सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आंदोलन (आधुनिक भारतीय इतिहास)

Total Questions: 59

31. आधुनिक शिक्षा को देश में आधुनिक विचारों के प्रसार के साधन के रूप में देखने वाले पहले समाज सुधारक कौन थे ? [CGL (T-I) 17 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (c) राजा राममोहन राय
Solution:
  • राजा राममोहन राय आधुनिक शिक्षा को देश में आधुनिक विचारों के प्रसार के साधन के रूप में देखने वाले पहले समाज सुधारक थे।
  • शिक्षा के क्षेत्र में राजा राममोहन राय अंग्रेजी शिक्षा के पक्षधर थे। उनके अनुसार, एक उदारवादी पाश्चात्य शिक्षा ही अज्ञान के अंधकार से हमें निकाल सकती है और भारतीयों को देश के प्रशासन में भाग दिला सकती है।
  • उनका मानना था कि शिक्षा देश के विकास और लोगों के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
  • उन्होंने 1817 में कलकत्ता में हिंदू कॉलेज की स्थापना की, जो बाद में कलकत्ता विश्वविद्यालय का केंद्र बन गया।
  • उन्होंने महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा की भी वकालत की और अंग्रेजी शिक्षा के विचार का समर्थन किया।
    Other Information
  •  डी.के. कर्वे एक समाज सुधारक थे जिन्होंने महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए काम किया और भारत में पहली महिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।
  •  सावित्रीबाई फुले एक समाज सुधारक भी थीं जिन्होंने लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा के लिए काम किया और भारत में लड़कियों के लिए पहला स्कूल स्थापित किया।
  • स्वामी विवेकानन्द एक आध्यात्मिक नेता और दार्शनिक थे जिन्होंने व्यक्ति और राष्ट्र के विकास के लिए शिक्षा के महत्व पर जोर दिया।
  • अतः सही उत्तर विकल्प 1, राजा राम मोहन राय है।
  • उन्होंने भारतीय समाज में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों के प्रसार के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण माध्यम माना।
  • राजा राम मोहन राय ने परंपरागत अंधविश्वासों, कुरीतियों और रूढ़िवाद को खत्म करने के लिए आधुनिक शिक्षा के माध्यम से ज्ञान और विज्ञान को बढ़ावा दिया।
  • उन्होंने 19वीं सदी में शिक्षा को बदलाव और प्रगति का सशक्त उपकरण माना, जिससे समाज में नए विचार और राष्ट्रीय चेतना का विकास हो सके।
  • राजा राम मोहन राय ने न केवल शिक्षा को आधुनिक किया बल्कि इसे सामाजिक सुधार का एक महत्वपूर्ण आधार भी माना। वे आधुनिक और पश्चिमी शिक्षा प्रणाली के समर्थक थे
  • जो भारतीय युवाओं को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक एवं उदार मूल्यों से परिचित कराए।
  • उन्होंने उन्नत वैज्ञानिक सोच और तर्कवाद को बढ़ावा दिया, जिससे भारत में नव संवेदनशीलता और जागरूकता का दौर शुरू   हुआ।
  • उनके प्रयासों ने भारत में सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन को जन्म दिया, जिसमें शिक्षा को परिवर्तन और पुनरुत्थान का एक केंद्र समझा गया।
  • इस आंदोलन ने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दों को भी समाज में स्थापित करना शुरू किया, जिससे शिक्षा केवल ज्ञान का साधन न रहकर समस्त देश के सामाजिक और सांस्कृतिक सुधार का माध्यम बनी।
  • इस प्रकार, राजा राम मोहन राय को आधुनिक शिक्षा के प्रवर्तक और इसे आधुनिक विचारों के प्रसार के साधन के रूप में देखने वाले पहले समाज सुधारक के रूप में जाना जाता है.​​

32. ब्रह्म समाज की स्थापना किसके द्वारा की गई थी? [CGL (T-I) 25 जुलाई, 2023 (III-पाली), CHSL (T-I) 8 अगस्त, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (c) राजा राममोहन राय
Solution:
  • राजा राममोहन राय (1772-1833 ई.) ने 20 अगस्त, 1828 को 'ब्रह्म सभा' नाम से एक नए समाज की स्थापना की, जिसे आगे चलकर 'ब्रह्म समाज' के नाम से जाना गया। इस समाज ने मूर्ति पूजा का विरोध किया
  • एक ब्रह्म की पूजा का उपदेश दिया। ब्रह्म समाज ने रंग, वर्ण अथवा मत पर विचार किए बिना मानवमात्र के प्रति प्रेम तथा जीवन की उच्चतम विधि के रूप में मानवता की सेवा पर बल दिया।
  • इंग्लैंड के ब्रिस्टल में 27 सितंबर, 1833 को राजा राममोहन राय की मृत्यु हो गई, जहां उनकी समाधि स्थापित है। इस संस्था में नया जीवन फूंकने और इसे एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने का श्रेय महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर को जाता है।
  • राजा राम मोहन राय एक समाज सुधारक थे जिन्होंने सती प्रथा के उन्मूलन की वकालत की और समाज में महिलाओं के उत्थान के लिए कार्य किया।
  • ब्रम्ह समाज एक सामाजिक-धार्मिक आंदोलन था जिसका उद्देश्य हिंदू धर्म में एकेश्वरवाद और तर्कवाद को बढ़ावा देना था।
  •  इस आंदोलन ने जाति व्यवस्था के उन्मूलन की भी वकालत की और शिक्षा और सामाजिक सुधारों को प्रोत्साहित किया।
    Other Information
  •  केशव चंद्र सेन राजा राम मोहन राय के शिष्य थे और उन्होंने ब्रम्ह समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  •  देवेन्द्रनाथ टैगोर भी राजा राम मोहन राय के शिष्य और उनके दामाद थे, जो बाद में ब्रम्ह समाज आंदोलन के नेता बने।
  •  दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक थे, जो भारत में एक और सामाजिक-धार्मिक आंदोलन था जिसका उद्देश्य वैदिक   शिक्षाओं को बढ़ावा देना और सामाजिक बुराइयों को खत्म करना था।
  •  इस समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य तत्कालीन हिन्दू धर्म की रूढ़ियों, अंधविश्वासों और सामाजिक बुराइयों जैसे सती   प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह, जातिवाद, और अस्पृश्यता को समाप्त करके हिन्दू धर्म को नवीन और आध्यात्मिक रूप देना था।
  • ब्राह्म समाज को आरंभ में "ब्रह्म सभा" कहा गया था और इसे "अद्वैतवादी हिन्दुओं की संस्था" भी कहा जाता है।
  • राजा राममोहन राय के बाद इस समाज के नेतृत्व में महर्षि द्वारिका नाथ टैगोर और रामचन्द्र विद्याविग्यश जैसे विद्वान शामिल हुए।
  • 1843 में देवेन्द्र नाथ टैगोर ने इस समाज की बागडोर संभाली और इसे ईश्वरवादी आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाया।
  • बाद में 1857 में केशव चन्द्र सेन को ब्रह्म समाज का सदस्य और आचार्य नियुक्त किया गया जिन्होंने इस समाज को तेजी से फैलाया और इसके विचारों को उदारवादी बनाया।
  • 1866 में केशव चन्द्र सेन ने ब्रह्म समाज के एक विभाजन के बाद "आदि ब्रह्म समाज" की स्थापना की।
  • इस संस्था ने स्त्रियों की मुक्ति, सामाजिक सुधार, शिक्षा का प्रसार, मद्य निषेध और दान को अपने मुख्य उद्देश्य बनाया। इस प्रकार ब्रह्म समाज ने भारत में धार्मिक पुनर्जागरण और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.​

33. निम्नलिखित में से किस सामाजिक धार्मिक समुदाय की स्थापना राजा राममोहन राय ने की थी? [MTS (T-I) 03 मई, 2023 (II-पाली)]

Correct Answer: (c) ब्रह्म समाज
Solution:
  • राजा राममोहन राय (1772-1833 ई.) ने 20 अगस्त, 1828 को 'ब्रह्म सभा' नाम से एक नए समाज की स्थापना की, जिसे आगे चलकर 'ब्रह्म समाज' के नाम से जाना गया।
  • इस समाज ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और एक ब्रह्म की पूजा का उपदेश दिया।
  • ब्रह्म समाज ने रंग, वर्ण अथवा मत पर विचार किए बिना मानवमात्र के प्रति प्रेम तथा जीवन की उच्चतम विधि के रूप में मानवता की सेवा पर बल दिया।
  • इंग्लैंड के ब्रिस्टल में 27 सितंबर, 1833 को राजा राममोहन राय की मृत्यु हो गई, जहां उनकी समाधि स्थापित है।
  • इस संस्था में नया जीवन फूंकने और इसे एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने का श्रेय महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर को जाता है।
  •  ब्रह्म समाज एक सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन था जिसका उद्देश्य हिन्दू समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, कुरीतियों और सामाजिक बुराइयों जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, जातिवाद, बहुविवाह आदि का उन्मूलन करना था।
  • इस समाज ने मूर्ति पूजा और बहुदेववाद को खारिज करते हुए एकेश्वरवाद (मोनोथीइज्म) को बढ़ावा दिया
  • धार्मिक सहिष्णुता, नैतिकता तथा वेदों के अध्ययन को प्रेरित किया। राजा राममोहन राय ने इसे एक नए धार्मिक और सामाजिक सोच की शुरुआत माना, जो प्राचीन भारतीय धार्मिक ग्रंथों और पश्चिमी वैज्ञानिक तथा दार्शनिक विचारों का मिश्रण था।
  • ब्रह्म समाज ने हिंदू धर्म की कट्टरपंथी रूढ़ियों, जाति प्रथा, अंधविश्वासों और कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और सामाजिक सुधारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • इसके सदस्यों में राजा राममोहन राय के साथ अन्य प्रमुख सुधारक जैसे ईश्वरचंद्र विद्यासागर, केशव चंद्र सेन और दयानंद सरस्वती भी थे, जिन्होंने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया।
  • ब्रह्म समाज की यह पहल ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान सती प्रथा पर प्रतिबंध लगवाने जैसे ऐतिहासिक बदलावों में भी सहायक सिद्ध हुई।
  • यह समाज धार्मिक स्वतंत्रता और समाज की आधुनिक सोच को बढ़ावा देने वाला पहला बड़ा सुधार आंदोलन था, जिसने भारत में धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में गहरा प्रभाव डाला।
  • संक्षेप में, राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज ने धार्मिक आस्थाओं की एकता, सामाजिक समानता, धार्मिक सहिष्णुता और आधुनिकता के मार्ग दिखाए, जिससे भारतीय समाज में सुधार और पुनर्जागरण की शुरुआत हुई.​

34. हिंदू सुधार संगठन ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की? [MTS (T-I) 08 सितंबर, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 21 नवंबर, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 16 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) राजा राममोहन राय
Solution:
  • राजा राममोहन राय (1772-1833 ई.) ने 20 अगस्त, 1828 को 'ब्रह्म सभा' नाम से एक नए समाज की स्थापना की
  • जिसे आगे चलकर 'ब्रह्म समाज' के नाम से जाना गया। इस समाज ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और एक ब्रह्म की पूजा का उपदेश दिया।
  • ब्रह्म समाज ने रंग, वर्ण अथवा मत पर विचार किए बिना मानवमात्र के प्रति प्रेम तथा जीवन की उच्चतम विधि के रूप में मानवता की सेवा पर बल दिया।
  • इंग्लैंड के ब्रिस्टल में 27 सितंबर, 1833 को राजा राममोहन राय की मृत्यु हो गई, जहां उनकी समाधि स्थापित है। इस संस्था में नया जीवन फूंकने और इसे एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने का श्रेय महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर को जाता है।
  • राम मोहन रॉय
    •  राम मोहन रॉय को ब्रह्म समाज का संस्थापक माना जाता है।
    •  उन्होंने 1815 में इसके पूर्ववर्ती, आत्मीय सभा की स्थापना की और 1828 में ब्रह्म सभा की स्थापना की, जिसका बाद में नाम बदलकर ब्रह्म समाज कर दिया गया।
    • रॉय एक प्रमुख सामाजिक और धार्मिक सुधारक थे जिन्होंने एकेश्वरवाद, सती प्रथा के उन्मूलन और भारत में आधुनिक शिक्षा की वकालत की।
    •  उनके प्रयासों ने ब्रह्म समाज की नींव रखी, जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक-धार्मिक आंदोलन था जिसका उद्देश्य हिंदू समाज   में सुधार करना और धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा देना था।
    •  रॉय की बौद्धिक प्रतिभा और पूर्वी और पश्चिमी दोनों विचारों के साथ उनकी व्यस्तता ब्रह्म समाज के प्रारंभिक सिद्धांतों को   आकार देने में महत्वपूर्ण थी।
      Other Information
  •  केशव चंद्र सेन
    • केशव चंद्र सेन ब्रह्म समाज के एक प्रमुख नेता थे, लेकिन उन्होंने इसकी स्थापना नहीं की थी।
    • वे 1857 में ब्रह्म समाज में शामिल हुए और इसके विस्तार और लोकप्रियता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • हालांकि, देवेन्द्रनाथ टैगोर, एक अन्य प्रमुख नेता के साथ मतभेद के कारण ब्रह्म समाज में विभाजन हो गया।
    • सेन ने 1866 में ब्रह्म समाज ऑफ इंडिया का गठन किया जो अपने सामाजिक सुधारों में अधिक क्रांतिकारी था और अधिक सार्वभौमिक धार्मिक दृष्टिकोण अपनाया।
    •  यद्यपि ब्रह्म समाज में सेन का योगदान महत्वपूर्ण था, लेकिन इसकी प्रारंभिक नींव राम मोहन राय ने रखी थी।
  • ईश्वर चंद्र विद्यासागर
    •  ईश्वर चंद्र विद्यासागर बंगाल के एक प्रसिद्ध विद्वान, शिक्षक और समाज सुधारक थे।
    •  वे मुख्य रूप से महिला शिक्षा और विधवा विवाह के लिए अपनी वकालत के लिए जाने जाते हैं।
    •  हालाँकि विद्यासागर ब्रह्म समाज के समकालीन थे और इसके कुछ सुधारवादी आदर्शों को साझा करते थे, लेकिन वे इसकी   स्थापना या नेतृत्व में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं थे।
    •  उन्होंने अपने लेखन, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक सक्रियता के माध्यम से अपने सुधारवादी एजेंडे का पीछा किया,   अक्सर ब्रह्म समाज के समानांतर काम करते हुए लेकिन अपनी अलग पहचान और ध्यान बनाए रखते हुए।

35. निम्नलिखित में से कौन-सी सुधारवादी संस्था वेदों को समस्त ज्ञान का स्रोत मानती थी ? [CGL (T-I) 17 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) आर्य समाज
Solution:
  • आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती शुद्ध वैदिक परंपरा में विश्वास करते थे।
  • 'वेदों की ओर लौटो' का नारा दिया। उत्तर वैदिक काल से आज तक सभी अन्य मतों को उन्होंने पाखंड या झूठे धर्म की संज्ञा दी। 1867 ई. में उन्होंने झूठे धर्मों का खंडन करने के लिए 'पाखंड खंडिनी पताका' लहराई।
  • उनका विश्वास था कि हिंदू धर्म और वेद जिस पर भारत का पुरातन समाज टिका था, शाश्वत, अपरिवर्तनीय, धर्मातीत तथा दैवीय हैं।
  • इसलिए उन्होंने 'वेदों की ओर लौटो' तथा वेद ही समस्त ज्ञान के स्रोत हैं, का नारा दिया। स्वामी दयानंद को उनके धार्मिक सुधार प्रयासों के कारण 'भारत का मार्टिन लूथर किंग' कहा जाता है।
  • वेदों को समस्त ज्ञान का स्रोत मानने वाली प्रमुख सुधारवादी संस्था आर्य समाज है, जिसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी।
  • उन्होंने वेदों को अंतिम और अपरिवर्तनीय ज्ञान का स्रोत माना और "वेदों की ओर लौटो" का नारा दिया।
  • इस आंदोलन का उद्देश्य प्राचीन वैदिक परंपराओं को पुनर्जीवित करना और वेदों में न पाए जाने वाले सामाजिक अंधविश्वासों जैसे मूर्ति पूजा, बहुदेववाद, और सामाजिक कुरीतियों का विरोध करना था।
  • स्वामी दयानंद ने वेदों को ईश्वरीय ज्ञान बताया और वेदों पर आधारित एकेश्वरवादी धर्म और नैतिकता का प्रचार किया।
  •  इस संस्था ने शिक्षा सुधारों को भी बढ़ावा दिया, जिसमें संस्कृत तथा वैदिक शिक्षाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
  • स्वामी दयानंद ने विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा, अस्पृश्यता उन्मूलन जैसे सामाजिक सुधारों की भी समर्थना की। उनका ग्रंथ "सत्यार्थ प्रकाश" आर्य समाज की विचारधारा का बुनियादी ग्रंथ माना जाता है
  • जिसमें वेदों के ज्ञान सहित धार्मिक और सामाजिक सुधारों के लिए उनके दृष्टिकोण को व्यापक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
  • आर्य समाज के विचारधारा के अनुसार, वेद इस संसार की समस्त सच्चाइयों और ज्ञान का स्रोत हैं
  • जो ईश्वर द्वारा ऋषियों को समाधि अवस्था में दिए गए थे। वेदों में जीवन के प्रत्येक आयाम—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—का व्यवस्थित ज्ञान मौजूद है। स्वामी दयानंद का यह मानना था
  • भारत में जो भी सामाजिक पथभ्रष्टताएं हुईं, वे वेदों से विमुख होने की वजह से थीं, इसलिए वेदों की शिक्षाओं की ओर वापस लौटना आवश्यक है।
  • इस प्रकार, आर्य समाज न तो केवल धार्मिक प्रथा सुधारने में लगा, बल्कि वेदों को ज्ञान का आधार मान कर सामाजिक और धार्मिक पुनरुत्थान की कोशिश भी की.​
  • इस व्यापक दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि वेदों को समस्त ज्ञान का स्रोत मानने वाली संस्था का प्रमुख नाम आर्य समाज है, जो स्वामी दयानंद सरस्वती के नेतृत्व में प्राचीन वैदिक ज्ञान की पुनर्स्थापना और सामाजिक सुधार के लिए कार्यरत है।

36. विवेकानंद ने विश्व धर्म संसद में कहां भाग लिया था? [CGL (T-I) 20 जुलाई, 2023 (IV-पाली)]

Correct Answer: (d) शिकागो
Solution:
  • रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं की व्याख्या को साकार करने का श्रेय उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद (1863-1902 ई.) को है।
  • उन्होंने इस शिक्षा का साधारण भाषा में वर्णन किया। स्वामी विवेकानंद इस नवीन हिंदू धर्म (Neo-Hinduism) के प्रचारक के   रूप में उभरे।
  • 1893 ई. में वे शिकागो गए जहां उन्होंने 'पार्लियामेंट ऑफ द वर्ड्स रिलीजन्स' (विश्व धर्म संसद) में अपना सुप्रसिद्ध भाषण दिया।
  • इस भाषण से उन्होंने पश्चिमी संसार के सामने पहली बार भारत की संस्कृति की महत्ता को प्रभावकारी तरीके से प्रस्तुत किया।
  • उन्हें सम्मेलन के पहले दिन हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करने और भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था।
  • उनका भाषण, जो प्रसिद्ध शब्दों "अमेरिका की बहनों और भाइयों के साथ शुरू हुआ, सार्वभौमिक भाईचारे और सभी धर्मों की सहिष्णुता और स्वीकृति के महत्व का एक शक्तिशाली संदेश था।
  • विवेकानन्द के भाषण की व्यापक रूप से प्रशंसा हुई और उन्होंने अमेरिका में तुरंत सनसनी फैला दी, जिसके कारण उन्हें विभिन्न मंचों पर बोलने के लिए कई निमंत्रण मिले।
  • सैन फ्रांसिस्को, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रमुख शहर हैं, लेकिन वे 1893 में आयोजित विश्व धर्म संसद से जुड़े नहीं हैं।
    Other Information
  • विश्व धर्म संसद में विवेकानन्द की भागीदारी ने दुनिया भर में वेदांत और हिंदू धर्म का संदेश फैलाने के उनके मिशन की शुरुआत को चिह्नित किया।
  • संसद एक ऐतिहासिक घटना थी जिसने अंतरधार्मिक संवाद और समझ को बढ़ावा देने के लिए दुनिया भर से विभिन्न धर्मों के    प्रतिनिधियों को एक साथ लाया।
  • सैन फ्रांसिस्को कैलिफोर्निया का एक प्रमुख शहर है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता   है। इसने 1939 में गोल्डन गेट अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी सहित कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की मेजबानी की।
  • राज्य और व्हाइट हाउस, कैपिटल बिल्डिंग और स्मिथसोनियन संग्रहालय सहित कई महत्वपूर्ण स्थलों का घर। इसने कई              महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की मेजबानी की है, जिनमें राष्ट्रपति उद्घाटन और अंतर्राष्ट्रीय शिखर सम्मेलन शामिल हैं।

37. निम्नलिखित में से रामकृष्ण परमहंस के शिष्य कौन थे? [CHSL (T-I) 17 अगस्त, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 02 मई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) स्वामी विवेकानंद
Solution:
  • रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं की व्याख्या को साकार करने का श्रेय उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद (1863-1902 ई.) को है। उन्होंने इस शिक्षा का साधारण भाषा में वर्णन किया।
  • स्वामी विवेकानंद इस नवीन हिंदू धर्म (Neo-Hinduism) के प्रचारक के रूप में उभरे। 1893 ई. में वे शिकागो गए जहां उन्होंने 'पार्लियामेंट ऑफ द वर्ड्स रिलीजन्स' (विश्व धर्म संसद) में अपना सुप्रसिद्ध भाषण दिया।
  • इस भाषण से उन्होंने पश्चिमी संसार के सामने पहली बार भारत की संस्कृति की महत्ता को प्रभावकारी तरीके से प्रस्तुत किया।
  • स्वामी विवेकानंद आरंभ में रामकृष्ण परमहंस से काफ़ी तर्क-वितर्क करते थे, लेकिन बाद में गुरु की संगति में आध्यात्मिक सत्य का अनुभव प्राप्त किया।
  • उन्होंने रामकृष्ण की शिक्षाओं को वेदांत और योग के माध्यम से सरल और सार्वभौमिक रूप दिया तथा 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद में भारत और हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व किया।
  • इसके अलावा उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर गुरु के आदर्शों को आगे बढ़ाया.​
  • रामकृष्ण परमहंस के अन्य शिष्य भी थे, जैसे राखाल, भवनाथ, भूपती, नित्यगोपाल, और दुर्गाचरण, जिन्होंने भी उनकी साधना और शिक्षाओं का अनुसरण किया।
  • स्वामी विवेकानंद को उनका सबसे प्रमुख और समर्पित शिष्य माना जाता है, जो आध्यात्मिक गुरु के कार्य को विश्व स्तर पर फैलाने के लिए विशेष प्रभावशाली रहे।
  • ये शिष्य रामकृष्ण के आध्यात्मिक परिवार को बनाते थे और उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के माध्यम से उनके विचारों का प्रचार किया गया.​
  • रामकृष्ण परमहंस ने जीवन भर विभिन्न धर्मों की एकता पर जोर दिया और अपनी साधना में सभी धर्मों के अनुष्ठान अपनाए।
  • उन्होंने भक्ति, ध्यान, और निस्वार्थ सेवा को परम सत्य की प्राप्ति के मार्ग के रूप में बताया।
  • स्वामी विवेकानंद ने इन शिक्षाओं को ग्रहण कर उन्हें आधुनिक एवं वैश्विक रूप में प्रस्तुत किया, जिससे हिंदू धर्म और भारतीय आध्यात्मिकता का पुनरुद्धार हुआ.​

38. करसनदास मूलजी और दादोबा पांडुरंग ....... से जुड़े थे, जिसने जाति व्यवस्था जैसी बुराइयों के खिलाफ काम किया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया। [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (I-पाली)]

Correct Answer: (b) परमहंस मंडली
Solution:

करसनदास मूलजी और दादोबा पांडुरंग परमहंस मंडली से जुड़े थे, जिसने जाति व्यवस्था जैसी बुराइयों के खिलाफ काम किया और विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया।

  • 1840 में परमहंस मंडली नामक एक गुप्त सामाजिक-धार्मिक संगठन की स्थापना बॉम्बे में की गई थी।
  •  इसका मानव धर्म सभा के साथ घनिष्ठ संबंध है, जिसकी स्थापना 1844 में सूरत में हुई थी।
  •  दादोबा पांडुरंग, दुर्गाराम मेहताजी और उनके कई दोस्तों ने इसकी स्थापना की।
  •  करसोनदास मूलजी परमहंस मंडली से भी जुड़े थे।
  •  यह महाराष्ट्र की पहली सामाजिक-धार्मिक संस्था थी।
  •  इन मंडली के संस्थापकों का एकेश्वरवादी विश्वास था।
  •  वे अधिकतर जाति कानूनों की अवज्ञा से चिंतित थे।
  •  सदस्यों ने अपने सत्र के दौरान निचली जातियों के सदस्यों द्वारा तैयार भोजन का सेवन किया।
  •  मंडली ने विधवा पुनर्विवाह और महिला शिक्षा का समर्थन किया और जाति व्यवस्था जैसी बुराइयों के खिलाफ काम किया।
    Other Information
    आर्य समाज:
  • यह 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित एक हिंदू सुधार आंदोलन है।
  •  संगठन का उद्देश्य वैदिक ज्ञान को बढ़ावा देना और मूर्ति पूजा और जाति व्यवस्था को अस्वीकार करना था।
    ब्रह्म समाज:
  • यह 1828 में राजा राम मोहन राय द्वारा स्थापित एक सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन है।
  •  संगठन का उद्देश्य एकेश्वरवाद को बढ़ावा देना और मूर्ति पूजा, जाति व्यवस्था और अन्य सामाजिक बुराइयों को अस्वीकार करना था।
    रामकृष्ण मिशन:
  •  यह 1897 में स्वामी विवेकानन्द द्वारा स्थापित एक आध्यात्मिक संगठन है।
  •  संगठन का उद्देश्य श्री रामकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द की शिक्षाओं को बढ़ावा देना और विभिन्न सामाजिक कल्याण       गतिविधियों के माध्यम से समाज की बेहतरी की दिशा में काम करना है।

39. आध्यात्मिक सत्य की खोज के लिए गठित तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना किसने की थी? [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (II-पाली), MTS (T-I) 08 मई, 2023 (I-पाली), दिल्ली पुलिस कांस्टेबिल 15 नवंबर, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) देबेंद्रनाथ टैगोर
Solution:

हिंदू धर्म का पहला सुधार आंदोलन 'ब्रह्म सभा' (ब्रह्म समाज) था। जिसकी स्थापना राजा राममोहन राय ने 1828 ई. में की थी। इस पर आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा का बहुत प्रभाव पड़ा था। राजा राममोहन राय के इन्हीं विचारों के प्रसार के लिए देवेंद्रनाथ टैगोर ने 1839 ई. में 'तत्वबोधिनी सभा' की स्थापना की।

  • देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 'तत्वबोधिनी सभा' की स्थापना की।
  • 6 अक्टूबर 1839 को देवेन्द्रनाथ टैगोर ने तत्वरंजिनी सभा की स्थापना की, जिसे कुछ ही समय बाद तत्वबोधिनी ('सत्य-साधक) सभा का नाम दिया गया।
  • देवेन्द्रनाथ टैगोर एक हिंदू दार्शनिक और धार्मिक सुधारक थे।
  • ब्रह्म समाज की स्थापना राजा राम मोहन राय और देवेन्द्रनाथ टैगोर ने की थी
  • 1859 में, देवेन्द्रनाथ टैगोर द्वारा तत्वबोधिनी सभा को वापस ब्रह्म समाज में भंग कर दिया गया था।
  • राजा राम मोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है।
महत्वपूर्ण आंदोलन/सभा और उनके संस्थापकः
आर्य समाजस्वामी दयानंद सरस्वती
रामकृष्ण मिशनस्वामी विवेकानन्द
भिनव भारतवि. सावरकर
प्रार्थना समाजआत्मा राम पांडुरंग और दादोबा पांडुरंग
आत्मीय सभाराजा राम मोहन राय
गदर पार्टीलाला हरदयाल और काशीराम
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशनचंद्रशेखर आज़ाद
मुस्लिम लीगआगा खान

40. फारसी में लिखी गई पुस्तक 'गिफ्ट टू मोनोथिस्ट' के लेखक कौन हैं, जिसमें अनेकेश्वरवाद की निंदा की गई है? [CGL (T-I) 26 जुलाई, 2023 (III-पाली)]

Correct Answer: (a) राजा राममोहन राय
Solution:

राजा राममोहन राय ने 'तुहफात-उल-मुवाहिदीन' फारसी भाषा में लिखी थी। बाद में इसका अंग्रेजी अनुवाद मौलवी ओबैदुल्लाह अल ओबैदी द्वारा 'ए गिफ्ट टू मोनोथेईस्टस' नाम से 1884 ई. में प्रकाशित किया गया था, जिसमें अनेकेश्वरवाद की निंदा की गई है।

  • मुगल काल के दौरान फ़ारसी भारत में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली भाषा थी और अदालत की भाषा थी।
  • राजा राम मोहन राय एक प्रमुख समाज सुधारक और विद्वान थे जिन्होंने भारतीय पुनर्जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • कार्य, एकेश्वरवादियों को उपहार, बहुदेववाद की आलोचना और एकेश्वरवादी धर्मों की श्रेष्ठता के लिए एक तर्क था।
    Other Information
  •  अरबी मुख्य रूप से इस्लाम से जुड़ी भाषा है और धार्मिक ग्रंथों और अनुष्ठानों में इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता       है।
  •  सेमेटिक भाषा अरबी के अधिकांश वक्ता अरब जगत में पाए जाते हैं।
  •  इसका नाम अरब लोगों के नाम पर रखा गया है और यह पहली बार पहली शताब्दी ईस्वी में सामने आया था।
  •  बांग्ला पूर्वी भारत और बांग्लादेश के बंगाली लोगों की भाषा है और इसकी एक समृद्ध साहित्यिक परंपरा है।
  •  यह पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असमिया बराक घाटी की आधिकारिक भाषा है।
  •  संस्कृत भारत की एक प्राचीन भाषा है और यह हिंदू धर्म और पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणालियों से जुड़ी है।
  • कांस्य युग के अंत के दौरान उत्तरपश्चिम से अपनी पूर्ववर्ती भाषाओं के फैलाव के बाद, इसकी उत्पत्ति दक्षिण एशिया में हुई।