सांस्कृतिक गतिविधियां (परम्परागत सामान्य ज्ञान) भाग-II

Total Questions: 50

1. भरतनाट्यम दक्षिणी भारत में ....... का एक शास्त्रीय नृत्य है। [CHSL (T-I) 16 अगस्त, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 11 सितंबर, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 02 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (b) तमिलनाडु
Solution:
  • 'भरतनाट्यम' दक्षिणी भारत में तमिलनाडु का शास्त्रीय नृत्य है। इस राज्य के लोक नृत्य कावड़ीअट्टम, कराकट्टम, थप्पाट्टम, कवादियाट्टम आदि हैं।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • भरतनाट्यम की जड़ें लगभग 2000 वर्ष पुरानी हैं और इसका आधार भरत मुनि के रचित नाट्यशास्त्र तथा नंदिकेश्वर के अभिनय दर्पण पर टिका है।
    • प्राचीन काल में इसे दासीअट्टम या सादिर के नाम से जाना जाता था, जिसे तमिलनाडु के मंदिरों में देवदासियां (मंदिर नृतकियां) प्रस्तुत करती थीं।
    • 20वीं सदी में रुक्मिणी देवी अरुंडेल और ई. कृष्ण अय्यर जैसे सुधारकों ने इसे पुनर्जीवित कर मंचीय रूप दिया, जिससे यह वैश्विक पहचान प्राप्त कर सका।​
  • नाम का अर्थ
    • नाम भरतनाट्यम् संस्कृत शब्दों से बना है
    • भ भावम् (भावना), र रागम् (संगीत), त तालम् (लय), और नाट्यम् (नृत्य)। यह नृत्य भाव, राग और ताल के समन्वय पर आधारित है
    • जो इसे पूर्ण कलात्मक अभिव्यक्ति बनाता है।
    • चिदंबरम मंदिर की मूर्तियां इसके प्रेरणा स्रोत हैं।​
  • प्रदर्शन का क्रम (मार्गम)
    • एक पूर्ण भरतनाट्यम प्रदर्शन मार्गम कहलाता है, जिसमें निम्नलिखित चरण होते हैं:
    • अलारिप्पू: गुरु और ईश्वर की वंदना, सोल्लू कुट्टू (बोलों पर) नृत्य, तिश्र या मिश्र ताल में।​​
    • जातिस्वरम: शुद्ध नृत्य, जटिल फुटवर्क और राग प्रदर्शन।​​
    • शब्दम: भक्ति गीतों पर अभिनय।​
    • वर्णम: केंद्रीय भाग, नृत्य, नृत्य (भावपूर्ण) और नाट्य का मिश्रण, सबसे चुनौतीपूर्ण।​
    • तिल्लाना: तेज गति का समापन नृत्य।​
    • अन्य: पदम (आध्यात्मिक प्रेम), आश्टापादी, मंगल।​
  • विशेषताएं और तकनीक
    • यह नृत्य नृत (शुद्ध लयबद्ध गतियां), नृत्य (भावपूर्ण अभिव्यक्ति) और नाट्य (कथा चित्रण) पर आधारित है।
    • मुद्राएं (हस्तांग), नेत्र अभिनय, पैरों की थिरकियां (टत्तुमेट्टू) और शारीरिक स्थितियां जैसे समभंग, अभंग, त्रिभंग प्रमुख हैं।
    • कर्नाटक संगीत, मृदंगम, वायलिन, बांसुरी और घुँघरू का उपयोग होता है।
    • वेशभूषा में प्लीतेड सिल्क साड़ी, भारी आभूषण और डोमिनेंट मेकअप विशेष हैं।​
  • महत्व और प्रसार
    • संगीत नाटक अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त यह नृत्य शैव भक्ति, रामायण-महाभारत कथाओं को व्यक्त करता है।
    • प्रसिद्ध कलाकार: यामिनी कृष्णमूर्ति, पद्म सुब्रह्मण्यम, मृणालिनी साराभाई।
    • आज महिलाओं के साथ पुरुष भी इसे अपनाते हैं, और यह वैश्विक मंचों पर लोकप्रिय है।​

2. दीपिका रेड्डी का संबंध निम्नलिखित में से किस शास्त्रीय नृत्य शैली से है? [CHSL (T-I) 15 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) कुचिपुड़ी
Solution:
  • दीपिका रेड्डी एक प्रशंसित कुचिपुड़ी नर्तकी हैं। कुचिपुड़ी नृत्य में उनके योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला था।
  • पृष्ठभूमि
    • उन्होंने मात्र 6 वर्ष की आयु से कुचिपुड़ी नृत्य की शुरुआत की और 1976 में रंगप्रवेशम (पहली सार्वजनिक प्रस्तुति) किया, जो रविंद्र भारती में तत्कालीन मुख्यमंत्री के समक्ष हुआ।
    • विवाह के बाद उन्होंने वेम्पति चिन्ना सत्यन के अधीन उन्नत प्रशिक्षण लिया, जो कुचिपुड़ी के महान गुरु थे।​
  • कुचिपुड़ी से संबंध
    • कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश की शास्त्रीय नृत्य शैली है, जो नृत्य, नाट्य और अभिनय का मिश्रण है।
    • दीपिका रेड्डी को वर्तमान समय की प्रमुख कुचिपुड़ी प्रचारकों में गिना जाता है।
    • उन्होंने 50 वर्षों से अधिक समय से इस कला को समर्पित होकर भारत और विश्व भर में प्रदर्शन किया है।
    • उनकी शैली पौराणिक, सांस्कृतिक और समसामयिक विषयों पर आधारित कोरियोग्राफी पर केंद्रित है, जो दर्शकों को आकर्षित करती है।​​
  • उपलब्धियाँ
    • पुरस्कार: 2017 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (कुचिपुड़ी के लिए) और 2026 में पद्म श्री प्राप्त।
    • संस्थान: 2000 में दीपांजलि की स्थापना की, जहाँ उन्होंने सैकड़ों शिष्यों को प्रशिक्षित किया
    • जिनमें वंचित बच्चे भी शामिल हैं। कई शिष्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन कर चुके हैं।​
    • प्रशासनिक भूमिका: जुलाई 2022 से दिसंबर 2023 तक तेलंगाना राज्य संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष रहीं।​
  • योगदान
    • दीपिका रेड्डी न केवल प्रदर्शनकर्ता हैं बल्कि गुरु के रूप में समग्र प्रशिक्षण देती हैं
    • जो नृत्य की जड़ों को मजबूत करता है।
    • वे कुचिपुड़ी को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के रूप में प्रचारित करने के लिए समर्पित हैं।
    • उनके प्रयासों से यह शैली नई पीढ़ी तक पहुँची है, जिसमें जटिल मुद्राएँ, ताल और भावाभिनय शामिल हैं।​
  • कुचिपुड़ी का संक्षिप्त परिचय
    • कुचिपुड़ी 17वीं शताब्दी में आंध्र प्रदेश के कुचिपुड़ी गाँव से उत्पन्न हुई। यह भरतनाट्यम से प्रभावित है
    • लेकिन नाटकीय तत्वों जैसे पात्र-चरित्र निभाना (जैसे सत्यभामा) इसे विशिष्ट बनाते हैं।
    • नर्तक घुँघरू बाँधते हैं और मंच पर आकृतियाँ बनाते हैं। दीपिका जैसे कलाकार इसे जीवंत रखते हैं।​

3. डोलू कुनीथा नृत्य के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें। सही कथनों को चुनिए। [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

(a) यह कर्नाटक का लोकप्रिय नृत्य है।

(b) नगाड़ों को रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाया जाता है।

(c) धार्मिक और युद्ध के उत्साह के गीत गाए जाते हैं।

Correct Answer: (d) A, B, C
Solution:
  • 'डोलू कुनीथा' कर्नाटक का एक पारंपरिक नृत्य है। यह भगवान शिव से जुड़ा है।
  • इसमें नगाड़ों को रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाया जाता है। इसमें धार्मिक और युद्ध के उत्साह के गीत गाए जाते हैं।
  • उत्पत्ति और महत्व
    • यह नृत्य कुरुबा समुदाय (चरवाहों) की सांस्कृतिक धरोहर है
    • जो धार्मिक अनुष्ठानों, त्योहारों और सामुदायिक समारोहों में किया जाता है।
    • कलाकार ढोल बजाते हुए जटिल पैरों की हरकतें करते हैं
    • जो समुदाय की एकता और भक्ति को दर्शाता है।
  • प्रदर्शन शैली
    • प्रदर्शन में 10-16 कलाकार अर्ध-वृत्त या वृत्ताकार बनाते हैं
    • बीच में नेता तालियाँ बजाकर लय नियंत्रित करता है। ढोल कमर पर बंधे होते हैं
    • जिन्हें नृत्य करते हुए तेज़ लयबद्ध तरीके से बजाया जाता है
    • कभी धीमी तो कभी तेज़ धुनों के साथ। गायन भी शामिल होता है, जिसमें पुराण कथाएँ और भक्ति गीत गाए जाते हैं।​
  • पोशाक और वाद्ययंत्र
    • पोशाक सरल होती है: पुरुष धोती पर काला कपड़ा बाँधते हैं
    • ऊपरी शरीर नंगा या रंगीन सजावट वाला, सिर पर पत्तियों वाली पगड़ी।
    • मुख्य वाद्य डोलू (बड़े ढोल, बकरी और भेड़ के चमड़े से बने) है
    • साथ में ताली, काहल, जागटे आदि। महिलाएँ कभी-कभी पारंपरिक साड़ियाँ पहनकर भाग लेती हैं, लेकिन मुख्यतः पुरुष नर्तक होते हैं।
  • सांस्कृतिक प्रसार
    • यह नृत्य कर्नाटक के उत्तरी जिलों, चित्रदुर्ग और शिवमोग्गा में लोकप्रिय है
    • दशहरा और वसंतोत्सवों में प्रमुख आकर्षण। आधुनिक समय में यह मंच प्रदर्शनों तक फैल चुका है
    • लेकिन ग्रामीण परंपराएँ जीवित हैं। डोलू कुनीथा शारीरिक शक्ति, लयबद्धता और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है।​

4. मणिपुरी शास्त्रीय नृत्य के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (I-पाली)]

(A) लाई हरोबा मणिपुरी नृत्य की सबसे पुरानी शैली है।

(B) रास, संकीर्तन और थांग-ता इस नृत्य की सबसे लोकप्रिय शैलियां हैं।

(C) मणिपुरी नृत्य की उत्पत्ति जैन पारंपरिक नृत्य शैली से हुई है।

Correct Answer: (b) A और B दोनों
Solution:
  • लाई हरोबा मणिपुरी नृत्य शैली का सबसे प्राचीनतम रूप है। रास, संकीर्तन और थांग-ता इस नृत्य की सबसे लोकप्रिय शैलियां हैं।
  • मणिपुरी नृत्य की उत्पत्ति प्राचीन समय से माना जाता है, जो लिपिबद्ध किए गए इतिहास से भी परे है।
  • इस नृत्य की उत्पत्ति वैष्णव पारंपरिक नृत्य शैली से हुई है। अतः कथन (A) और (B) सही हैं, जबकि कथन (C) गलत है।
  • उत्पत्ति और इतिहास
    • मणिपुरी नृत्य भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर से उत्पन्न एक प्रमुख शास्त्रीय नृत्य रूप है
    • जिसे संगीत नाटक अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त आठ शास्त्रीय नृत्यों में शामिल किया गया है।
    • इसकी जड़ें प्राचीन लोक परंपराओं, अनुष्ठानों और वैष्णव भक्ति में निहित हैं, न कि जैन नृत्य शैली में जैसा कि विकल्प c में गलत दावा किया गया है।
    • लाई हरोबा इसका प्रारंभिक अनुष्ठानिक रूप है, जो याओशांग उत्सव से जुड़ा है और वैष्णव युग से पूर्व का प्रतिनिधित्व करता है।
  • प्रमुख रूप और विशेषताएँ
    • लाई हरोबा: मणिपुरी नृत्य का सबसे पुराना रूप, जिसमें स्थानीय देवताओं की पूजा और अनुष्ठानिक अभिनय शामिल है।​
    • रास लीला: भगवान कृष्ण और राधा के प्रेम को दर्शाने वाला भक्ति नृत्य, जो नृत्य का सबसे प्रसिद्ध रूप है।
    • संकीर्तन: भक्ति गायन और नृत्य का संयोजन, जिसमें सामूहिक प्रदर्शन होता है।​
    • थांग-टा: मार्शल आर्ट से प्रेरित नृत्य, जो युद्ध कौशल और नृत्य को जोड़ता है।​
    • ये रूप मणिपुरी नृत्य की विविधता को दर्शाते हैं
    • जिसमें तरल गतियाँ, मुड़े हुए पैर, बाहों-हाथों का सूक्ष्म उपयोग और कथात्मक मुद्राएँ प्रमुख हैं।​
  • गलत कथन का खंडन
    • विकल्प c गलत है क्योंकि मणिपुरी नृत्य की उत्पत्ति मणिपुर की स्वदेशी परंपराओं और कृष्ण-केंद्रित वैष्णव परंपरा से है, न कि जैन शैली से।
    • यह नृत्य 20वीं शताब्दी तक मुख्यतः मंदिरों और उत्सवों तक सीमित रहा, बाद में मंचीय रूप में विकसित हुआ।
  • प्रदर्शन शैली
    • महिलाएँ बारीक और कोमल गतियों पर केंद्रित रहती हैं, जबकि पुरुष अधिक सशक्त।
    • नृत्य में पुंग (ढोल), मृदंग और कर्ताल जैसे वाद्ययंत्रों का उपयोग होता है
    • जो लयबद्धता प्रदान करते हैं। यह नृत्य भक्ति, कथा और सौंदर्य का अनूठा संगम है।

5. गुलाबो सपेरा का संबंध निम्नलिखित में से किस नृत्य शैली से है? [CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (IV-पाली), MTS (T-I) 09 मई, 2023 (III-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 28 नवंबर, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 14 जून, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 05 सितंबर, 2023 (I-पाली), MTS (T-I) 12 सितंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) कालबेलिया
Solution:
  • गुलाबो सपेरा का संबंध कालबेलिया नृत्य शैली से है।
  • कालबेलिया लोक नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाने के कारण उन्हें वर्ष 2016 में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया।
  • कालबेलिया नृत्य की विशेषताएं
    • कालबेलिया राजस्थान के थार रेगिस्तान की कालबेलिया जनजाति का पारंपरिक नृत्य है, जिसे "सपेरा नृत्य" या "स्नेक चार्मर डांस" भी कहा जाता है।
    • यह सांप की लहराती गतियों से प्रेरित है, जिसमें नर्तक सर्पिल मुद्राओं, तेज घुमावों और ऊर्जावान कदमों का प्रदर्शन करते हैं।
    • पुरुष और महिला दोनों इसे करते हैं, जो जनजाति के सांप पकड़ने के पेशे को दर्शाता है; 2010 में यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया।​
  • गुलाबो सपेरा का जीवन परिचय
    • गुलाबो सपेरा का जन्म 1960 के आसपास राजस्थान के अजमेर जिले के पुष्कर में कालबेलिया परिवार में हुआ था।
    • जन्म के तुरंत बाद उन्हें लड़की होने के कारण जिंदा दफना दिया गया था
    • लेकिन उनकी मौसी ने बचा लिया; बचपन से ही उन्होंने कालबेलिया नृत्य सीखा।​​
    • समाजिक विरोध और गरीबी के बावजूद, वे जयपुर आकर प्रस्तुतियां देने लगीं और 153 से अधिक देशों में प्रदर्शन कर इस नृत्य को प्रसिद्ध बनाया।​
  • उपलब्धियां और सम्मान
    • उन्हें 2016 में भारत सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया, साथ ही वे रियलिटी शो बिग बॉस (सीजन 5) में भी शामिल हुईं।
    • गुलाबो ने कालबेलिया को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ले जाकर जनजाति की लड़कियों को सशक्त बनाया, जो पहले हाशिए पर थीं।
    • उनकी प्रेरणा से कई लड़कियां अब डांसर, गायिका बनीं, और वे ग्रामीण लड़कियों को मुफ्त शिक्षा भी देती हैं।​
  • नृत्य शैली का महत्व
    • कालबेलिया केवल नृत्य नहीं, बल्कि गीत, वाद्ययंत्र (पोई नागारा, भणai, घुंघरू) और वेशभूषा (काली चोली, घाघरा, चूड़ियां) का समन्वय है।
    • यह जनजाति की घुमंतू जीवनशैली, प्रकृति प्रेम और संघर्षों की कहानी कहता है, जो आज भी उत्सवों और समारोहों में जीवंत होता है।

6. निम्नलिखित में से कौन-सा नृत्य गुजरात राज्य का एक लोक नृत्य है ? [CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (d) टिप्पणी
Solution:
  • 'टिप्पणी' गुजरात के मुख्यतः सौराष्ट्र चोखाड़ क्षेत्र से उत्पन्न एक लोक नृत्य शैली है। यह नृत्य केवल महिलाओं द्वारा किया जाता है।
  • प्रमुख गुजरात लोक नृत्य
    • गुजरात के लोक नृत्य मुख्यतः नवरात्रि जैसे त्योहारों पर किए जाते हैं और इनमें गरबा, डांडिया जैसे नृत्य शामिल हैं।
    • ये नृत्य महिलाओं और पुरुषों दोनों द्वारा किए जाते हैं तथा संगीत वाद्ययंत्रों जैसे ढोल, तबला और तुरी के साथ प्रस्तुत होते हैं।
    • गरबा: महिलाओं द्वारा मां दुर्गा की पूजा में किया जाने वाला वृत्ताकार नृत्य, जिसमें चनिया चोली पहनकर मटकी (गरबो) के चारों ओर घूमा जाता है। यह नवरात्रि के 9 दिनों तक चलता है।
    • डांडिया रास: पुरुषों और महिलाओं द्वारा लकड़ी की सजाई हुई छड़ियों (डांडिया) के साथ किया जाने वाला नृत्य, जो देवी की तलवार का प्रतीक है। यह गरबा के बाद रात में होता है।
    • भवाई: नर्तक सर पर 7-9 पीतल के घड़े संतुलित करते हुए कांच या तलवार की धार पर नृत्य करते हैं, जो भावनाओं का नृत्य कहलाता है।
  • अन्य महत्वपूर्ण नृत्य
    • गुजरात के तटीय और आदिवासी क्षेत्रों से जुड़े ये नृत्य स्थानीय जनजातियों की जीवनशैली को चित्रित करते हैं। इन्हें विशेष अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है।
    • टिप्पनी: चोरवाड़ जिले की कोली और खरवा महिलाओं द्वारा लकड़ी की छड़ी से फर्श पीटकर किया जाने वाला नृत्य, थाली और तुरी के संगीत पर।
    • हुडो: धरवाड़ भारवाड़ जनजाति का नृत्य, जो भेड़ों के झगड़े से प्रेरित है; नर्तक ताली और तलवारों से प्रदर्शन करते हैं।​
    • पधार: पधर समुदाय (मछुआरों) द्वारा समुद्री जीवन की नकल करते हुए गीत गाकर किया जाने वाला नृत्य।​
    • डंगी नृत्य: डांग जिले के आदिवासियों द्वारा सर्पिल गति में किया जाने वाला नृत्य, ढोल और पावरी के साथ।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ये नृत्य गुजरात की पहचान हैं और सामाजिक एकता को बढ़ावा देते हैं। नवरात्रि में लाखों लोग इनका आनंद लेते हैं
    • जो राज्य सरकार द्वारा भी प्रोत्साहित किया जाता है। वेशभूषा में चनिया चोली, केशरिया धोती और रंगीन आभूषण प्रमुख हैं।

7. निम्नलिखित में से कौन-सी श्रीलंका की एक पारंपरिक नृत्य शैली है? [CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) कैन्डीयन नृत्य
Solution:
  • कैन्डीयन नृत्य (Kandyan dance) शैली श्रीलंका का एक पारंपरिक नृत्य रूप है, जिसकी उत्पत्ति कैंडी क्षेत्र से हुई है। इसे 'उदारता नटुम' के नाम से भी जाना जाता है।
  • मुख्य पारंपरिक नृत्य शैलियाँ
    • श्रीलंका के पारंपरिक नृत्य मुख्यतः तीन श्रेणियों में विभाजित हैं: अपकंट्री (कैंडीयन), लो कंट्री और सबरागमुवा।
    • इसमें जटिल पदकौतुक, लयबद्ध हावभाव तथा रंग-बिरंगी वेशभूषा शामिल होती है।
    • सबरागमुवा नृत्य रत्नापुरा क्षेत्र की विशिष्ट शैली है, जो लोक देवताओं की पूजा से प्रेरित है।
    • लो कंट्री डांस दक्षिणी मैदानों में प्रचलित है
    • जिसमें नकाबपोश (मास्क डांस) और शैतान नृत्य (डेविल डांस) सम्मिलित हैं, जो रोग निवारण के लिए किए जाते हैं।
  • कैंडीयन नृत्य का विवरण
    • यह नृत्य शास्त्रीय परंपरा का सर्वोत्तम उदाहरण है, जिसमें वेस डांस (चाँदी के मुकुट वाला), नैयंडी, उद्देक्की, पैंथेरु और वन्नम शामिल हैं।
    • वन्नम पाँच प्रकार के होते हैं, जैसे तुरंगा वन्नम (घोड़े का) और उरागा वन्नम (सर्प का), जो पशु-आकृतियों की नकल करते हैं।
    • नर्तक डफ (बेरा) नामक वाद्य के साथ प्रदर्शन करते हैं, जो नृत्य की लय बनाए रखता है।
    • यह कला प्राचीन कोहोंबा अनुष्ठानों से जुड़ी है और सिंहली संस्कृति को दर्शाती है।​
  • सबरागमुवा नृत्य की विशेषताएँ
    • सबरागमुवा नृत्य सबरागमुवा प्रांत में लोकप्रिय है, जहाँ नर्तक विस्तृत मुखौटे पहनते हैं।
    • यह कृषि और प्रकृति पूजा से संबंधित है
    • जिसमें ऊर्जावान कदम और ताल वाद्य शामिल हैं। प्रदर्शन सामूहिक होते हैं और त्योहारों में आयोजित किए जाते हैं।
  • लो कंट्री और अन्य लोक नृत्य
    • लो कंट्री डांस में राक्षस नृत्य प्रमुख हैं, जो बीमारियों को दूर करने के लिए होते हैं।
    • इसके अलावा, लोक नृत्य और नृत्य-नाटक (कोलम) ग्रामीण जीवन को चित्रित करते हैं। ये सभी शैलियाँ श्रीलंका की विविधता को उजागर करती हैं।
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ये नृत्य धार्मिक अनुष्ठानों, फसल उत्सवों और सामाजिक समारोहों का अभिन्न अंग हैं।
    • आधुनिक समय में भी इन्हें संरक्षित किया जा रहा है, विशेषकर कandy के मंदिर परिसरों में। पर्यट

8. ढिम्सा लोक नृत्य निम्नलिखित में से किस जनजाति द्वारा किया जाता है? [CHSL (T-I) 03 अगस्त, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) अराकू घाटी
Solution:
  • 'ढिम्सा' आंध्र प्रदेश की अराकू घाटी में पहाड़ी जनजातियों का एक पारंपरिक लोक नृत्य है।
  • यह नृत्य महिलाओं द्वारा एक समूह में किया जाता है और आमतौर पर आदिवासी संगीत और गीतों के साथ होता है।
  • उत्पत्ति और क्षेत्र
    • यह नृत्य मुख्य रूप से पोरजा, गाडबा और वाल्मीकि समुदायों से जुड़ा हुआ है
    • हालांकि अन्य जनजातियां भी इसमें भाग लेती हैं।
    • यह ओडिशा और छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों में भी देखा जाता है, लेकिन इसका प्रमुख केंद्र आंध्र प्रदेश ही है।
  • प्रदर्शन और विशेषताएं
    • यह नृत्य पुरुषों और महिलाओं दोनों द्वारा किया जाता है, जिसमें युवा से लेकर वृद्ध तक सभी भाग ले सकते हैं।
    • नर्तक पारंपरिक वेशभूषा में सजते हैं—महिलाएं रंगीन साड़ियां या लहंगे पहनती हैं
    • जबकि पुरुष धोती-कुर्ता या पारंपरिक पोशाक धारण करते हैं। नृत्य की खासियत हाथ पकड़कर गोलाकार घेरे बनाना है
    • जो पड़ोसी गांवों के बीच मित्रता और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
    • संगीत ढोल, बांसुरी, मांदल और अन्य लोक वाद्यों से उत्पन्न होता है, जो ताल और ऊर्जा प्रदान करता है।
  • अवसर और महत्व
    • ढिम्सा नृत्य त्योहारों, शादियों, फसल कटाई और अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है।
    • मार्च-अप्रैल के महीनों में विशेष रूप से आयोजित होता है
    • जब जनजातियां खुशी, सद्भाव और सांस्कृतिक धरोहर को व्यक्त करती हैं।
    • यह नृत्य न केवल मनोरंजन का साधन है
    • बल्कि सामुदायिक बंधन मजबूत करने और सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का माध्यम भी है।
    • आंध्र प्रदेश सरकार इसे आधिकारिक लोक नृत्य के रूप में मान्यता देती है।
  • अन्य विवरण
    • कभी-कभी इसे धेमसा के नाम से भी जाना जाता है, जो दक्षिण भारत के आदिवासी समुदायों की परंपरा को दर्शाता है।
    • यह नृत्य रात के समय देर तक चलता है और इसमें देसीया या आदिवासी शैलियों का मिश्रण होता है।
    • कुल मिलाकर, ढिम्सा आदिवासी संस्कृति की जीवंतता और एकता का प्रतीक है, जो आधुनिक समय में भी अपनी लोकप्रियता बनाए हुए है।

9. निम्नलिखित में से कौन-सी नृत्य शैली असम से संबंधित है? [CHSL (T-I) 15 अगस्त, 2023 (III-पाली), MTS (T-I) 05 सितंबर, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 29 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (b) बिहू
Solution:
  • 'बिहू' असम का सबसे लोकप्रिय लोक नृत्य है। मुख्य रूप से तीन बिहू उत्सव नामित हैं, जो असम में लोकप्रिय हैं-कोंगाली बिहू, रोंगाली/रंगोली बिहू और भोगली बिहू।
  • असम की प्रमुख नृत्य शैली
    • असम से सबसे निकटता से जुड़ी नृत्य शैली बिहू नृत्य है, जो असम का सबसे प्रसिद्ध और प्रतिनिधि लोक नृत्य माना जाता है।
    • यह नृत्य असमिया नव वर्ष और बिहू त्योहार के दौरान प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें युवा पुरुष और महिलाएं ऊर्जावान कदमों के साथ भाग लेते हैं।
  • बिहू नृत्य का परिचय
    • बिहू नृत्य असम की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है और साल में तीन बार (रोंगाली, भुडोई और कोंगाली बिहू) मनाया जाता है।
    • इसमें तेज़ संगीत, थिरकते कदम और खेती-किसानी से जुड़े गीत शामिल होते हैं
    • जो असम के ग्रामीण जीवन की खुशी और उत्साह को दर्शाते हैं।
    • नर्तक पारंपरिक वेशभूषा जैसे महिलाओं के लिए मेखेला-चादर और पुरुषों के लिए धोती-गमछा पहनते हैं।
  • प्रस्तुति शैली
    • बिहू में नर्तक घेरे में खड़े होकर कमर झुकाकर हाथ फैलाते हैं
    • जबकि ढोल, पेपा (सींग का वाद्य) और बांसुरी की थाप पर नृत्य तेज़ होता जाता है
    • युवा लड़कियां कूल्हों पर हाथ रखकर घूमती हैं
    • वहीं पुरुष वाद्ययंत्र बजाते हुए नेतृत्व करते हैं। यह नृत्य समुदायिक एकता और प्रजनन क्षमता का प्रतीक है।
  • अन्य असमिया नृत्य शैलियाँ
    • बागुरुंबा: बोडो जनजाति का नृत्य, जिसमें मोर पंखों वाली रंगीन पोशाकें और कलाबाजियाँ होती हैं।​
    • धुलिया: सगौटी जनजाति द्वारा सिर पर मिट्टी के ढोल रखकर किया जाने वाला अनोखा नृत्य।​
    • अली आई लिगांग: मिकिर जनजाति का नृत्य, जो उनकी परंपराओं को जीवंत करता है।​
    • सत्रिया: असम का शास्त्रीय नृत्य, जो वाishnav मठों से जुड़ा है और राम-कृष्ण कथाओं पर आधारित है।​
  • सांस्कृतिक महत्व
    • ये नृत्य असम की विविध जनजातियों (बोडो, राभा, मिकिर आदि) की परंपराओं को संजोए रखते हैं
    • पर्यटन को बढ़ावा देते हैं। बिहू विशेष रूप से राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है
    • जबकि सत्रिया को भारत के आठ शास्त्रीय नृत्यों में शामिल किया गया है।

10. निम्नलिखित में से कौन-सा एक उत्सव और नृत्य है? [CHSL (T-I) 07 अगस्त, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (b) बिहू
Solution:
  • 'बिहू' असम में मनाया जाने वाला एक उत्सव और नृत्य है।
  • बिहू असम के तीन अलग-अलग सांस्कृतिक उत्सवों के एक समूह को दर्शाता है और दुनियाभर के असमी प्रवासी इसे धूमधाम से मनाते हैं।
  • बिहू का महत्व
    • रोंगाली बिहू (वसंत), कोन्घाली बिहू (मानसून) और भोगाली बिहू (फसल)। नृत्य पुरुष और महिला दोनों द्वारा समूह में किया जाता है
    • जिसमें कूल्हों की लयबद्ध हलचल और हाथों की मुद्राएँ प्रमुख होती हैं। यह नृत्य प्रजनन, प्रेम और आनंद को दर्शाता है।
  • अन्य विकल्पों से अंतर
    • बैसाखी: पंजाब का फसल त्योहार, भांगड़ा नृत्य से जुड़ा लेकिन त्योहार और नृत्य एक ही नाम का नहीं।​
    • उगादी: दक्षिण भारत का नव वर्ष, विशेष नृत्य से जुड़ा नहीं।​
    • पोंगल: तमिलनाडु का फसल उत्सव, नृत्य इसका अभिन्न हिस्सा नहीं।​
    • बागुरम्बा: बिसागु उत्सव का नृत्य (असम के बोडो समुदाय), लेकिन उत्सव और नृत्य अलग नाम।​
  • बिहू नृत्य की विशेषताएँ
    • नर्तक पारंपरिक वेशभूषा जैसे घाघरा-चोली (महिलाएँ) और धोती-गमछा (पुरुष) पहनते हैं।
    • प्रदर्शन में तेज़ संगीत और समन्वित कदम होते हैं, जो खेतों की हरियाली और जीवन चक्र को प्रतिबिंबित करते हैं।
    • यह लोकप्रियता में कथकली या भरतनाट्यम जैसे शास्त्रीय नृत्यों से अलग, सामुदायिक उत्सव का हिस्सा है।
    • असम में बिहू के अलावा सत्रिया शास्त्रीय नृत्य है, लेकिन बिहू लोक उत्सव का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।