सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-V

Total Questions: 59

31. सी.वी. चंद्रशेखर को निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था? [CHSL (T-I) 02 जून, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) भरतनाट्यम
Solution:
  • सी.वी. चंद्रशेखर को भरतनाट्यम नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए वर्ष 2011 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
  • इस सम्मान के साथ उनका प्रमुख योगदान भारतीय शास्त्रीय नृत्य पर केंद्रित रहा
  • खासकर भरतनाट्यम के क्षेत्र में उनके नवाचार, कोरियोग्राफी और शिक्षण कार्य के कारण। नीचे विस्तृत संदर्भ है:
  • पद्म भूषण की घोषणा: 2011 में भारत सरकार ने भरतनाट्यम के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सी.वी. चंद्रशेखर को पद्म भूषण से सम्मानित किया।
  • यह सम्मान भारतीय नागरिकों के लिए तीसरा उच्च नागरिक पुरस्कार है और नृत्य क्षेत्र में उनकी प्रतिष्ठा को मान्यता देता है.​
  • कला संपत्ति और योगदान: चंद्रशेखर एक विशिष्ट भरतनाट्यम नर्तक, कोरियोग्राफर और शिक्षक के रूप में जाने जाते थे
  • जिन्होंने परंपरागत तत्वों के साथ आधुनिक अभिव्यक्ति को मिलाने का प्रयास किया, जिससे बच्चों और युवा कलाकारों में शास्त्रीय नृत्य के प्रति रुचि जागृत हुई.​
  • भरतनाट्यम का परिचय: भरतनाट्यम तमिलनाडु से उत्पन्न भारतीय शास्त्रीय नृत्य है
  • जिसमें सशक्त भाव-भंगिमा, मणिक-आंशिक पादकलाएं और कठिन तकनीकी कौशल प्रमुख हैं।
  • यह देवदासी-संस्कृति और संरचित आचार-व्यवस्था के साथ गहरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि रखता है.​
  • अन्य संदेह के संभावित विकल्पों की स्पष्टता: इसके अतिरिक्त प्रश्न में अन्य नृत्यों जैसे कथकली, मणिपुरी, kathak आदि भी भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के प्रमुख रूप हैं
  • पद्म भूषण के लिए 2011 में उनका सम्मान भरतनाट्यम के क्षेत्र में ही तय हुआ था.​

32. कलामंडलम क्षेमवती पवित्रन को निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था? [CHSL (T-I) 02 जून, 2022 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) मोहिनीअट्टम
Solution:
  • कलामंडलम क्षेमवती पवित्रन को मोहिनीअट्टम नृत्य शैली में उनके योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार से वर्ष 2011 में सम्मानित किया गया था।
  • पूरा विवरण:
    • क्रेडेंशियल्स: कलामंडलम क्षेमवती पावित्रन एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नर्तकी हैं
    • जिन्हें मोहिनीअट्टम शैली में उनके योगदान के लिए पद्म श्री मिला था।
    • यह जानकारी उनके मोहिनीअट्टम में संस्थापक-स्तरीय योगदान और Kerala से उत्पत्ति के संदर्भ में दी जाती है ।​
    • मोहिनीअट्टम की पृष्ठभूमि: मोहिनीअट्टम दक्षिण भारत के केरल में विकसित हुआ
    • एक अत्यंत अभिव्यक्ति-आधारित नृत्य रूप है जिसमें नर्तकी का रूप-आकार और facial expression गहरी भूमिका निभाते हैं ।
    • क्यों अहम माने जाते हैं: क्षेमवती पावित्रन के प्रदर्शन-शैली में उनके शिक्षक-कोरियोग्राफर योगदान, शिक्षक-नर्तकी दोनों के रूप में उनकी भूमिका और उनके कई वर्षों के करीबी प्रशिक्षण से मोहिनीअट्टम के पुनर्जीवन-प्रसार में उनका योगदान माना जाता है ।​
  • नोट्स और संदर्भ:
    • मोहिनीअट्टम और पद्म श्री के बीच संबंध की पुष्टि के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों में अक्सर क्षेमवती पावित्रन के नाम के साथ मोहिनीअट्टम का उल्लेख आता है
    • पद्म श्री सम्मान का उल्लेख उनके नाम के साथ किया गया है ।​
    • मोहिनीअट्टम के बारे में सामान्य जानकारी भी केरल-आधारित नृत्य रूप होने का संकेत देती है, जिससे उनके संदर्भ स्पष्ट होते हैं ।​

33. इंद्राणी रहमान भारत के किस शास्त्रीय नृत्य से जुड़ी थीं? [MTS (T-I) 12 जुलाई, 2022 (III-पाली)]

I. भरतनाट्यम नृत्य

II. ओडिसी नृत्य

Correct Answer: (c) I और II दोनों
Solution:
  • इंद्राणी रहमान भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली और ओडिसी की एक भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना थीं। उन्हें वर्ष 1969 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
  • पूरा विवरण:
    • जीवन-परिचय: इंद्राणी रहमान एक प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नर्तकी और सांस्कृतिक व्यक्तित्व थीं
    • जिन्होंने भारत और विदेशों में शास्त्रीय नृत्यों का प्रचार-प्रसार किया
    • वे 1950s के दशक में मिस इंडिया प्रतियोगिता जीतीं और बाद में पश्चिमी देशों में भारतीय नृत्यों की पहचान बनाने में लगीं .
  • नृत्य-शैलीयों से जुड़ाव:
    • भरतनाट्यम: दक्षिण भारत के तमिलनाडु-शास्त्रीय नृत्य के प्रमुख स्तंभ में वे अग्रणी कलाकारों में से एक मानी जाती हैं
    • उन्होंने भरतनाट्यम में प्रशिक्षित होकर प्रदर्शन किए और इसे विदेशों में प्रस्तुत किया .
    • कुचिपुड़ी: आंध्र प्रदेश का शास्त्रीय नृत्य जिसे इंद्राणी ने भी सीखा और संप्रेषित किया; वे इस शैली के प्रचार-प्रसार में सहमोहित रहीं .
    • कथकली: केरल के दिव्य-नृत्य कथकली में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा; उनका प्रशिक्षण और प्रदर्शन इस शास्त्रीय कला में उनके योगदान को दर्शाते हैं .
    • ओडिसी: उड़ीसा का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य, जिसे उन्होंने वैश्विक मंच पर स्थापित करने में भूमिका निभाई; ओडिसी उनके व्यापक-आयाम नृत्य-रचय के हिस्से रहे .
    • वैश्विक प्रभाव: उनकी कला-यात्रा पश्चिम में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के प्रति रुचि बढ़ाने, हॉर्वर्ड-ने जुड़े शैक्षिक संस्थानों से नृत्य-प्रशिक्षण के अवसर प्राप्त करने और न्यूयॉर्क आदि में स्थायित्व बनाने में प्रभावी रही .
    • सम्मान व इतिहास: भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के लिए उनके योगदान को मान्यता मिली
    • वे 1960s-1970s में अंतरराष्ट्रीय舞台 पर भारतीय नृत्यों की प्रतिष्ठा बढ़ाने वालों में से एक मानी जाती हैं .
    • संबंधित संदर्भ सूचना: भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली और ओडिसी शामिल हैं
    • वे चारों में स्थापित प्रतिनिधित्व के रूप में पहचान में आईं और पश्चिमी मंचों पर भारत-नृत्यों की लोकप्रियता बढ़ाई .

34. शास्त्रीय ओडिसी नृत्य में निम्नलिखित में से सबसे पहले कौन-सा स्टेप किया जाना चाहिए? [Phase-XI 30 जून, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) मंगलाचरण
Solution:
  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य के अनेक रूपों में से 'ओडिसी नृत्य' एक है।
  • पारंपरिक ओडिसी नृत्य का प्रदर्शन 'मंगलाचारण' से प्रारंभ होती है।
  • उसके बाद क्रमशः बटु, पल्लवी, अभिनय और मोक्ष नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
  • सीधा उत्तर
    • शास्त्रीय ओडिसी नृत्य में सबसे पहले किया जाने वाला स्टेप है
    • Mangalacharana (मुंगळचरण), जिसे आशीर्वाद-इन्वोकेशन के रूप में भी जाना जाता है।
  • पूरा विवरण
    • Mangalacharana क्या है: यह एक इन्वोकेशन/आशीर्वाद-पंक्ति है जिसमें नर्तकी मंदिर-भक्ति या देवी-देवता को समर्पित एक श्लोक के रूप में शुरूआत करती है
    • प्रस्तुति के लिए शुभ और शांत वातावरण बन सके। यह भाग भाव-विन्यास और सेट-अप के लिए प्रारम्भिक ध्वनि-चालना बनता है.​​
    • क्रमिक स्थान: Odissi के पारंपरिक आचार-संरचना में Mangalacharana के बाद Pushpanjali (फूल अर्पण) और Bhumi Pranam (माँearth को प्रणाम) जैसे स्टेप आते हैं
    • इससे नर्तकी का ध्यान, ऊर्जा-स्तर और भवन-संयोजन सेट होता है.​
    • उद्देश्य और प्रदर्शन-तत्व: यह स्टेप आध्यात्मिक-आचरण, गुरु-शिष्य-आयतन, और मंच-सम्बद्धता को स्थापित करता है।
    • भाव-भंगिमा, नेत्र-आँखों की कंट्रोल और देह-स्थिति के साथ शास्त्रीय हस्त-चालों की सटीकता भी इस भाग में उभरती है.
    • प्रमुख मुद्रा/तकनीक: Mangalacharana के दौरान नर्तकी अक्सर एक प्रशस्त-आयाम वाले डेस्को-स्तर (ऊँचे-आंखी, अभिवादन-सी मुद्रा) में शौर्य या भक्ति की मुद्रा बनाती है
    • दर्शकों को शास्त्रीयता की पुष्टि मिले। इसके साथ सूक्ष्म मुख-भंगिमा और गलबंन/कंधे-गति की अनुशासनपूर्ण प्रस्तुति भी महत्त्वपूर्ण रहती है.
    • सांस्कृतिक संदर्भ: Odissi की उत्पत्ति और मंदिर-परंपरा से इसका गहरा संबंध रहा है; यह नृत्य-कला के आरम्भिक भागों में से एक है
    • बहुधा Jagannath मंदिर-आकाश-आवेश से जुड़ी कथाओं को आगे बढ़ाने के लिए मंचित किया जाता है.

35. 'मोक्ष' भारत के निम्नलिखित शास्त्रीय नृत्य रूपों में से किस से संबंधित है? [Phase-XI 30 जून, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) ओडिसी
Solution:
  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य के अनेक रूपों में से 'ओडिसी नृत्य' एक है। पारंपरिक ओडिसी नृत्य का प्रदर्शन 'मंगलाचारण' से प्रारंभ होती है।
  • उसके बाद क्रमशः बटु, पल्लवी, अभिनय और मोक्ष नृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
  • विरूपण और संकल्पना
    • मोक्ष को हिन्दू दर्शन में संसार के चक्र से मुक्ति, अजर-अमर आत्मा की पराकाष्ठा और ब्रह्मानंद की अनुभूति माना जाता है; यह गैर-भौतिक शुद्धि का लक्ष्य है.​
    • बहुत से शास्त्रीय नृत्यों में दिव्य प्रेरणा, भक्तिपूर्ण समर्पण और मोक्ष-संभावना के संकेत दिखते हैं
    • जैसे भगवान के विभिन्न अवतारों के नाट्य-आकर्षक प्रसंगों में मोक्ष, उद्धार और दिव्यता की चर्चा होती है.​
    • इसलिए “मोक्ष” के सिद्धान्त का नृत्यों की संरचना, मर्म और अभिनय में गहरा स्थान रहता है, भले ही कोई नृत्य नाम सीधे इसका नाम न हो.
  • नृत्यों के संदर्भ में मोक्ष-एप्लिकेशन
    • मोहिनीअट्टम, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओड़िसी, कथकली, कथक और सत्रिया जैसे शास्त्रीय नृत्यों में भगवत-प्रसंग, अवतार-कथाएँ और अध्यात्मिक उन्मुक्ति की कथा मिलती है
    • इन कथाओं के भीतर मोक्ष की आकांक्षा, आत्म-त्याग और दिव्यता का चित्रण सामान्य है.
    • लोक नृत्यों में भी आध्यात्मिकता, त्योहार-उत्साह और प्रकृति के साथ आचार-विचार के माध्यम से मोक्ष के विचार का सांस्कृतिक प्रभाव दिख सकता है
    • उदाहरण के तौर पर चैत्र/वसंत के त्योहारों के साथ नृत्य-प्रदर्शनों में शास्त्रीय-लोक कला का मिश्रण होता है.​
    • किसी नृत्य-शैली के भीतर मोक्ष सीधे नाम से न हो भी सकता है
    • शैलीगत अभिव्यक्ति जैसे भक्ति-रस, देवी-पूजा और पौराणिक तत्वों के माध्यम से मोक्ष की अनुभूति प्रस्तुत होती है.​
  • चयनित शास्त्रीय नृत्यों के भीतर मोक्ष-डायनेमिक्स
    • भरतनाट्यम: भगवान की महिमा, मोक्ष की आध्यात्मिक यात्रा और नैतिक-आध्यात्मिक शिक्षा का प्रदर्शन; राग-भक्ति-नाट्य के संयोजन से मोक्ष का भाव उभरता है.​
    • ओड़िसी: चित्रण-based नृत्य where परमात्मा के वरदान और मोक्ष की दैवीय दिशा का आभास दिलाया जाता है; देवी-पुराण कथाओं के माध्यम से प्रेरणा मिलती है.​
    • कथकली: मलयालम मिथकों और भगवान विष्णु के अवतारों की कथा, जहाँ मोक्ष का तत्व कथानकों के अंत में शुद्धि-मार्ग के रूप में आता है.​
    • सत्रिया: असम की नृत्य-शैली जिसमें नैमित्तिक देव-आराधना और भक्ति-आध्यात्मिकता मोक्ष-भावना के साथ जुड़ता है.​
    • कुचिपुड़ी, मोहिनीअट्टम, कथक आदि में भी प्रेम-भक्ति, तप-संयम और मोक्ष-प्राप्ति के मार्ग दर्शाने वाले भाग प्रमुख हैं.
  • ऐतिहासिक-भाष्य और संदर्भ
    • भारत के शास्त्रीय नृत्यों के समग्र समूह में 8 प्रमुख शास्त्रीय नृत्य मान्य हैं
    • भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, ओड़िसी, कथकली, मणिपुरी, मोहिनीअट्टम, सत्रिया
    • इनमें से प्रत्येक में कथा-सूत्र और आचार-उच्चारण मोक्ष-विषयक कथाओं के पुनरावर्तन का जरिया बनते हैं.​
    • लोक-नृत्यों में भी एकात्मिक आध्यात्मिकता और सामाजिक-धार्मिक अर्थ होते हैं
    • उनके माध्यम से मानवीय त्रास, वीरता या प्रकृति-आधारित मोक्ष-आशाओं को व्यक्त किया जाता है.​
  • निष्कर्ष
    • मोक्ष किसी एक नृत्य का नाम नहीं है; यह भारत के शास्त्रीय-आध्यात्मिक नृत्यों के भीतर एक गहन विचारधारा है जो कथा, भक्ति, और दिव्यता के माध्यम से प्रकट होता है.​
    • यदि आप किसी विशेष नृत्य-शैली में मोक्ष-आधार के प्रदर्शन के बारे में गहराई से जानना चाहें
    • तो मैं हर शैली के लिए एक अनुशंसित भाग-रिपोर्ट बना दूँगा जिसमें कथा-चरित्र, अभिनेय-भाषाएं और मुद्रा-विशेष शामिल हों.​​
  • उद्धरण:
    • भारत के शास्त्रीय नृत्यों की सूची और उनका स्वरूप.​
    • मोहिनीअट्टम, भरतनाट्यम, ओड़िसी आदि में मोक्ष-आध्यात्मिक दार्शनिक तत्वों का संकेत.​
    • असम के सत्रिया और अन्य नृत्यों के आध्यात्मिक आयामों का उल्लेख.​

36. निम्नलिखित में से कौन-सा अनुष्ठानिक नृत्य मध्य प्रदेश की कामड़ जनजाति द्वारा किया जाता है? [Phase-XI 28 जून, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) तेराताली
Solution:
  • मध्य प्रदेश के कामड़ जनजाति की औरतों द्वारा 'तेराताली' लोकनृत्य किया जाता है।
  • तेराताली नृत्य एक अनुष्ठानिक नृत्य है, जो लोकदेवता बाबा रामदेव की पूजा करने के लिए किया जाता है।
  • संभावित उत्तर: तेराताली नृत्य है।
    • यह एक प्रमुख अनुष्ठानिक नृत्य माना जाता है जो बाबा रामदेव की पूजा से जुड़ा है और पारंपरिक ताल-ताल के साथ किया जाता है.​
    • इस नृत्य में महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं
    • नर्तक जमीन पर बैठकर डांड-झांझ जैसे वाद्यों के साथ शरीर के विभिन्न हिस्सों को झुकाते-घुमाते ऊर्जावान गतिशीलता दिखाते हैं
    • कभी-कभी तलवार-सा सज्जा वस्त्रों के साथ दांतों में भी बर्तनों को पकड़ते हैं.​
    • तेराताली के साथ बाबा रामदेव, शक्ति-देवता, और tribal-पूजा की प्रथाएं जुड़ी होती हैं
    • जिससे यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं बल्कि एक धार्मिक-समुदायिक अनुष्ठान बन जाता है.​
    • अन्य मध्य प्रदेश की आदिवासी नृत्यों में करमा, ढांढल, सैतम आदि भी प्रसिद्ध हैं
    • लेकिन आप के प्रश्न में पूछा गया “अनुष्ठानिक नृत्य” खासकर कमाड़ जनजाति के संदर्भ में अक्सर तेराताली को उच्यitä जाता है.

37. राजस्थान का घूमर नृत्य मूल रूप से कौन-से आदिवासी समूह द्वारा किया जाता था? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22, 23 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) भील
Solution:
  • घूमर राजस्थान का परंपरागत लोक नृत्य है। इसका विकास 'भील जनजाति' द्वारा किया गया और बाद में यह अन्य समुदायों द्वारा अपनाया गया।
  • व्यापक इतिहास और उत्पत्ति
    • घूमर नृत्य की शुरुआत मारवाड़ क्षेत्र में भील जनजाति के पूजा-आधारित प्रदर्शन के रूप में मानी जाती है
    • जिसका उद्देश्य देवी सरस्वती की आराधना रहा है। इसके बाद यह नृत्य अन्य समुदायों में फैलकर राजस्थानी सांस्कृतिक परंपरा का भाग बन गया।
    • भील समूह द्वारा origins, देवी सरस्वती की पूजा] [उत्पत्ति/इतिहास—विषयक स्रोतों के अनुसार]।
    • परंपरागत तौर पर महिलाएं घूंघट ओढ़कर समूह में घुमती-दौड़ती, रंगीन घाघरे पहनतीं और गोलाकार क्रम बनाकर प्रदर्शन करतीं।
    • समय के साथ इसे विवाह, त्योहारों और सामाजिक अवसरों से जोड़ दिया गया।
  • सांस्कृतिक संगठन और रूप
    • प्रमुख तत्त्व: परिधान (घाघरा, चोली, ओढ़नी/घूंघट), वादन (ढोलक, हार्मोनियम), वादन-ताल (लोक संगीत), और कदम (घूमना-घुमराते कदम)।
    • समूह नृत्य के तौर पर प्रस्तुति: महिलाएं एक साथ समूह बनाती हैं
    • गोल चक्र बनाकर एक-दूसरे के हाथ पकड़कर घूमती हैं; यह सामूहिकता और सामाजिक बंधन का प्रतीक है।
    • regional रूप: राजस्थान के विभिन्न जिलों/区域ों में घूमर के अंदाज़ में थोड़ा फर्क हो सकता है, पर मौलिक भाव और घूमने की गतिविधि समान रहती है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • घूमर राजस्थान की सौंदर्य, शालिनता और सामाजिक मिलजुलाहट का प्रतीक रहा है
    • इसे राज्य की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में माना गया है। [सांस्कृतिक प्रतीक/राजकीय मान्यता]
    • यह नृत्य शादियों, तीज-त्योहारों, गणगौर आदि धार्मिक-अनुष्ठानों में विशेष भूमिका निभाता है और समुदायों को एक साथ लाने का माध्यम बना रहता है।
  • आधुनिक संदर्भ और स्थान
    • पारंपरिक रूप के अलावा घूमर आज राष्ट्रीय-और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी दिखाया जाता है
    • सांस्कृतिक महोत्सवों, पर्यटन कार्यक्रमों में इसकी प्रस्तुति आम है और युवाओं के बीच भी लोकप्रिय बना रहता है।
    • आधुनिक प्रस्तुतियों में भील-आधारित तत्वों के साथ नए संगीत/चाल-ढंग शामिल करके इसका प्रस्तुतीकरण विविध हुआ है, जिससे यह जीवित और प्रासंगिक बना रहता है।
  • संदर्भ-बिंदु (साक्ष्य के सुझाव)
    • घूमर के मूल के बारे में कई लोक-नाटक/सांस्कृतिक स्रोत बताते हैं
    • यह भील जनजाति द्वारा देवी सरस्वती के लिए किया गया आराधनात्मक नृत्य था
    • बाद में अन्य राजस्थानी समुदायों ने इसे अपनाया। यह रूपांतरण सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा माना गया है।
    • राजस्थानी कथनों और शिक्षण-स्रोतों में परीचय के तौर पर यह भीबताया गया है
    • घूमर महिलाओं के समूह-नृत्य के रूप में पहचाना जाता है और पारंपरिक पोशाक, संगीत और गोल घेरा बनाकर किया जाता है।
  • यदि आप चाहें, मैं आपके संदर्भ के लिए नीचे दिए गए बिंदुओं पर अधिक गहराई से दे सकता/सकती हूँ:
    • भील जनजाति के धार्मिक और सामाजिक संदर्भ में घूमर का स्थान
    • राजस्थानी उपखण्डों के अनुसार घूमर के regional variations
    • घूमर से जुड़े गाने/सामग्री के उदाहरण और उनके अर्थ

38. निम्नलिखित में से कौन-सा नृत्य मठों में परंपरागत रूप से पुरुष भिक्षुओं द्वारा किया जाता था? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 22, 23 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) सत्रिया
Solution:
  • सत्रिया नृत्य परंपरागत रूप से मठों में पुरुष भिक्षुओं द्वारा अपने दैनिक अनुष्ठान के एक भाग के रूप में प्रदर्शित किया जाता था।
  • 15वीं से 16वीं शताब्दी ई. के मध्य में असम के महान वैष्णव संत और सुधारक शंकरदेव द्वारा वैष्णव धर्म के प्रचार के रूप में इस नृत्य का परिचय लोगों से कराया गया।
  • संभावित उत्तर: छऊ
    • स्पष्ट उत्तर: निम्नलिखित नृत्यों में से मठों में परंपरागत रूप से पुरुष भिक्षुओं द्वारा किया गया
    • मटका-उत्तर भारतीय लोक/जातीय नृत्य “छऊ” माना جاتا है।
    • यह नृत्य अक्सर पूर्वी भारत के झारखण्ड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के क्षेत्रीय मठ-परंपराओं से जुड़ा है
    • भक्तों/भिक्षुओं द्वारा मंचन किया जाता है।​
  • व्याख्या और पृष्ठभूमि:
    • छऊ एक भक्ति-नृत्य शैली है जो विशेष रूप से मठों, वैष्णव समुदायों और गांवों के मंदिर-आयोजनों के दौरान पुरुष नर्तकों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।
    • यह नृत्य ईश्वर-पूर्वक कथाओं को गाया/युक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, और अक्सर मठों में साधु-भिक्षुओं द्वारा प्रदर्शन के रूप में विकसित हुआ है।​
    • छऊ की प्रस्तुति में अक्सर प्रतीकात्मक पात्र, देव-प्राप्त कथानक और आराधना-क्रम शामिल होते हैं
    • जिसे भक्ति-आंदेलन के साथ जोड़ा गया है
    • यह परंपरा भारतीय उत्तर-पूर्वी भूभागों के सांस्कृतिक-जनजातीय विरासत से भी जुड़ी बताई जाती है।​
  • विकल्प के अन्य संदर्भ (जानकारी के लिए):
    • देहाती/-लोक नृत्यों में गवरी, मौनिया आदि भी पुरुष-प्रदर्शन के उदाहरण हैं
    • किंतु इनका संबंध खास तौर पर राजस्थान/उत्तर पश्चिमी क्षेत्र से है और ये सभी मठ-आचार के साथ बराबर नहीं जुड़ते।
    • कुछ स्रोतों में अन्य नृत्यों के बारे में जानकारी मिलती है
    • लेकिन उनका धार्मिक-आचार-शैली के तहत मठ-प्रवेश/मठ-भक्तों द्वारा किया जाना विशेष रूप से छऊ के लिए उल्लेखित माना जाता है।

39. निम्नलिखित में से कौन-सी नृत्य शैली उत्तर-पूर्व भारत के वैष्णव मठों से संबंधित है? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (a) सत्रिया
Solution:
  • सत्रिया नृत्य परंपरागत रूप से मठों में पुरुष भिक्षुओं द्वारा अपने दैनिक अनुष्ठान के एक भाग के रूप में प्रदर्शित किया जाता था।
  • 15वीं से 16वीं शताब्दी ई. के मध्य में असम के महान वैष्णव संत और सुधारक शंकरदेव द्वारा वैष्णव धर्म के प्रचार के रूप में इस नृत्य का परिचय लोगों से कराया गया।
  • संक्षिप्त जवाब:
    • मणिपुरी नृत्य (Manipuri Dance) उत्तर-पूर्व भारत के वैष्णव मठों से गहराई से जुड़ी एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैली है।
  • पूरा विवरण:
  • पृष्ठभूमि और संदर्भ
    • उत्तर-पूर्व भारत के वैष्णव मठ (Vaishnav monasteries/ashrams) में भगवान विष्णु की भक्ति और रस-लीला का आंतरिक अनुभव केंद्रित होता है
    • जो नृत्य और संगीत के माध्यम से व्यक्त किया जाता है. इस क्षेत्र की शास्त्रीय नृत्यों में धार्मिक-आध्यात्मिक आयाम प्रमुख होते हैं, और कई नृत्य रूप मठ-परंपराओं से अविकल जुड़े होते हैं.
    • मणिपुर का नृत्य-परंपरा विशेषकर भक्ति-आधारित रस-लीला, भगवती-पूजा और विष्णु-रूप के bhakti-प्रेरित प्रदर्शन के लिए प्रख्यात है
    • इसे व्यापक रूप में वैष्णव भक्ति के साथ जोड़ा जाता है.​
  • मणिपुरी नृत्य (Manipuri Dance)
    • संरचना और शैली: यह नृत्य क्लासिकल-शैक्षणिक रूप से मान्यता प्राप्त छह भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में से एक है
    • शास्त्रीय गायन, नृत्य, और थिरक के सम्मिलित सम्मिलन को दर्शाता है; इसे रास-लीला से प्रेरित व्यापक कथानक-प्रदर्शन के तौर पर भी जाना जाता है.
    • वैष्णव मठों से संबंध: मणिपुर की विभिन्न वैष्णव मठ-परम्पराओं में भक्त-नृत्य, त्योहारों, और पवित्र रस-लीला के अवसरों पर यह नृत्य प्रमुख रूप से किया जाता है
    • इसमें कृष्ण-लीला/रास-लीला के रूपांकनों का प्रदर्शन अक्सर होता है, जो वैष्णव भक्ति की आत्म-उन्मुख अनुभूति को दर्शाता है.​​
    • वाद्य-संयोजन: यह नृत्य पुंग-चालोम जैसे मणिपुरी संगीत-टेपल पर आधारित होता है; हाथ-थाप और ड्रम-समूह के साथ ताल-लय बुनता है
    • जिससे एक अत्यंत मधुर और शांत, लेकिन गहरे भाव-प्रधान प्रदर्शन निकलता है.​
  • अन्य उत्तर-पूर्व नृत्य संदर्भ (तुलना)
    • मेघालय का नोंगक्रेम, असम का सत्रिया-नृत्य आदि भी उत्तर-पूर्व के विविध नृत्यों में हैं
    • वैष्णव मठों से सबसे गहरा और प्रत्यक्ष नाता मणिपुरी नृत्य का माना जाता है.
    • पश्चिमी पाठ्यक्रमों में मणिपुरी नृत्य को अन्य भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के समान क्रम में रखा जाता है
    • इसकी देवी-भक्ति, कृष्ण-लीला और मठ-आध्यात्मिक धरोहरें इसे विशिष्ट बनाती हैं.
  • प्रमुख विशेषताएं
    • रंग-भाव: चेहरे के भाव (भावा) और चित्त-आनंद को प्रकट करने के लिए सूक्ष्म मूक-चाल-भंगिमाएं; हाथ-आक्र punishings, नेत्र-आभा से कृष्ण-कथा को व्यक्त किया जाता है।
    • मुद्राएँ और अंगेय-भंगिमा: दोनों हाथों के गहराई से इस्तेमाल, भृकुटि-आक्रामकता कम और सौम्यता अधिक; शरीर-लय और चरण-नृत्य में गति धीरे-धीरे उठती-गिरती है।
    • पोशाक और रंग: पारंपरिक पेस्टल रंगों के मुलायम वस्त्र, विशिष्ट रूप से कृष्ण-राधा संदर्भों के लिए; ध्वनि-यंत्रों के साथ एक शांत लेकिन भावनात्मक दृश्य बनता है।
  • उदाहरण और नोट
    • Rasleela-आधारित प्रदर्शन और कृष्ण-परक कथा-नृत्य, वैष्णव भक्ति के केंद्र में रहने वाले मठों के साथ गहराई से जुड़ा रहता है.
    • वैश्विक संदर्भ में यह नृत्य, भारतीय शास्त्रीय-नृत्यों की संयुक्त सूची में एक विशिष्ट स्थान रखता है; इसे प्रदर्शन-आर्ट के रूप में शिक्षा-संस्थाओं में भी पढ़ाया जाता है.​
  • एक-लाइन सारांश
    • उत्तर-पूर्व भारत के वैष्णव मठों से जुड़ी नृत्य शैली मुख्यतः मणिपुरी नृत्य है
    • जो कृष्ण-लीला और विष्णु-भक्ति पर आधारित शास्त्रीय-नृत्य का प्रतिनिधित्व करता है.

40. शंकरदेव ने किस धर्म के प्रचार के लिए असम में सत्रिया नृत्य की शुरुआत की थी? [दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 28 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) वैष्णव धर्म
Solution:
  • सत्रिया नृत्य परंपरागत रूप से मठों में पुरुष भिक्षुओं द्वारा अपने दैनिक अनुष्ठान के एक भाग के रूप में प्रदर्शित किया जाता था।
  • 15वीं से 16वीं शताब्दी ई. के मध्य में असम के महान वैष्णव संत और सुधारक शंकरदेव द्वारा वैष्णव धर्म के प्रचार के रूप में इस नृत्य का परिचय लोगों से कराया गया।
  • विस्तारपूर्ण विवरण:
    • पृष्ठभूमि और उद्देश्य: 15वीं—16वीं शताब्दी के शंकरदेव (Sankaradeva) असम के प्रमुख वैष्णव संत थे
    • उन्होंने असमिया समाज में भक्ति-आधारित वैष्णव धर्म के प्रसार के लिए आस्था-आधारित कला-रूपों को प्रोत्साहित किया।
    • सत्रिया नृत्य इसी वैष्णव प्रचार-कार्य का एक प्रमुख माध्यम बना; इसे मठ-आश्रित धार्मिक अनुष्ठानों और भक्तिपूर्ण कथानक प्रस्तुति के साथ जोड़ा गया
    • भगवान विष्णु VIII के अवतार-लक्षणों और भक्तिमार्ग की शिक्षा लोगों तक पहुँच सके.
    • नृत्य-शैली की संरचना: सत्रिया नृत्य एक शास्त्रीय नृत्य-शैली है जिसमें कहानी-नाट्य (अंकिया नाट) के तत्व और लोक-राग-त्यौहारों का संयुक्त मिश्रण मिलता है
    • इसे महापुरुष शंकरदेव ने वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए विकसित किया था, ताकि भक्ति-ज्ञान को सरल, चरितार्थ और सामुदायिक रूप से अनुभव कराया जा सके.
    • संस्थागत विकास: शंकरदेव ने सत्रिया के साथ साथ मठ-परंपरा (सत्र) की स्थापना की ताकि नृत्य, नाटक और संगीत के माध्यम से वैष्णव सिद्धांतों का प्रसार सतत रूप से किया जा सके
    • इससे असम के ग्रामीण और शहरी समाज दोनों में भक्ति-आचार का एक नया पाठ स्थापित हुआ.
    • प्रचार-तरीके और प्रभाव: सत्रिया के मंचन अक्सर धार्मिक त्योहारों, पूजा-समारोहों और प्रवचन के साथ जुड़कर व्यापक भक्त-समुदाय को आकर्षित करते रहे
    • यह नृत्य-रूप असम की सांस्कृतिक-धार्मिक पहचान का हिस्सा बना और बाद में भारत के आठ प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों में से एक के रूप में मान्यता पाई
    • जो शंकरदेव के वैष्णव-आचार पर आधारित प्रचार-कार्य का प्रत्यक्ष द्योतक है.
    • संक्षिप्त निष्कर्ष: अतः शंकरदेव ने असम में सत्रिया नृत्य की शुरुआत करके वैष्णव धर्म का प्रचार-प्रसार किया
    • यह नृत्य-शैली उनकी शिक्षाओं के नैरेटिव-आधार पर बनकर आने वाले समय में असम की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया.
  • उद्धरण (लेखक/स्रोत के अनुसार):
    • असम में सत्रिया नृत्य के प्रचार-कार्य और शंकरदेव की भूमिका: स्रोतों में स्पष्ट है
    • यह नृत्य शंकरदेव द्वारा वैष्णव धर्म के प्रचार के लिए प्रस्तुत किया गया था.
    • सत्रिया नृत्य की संरचना और इतिहास: इतिहास-सार और विकिपीडिया/विश्वविद्यालय–आर्काइव्स में शंकरदेव को इसकी संस्थापक-स्वरूप के रूप में दर्ज किया गया है.