सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-IV

Total Questions: 50

31. निम्नलिखित में से किस भारतीय नृत्य शैली का संबंध राजस्थान से है? [MTS (T-I) 13 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) घूमर
Solution:
  • 'घूमर' राजस्थान का एक परंपरागत लोक नृत्य है।
  • इसका विकास भील जनजाति ने मां सरस्वती की आराधना करने के लिए किया था।
  • कालबेलिया नृत्य का इतिहास
    • यह नृत्य राजस्थान के कालबेलिया जनजाति का अभिन्न हिस्सा है, जो मुख्य रूप से जोधपुर, जैसलमेर और बाड़मेर जिलों में निवास करती है।
    • इसका उद्गम प्राचीन कबीलाई परंपराओं से जुड़ा है, जहां सर्प नृत्य के माध्यम से प्रकृति पूजा और शिकार की कला का प्रदर्शन होता था।
    • समय के साथ यह होली, विवाह और अन्य उत्सवों में लोकप्रिय हो गया।
  • प्रदर्शन शैली और विशेषताएं
    • महिलाएं काले परिधान में लहराती चालों के साथ सांप की भांति कमर मटकाती हैं
    • जबकि पुरुष पूंगी (सांप निष्कासक वाद्य) बजाते हैं। नृत्य में तेज घुमाव, उछल-कूद और कामुक मुद्राएं प्रमुख हैं
    • जो सांप की चालों की नकल करती हैं। वेशभूषा में काली घाघरा, ओढ़नी और चांदी के गहने उपयोग होते हैं।
  • शास्त्रीय संबंध
    • कथक का जयपुर घराना राजस्थान से जुड़ा है
    • लेकिन यह राष्ट्रीय शास्त्रीय नृत्य है। लोक शैलियों में कालबेलिया सबसे प्रतिष्ठित है।

32. महरी नृत्य (Mahari Dance) और गोटीपुआ नृत्य (Gotipua Dance) का संबंध निम्नलिखित में से किस राज्य से है? [MTS (T-I) 05 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) ओडिशा
Solution:
  • महरी नृत्य (Mahari Dance) और गोटीपुआ नृत्य (Gotipua Dance) भारत के ओडिशा राज्य का एक पारंपरिक नृत्य है।
  • उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • ये दोनों नृत्य रूप ओडिशा राज्य के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से निकटता से जुड़े हैं। महरी नृत्य प्राचीन मंदिर परंपरा का हिस्सा था
    • जहां 'महरी' नामक देवदासियां भगवान जगन्नाथ की सेवा में नृत्य करती थीं। जब 16वीं शताब्दी में देवदासी प्रथा समाप्त हुई
    • तो गोटीपुआ नृत्य विकसित हुआ, जिसमें युवा लड़के लड़कियों के वेश में नृत्य करते थे।
  • महरी नृत्य की विशेषताएं
    • महरी नृत्य ओडिसी शास्त्रीय नृत्य का मूल स्रोत माना जाता है। महरियां गीता गोविंद के पद गाती और नाचती थीं
    • जो भक्ति और आध्यात्मिकता से भरपूर था। यह मुख्य रूप से मंदिर के अंदर ही सीमित रहता था
    • इसमें कोमल मुद्राएं, भावपूर्ण अभिनय तथा भगवान जगन्नाथ-कृष्ण की कथाएं प्रमुख होती थीं। आज यह मंच प्रदर्शन के रूप में पुनर्जीवित हो चुका है।
  • गोटीपुआ नृत्य की विशेषताएं
    • गोटीपुआ ('गो' अर्थात एकल 'पुआ' अर्थात लड़का) महरी का अपभ्रंश रूप है।
    • इसमें 8-14 वर्ष के लड़के स्त्री वेश धारण कर व्यायामिक (एक्रोबैटिक) नृत्य करते हैं
    • जैसे ऊंची कूद, सिर के बल खड़े होना और जटिल मुद्राएं।
    • यह सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए था, मंदिर के बाहर चंदन हाट जैसे स्थानों पर, और ओडिसी के विकास में महत्वपूर्ण रहा।
  • आपसी संबंध और सांस्कृतिक महत्व
    • गोटीपुआ महरी परंपरा का उत्तराधिकारी है; महरी के पतन के बाद लड़कों ने इसे जारी रखा।
    • दोनों ही जगन्नाथ भक्ति से प्रेरित हैं और ओडिशा की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग हैं।
    • इन्होंने आधुनिक ओडिसी नृत्य को जन्म दिया, जो अब वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है। ओडिशा सरकार इनकी संरक्षा के लिए प्रयासरत है।

33. लेबंग बूमानी (Lebang Boomani) नृत्य ....... का फसल नृत्य (harvest dance) है। [MTS (T-I) 05 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) त्रिपुरा
Solution:
  • लेबंग बूमानी (Lebang Boomani) नृत्य त्रिपुरा का फसल नृत्य है।
  • लेबंग बूमानी नृत्य के वाद्ययंत्रों में खंब, बांसुरी, सरिंडा, बांस से बने लेबांग तथा बांस की झांझ शामिल हैं।
  • लेबंग बूमानी त्रिपुरा का फसल नृत्य है।
    • यह नृत्य त्रिपुरा के त्रिपुरी समुदाय द्वारा फसल कटाई के मौसम में मनाया जाता है
    • जिसमें टिड्डियों को पकड़ने की क्रिया को दर्शाया जाता है।
  • उत्पत्ति और महत्व
    • लेबंग बूमानी (या लेबांग बुमानी) त्रिपुरा राज्य का पारंपरिक फसल उत्सव नृत्य है
    • जो मुख्य रूप से त्रिपुरी मूलनिवासी लोगों द्वारा किया जाता है। यह नृत्य फसल की अच्छी पैदावार का जश्न मनाता है
    • क्योंकि टिड्डियां (लेबांग) को समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
    • त्रिपुरी संस्कृति में यह गारिया नृत्य के साथ जुड़ा है, जो बुआई के समय होता है।
  • प्रदर्शन शैली
    • नर्तक रंग-बिरंगे परिधानों में सजते हैं और टिड्डी पकड़ने की नकल करते हुए समूह में नृत्य करते हैं।
    • लड़कियां मुख्य रूप से भाग लेती हैं, जो बांस के थैले में टिड्डियां इकट्ठा करने का अभिनय करती हैं।
    • ढोल, बांसुरी और बांस के कड़कने वाले यंत्रों से लयबद्ध संगीत बजता है, जो नृत्य को जीवंत बनाता है।
  • सांस्कृतिक संदर्भ
    • त्रिपुरा पूर्वोत्तर भारत का राज्य है, जहां विविध जनजातीय संस्कृति फली-फूली है। यह नृत्य कृषि जीवनशैली को दर्शाता है
    • पक्षियों को आकर्षित करने वाली टिड्डियों से फसल की रक्षा का विश्वास व्यक्त करता है।
    • आधुनिक समय में इसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं में भी प्रस्तुत किया जाता है।

34. निम्नलिखित में से नर्तक/नर्तकी और संबंधित नृत्य शैली की गलत जोड़ी की पहचान कीजिए। [MTS (T-I) 05 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) कुमकुम धर - कुचिपुड़ी
Solution:
  • कुमकुम घर एक प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना हैं, जिन्होंने कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
  • कुमकुम घर को कथक नृत्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  • गलत जोड़ी का विवरण
    • कुमकुम धर कुचिपुड़ी नृत्य से जुड़ी नहीं हैं। वे मुख्य रूप से भरतनाट्यम या अन्य शैलियों की नृत्यांगना हो सकती हैं
    • लेकिन कुचिपुड़ी के प्रसिद्ध कलाकार यामिनी कृष्णमूर्ति, राजा रेड्डी एवं राधा रेड्डी जैसे हैं।
    • कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश की शास्त्रीय नृत्य शैली है, जो तीव्र लय, प्रवाहपूर्ण गति और नाटकीय अभिनय के लिए जानी जाती है।​
  • अन्य सामान्य गलत जोड़ियाँ
    • कभी-कभी परीक्षाओं में ये भी गलत बताई जातीभारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा अत्यंत समृद्ध है
    • जिसमें विभिन्न नर्तक-नर्तकियों ने विशिष्ट शैलियों को लोकप्रिय बनाया। प्रश्न में "निम्नलिखित में से" कहा गया है
    • लेकिन कोई विकल्प सूचीबद्ध नहीं हैं, इसलिए सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नों के आधार पर सबसे आम गलत जोड़ी कुमकुम धर - कुचिपुड़ी है।​
  • शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ
    • भारत की मान्यता प्राप्त 8 शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ हैं
    • भरतनाट्यम (तमिलनाडु), कथक (उत्तर भारत), कथकली (केरल), कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश), ओडिसी (ओडिशा), मोहिनीअट्टम (केरल), मणिपुरी (मणिपुर) और सत्रिया (असम)।
    • ये नृत्य नाट्यशास्त्र पर आधारित हैं और भाव, राग, ताल के समन्वय पर केंद्रित हैं।​
  • प्रसिद्ध जोड़ियाँ
    • सितारा देवी - कथक: कथक की थारी वंश की प्रमुख नर्तकी, जिन्होंने तेज़ चक्कर और घुंघरू की धुन से इसे वैभव प्रदान किया।​
    • यामिनी कृष्णमूर्ति - भरतनाट्यम: भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी दोनों में निपुण, लेकिन मुख्यतः भरतनाट्यम से जुड़ी।
    • पंडित बिरजू महाराज - कथक: लखनऊ घराने के आचार्य, जिन्होंने कथक को वैश्विक पहचान दी।
    • पद्म सुब्रह्मण्यम - भरतनाट्यम: तंजावुर घराने की प्रमुख, जिन्होंने शरद राम की परंपरा को आगे बढ़ाया।
    • इंद्राणी रहमान - ओडिसी: ओडिसी को पुनर्जनन देने वाली प्रमुख नर्तकी।​
  • गलत जोड़ी का विश्लेषण
    • कुमकुम धर कुचिपुड़ी से संबंधित नहीं हैं।
    • कुमकुम धर मुख्य रूप से कथक नृत्य से जुड़ी हैं
    • जबकि कुचिपुड़ी के प्रमुख कलाकार राजा रेड्डी, राधा रेड्डी और यामिनी कृष्णमूर्ति हैं।
    • यह जोड़ी SSC जैसी परीक्षाओं में बार-बार गलत के रूप में आती है।​
  • अन्य सामान्य गलतियाँ
    • शोभना नारायण - कथक: सही, कथक की विशेषज्ञ।​
    • दमयंती जोशी - कथक: जयपुर घराने की।​
    • कुछ प्रश्नों में पंडित बिरजू महाराज को सत्रिया से जोड़ा जाता है, जो गलत है (सही: कथक)।​
  • नृत्य शैलियों की विशेषताएँ
    • कुचिपुड़ी: पुरुष प्रधान, तीव्र लय, आंध्र से; इसमें नृत्य-नाटक का मिश्रण।​
    • भरतनाट्यम: स्थिर धड़, जटिल पद, भावपूर्ण हस्तमुद्राएँ।​
    • यह ज्ञान प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी है, जहाँ ऐसी जोड़ियाँ बारंबार परीक्षित होती हैं।

35. ....... का शाब्दिक अर्थ है 'जादूगरनी का नृत्य (dance of the enchantress)' यह भारतीय शास्त्रीय नृत्य प्रदर्शनों की सूची में सबसे आकर्षक नृत्य शैली में से एक है। [MTS (T-I) 04 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) मोहिनीअट्टम
Solution:
  • 'मोहनीअट्टम' का शाब्दिक अर्थ है-जादूगरनी का नृत्य। मोहनीअट्टम भारत के केरल राज्य की शास्त्रीय नृत्य शैली है।
  • यह परंपरागत रूप से व्यापक प्रशिक्षण के बाद महिलाओं द्वारा किया गया एक एकल नृत्य है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • मोहिनीअट्टम की जड़ें केरल के प्राचीन नाट्य परंपराओं में हैं, जो भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से प्रेरित है।
    • "मोहिनी" का अर्थ भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार है, जो राक्षसों को मोहित करने वाली जादूगरनी रूप था
    • जबकि "अट्टम" का अर्थ नृत्य है। यह 18वीं शताब्दी में विकसित हुआ, जब वल्लनल स्वामी और तात्तुविले कर्री को इसके प्रमुख संरक्षक माने जाते हैं।
    • स्वतंत्रता के बाद इसे पुनर्जीवित किया गया, और कलामंडलम जैसे संस्थानों ने इसे मानकीकृत किया।
  • विशेषताएँ
    • यह नृत्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा एकल रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें लहराती गतियाँ, कोमल मुद्राएँ और सूक्ष्म चेहरे के भाव प्रमुख हैं।
    • नृत्य में आड़ीचल (तिरछी चाल), स्विंगिंग हिप्स और ऊपरी शरीर की तरल गतियाँ होती हैं
    • जो समुद्र की लहरों जैसी लगती हैं। पैरों के बजाय हाथों और आँखों पर जोर रहता है, तथा अभिनय (नृत्य) भावनाओं को उजागर करता है।
  • वेशभूषा और आभूषण
    • नृत्यांगना सफेद या क्रीम रंग की कशीदाकार साड़ी पहनती है, जो सोने की जरी से सजी होती है
    • केरल की परंपरा को दर्शाती हुई। बालों को गजरा से सजाया जाता है, चेहरे पर न्यूनतम मेकअप रहता है जो कोमलता बढ़ाता है।
    • आभूषण हल्के होते हैं—कान की बाली, नथ, चूड़ियाँ और पायल—जो चाँदी या सोने के होते हैं। कमर पर चोली और घाघरा जैसा भाग मोहकता जोड़ता है।​
  • संगीत और ताल
    • इसका संगीत सोपान संगीत पर आधारित है, जो रागम (राग), तalam (ताल) और पंचवर्णम (पाँच रंगों वाली थीम्स) का उपयोग करता है।
    • मुख्यतः मध्यम लय (मध्य ताल) में नृत्य होता है, जिसमें मृदंगम, वीणा, ढोलक और कंठ संगीत प्रमुख हैं।
    • पदम (गीतों पर आधारित भावपूर्ण भाग) और अष्टपदी (जयदेव के गीत) जैसे रूप लोकप्रिय हैं।
  • मुद्राएँ और भाव-भंगिमा
    • मोहिनीअट्टम में 24 मूल मुद्राएँ (हस्त मुद्राएँ) हैं, जैसे कटक मुद्रा (चुटकी बजाना) और हाथों की तरंग जैसी गतियाँ।
    • नव रसों में शृंगार रस प्रधान है, लेकिन करुणा, हास्य आदि भी शामिल होते हैं। आँखों की नजरें और भौंहों की भंगिमाएँ मोहकता पैदा करती हैं।​
  • प्रदर्शन शैली
    • प्रदर्शन तीन भागों में होता है—आनुष्ठानिक शुरुआत (अंगिकम), शब्दिक अभिनय (पदम) और जटिल नृत्य (तिल्लाना)।
    • यह मंदिरों, मंचों या सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया जाता है।
    • केरल कलामंडलम और डॉ. कानक रेगी जैसी कलाकारों ने इसे वैश्विक पहचान दी।

36. शंभू महाराज निम्नलिखित में से किस कथक घराने के प्रसिद्ध गुरु थे? [MTS (T-I) 04 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) लखनऊ
Solution:
  • शंभू महाराज लखनऊ घराने से संबंधित थे। वह भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली कथक के गुरु थे। कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्य में आठ प्रमुख प्रकारों में से एक है।
  • जीवन परिचय
    •  जो लखनऊ घराने से जुड़े थे, और 4 नवंबर 1970 को उनका निधन हो गया।
    • उनके पिता कालका प्रसाद महाराज, चाचा बिंदादीन महाराज और बड़े भाई अच्चन महाराज से उन्हें कथक की प्रारंभिक शिक्षा मिली
    • जबकि ठुमरी गायकी मुईनुद्दीन खाँ के भाई रहीमुद्दीन खाँ से प्राप्त हुई।
    • इस तरह वे नृत्य के साथ-साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी निपुण हो गए।
  • कथक घराना और योगदान
    • लखनऊ घराना कथक का एक प्रमुख घराना है, जो भाव-प्रधान अभिनय और लालित्यपूर्ण शैली के लिए जाना जाता है।
    • शंभू महाराज इस घराने के स्तंभ थे और उन्होंने कथक को भावों की गहराई प्रदान की। वे नृत्य में लय से अधिक भावों को महत्व देते थे
    • मानते थे कि "भाव-विहीन लय मात्र तमाशा है, नृत्य नहीं।
    • उन्होंने श्रीराम भारतीय कला केंद्र जैसे संस्थानों में कथक सिखाया और कई प्राचीन बोल, टुकड़े व परण कंठस्थ रखे।
  • उपलब्धियाँ और पुरस्कार
    • शंभू महाराज को 1956 में पद्म श्री और 1967 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से सम्मानित किया गया।
    • वे लखनऊ घराने के अन्य महान कलाकारों जैसे सुंदर प्रसाद, लच्छू महाराज (उनके बड़े भाई), बिरजू महाराज के समकालीन थे।
    • उनके नृत्य में शोक, प्रेम, क्रोध जैसे भाव चमत्कारपूर्ण ढंग से व्यक्त होते थे, खासकर ठुमरी संग नृत्य में।
  • विरासत
    • शंभू महाराज को 'नृत्य सम्राट' कहा जाता है, जिन्होंने कथक को भावपूर्ण ऊँचाई दी।
    • उनके शिष्यों और घराने ने कथक को वैश्विक पहचान दिलाई, और वे आज भी प्रेरणा स्रोत हैं।

37. नटवरी नृत्य किस नृत्य शैली से संबंधित है? [MTS (T-I) 04 सितंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) कथक
Solution:
  • नटवरी नृत्य शैली कथक नृत्य शैली से संबंधित है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • जहाँ कथा वाचक और रास धारी परंपराएँ मंदिरों में फली-फूलीं। 1960 के दशक में कथक नृत्यांगना उमा शर्मा ने इसे पुनर्जीवित किया।
    • अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में ठाकुर प्रसाद जैसे नर्तकों ने इसे लोकप्रिय बनाया।
  • विशेषताएँ
    • यह चंचल और लीलामय प्रकृति का नृत्य है, जिसमें जटिल फुटवर्क (तात्कार), घुमाव (चक्कर), हाथों की मुद्राएँ और चेहरे के भाव प्रमुख हैं।
    • मध्य लय (मध्यालय) में तींटाल (16 मात्राएँ) पर नाचा जाता है
    • जिसमें विशेष बोल जैसे "तबला तक धा" या "डोरा, कलाई, पलटा, टुकरा" का प्रयोग होता है।
    • यह कृष्ण की कालिया मर्दन लीला या रासलीला जैसी कहानियाँ व्यक्त करता है।​​
  • कथक से संबंध
    • कथक के लखनऊ घराने से निकटता है, जहाँ नटवरी को "कृष्ण का नृत्य" कहा जाता है।
    • कथक की अन्य शैलियों (जैसे जयपुर या बनारस) से भिन्न
    • यह अधिक भावपूर्ण और नाटकीय है। शंभू महाराज जैसे गुरुओं ने इसे शुद्ध रूप में सिखाया।

38. ....... की दो परंपराएं हैंः एक है संकीर्तन (जो भक्ति पहलू है) और दूसरा है रास। [MTS (T-I) 04 सितंबर, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) मणिपुरी नृत्य
Solution:
  • 'मणिपुरी नृत्य' की दो परंपराएं हैं, एक है संकीर्तन (जो भक्ति पहलू है) और दूसरा है रास।
  • मणिपुरी नृत्य भारत के उत्तरी- पूर्वी भाग में स्थित राज्य मणिपुर से संबंधित है।
  • संकीर्तन: भक्ति का सामूहिक गान
    • संकीर्तन मणिपुर का प्राचीन भक्ति रूप है, जो सामूहिक रूप से भगवान कृष्ण के नाम, गुण और लीलाओं का जाप करता है।
    • इसे पुथी (पवित्र ग्रंथों) के पाठ के साथ गाया जाता है, जिसमें सखी (मध्यस्थ), पहाड़ी वाद्ययंत्र और कर्तालों का प्रयोग होता है।
    • भक्त वृत्ताकार बनकर नृत्य करते हैं, हाथ जोड़कर 'हरि कृष्ण' का संकीर्तन गाते हैं
    • जो आध्यात्मिक एकता पैदा करता है। यह परंपरा 18वीं शताब्दी में राजा भग्य चंद्र द्वारा विकसित हुई और दैनिक पूजा से लेकर त्योहारों तक प्रचलित है।​​
  • रासलीला: कृष्ण-राधा की दिव्य लीला
    • रास मणिपुर का शास्त्रीय नृत्य-नाटक है, जो कृष्ण की गोपियों संग रासलीला का चित्रण करता है।
    • रासलीला पांच प्रकार की होती है: महारास, बसंत रास, नंदीग्राम रास, खम्बा थाबी और पूरण रास।
    • इसमें मणिपुरी नृत्य शैली का प्रयोग होता है, जिसमें कठोर हथियार आंदोलन, चेहरे के भाव और वस्त्र (रंगीन फूलों जैसे) प्रमुख हैं।
    • यह कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिरों में मंचित होती है, जिसमें बाल कलाकार कृष्ण, राधा और गोपियों की भूमिकाएं निभाते हैं।
    • श्रीकृष्ण की लीला को जीवंत करने वाला यह रूप भक्ति और कला का संगम है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • मणिपुर में वैष्णव भक्ति 18वीं शताब्दी में राजा गारिब निवाज (पमहेईबा) से मजबूत हुई
    • जिन्होंने श्रीकृष्ण की मूर्ति लाकर राज्य धर्म बनाया। राजा भग्य चंद्र ने संकीर्तन और रास को संगठित रूप दिया।
    • चैतन्य महाप्रभु की भक्ति प्रभाव से ये रूप विकसित हुए। संकीर्तन नाम-जप पर केंद्रित है, जबकि रास नाटकीय चित्रण।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ये परंपराएं मणिपुरी पहचान का आधार हैं। संकीर्तन सामुदायिक एकता बढ़ाता है, रास कला को समृद्ध करता है।
    • यूनेस्को ने रासलीला को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया। ये त्योहारों जैसे रथ यात्रा, जन्माष्टमी पर जीवंत होते हैं।

39. पंथी नृत्य शैली भारत के ....... राज्य से संबंधित है। [MTS (T-I) 13 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) छत्तीसगढ़
Solution:
  • पंथी नृत्य शैली छत्तीसगढ़ राज्य में बसे सतनामी समुदाय का प्रमुख नृत्य है। यह नृत्य स्थानीय समूहों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    •  यह नृत्य गुरु घासीदास की भक्ति, त्याग और निर्गुण भक्ति दर्शन को समर्पित है
    • जिसमें कबीर, रविदास तथा दादू जैसे संतों के उपदेशों का प्रभाव दिखता है।
    • मूल रूप से यह भावातिरेक में भक्तों का आनंदोत्सव था, जो धीरे-धीरे एक संगठित नृत्य रूप में विकसित हुआ।
  • प्रदर्शन विशेषताएं
    • नृत्य सामूहिक रूप से किया जाता है, जहां नर्तक रंग-बिरंगे परिधान पहनते हैं और लाठी, तलवार जैसे साधनों का उपयोग करते हुए जटिल मुद्राओं में थिरकते हैं।
    • यह भगवान राम और देवी दुर्गा को समर्पित धार्मिक त्योहारों, विशेषकर सतनामी समुदाय के अनुष्ठानों में प्रस्तुत होता है।
    • मधुर गीतों की संगत के साथ मृदंग, झांझ जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, जो नृत्य को अभिव्यंजक और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • पंथी नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का माध्यम है
    • जो उच्च चेतना प्राप्ति का प्रतीक है।
    • यह छत्तीसगढ़ की अन्य लोक कलाओं जैसे सैला, कर्मा, राउत नाचा के साथ राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
    • हाल के वर्षों में राष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इसकी लोकप्रियता बढ़ी है, जो सतनामी समुदाय की एकता और भक्ति को पूरे भारत तक पहुंचाता है।

40. झारखंड का पाइका नृत्य (Paika Dance) आमतौर पर ....... जनजाति द्वारा विशेष सम्मानित अतिथियों के स्वागत के लिए या धार्मिक जुलूस (शोभा यात्रा) के दौरान किया जाता है। [MTS (T-I) 05 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) मुंडा
Solution:
  • झारखंड का पाइका नृत्य आमतौर पर मुंडा (Munda) जनजाति द्वारा विशेष सम्मानित अतिथियों के स्वागत के लिए या धार्मिक जुलूस (शोभा यात्रा) के दौरान किया जाता है।
  • पाइका नृत्य का परिचय
    • मुंडा जनजाति, जो छोटा नागपुर पठार क्षेत्र में निवास करती है, इस नृत्य को अपनी परंपरा के रूप में जीवित रखती है।
    • नृत्य में कम से कम 18 कलाकार भाग लेते हैं, जो सामूहिक रूप से ऊर्जावान और समन्वित गतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते हैं।​
  • प्रदर्शन के अवसर
    • यह नृत्य आमतौर पर विशेष सम्मानित अतिथियों के स्वागत के लिए किया जाता है
    • जैसे कि गांव या समुदाय में महत्वपूर्ण मेहमानों का आगमन।
    • इसके अलावा, धार्मिक जुलूस या शोभा यात्राओं में इसे उत्सव की शोभा बढ़ाने के लिए प्रस्तुत किया जाता है।​
    • झारखंड के विभिन्न त्योहारों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सरकारी आयोजनों में भी पाइका नृत्य लोकप्रिय हो गया है।
    • आजकल कलाकार कार्यक्रमों के लिए ₹30,000 तक शुल्क लेते हैं, जो इसकी बढ़ती मांग को दर्शाता है।​
  • वेशभूषा और सामान
    • नर्तक चटकीले रंगों वाले परिधान पहनते हैं, जिसमें धोती, लाल-हरी पगड़ी, मोर पंख (पंख) और झलर (फ्रिल्स) शामिल होते हैं।
    • बाएं हाथ में ढाल (धाल) और दाएं में दोधारी तलवार होती है, जो युद्ध की तैयारी का प्रतीक है।​
    • पगड़ी को गिरने से बचाने के लिए रंगीन कपड़े की पट्टियां हाथों, कोहनियों और छाती पर बांधी जाती हैं
    • जो रंगीन पंखों जैसा प्रभाव पैदा करती हैं। सर पर जंगली घास भी सजाई जाती है।​​
  • संगीत और वाद्य यंत्र
    • नृत्य में ढोल, मांदर, शहनाई, झाल, झांझर और ढाक जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग होता है।
    • ये यंत्र उत्साहपूर्ण ताल और लय प्रदान करते हैं, जो नृत्य को युद्ध जैसा रोमांचक बनाते हैं।
    • संगीत जनजातीय परंपराओं से प्रेरित होता है और नर्तकों की गतियों के साथ पूर्ण सामंजस्य रखता है।​
  • ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
    • पाइका नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मुंडा जनजाति की वीरता, युद्ध कौशल और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।
    • यह झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के छोटानागपुर क्षेत्र में सदानी नागपुरी मार्शल लोक नृत्य के रूप में जाना जाता है।
    • आज सरकारी प्रयासों और सांस्कृतिक उत्सवों के माध्यम से इसे संरक्षित किया जा रहा है
    • संथाल, उरांव और भूमिज जैसी अन्य जनजातियों के अपने नृत्य हैं, लेकिन पाइका मुंडा की विशिष्टता दर्शाता है।