सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-I

Total Questions: 50

1. गरबा किस त्योहार के दौरान किया जाता है? [CGL (T-I) 18 जुलाई, 2023 (I-पाली), Phase-XI 28 जून, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (d) नवरात्रि
Solution:
  • 'गरबा' गुजराती लोक नृत्य का एक रूप है, जो नौ दिवसीय हिंदू त्योहार 'नवरात्रि' के दौरान किया जाता है।
  • गरबा का मुख्य त्योहार
    • गरबा विशेष रूप से शारदीय नवरात्रि (अश्विन मास में) और चैत्र नवरात्रि के अवसर पर किया जाता है।
    • नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है, और गरबा रात्रियों में सामूहिक नृत्य के रूप में होता है।
    • पहली रात को गरबा की स्थापना की जाती है, जिसमें गर्भदीप (मिट्टी के घड़े में दीपक) जलाया जाता है।
  • उत्पत्ति और अर्थ
    • गरबा शब्द संस्कृत के "गर्भदीप" से आया है, जो स्त्री गर्भ की सृजन शक्ति और सौभाग्य का प्रतीक है।
    • पौराणिक कथा के अनुसार, यह नृत्य मां दुर्गा को प्रसन्न करने और महिषासुर पर विजय का जश्न मनाने से जुड़ा है।
    • गुजरात में यह नृत्य कृषि समृद्धि और समुदायिक एकता का प्रतीक बन गया है।
  • कैसे किया जाता है गरबा
    • स्थापना: नवरात्रि की पहली रात मिट्टी का घड़ा सजाया जाता है, जिसमें चार ज्योतियां जलाकर चांदी का सिक्का रखा जाता है।
    • नृत्य शैली: महिलाएं (और अब पुरुष भी) रंग-बिरंगे चनिया-चोली पहनकर वृत्ताकार घेरे में ताली बजाते हुए चक्कर लगाती हैं। गीत देवी स्तुति पर आधारित होते हैं।
    • संगीत: ढोल, मंजीरा और कांसे की झांझों का उपयोग; आधुनिक समय में DJ संगीत भी लोकप्रिय।
    • रासलीला (डांडिया रास) गरबा का विस्तार है, जिसमें डंडियां बजाई जाती हैं।
  • क्षेत्रीय महत्व
    • गरबा मूल रूप से गुजरात का है, लेकिन अब राजस्थान, महाराष्ट्र, दिल्ली और विश्व भर के भारतीय समुदायों में प्रचलित है।
    • गुजरात में नवरात्रि गरबा उत्सवों का केंद्र होती है
    • जहां रातभर कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यह सामाजिक मेलजोल और युवाओं के लिए आकर्षण का केंद्र है।
  • अन्य अवसर
    • हालांकि मुख्य रूप से नवरात्रि से जुड़ा, गरबा कभी-कभी विवाह, जन्मोत्सव या अन्य उत्सवों में भी किया जाता है।
    • लेकिन इसका चरम नवरात्रि में ही होता है, जब इसे भक्ति मार्ग माना जाता है।
  • सांस्कृतिक प्रभाव
    • आजकल गरबा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय है, Falguni Pathak जैसे कलाकारों ने इसे आधुनिक रूप दिया।
    • यह नृत्य स्वास्थ्य लाभ (कार्डियो व्यायाम) और सांस्कृतिक निर्यात का माध्यम भी है।
    • महामारी के बाद भी गरबा इवेंट्स लाखों को आकर्षित करते हैं।

2. भगवान खंडोबा से जुड़ा 'वाघ्य मुरली' नृत्य, मूल रूप से निम्न में से किस राज्य से संबंधित है? [MTS (T-I) 12 जुलाई, 2022 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) महाराष्ट्र
Solution:
  • भगवान खंडोबा से जुड़ा 'वाघ्य मुरली' नृत्य, मूल रूप से महाराष्ट्र राज्य से संबंधित है।
  • वाघ्य मुरली नृत्य महाराष्ट्र से जुड़ा है। यह भगवान खंडोबा की भक्ति से प्रेरित एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से महाराष्ट्र के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • यह नृत्य भगवान खंडोबा (शिव का अवतार माने जाते हैं) की कथाओं पर आधारित है।
    • परंपरा के अनुसार, संतान प्राप्ति की मन्नत मांगने वाले भक्त अपने पहले पुत्र को 'वाघ्या' (बाघ) और पुत्री को 'मुरली' (नृत्यांगना) के रूप में खंडोबा को समर्पित कर देते थे।
    • ये भक्त जीवन भर खंडोबा की सेवा में रहते, जागरण रातों में नृत्य-गान कर भगवान की लीला का वर्णन करते।​
  • नृत्य की विशेषताएं
    • इस नृत्य में पुरुष 'वाघ्या' बाघ की वेशभूषा धारण कर उछल-कूद करते हैं
    • जबकि महिलाएं 'मुरली' के रूप में घुंघरू बांधे सुंदर मुद्राओं में नृत्य करती हैं।
    • प्रस्तुति पांच बांस की संरचना (चौक) पर होती है
    • जिसमें आह्वान, गण, कथन और आरती के चरण शामिल हैं।
    • खंडोबा की वीर रस वाली कथाएं, जैसे मल्हारी देवता से युद्ध, गाई जाती हैं।
    • यह नृत्य महाराष्ट्र की अन्य लोक कलाओं की जननी माना जाता है।​​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • खंडोबा महाराष्ट्र के क्षेत्रीय देवता हैं, जिनकी पूजा दही-हल्दी विवाह और जींडी पूजा जैसे अनुष्ठानों से होती है।
    • वाघ्य मुरली जेजुरी के खंडोबा मंदिर में वार्षिक यात्रा के दौरान प्रमुख आकर्षण होता है
    • जो स्थानीय समुदायों की भक्ति और सांस्कृतिक एकता को दर्शाता है।
    • हालांकि कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रभाव दिखता है, लेकिन मूल रूप महाराष्ट्रीय है।

3. शाद सुक मिन्सीम सांस्कृतिक उत्सव निम्नलिखित में से किस भारतीय राज्य से संबंधित है? [C.P.O.S.I. (T-I) 11 नवंबर, 2022 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) मेघालय
Solution:
  • शाद सुक मिन्सीम सांस्कृतिक उत्सव मेघालय राज्य से संबंधित है।
  • यह ईश्वर को उसकी कृपा हेतु प्रतीकात्मक अनुष्ठानों, नृत्यों और पारंपरिक परिधानों के माध्यम से धन्यवाद देने का विशेष तरीका है।
  • उत्सव का अर्थ और महत्व
    •  यह मेघालय की खासी समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला वार्षिक वसंत उत्सव है, जो प्रकृति, फसल और दिव्य शक्ति यू ब्लेईं के प्रति आभार प्रकट करता है।
    • यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि खासी संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति भी है, जिसमें सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर दिया जाता है।
  • आयोजन का समय और स्थान
    • यह उत्सव मुख्य रूप से अप्रैल महीने में शिलांग के जयआव वीकिंग ग्राउंड (Jaiaw Playground) में आयोजित होता है।
    • दो दिवसीय कार्यक्रम में सैकड़ों नर्तक-नर्तकियां पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं
    • जिसमें महिलाएं रंगीन झुमके, कढ़ाई वाले शॉल और चांदी के आभूषण पहनती हैं। पुरुष ढोल और बांसुरी बजाते हैं, जो उत्सव की आत्मा हैं।
  • नृत्य और परंपराएं
    • उत्सव का केंद्र बिंदु सामूहिक नृत्य है, जिसमें सुव्यवस्थित पंक्तियों में नर्तक धीमी लय पर हिलते-डुलते हैं।
    • यह "थलाला" नामक शांतिपूर्ण नृत्य है, जो प्रकृति के प्रति समर्पण दर्शाता है। महिलाओं के नृत्य अधिक प्रमुख होते हैं
    • जो मातृसत्तात्मक खासी समाज को प्रतिबिंबित करते हैं।
    • आयोजन में पारंपरिक भोज, प्रार्थनाएं और सामुदायिक भोज शामिल होते हैं, जो पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं।
  • मेघालय और खासी संस्कृति का संदर्भ
    • मेघालय, "बादलों का निवास" कहलाने वाला पूर्वोत्तर राज्य, खासी, गारो और जयंतिया जनजातियों का घर है।
    • 1972 में बना यह राज्य अपनी जैव विविधता, जीवित जड़ पुलों और चेरापूंजी की भारी वर्षा के लिए प्रसिद्ध है।
    • शाद सुक म्यंसीम जैसे उत्सव खासी की मातृवंशीय प्रथा को जीवित रखते हैं, जहां संपत्ति महिलाओं को हस्तांतरित होती है।
    • यह नोंगक्रेम नृत्य जैसे अन्य खासी उत्सवों से भिन्न है, जो विशेष रूप से फसल आशीर्वाद पर केंद्रित है।
  • सांस्कृतिक प्रभाव
    • यह उत्सव खासी विरासत को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण है, जो आधुनिकता के बीच प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखता है।
    • हाल के वर्षों में, जैसे 2025 में लैतकोर में आयोजित कार्यक्रम, ने स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया।
    • पर्यटक इसे सांस्कृतिक अनुभव के रूप में देखने आते हैं, जो मेघालय की अनूठी पहचान को मजबूत करता है।

4. कलाक्षेत्र फाउंडेशन किस भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली से संबंधित है? [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) भरतनाट्यम
Solution:
  • कलाक्षेत्र फाउंडेशन, तमिलनाडु में एक प्रसिद्ध नृत्य संस्थान है, जिसकी स्थापना वर्ष 1936 में एक प्रमुख नृत्यांगना और थियोसोफिस्ट रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने की थी।
  • यह संस्था मुख्यतः 'भरतनाट्यम' शास्त्रीय नृत्य के प्रचार और संरक्षण के लिए समर्पित है।
  • उत्सव का अर्थ और महत्व
    • शाद सुक म्यंसीम (Shad Suk Mynsiem) का शाब्दिक अर्थ "संतोष का नृत्य" या "शांतिपूर्ण हृदय का नृत्य" है।
    • यह मेघालय की खासी समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला वार्षिक वसंत उत्सव है
    • जो प्रकृति, फसल और दिव्य शक्ति यू ब्लेईं के प्रति आभार प्रकट करता है।
    • यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि खासी संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति भी है, जिसमें सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक संरक्षण पर जोर दिया जाता है।
  • आयोजन का समय और स्थान
    • यह उत्सव मुख्य रूप से अप्रैल महीने में शिलांग के जयआव वीकिंग ग्राउंड (Jaiaw Playground) में आयोजित होता है।
    • दो दिवसीय कार्यक्रम में सैकड़ों नर्तक-नर्तकियां पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं
    • जिसमें महिलाएं रंगीन झुमके, कढ़ाई वाले शॉल और चांदी के आभूषण पहनती हैं। पुरुष ढोल और बांसुरी बजाते हैं, जो उत्सव की आत्मा हैं।
  • नृत्य और परंपराएं
    • उत्सव का केंद्र बिंदु सामूहिक नृत्य है, जिसमें सुव्यवस्थित पंक्तियों में नर्तक धीमी लय पर हिलते-डुलते हैं।
    • यह "थलाला" नामक शांतिपूर्ण नृत्य है, जो प्रकृति के प्रति समर्पण दर्शाता है। महिलाओं के नृत्य अधिक प्रमुख होते हैं
    • जो मातृसत्तात्मक खासी समाज को प्रतिबिंबित करते हैं।
    • आयोजन में पारंपरिक भोज, प्रार्थनाएं और सामुदायिक भोज शामिल होते हैं, जो पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं।
  • मेघालय और खासी संस्कृति का संदर्भ
    • मेघालय, "बादलों का निवास" कहलाने वाला पूर्वोत्तर राज्य, खासी, गारो और जयंतिया जनजातियों का घर है।
    • 1972 में बना यह राज्य अपनी जैव विविधता, जीवित जड़ पुलों और चेरापूंजी की भारी वर्षा के लिए प्रसिद्ध है।
    • शाद सुक म्यंसीम जैसे उत्सव खासी की मातृवंशीय प्रथा को जीवित रखते हैं, जहां संपत्ति महिलाओं को हस्तांतरित होती है।
    • यह नोंगक्रेम नृत्य जैसे अन्य खासी उत्सवों से भिन्न है, जो विशेष रूप से फसल आशीर्वाद पर केंद्रित है।
  • सांस्कृतिक प्रभाव
    • यह उत्सव खासी विरासत को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण है, जो आधुनिकता के बीच प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखता है।
    • हाल के वर्षों में, जैसे 2025 में लैतकोर में आयोजित कार्यक्रम, ने स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया।
    • पर्यटक इसे सांस्कृतिक अनुभव के रूप में देखने आते हैं, जो मेघालय की अनूठी पहचान को मजबूत करता है।

5. मार्च, 2022 तक की स्थिति के अनुसार, निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली को भारत में शास्त्रीय नृत्य के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है? [C.P.O.S.I. (T-I) 11 नवंबर, 2022 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) लावणी
Solution:
  • भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख शैलियां 8 हैं-कथक, भरतनाट्यम, कथकली, मणिपुरी, ओडिसी, कुचीपुड़ी, सतारिया/सत्रिया एवं मोहिनीअट्टम। लावणी महाराष्ट्र का लोक नृत्य है।
  • शास्त्रीय नृत्यों की आधिकारिक सूची
    • संगीत नाटक अकादमी ने मार्च 2022 तक निम्नलिखित आठ नृत्यों को शास्त्रीय मान्यता दी थी:
    • भरतनाट्यम (तमिलनाडु): मंदिर नृत्य पर आधारित, अभिनय और नृत्य का संगम।​
    • कथक (उत्तर प्रदेश): मुगल प्रभावित, घुंघरू और चक्करदार चालें प्रमुख।​
    • कथकली (केरल): नाटकीय अभिनय, रंगीन वेशभूषा और मुखौटे।​
    • कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश): नृत्य-नाटक शैली, तेज़ पदताल।​
    • ओडिसी (ओडिशा): मंदिर मूर्तियों से प्रेरित, कोणीय मुद्राएँ।​
    • मणिपुरी (मणिपुर): रासलीला आधारित, नाजुक और प्रवाहमय।​
    • मोहिनीअट्टम (केरल): मोहिनी की भंगिमाएँ, लहराती गतियाँ।​
    • सत्रिया (असम): 15वीं शताब्दी में शंकरदेव द्वारा विकसित, वैष्णव भक्ति प्रधान।​
    • ये सभी नृत्य प्राचीन ग्रंथों जैसे नाट्यशास्त्र पर आधारित हैं और कठोर प्रशिक्षण व नियमों का पालन करते हैं।​
  • लावणी क्यों नहीं है शास्त्रीय?
    • लावणी महाराष्ट्र का लोक नृत्य है, जो तमाशा लोकनाट्य से जुड़ा है। यह ऊर्जावान, कामुक और सामाजिक व्यंग्य प्रधान होता है
    • जिसमें धमाल (तेज़ नृत्य) और भावपूर्ण गीत शामिल होते हैं।
    • हालांकि लोकप्रिय, यह शास्त्रीय मानदंडों (जैसे नाट्यशास्त्र अनुसरण, शास्त्रीय संगीत बंधन) को पूरा नहीं करता
    • इसलिए इसे लोक कला के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। मार्च 2022 तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ था।​
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
    • भारत के शास्त्रीय नृत्य भरत मुनि के नाट्यशास्त्र (200 ई.पू.-200 ई.) से विकसित हुए।
    • संगीत नाटक अकादमी ने 1952 से मान्यता प्रक्रिया शुरू की—सबसे पहले 1952 में भरतनाट्यम आदि को मान्यता, 2000 में सत्रिया को आठवाँ स्थान।
    • लोक नृत्य जैसे लावणी क्षेत्रीय उत्सवों (गणेश चतुर्थी) में प्रचलित हैं, लेकिन शास्त्रीय सूची से बाहर।​​

6. नाटी निम्नलिखित में से भारत के किस राज्य का लोक नृत्य है? [CGL (T-I) 21 जुलाई, 2023 (IV-पाली), CHSL (T-I) 11 अगस्त, 2023 (IV-पाली), MTS (T-I) 04 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) हिमाचल प्रदेश
Solution:
  • 'नाटी' भारत के 'हिमाचल प्रदेश' राज्य का एक लोक नृत्य है। यह एक पारंपरिक लोक नृत्य है, जो राज्य में विभिन्न त्योहारों और समारोहों के दौरान किया जाता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • नाटी मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के कुल्लू, शिमला, सिरमौर, चंबा और किन्नौर जिलों में प्रचलित है।
    • यह नृत्य गद्दी या हिमाचली खानाबदोश समुदायों की परंपराओं से जुड़ा हुआ है
    • कभी-कभी उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों जैसे उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल में भी देखा जाता है
    • लेकिन मूल रूप से यह हिमाचली है। त्योहारों, मेलों और विवाह समारोहों के दौरान इसे बड़े उत्साह से प्रस्तुत किया जाता है।
  • प्रदर्शन शैली
    • नाटी एक समूहिक नृत्य है जिसमें पुरुष और महिलाएं दोनों भाग लेते हैं, जो अक्सर एक घेरे में हाथ पकड़कर नाचते हैं।
    • नृत्य की शुरुआत धीमी गति (ढीली नाटी) से होती है और धीरे-धीरे तेज हो जाती है।
    • नेतृत्व आमतौर पर चंवर (पंखा) पकड़े एक पुरुष नर्तक करता है, जबकि संगीतकारों को "टूनिस" कहा जाता है।
  • वाद्य यंत्र और संगीत
    • इसमें पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल, नगाड़ा, शहनाई, बांसुरी, नरसिंहा और करनाल का उपयोग होता है।
    • संगीत हिमाचली लोक धुनों पर आधारित होता है, जो नृत्य को जीवंत बनाता है।
    • प्रदर्शन के अंत में नर्तक देवी-देवताओं को श्रद्धांजलि देते हुए एक यज्ञ भी करते हैं।
  • पोशाक और विशेषताएं
    • नर्तक रंग-बिरंगे पारंपरिक हिमाचली परिधान पहनते हैं, जो पहाड़ी संस्कृति को दर्शाते हैं
    • पुरुषों के लिए घाघरा-चोली जैसी पोशाकें या खानाबदोश शैली।
    • नृत्य अपनी ऊर्जावान गतियों, सामूहिक तालमेल और उत्साहपूर्ण वातावरण के लिए प्रसिद्ध है।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • नाटी हिमाचल की सामाजिक एकता का प्रतीक है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
    • यह कुल्लू दशहरा जैसे प्रमुख उत्सवों में प्रमुख आकर्षण होता है।
    • राज्य में अन्य नाटी रूप जैसे कुल्लू नाटी, छंबा नाटी और किन्नौरी नाटी भी हैं
    • जो क्षेत्रीय विविधता दिखाते हैं। यह नृत्य भारत की लोक कला को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

7. 'वाझुदूर' किस भारतीय शास्त्रीय नृत्य की शैलियों में से एक है? [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) भरतनाट्यम
Solution:
  • 'वाझुवूर' भरतनाट्यम की मूल शैलियों में से एक है। भरतनाट्यम की अन्य प्रमुख शैलियों में पांडानल्लूर, मैसूर और कलाक्षेत्र शामिल है।
  • भरतनाट्यम का परिचय
    • भरतनाट्यम सदियों पुरानी देवदासी परंपरा से विकसित हुआ, जो तमिलनाडु के मंदिरों में भगवान शिव की आराधना के लिए नृत्य था।
    • 20वीं शताब्दी में रुकमिणी देवी अरुंडेल जैसे गुरुओं ने इसे मंच पर लाकर लोकप्रिय बनाया।
    • वर्तमान में भारत के आठ मान्यता प्राप्त शास्त्रीय नृत्यों में शामिल, यह नृत्य, संगीत और अभिनय का संगम है।
  • वाझुदूर शैली की उत्पत्ति
    • वाझुदूर (या वझुवूर/विझुवुर) का नाम तमिलनाडु के नागापत्तिनम जिले के वाझुवूर गांव से पड़ा, जहां गुरु वेथा लक्ष्मी नारायण शास्त्री जैसे नृत्याचार्यों ने इसे विकसित किया।
    • यह भरतनाट्यम की चार मूल शैलियों—तंजावुर, पांडानल्लूर, वाझुदूर और कलाक्षेत्र—में से एक है।
    • 1930-40 के दशक में यह शैली प्रमुखता से उभरी, जब चित्रलेखा ने इसे राष्ट्रव्यापी प्रसिद्धि दी।
  • विशेषताएं और तकनीक
    • वाझुदूर शैली अपनी लास्यपूर्ण (नारीसुलभ) अभिव्यक्ति, सुंदर चाल (गतियों) और जटिल पैर कदमों के लिए जानी जाती है।
    • इसमें समृद्ध श्रींगार रस, नृत्य की विस्तृत गति श्रृंखला (धीमी से तेज), और प्रवाहमय मुद्राएं प्रमुख हैं।
    • नर्तकियां घुंघरू बांधकर लयबद्ध ताल पर नृत्य करती हैं, जहां अरमंडी (कूल्हे की हलचल), सरकलिंग (गोलाकार घुमाव) और जंपिंग स्टेप्स विशेष हैं।
    • यह शैली अभिनय (नृत्य) पर अधिक जोर देती है, जिससे भावनाएं जीवंत हो उठती हैं।
  • प्रसिद्ध कलाकार और योगदान
    • चित्रलेखा: वाझुदूर की प्रणेता, जिन्होंने इसे वैश्विक मंच दिया।
    • कमला, यामिनी कृष्णमूर्ति: इस शैली को समृद्ध किया।
    • अन्य: अल्ला रानी, सोभा नायडू।
      ये कलाकारों ने वाझुदूर को भरतनाट्यम की "सौंदर्यपूर्ण" शैली के रूप में स्थापित किया, जो आज भी कालाक्षेत्र और अन्य संस्थानों में सिखाई जाती है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • वाझुदूर शैली हिंदू पौराणिक कथाओं जैसे रामायण-महाभारत की कहानियां अभिनय के माध्यम से जीवंत करती है।
    • यह नारी सौंदर्य, भक्ति और कलात्मकता का प्रतीक है।
    • आधुनिक समय में यह योग, ध्यान और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का माध्यम बनी हुई है, विशेषकर तमिलनाडु के त्योहारों में।
  • प्रदर्शन संरचना
    • भरतनाट्यम का पारंपरिक कार्यक्रम (मार्गम) में वाझुदूर शैली में शामिल हैं:
    • अलारिप्पू: आमदंछी।
    • जटिस्वरम: शुद्ध नृत्य।
    • वर्णम: मुख्य आइटम, अभिनय प्रधान।
    • पदम, तिल्लाना, मंगल।
    • प्रत्येक भाग में वाझुदूर की चालें नृत्य को मोहक बनाती हैं।​

8. निम्नलिखित में से कौन-सा त्योहार उत्तराखंड में मनाया जाता है? [CGL (T-I) 20 अप्रैल, 2022 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) फूल देई
Solution:
  • फूल देई त्योहार उत्तराखंड में मनाया जाता है। फूल देई त्योहार प्रतिवर्ष चैत्र मास में मनाया जाता है।
  • उत्तराखंड में कई पारंपरिक त्योहार मनाए जाते हैं, जो राज्य के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं।
  • उपयोगकर्ता के प्रश्न में विकल्पों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, इसलिए मैं उत्तराखंड के प्रमुख त्योहारों का विस्तृत विवरण प्रदान कर रहा हूँ
  • जो सामान्यतः प्रतियोगी परीक्षाओं या सामान्य ज्ञान प्रश्नों में पूछे जाते हैं।
  • प्रमुख त्योहार
    • उत्तराखंड के त्योहार ऋतु-प्रकृति और कृषि से जुड़े होते हैं। इनमें हरेला सबसे प्रसिद्ध है
    • जो कुमाऊं क्षेत्र में श्रावण मास के प्रथम दिन (लगभग 16 जुलाई) मनाया जाता है।
    • इस दिन लोग धान, गेहूँ, जौ आदि के बीजों को मिट्टी में बोते हैं, जो मानसून की शुरुआत का प्रतीक है।
    • घुघुतिया या घुघूती: मकर संक्रांति (पौष मास) पर मनाया जाता है, विशेषकर कुमाऊं में।
    • आटे से घुघुतिया बनाकर कौवों को खिलाते हैं, इसे 'काला कौवा त्योहार' भी कहते हैं। उत्तरायणी मेला भी इसी समय लगता है।
    • फूलदेई या फूलसंग्राद: चैत्र मास (वसंत पंचमी से) हिंदू नववर्ष की शुरुआत में। बच्चे घरों के दरवाजों पर फूल चढ़ाते हैं, वसंत का स्वागत करते हैं।
    • खुतपुडा: अश्विन संक्रांति पर कुमाऊं में, फसलों की कटाई के बाद।
    • जागड़ा: भाद्र मास में महासू देवता के सम्मान में गढ़वाल के जौनसर क्षेत्र में।
    • कलाई: कुमाऊं में फसल कटाई पर, नाच-गान के साथ।
    • बैसी: श्रावण मास में 22 दिनों तक सात्विक जीवन जिया जाता है।
  • क्षेत्रीय विविधता
    • कुमाऊं क्षेत्र में हरेला, घुघुतिया, जन्मो-पुण्य (श्रावण पूर्णिमा पर ब्राह्मणों का उत्सव) प्रमुख हैं।
    • गढ़वाल में सारा (नंदादेवी के दूतों का आह्वान), आंठू (चांचरी नृत्य के साथ) मनाए जाते हैं।
    • भिटौली चैत्र मास में भाई-बहन का त्योहार है, जहाँ भाई बहनों को उपहार देते हैं।
    • बग्वाल मेला रक्षाबंधन पर वाराही देवी मंदिर में पत्थर फेंकने की अनोखी परंपरा के साथ मनाया जाता है।
  • धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
    • ये त्योहार प्रकृति पूजा, फसल चक्र और पारिवारिक बंधनों पर केंद्रित हैं।
    • कुंभ मेला हरिद्वार में हर 12 वर्ष में लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।
    • नवरात्रि और रामलीला दशहरे पर हर जगह आयोजित होते हैं।

9. ईश्वरी प्रसाद, निम्नलिखित में से किस भारतीय शास्त्रीय नृत्य से संबंधित हैं? [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (d) कथक
Solution:
  • ईश्वरी प्रसाद, भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक से जुड़े हैं। कथक के लखनऊ घराने की उत्पत्ति ईश्वरी प्रसाद से मानी जाती है।
  • कथक से संबंध
    •  जिसकी जड़ें हंडिया तहसील (इलाहाबाद) से जुड़ी हैं, जहां वे निवास करते थे।
    • किंवदंती के अनुसार, उन्हें स्वप्न में भगवान कृष्ण से दिव्य प्रेरणा मिली
    • जिसने उन्हें कथक को भक्ति कला के रूप में विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
  • जीवन और योगदान
    • उनका जन्म इलाहाबाद के हंडिया क्षेत्र में हुआ था। वे 105 वर्ष की आयु तक जीवित रहे और सर्पदंश से उनका निधन हुआ
    • जिसके बाद उनकी पत्नी ने सती प्रथा का पालन किया।
    • इस घटना ने उनके शिष्यों जैसे तुलारामजी और खडगुजी को गहरा प्रभावित किया।
    • ईश्वरी प्रसाद ने कथक को परिष्कृत फुटवर्क, चालाकी भरी मुद्राओं और भक्ति भाव से समृद्ध किया, जो लखनऊ घराने की विशेषता है।
  • कथक की विशेषताएं
    • कथक उत्तर भारत का प्रमुख शास्त्रीय नृत्य है, जिसकी उत्पत्ति मुगल काल में कथावाचकों (कथक) से मानी जाती है।
    • इसमें जटिल तालबद्ध फुटवर्क (तात्कार), घुंघरूओं की बोलों वाली ध्वनियां, चक्करदार चालें और अभिनय प्रधान भाव-भंगिमाएं प्रमुख हैं।
    • लखनऊ घराना कथक के तीन मुख्य घरानों (जयपुर, लखनऊ, बनारस) में सबसे अभिनय-प्रधान है।​
  • ऐतिहासिक महत्व
    • कथक लखनऊ घराने ने मुगल दरबारों से प्रभावित होकर नृत्य को परिष्कृत किया।
    • ईश्वरी प्रसाद जैसे नर्तकों ने इसे मंदिरों से निकालकर लोकप्रिय बनाया। आधुनिक कथक गुरु जैसे बिरजू महाराज इस घराने से प्रेरित हैं।
    • यह नृत्य आज भी तबला, पखावज और वायलिन के साथ प्रस्तुत होता है।​

10. कथक के लखनऊ घराने की स्थापना किसने की थी? [CGL (T-I) 24 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (a) ईश्वरी प्रसाद
Solution:
  • ईश्वरी प्रसाद, भारतीय शास्त्रीय नृत्य कथक से जुड़े हैं। कथक के लखनऊ घराने की उत्पत्ति ईश्वरी प्रसाद से मानी जाती है।
  • कथक के लखनऊ घराने की स्थापना
    • कथक के लखनऊ घराने की स्थापना श्री ईश्वरी प्रसाद ने की थी, जो एक प्रमुख नर्तक और संगीतकार थे।
    • उनका जन्म 1856 में प्रयागराज (इलाहाबाद) के हंडिया क्षेत्र के चुनारा ग्राम में हुआ था
    • जहाँ उन्होंने अपने पिता ठाकुर प्रसाद से कथक की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की।
  • ईश्वरी प्रसाद का जीवन और योगदान

    • ईश्वरी प्रसाद भक्ति आंदोलन के अनुयायी थे और कथक को एक उपासना का रूप बनाने के लिए समर्पित थे।
    • ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर नृत्य को भगवत रूप देने की प्रेरणा दी
    • जिसके बाद उन्होंने कथक के लखनऊ घराने की नींव रखी। उन्होंने पारंपरिक कथक शैली को फ़ारसी
    • उर्दू संस्कृति और ठुमरी के तत्वों के साथ मिश्रित किया
    • जिससे यह घराना अभिनय, भाव-भंगिमा और कोमलता के लिए प्रसिद्ध हुआ।​
  • घराने की विशेषताएँ

    • लखनऊ घराना कथक के तीन प्रमुख घरानों (जयपुर, बनारस और लखनऊ) में सबसे अभिव्यंजक माना जाता है
    • जहाँ चक्कर (तेज़ घुमाव), ठुमरी आधारित नृत्य, हाथों की मुद्राएँ, चेहरे के भाव और कहानी कहने की कला पर जोर दिया जाता है।
    • जयपुर घराने के विपरीत, यहाँ पैरों की ताकत से अधिक ऊपरी अंगों की सुंदरता और लयबद्ध अभिनय को महत्व मिलता है।
    • नवाबी दरबारों के संरक्षण में विकसित यह शैली छोटे-छोटे टुकड़ों (टुكड़े) में नृत्य पर केंद्रित है।
  • वंश और उत्तराधिकारी
    • ईश्वरी प्रसाद के तीन पुत्रों—अड़गू जी, खड़गू जी और तुलाराम जी—ने उनके ग्रंथों और शिक्षा को आगे बढ़ाया।
    • बाद में यह घराना दिल्ली के कथाकारों (जैसे मोदू खान और बख्शू खान) के लखनऊ प्रवास से और समृद्ध हुआ
    • जहाँ नवाबों ने इसका संरक्षण किया। प्रसिद्ध कलाकार जैसे पंडित बिरजू महाराज (कथक के समकालीन महान उस्ताद) इसी घराने से जुड़े हैं, जिन्होंने इसे वैश्विक मंच पर पहुँचाया।​
  • ऐतिहासिक संदर्भ

    • यह घराना दिल्ली घराने से उत्पन्न माना जाता है
    • लेकिन ईश्वरी प्रसाद को इसके मूल प्रवर्तक के रूप में मान्यता प्राप्त है।
    • हंडिया क्षेत्र कथाकारों का प्रमुख केंद्र रहा, और लखनऊ में आकर इसने नवाबी वैभव को आत्मसात किया। आज भी यह घराना कथक की कोमल, भावपूर्ण शैली का प्रतीक है।