अलार्मेल वल्ली, यामिनी कृष्णमूर्ति और अनीता रत्नम 'भरतनाट्यम' नृत्य शैली की महान प्रतिपादक हैं।
  • भरतनाट्यम का परिचय
    • भरतनाट्यम तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों से उत्पन्न भारत का सबसे पुराना और लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य रूप है।
    • यह नृत्य नाट्य शास्त्र पर आधारित है, जिसमें जटिल पैरकर्म, कोमल मुद्राएँ, अभिनय और भावपूर्ण चेहरे के भाव प्रमुख हैं।
    • इसे पारंपरिक रूप से कर्नाटक संगीत के साथ प्रस्तुत किया जाता है और भगवान शिव के नटराज रूप को समर्पित माना जाता है।
  • पद्मा सुब्रह्मण्यम
    • पद्मा सुब्रह्मण्यम (जन्म: 4 फरवरी 1943, चेन्नई) भरतनाट्यम की दुनिया की अग्रणी नृत्यांगना, शोधकर्ता, कोरियोग्राफर, संगीतकार, शिक्षिका और लेखिका हैं।
    • उन्होंने 'भरत नृत्यम' नामक एक नवीन शैली विकसित की, जो 108 करणों (नटराज की मुद्राओं) पर आधारित है
    • पार्वती के नृत्य को भी समाहित करती है। संगीत में स्नातक तथा नृत्य में पीएचडी करने वाली पद्मा ने 100 से अधिक पुरस्कार जीते
    • जिनमें पद्म विभूषण (2024) और पद्म भूषण (2003) शामिल हैं। जापान, ऑस्ट्रेलिया व रूस जैसे देशों ने उनके सम्मान में वृत्तचित्र बनाए।
  • अलार्मेल वल्ली
    • अलार्मेल वल्ली एक प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं, जो अपनी शुद्ध शैली, बारीक अभिनय और काव्यात्मक प्रस्तुतियों के लिए जानी जाती हैं।
    • उन्होंने भरतनाट्यम को परंपरा के साथ-साथ आधुनिक संवेदनशीलता प्रदान की। वे चेन्नई की नृत्य शिक्षिका भी हैं
    • कई शिष्यों को प्रशिक्षित कर इस कला को जीवंत रखा। उनकी प्रस्तुतियाँ मंदिर नृत्य की सुंदरता व कोमलता को प्रतिबिंबित करती हैं।
  • यामिनी कृष्णमूर्ति
    • यामिनी कृष्णमूर्ति (जन्म: 1940) भरतनाट्यम व कुचिपुड़ी की दिग्गज नृत्यांगना हैं
    • जिन्होंने 1960-70 के दशक में विश्व स्तर पर भारतीय नृत्य को लोकप्रिय बनाया।
    • उनकी ऊर्जावान, जीवंत शैली और भावपूर्ण अभिनय ने उन्हें 'भारतीय शास्त्रीय नृत्य की महारानी' का खिताब दिलाया।
    • पद्म भूषण, पद्म विभूषण व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित यामिनी ने भरतनाट्यम की मूर्तिकला जैसी मुद्राओं को वैश्विक पहचान दी।
  • अनीता रत्नम
    • अनीता रत्नम समकालीन भरतनाट्यम की अग्रणी कलाकार हैं, जो परंपरा को आधुनिकता के साथ फ्यूज करती हैं।
    • उन्होंने 'लास्या' जैसी विधाओं में नवाचार किया और सामाजिक मुद्दों पर आधारित प्रस्तुतियाँ दीं।
    • चेन्नई-आधारित यह नृत्यांगना कोरियोग्राफर व निर्देशक भी हैं
    • जिनकी शैली में भरतनाट्यम की कोमलता व शक्ति का अनूठा संगम दिखता है। वे विश्व भर में कार्यशालाएँ आयोजित करती हैं।
  • इनका योगदान
    • ये नृत्यांगनाएँ भरतनाट्यम को केवल मंदिर नृत्य से निकालकर वैश्विक मंच पर ले गईं।
    • पद्मा ने शोधपूर्ण आधार दिया, अलार्मेल ने शुद्धता, यामिनी ने ऊर्जा और अनीता ने समकालीनता।
    • इनके प्रयासों से यह नृत्य रूप सुंदरता, पवित्रता व भावना का प्रतीक बना।

16. रोशन कुमारी, शोवना नारायण, माया राव और कुमुदिनी लाखिया प्रख्यात ....... कलाकार हैं? [MTS (T-I) 01 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) कथक
Solution:
  • रोशन कुमारी, शोवना नारायण, माया राव और कुमुदिनी लाखिया प्रख्यात 'कथक' कलाकार हैं।
  • कथक शैली के विशिष्ट रूप से चार घराने हैं-जयपुर, रायगढ़, बनारस और लखनऊ।
  • कथक नृत्य का परिचय
    • कथक भारत का एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य रूप है, जो उत्तर भारत से उत्पन्न हुआ।
    • यह जटिल पदचाप (footwork), घुमावदार चालें (pirouettes), भावपूर्ण अभिनय और तालबद्ध प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध है।
    • हिंदू मंदिर परंपराओं और मुगल दरबारों के प्रभाव से विकसित यह नृत्य कथा वाचन (कथक) से प्रेरित है।
  • रोशन कुमारी का योगदान
    • रोशन कुमारी एक प्रमुख कथक नृत्यांगना हैं, जिन्होंने कथक को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
    • वे लखनऊ घराने से जुड़ी रही हैं और अपने सटीक नृत्य कौशल के लिए जानी जाती हैं।
    • उन्होंने कथक के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा कई पीढ़ियों को प्रेरित किया।
  • शोवना नारायण की उपलब्धियाँ
    • शोवना नारायण समकालीन कथक की अग्रणी कलाकार हैं, जो दिल्ली घराने की शिष्या रही हैं।
    • उन्होंने पंडित बिरजू महाराज से प्रशिक्षण प्राप्त किया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कथक को लोकप्रिय बनाया।
    • उनकी प्रस्तुतियाँ आधुनिक विषयों को पारंपरिक शैली से जोड़ती हैं, जैसे रामायण पर आधारित नृत्य नाटक।
  • माया राव का जीवन और कार्य
    • माया राव (1928-2014) कथक कोरियोग्राफर और शिक्षिका थीं, जिन्होंने लखनऊ और जयपुर घरानों में महारत हासिल की।
    • 1964 में उन्होंने दिल्ली में नाट्य इंस्टीट्यूट ऑफ कथक एंड कोरियोग्राफी की स्थापना की, बाद में बैंगलोर में विस्तार किया।
    • रूस से कोरियोग्राफी की ट्रेनिंग लेने वाली वे पहली भारतीय नृत्यांगना थीं और कथक-बैले फ्यूजन के लिए प्रसिद्ध रहीं।
  • कुमुदिनी लाखिया की विरासत
    • कुमुदिनी लाखिया आधुनिक कथक की प्रणेता हैं, जिन्होंने अहमदाबाद में कथक कॉर्पोरेशन स्थापित किया।
    • पद्म भूषण से सम्मानित, उन्होंने नृत्य को समूह प्रस्तुतियों और नवीन कोरियोग्राफी से समृद्ध किया। उनके कार्य कथक को वैश्विक पहचान दिलाने वाले रहे।
  • इन कलाकारों का समग्र प्रभाव
    • ये चारों नृत्यांगनाओं ने कथक को उत्तर से दक्षिण भारत तक फैलाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।
    • उनके प्रयासों से कथक न केवल संरक्षित हुआ, बल्कि नवाचारों से जीवंत भी रहा।

17. कुचिपुड़ी नृत्य शैली के किस गुरु को वर्ष 1998 में पद्म भूषण मिला था? [MTS (T-I) 02 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) गुरु वेंपति चिन्ना सत्यम
Solution:
  • वर्ष 1998 में पद्म भूषण प्राप्त करने वाले कुचिपुड़ी नृत्य शैली के गुरु, गुरु वेंपति चिन्ना सत्यम हैं।
  • गुरु वेंपति चिन्ना सत्यम कुचिपुड़ी नृत्य शैली में एक प्रसिद्ध भारतीय नर्तक और कोरियोग्राफर थे, जो भारत के आंध्र प्रदेश का एक शास्त्रीय नृत्य है।
  • जीवन परिचय
    • वेम्पति चिन्ना सत्यम का जन्म 15 अक्टूबर 1929 को आंध्र प्रदेश में हुआ था और उनका निधन 29 जुलाई 2012 को हुआ।
    • उन्होंने बचपन से ही कुचिपुड़ी नृत्य में प्रशिक्षण लिया और बाद में इसे अपनी शिक्षण शैली से परिष्कृत किया।
    • उनके प्रयासों ने कुचिपुड़ी को न केवल संरक्षित किया, बल्कि इसे आधुनिक मंचों के लिए अनुकूलित भी किया।
  • कुचिपुड़ी में योगदान
    • 1963 में उन्होंने चेन्नई में कुचिपुड़ी कला अकादमी की स्थापना की, जो नृत्य परंपराओं को बढ़ावा देने का प्रमुख केंद्र बनी।
    • उन्होंने श्रीनिवास कल्याणम और रुक्मिणी कल्याणम जैसे प्रसिद्ध कुचिपुड़ी बैले को कोरियोग्राफ किया
    • जो इस शैली के विकास में मील के पत्थर साबित हुए।
    • उनकी अनूठी तकनीकों ने जटिल फुटवर्क, अभिव्यंजक हावभाव और नाट्य तत्वों को मजबूत किया।
  • पुरस्कार और सम्मान
    • 1998 में उन्हें पद्म भूषण मिला, जो भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है
    • उनके नृत्य क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।
    • ये सम्मान उनके द्वारा कुचिपुड़ी को आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्य रूपों में स्थापित करने के योगदान को दर्शाते हैं।
  • विरासत और छात्र
    • उनकी विरासत आज भी जीवित है, क्योंकि शांताला शिवलिंगप्पा जैसे कई प्रसिद्ध नर्तक उनके शिष्य रहे।
    • उन्होंने नृत्य नाटकों को पुनर्जीवित कर आधुनिक दर्शकों तक पहुंचाया, जबकि शास्त्रीय सार को अक्षुण्ण रखा।
    • कुचिपुड़ी, जो आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के कुचिपुड़ी गांव से उत्पन्न हुई, उनके कारण विश्व स्तर पर लोकप्रिय हुई।
    • यह कुचिपुड़ी नृतकी मलबिका सेन का चित्र है, जो पारंपरिक वेशभूषा में मुद्रा प्रदर्शित कर रही हैं—शैली की सुंदरता को दर्शाता है।
  • कुचिपुड़ी का संक्षिप्त परिचय
    • कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य है, जो नृत्य, संगीत और अभिनय का मिश्रण है।
    • यह हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित है, जिसमें सुंदर आंदोलन और जटिल पैरकाम प्रमुख हैं।
    • भारत के अन्य शास्त्रीय नृत्यों जैसे भरतनाट्यम, कथक और ओडिसी के साथ यह सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है।

18. ज़ो-मल-लोक (Zo-Mal-Lok) लोक नृत्य किस समुदाय से संबंधित है? [MTS (T-I) 20 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) लेपचा समुदाय
Solution:
  • नृत्य का विवरण
    • ज़ो-मल-लोक एक समूह नृत्य है, जिसमें पुरुष और महिलाएं दोनों भाग लेते हैं।
    • यह धान की खेती के कृषि चक्र—बुवाई, कटाई और फसल काटने—का उत्सव मनाता है, जो लेप्चा समुदाय की कृषि-आधारित जीवनशैली को दर्शाता है।
    • नर्तक पारंपरिक लेप्चा वेशभूषा धारण करते हैं, जिसमें रंग-बिरंगे लबादे और आभूषण शामिल होते हैं।
    • संगीत की संगत तुंगबुक (बांसुरी), यांगजे (तार वाद्य), झांझ और ड्रम जैसे लेप्चा वाद्ययंत्रों से होती है, जो नृत्य को जीवंत बनाती है।
  • लेप्चा समुदाय
    • लेप्चा हिमालय के मूल निवासी हैं, जिनकी आबादी लगभग 11,000 है।
    • वे मुख्यतः सिक्किम, दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल), भूटान और नेपाल में रहते हैं।​
    • यह समुदाय प्रकृति पूजक है और अपनी भाषा, रीति-रिवाजों तथा लोक कला के लिए जाना जाता है।
    • ज़ो-मल-लोक जैसे नृत्य उनकी सामुदायिक एकता और फसलोत्सव को मजबूत करते हैं।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • यह नृत्य बुवाई-कटाई के मौसम में सामूहिक रूप से किया जाता है, जो सामाजिक बंधन बढ़ाता है।
    • सिक्किम की सांस्कृतिक विरासत में यह प्रमुख है, जो लेप्चा पहचान को जीवित रखता है।
    • वीडियो साक्ष्यों से पता चलता है कि यह सिक्किम के लेप्चा समुदाय द्वारा जीवंत रूप से प्रस्तुत किया जाता है।​

19. 2022 की स्थिति के अनुसार, 2022 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित होने वाली भारत की अंतिम जीवित सदिर नर्तकी (Sadhir dancer) कौन हैं? [MTS (T-I) 20 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) आर. मुथुकन्नमल
Solution:
  • आर. मुथुकन्नमल (R. Muthukannammal) भारतीय राज्य तमिलनाडु के सातवीं पीढ़ी के अनुभवी सदिर नर्तकी हैं।
  • विरालीमलई मुरुगन मंदिर में देवता की सेवा करने वाली 32 देवदासियों में वह एकमात्र जीवित व्यक्ति हैं।
  • वर्ष 2022 में उनके कला में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया था।
  • सदिर नृत्य क्या है?
    • सदिर (या सदीरट्टम, थेवरट्टम) तमिलनाडु की एक प्राचीन शास्त्रीय नृत्य शैली है, जो भरतनाट्यम का मूल रूप मानी जाती है।
    • यह जोरदार फुटवर्क, अभिव्यंजक मुद्राओं और मंदिर पूजा से जुड़ी है, जो मूल रूप से देवदासियों द्वारा की जाती थी।
    • ब्रिटिश काल में देवदासी प्रथा समाप्त होने के बाद यह लगभग लुप्त हो गई थी।
  • पुरस्कार यात्रा
    • 2022 के गणतंत्र दिवस पर पद्मश्री प्राप्त करने से पहले उन्हें दक्षिण चित्र वीरुधु और कलमशु आर्ट अवॉर्ड जैसे सम्मान मिले।
    • 85 वर्ष की उम्र में पुरस्कार मिलने पर उन्होंने कहा, "मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं थी।" वे देश में सदिर की एकमात्र जीवित संरक्षक हैं।​
  • विरासत और महत्व
    • मुथुकन्नम्मल ने राजा राजगोपाल थोंडाइमन के शासनकाल में समृद्धि देखी, लेकिन उसके बाद आर्थिक संकट और देवदासी प्रतिबंध ने उनके मंदिर स्टेज को छीन लिया।
    • फिर भी, उन्होंने तमिलनाडु भर में प्रदर्शन जारी रखे।
    • उनका कार्य सदिर को भरतनाट्यम के रूप में पुनर्जीवित होने से पहले के मूल स्वरूप को संरक्षित रखता है।
    • 2022 तक, वे भारत की अंतिम जीवित सदिर नर्तकी थीं।

20. निम्नलिखित में से कौन-सा नृत्य विशेष रूप से कामड (Kamad) जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाता है? [MTS (T-I) 20 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) तेरहताली नृत्य
Solution:
  • 'तेरहताली', कामड जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला नृत्य का एक रूप है।
  • कामड जाति की स्त्रियां शरीर पर तेरह मंजीरे बांधकर इस नृत्य को करती हैं।
  • नृत्य की उत्पत्ति और महत्व
    • परंपरागत रूप से इसे हिंगलाज माता की पूजा के लिए किया जाता था
    • लेकिन अब बाबा रामदेव जी की आराधना में भी प्रस्तुत होता है।
    • मेवाड़, बिकानेर और मारवाड़ क्षेत्रों में यह लोकप्रिय है, तथा राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और गुजरात में कामड़ समुदाय द्वारा प्रचलित है।​
    • यह नृत्य महिलाओं की भक्ति, कुशलता और ऊर्जा का प्रतीक है
    • जो घरेलू कार्यों को नृत्य के माध्यम से दर्शाती हैं। प्रसिद्ध नर्तकियां जैसे मांगी बाई, नारायणी और मोहिनी इससे जुड़ी हैं।
  • प्रदर्शन की शैली
    • नृत्य जमीन पर बैठकर किया जाता है, जो राजस्थान का एकमात्र ऐसा लोक नृत्य है।
    • महिलाएं शरीर पर 13 मंजीरें (झांझ) बांधती हैं: 9 दाहिने पैर में, 2 कोहनी पर और 2 हाथों में।
    • वे दांतों से तलवार या कटार पकड़ती हैं, जो हिंगलाज माता का प्रतीक है, तथा सिर पर सजावटी बर्तन रखती हैं।​
    • यह जोरदार और तालबद्ध होता है, जहां नर्तकियां पैर, हाथ, सिर और शरीर के विभिन्न हिस्सों से मंजीरें बजाती हैं।
    • पुरुष पीछे बैठकर चौतारा, ढोलक, ताल बजाते हैं और रामदेव जी या हिंगलाज माता के भजन गाते हैं।​
  • सांस्कृतिक संदर्भ
    • कामड़ जनजाति (कामड या कामड़िया) एक घुमंतु समुदाय है, जो लोक नृत्य और भक्ति परंपराओं से जुड़ा है।
    • तेरहताली त्योहारों, पूजा या रामदेव जी के भजनों के दौरान किया जाता है।
    • यह नृत्य न केवल मनोरंजन का साधन है, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान और सामुदायिक एकता को मजबूत करता है।​
    • ध्यान दें कि "कामड" को कभी-कभी "कमार" जनजाति से भ्रमित किया जाता है (जो मध्य प्रदेश में तेराताली से जुड़ी बताई जाती है
    • लेकिन स्रोत स्पष्ट रूप से राजस्थान की कामड़ जनजाति को तेरहताली से जोड़ते हैं। अन्य नृत्य जैसे करमा गोंड या बैगा जनजातियों से संबंधित हैं।​