आधिपत्य के एक आवश्यक कार्य में एक सामाजिक व्यवस्था के अस्तित्व के प्रति समर्थन देने के लिए लोगों को आश्वस्त करना शामिल है, जो बदले में उनका समर्थन नहीं करती है। सीमांत समूह प्रायः उन विचारधाराओं का विरोध या उनके प्रति विद्रोह नहीं करते, जो विशेषाधिकार-प्राप्त समूहों का अत्याधिक समर्थन करती हैं, क्योंकि वे किसी स्तर पर आधिपत्य जमाने देने पर सहमत होने दे रहे होते हैं। इस कथन से तत्काल प्रश्न खड़ा होता हैं | कोई भी व्यक्ति क्यों इस प्रकार की व्यवस्था के प्रति सहमत होता है? जबकि वर्चस्वकारी विचारधाराएं सामाजिक रूप से शक्तिशाली समूहों की इच्छाओं और हितों को प्रतिबिंबित करती हैं, इन विचारधाराओं के प्रसुप्त या आधिपत्यवादी बने रहने के लिए उनमें एक अतिरिक्त वचन देने की विशेषता भी आवश्यक है। सीमांत समूहों का श्रेष्ठ हित इन धारणाओं को स्वीकार करने में भी है। अन्य तरीके से कहा जाए तो सामाजिक रूप से शक्तिशाली समूह उनके वैश्विक दृष्टिकोण को सार्वभौमिक चिंतन के तरीके के रूप में स्वीकार करने के लिए कार्य करते हैं और इन समूहों के बाहर के सदस्य इन विचारधाराओं को स्वीकार करने लगते हैं क्योंकि ये उन्हें किसी तरीके से लाभप्रद लगती हैं | इसे स्वत: स्फूर्त सहमति की एक प्रक्रिया के रूप में संदर्भित किया जाता है क्योंकि यह विशिष्ट रूप से अनौपचारिक है या उस पर ध्यान नहीं जाता। आधिपत्य के प्रति स्वतः स्फूर्त सहमति को एक उदाहरण के माध्यम से श्रेष्ठ तरीके से समझा जा सकता है। किसी देश की उच्च शिक्षा प्रणाली के भीतर अनेक वैचारिक घटक विद्यार्थियों के सर्वोत्तम हितों में नहीं हो सकते हैं । एक वर्चस्वकारी धारणा सुझाती है कि कॉलेज के विद्यार्थियों को अपनी स्वयं की शिक्षा का भुगतान करना चाहिए। इस धारणा से प्रभावित होने के बावजूद वे इसे स्वीकार कर लेते हैं और यह विचारधारा बनी रहती है। लेकिन, जब इस प्रकार की सहमति विफल हो जाती है तो आधिपत्य की अवधारणा स्पष्ट करती है कि किस प्रकार वर्चस्वकारी विचारधाराएं लचीले विनियोजन की प्रक्रिया के माध्यम से इस विफलता को रोकने के लिए विकसित होती हैं । इस तरह की स्थिति में यह संभावना है कि वर्चस्वकरी सांस्कृतिक संस्थाएं किसी चुनौतीपूर्ण धारणा को आत्मसात करेंगी उन्हें आधिपत्यवादी मैट्रिक्स में एकीकृत करेंगी और पूर्ववर्ती मानक को पुनः स्थापित करेंगी । परिणामस्वरूप आधिपत्यवादी प्रणालियाँ कभी भी लुप्त नहीं होतीं । वे सामाजिक समूहों के बीच निरंतर लेन-देन की प्रक्रिया के माध्यम से केवल रूप बदलती हैं| आधिपत्यवादी वैचारिक संरचनाएं आंशिक रूप से सीमांत विचारधाराओं के एकीकरण और विनियोजन की कभी भी न समाप्त होने वाली प्रक्रिया के माध्यम से नियंत्रण बनाए रखती हैं ।
सीमांत लोग आधिपत्य के बावजूद विरोध क्यों नहीं करते हैं?