NTA यूजीसी नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2022 (इतिहास) Shift-I

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िये और उससे संबंधित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :

सैय्यद और उनके खानकाह को उनके परिजनों तथा अनुयायियों को सहायता प्रदान करने के निमित्त दिये गये दान के फल स्वरूप भूमि पर उनको नियंत्रण प्रदान किया गया। वे अत्यधिक सौभाग्यशाली थे कि उनके पास कृषि हेतु उपजाऊ भूमि थी, वे इन स्थानों पर रहने वाले अपने शिष्यों के स्वैच्छिक श्रम और अपने क्षेत्र के किसानों और कारीगरों से उत्पाद के रूप में भेंट से भी आय प्राप्त करते थे।

अपने शिष्यों के अदत्त श्रम से उनके पास अकूत धन इकट्ठा हो गया। कालांतर में, धार्मिक और पंथनिरपेक्ष अनुदान की प्रथा तथा दानदाताओं के अधीन किसानों और शिल्पकारों की दासता से घाटी के भीतर विद्यमान सामाजिक व्यवस्था परिभाषित होती थी। उनके अनुदान से सैय्यद समयानुक्रम में अपने उत्तराधिकारियों को सदैव के लिए प्रशासक के रूप में स्थापित करते रहे।

शनैः शनैः सैय्यदों ने स्थानीक परंपराओं को अपनाया, कम-से कम बाह्यरूप में ही उन्होंने अनुरूपता को अंगीकार किया ताकि अपने खानकाह और रियासतों के लोकस्वरूप का निर्माण कर सकें। उनके दान सुल्तान और उनके अधिकारियों द्वारा आहरण से मुक्त थे।

यद्यपि इन रियासतों के साथ उनके संबंध को यूरोपीय अर्थ में सामंती नहीं कहा जा सकता है। तथापि श्रम शक्ति के उपयोग में बहुत सी अड़चने थी। राज्य शासन ने इस अर्थ में सामंती प्रवृत्ति को अपना लिया था कि मूलतः यह धार्मिक और पंथनिरपेक्ष व्यक्तियों द्वारा वसूल किये गये अधिशेष पर ही आश्रित था और उप जागीर पद प्रदान करने की प्रक्रिया पर रोक नहीं लगा सका।
इन रियासतों के संबंध को आप कैसे वर्णित करेंगे? 

Correct Answer: (d) सामंती चरित्र
Solution:

सल्तनत काल में सुल्तानों ने सैय्यद और उनके खानकाह (सूफी संतों का निवास स्थान) को उनके परिवार एवं अनुयायियों के भरण-पोषण हेतु भूमि दान दिया था। इस भूमि पर दान-ग्रहिता को पूर्ण नियंत्रण दिया गया। धीरे-धीरे सैय्यदों ने स्थानीय परम्पराओं को अपना लिया।

दान में दिया गया भूमि सुल्तान एवं उनके अधिकारियों के हस्तक्षेप से मुक्त थे और उन्हें कर वसूलने एवं प्रशासनिक कार्य करने का अधिकार दिया गया। एक प्रकार से यह सामंती व्यवस्था का प्रतीक था, जो यूरोपीय सामंतवादी व्यवस्था से भिन्न था।

अपने स्वरूप में यह धार्मिक एवं पंथनिरपेक्षता लिए हुए था तथा बाद में धार्मिक और पंथनिरपेक्ष अनुदान की प्रथा तथा दानदाताओं के अधीन किसानों और शिल्पकारों की दासता से घाटी के भीतर विद्यमान सामाजिक व्यवस्था परिभाषित होने लगी थी।

92. अपने खानकाह को सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए सैय्यदों द्वारा कौन से कदम उठाये गये थे?

Correct Answer: (a) स्थानीय परंपराओं का अंगीकरण
Solution:

खानकाह को सामाजिक स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए सैय्यदों द्वारा स्थानीय परम्पराओं का अंगीकरण किया गया। खानकाह सूफी संतों के निवास स्थान होते थे। खानकाह सामाजिक जीवन का केंद्र बिंदु था।

शेख निजामुद्दीन औलिया का खानकाह यमुना नदी के तट पर स्थित था। दिल्ली के सुल्तानों के शासन काल में सिद्दी मौला ने विशालकाय खानकाह का निर्माण करवाया था। खानकाहों में सुबह से देर रात तक आने-जाने वाले यात्रियों के लिए लंगर की व्यवस्था की गई थी।

इन यात्रियों में सिपाही, गुलाम, व्यापारी, गायक, सूफी एवं हिन्दू संत आदि शामिल होते थे। अमीर हसन सिजजी और अमीर खुसरो ने शेख निजामुद्दीन के बारे में लिखा था कि शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों के सर का मुंडन तथा यौगिक व्यायाम आदि व्यवहार इस तथ्य के द्योतक हैं कि स्थानीय परम्पराओं को आत्मसात करने का प्रयत्न किया गया।

93. सामाजिक व्यवस्था में इस अनुदान के कारण कौन-से नये लक्षण उपस्थित हुए ?

Correct Answer: (b) इन भू अनुदानों पर काम करने वाले किसानों और कारीगरों की दासता
Solution:खानकाहों को प्रदत्त कृषि योग्य भूमि अनुदान के कारण सामाजिक व्यवस्था में नवीन लक्षण दिखाई देने लगें। यह नवीन लक्षण था- भू-अनुदानों पर काम करने वाले किसानों और कारीगरों की दासता। सैय्यदों को सुल्तान ने जिस भूमि का दान किया था वह सुल्तान तथा उसके अधिकारियों के नियंत्रण से मुक्त थीं। सैय्यद तथा उनके खानकाह का उस भूमि पर पूर्ण नियंत्रण था तथा वही कर वसूल करता था। वे यहाँ रहने वाले किसानों और कारीगरों से उत्पाद के रूप में प्राप्त उपहारों से धन प्राप्त करते थे। इस प्रकार खानकाहों को प्रदत्त भूमि तथा उस पर कार्य करने वाले कृषक एवं कारीगरों पर सैय्यदों का नियंत्रण स्थापित हुआ तथा समाज में दासता रूपी कुव्यवस्था का उद्भव हुआ।

94. सैय्यद और उनके खानकाह को दान देने का उद्देश्य क्या था?

Correct Answer: (a) उनके परिजनों एवं अनुयायियों के लिए आय का स्रोत प्रदान करना
Solution:

सैय्यद और उनके खानकाह को दान देने का प्रमुख उद्देश्य था उनके परिजनों एवं अनुयायियों के लिए आय का स्रोत प्रदान करना। खानकाह में सूफी संत तथा उनके परिवार, सेवक और अनुयायी रहा करते थे।

सिद्दी मौला के खानकाह में बलबन तथा खिलजियों के समर्थक सदा उपस्थित रहते थे। निजामुद्दीन औलिया के खानकाह में सदैव लंगर व्यवस्था चलती रहती थी। इन सभी खर्चा का वहन दान से प्राप्त आय से होता था। अतः सुल्तानों ने (जो स्वयं सूफी-संतों के अनुयायी थे) बृहद मात्रा में धन प्रदान किया तथा नियंत्रण मुक्त भूमि अनुदान दिया।

95. उनकी आय का स्रोत क्या था?

Correct Answer: (a) स्वैच्छिक श्रमिकों के द्वारा उनकी भूमि की जुताई से प्राप्त उपज
Solution:

सैय्यद और उनके खानकाह की आय का मुख्य स्रोत स्वैच्छिक श्रमिकों द्वारा उनकी भूमि की जुताई से प्राप्त उपज थी। अपने शिष्यों के कठिन परिश्रम एवं किसानों और कारीगरों से प्राप्त उपहारों से वे दिनोदिन धनी होते गये और धीरे-धीरे अपने उत्तराधिकारियों को एक प्रशासक के रूप में स्थापित करने लगे। तुगलक वंश के पश्चात् 1414 ई.से 1451 ई. तक सैय्यद वंश ने दिल्ली सल्तनत पर अधिकार करके शासन किया।

96. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़ें और प्रश्न के उत्तर दीजिए।

"गुजरात से जम्मू तक और अटक से रोहिलखंड तक सिधिया और सिखों को छोड़कर कोई शक्तिशाली नहीं थे, शेष अन्य सभी नाममात्रिक थे। यदि उनमें विवाद उत्पन्न हो जाए तो उनमें गंभीर और महत्वपूर्ण टकराव होगा : यदि उनमें एकता स्थापित हो जाए तो उनकी शक्ति अप्रतिरोध्य होगी।"
मुगल सम्राट द्वारा - महादजी सिंधिया को किस उपाधि से सम्मानित किया गया था?

Correct Answer: (a) वकील-ए-मुतलक
Solution:

मुगल सम्राट ने महादजी सिंधिया को 'वकील-ए-मुतलक उपाधि से सम्मानित किया था। बक्सर युद्ध में पराजित होने के पश्चात् इलाहाबाद की द्वितीय संधि के तहत मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय अंग्रेजों का पेंशनयाफ्ता बन गया।

सालबाई की संधि के पश्चात् पेशवा की स्थिति मजबूत हो गई तथा महादजी सिंधिया का महत्व इतना अधिक बढ़ गया कि वह मैसूर पर प्रभुत्व स्थापित करने लगा। अंग्रेजों ने शाहआलम द्वितीय के किसी भी मामले में हस्तक्षेप नहीं करने का वादा किया था।

अतः इसका लाभ महादजी सिंधिया ने उठाया। अब शाहआलम पर सिंधिया का प्रभाव बढ़ने लगा और सम्राट ने उसे मुगल सल्तनत का 'वकील-एमुतलक' नियुक्त किया। 1772 ई. में सिंधिया ने मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय को एक बार पुनः दिल्ली के सिंहासन पर आसीन किया।

97. महादजी सिंधिया की किस वर्ष में मृत्यु हुई थी?

Correct Answer: (d) 1794
Solution:

महादजी सिंधिया की मृत्यु 1794 ई. में हुई थी। 'वकील-ए-मुतलक' (साम्राज्य का संरक्षक) उपाधि प्राप्त होने के पश्चात् सिंधिया और अधिक शक्तिशाली हो गये थे। उनका साम्राज्य सतलुज नदी से लेकर नर्मदा तट तक फैल चुका था। अब वे पूना पर आधिपत्य के बारे में सोचने लगे थे। उन्होंने पूना दरबार में अपना प्रभाव एवं वर्चस्व स्थापित किया किन्तु 1794 ई. में उनकी मृत्यु के पश्चात् पूना दरबार में नाना फडनवीस का प्रभाव बढ़ने लगा था।
नोट- • महादजी सिंधिया ने गवर्नर जनरल मैकफर्सन से बंगाल प्रदेश के खिराज की शेष राशि जमा करवाने को कहा था।
• सिंधिया के मृत्यु के पश्चात् उसका भतीजा दौलत राव सिंधिया उत्तराधिकारी नियुक्त हुआ।

98. सालबाई संधि (1782) का सही प्रावधान (क्लॉज) क्या है?

Correct Answer: (c) रघुनाथ राव ने पेशवा की उपाधि पर अपना दावा छोड़ दिया।
Solution:सालबाई की संधि (17 मई, 1782 ई.) अंग्रेजों तथा मराठों के मध्य महादजी सिंधिया के प्रयास से सम्भव हुआ था। इसका प्रमुख उद्देश्य था मराठों को हैदरअली से दूर करना। सालबाई की संधि पर हस्ताक्षर सिंधिया और एण्डर्सन ने किया था। इसमें 17 धारायें शामिल है जिसमें से कुछ इस प्रकार हैं :-

1. सालसेट तथा एलिफेंटा अंग्रेजों को प्राप्त हो गया।

2. अंग्रेजों ने रघुनाथ राव का पक्ष त्याग दिया अर्थात रघुनाथराव ने पेशवा की उपाधि पर अपना दावा छोड़ दिया था। पेशवा की तरफ से उसके पेंशन की व्यवस्था की गई।

3. सिन्धिया को यमुना नदी के पश्चिम की अपनी समस्त भूमि पुनः प्राप्त हो गयी।

4. बम्बई तथा दक्षिण में एक-दूसरे के जीते हुए भू-क्षेत्र एक-दूसरे को वापस मिल गये।

5. अंग्रेजों को पूर्ववत् व्यापार के विशेषाधिकार के उपभोग करने की स्वीकृति दी गई। डॉडवेल के अनुसार, "सालंबाई की संधि भारत में अंग्रेजी प्रभुसत्ता के इतिहास को एक नवीन मोड़ देने वाली थी।"

99. किस पेशवा के शासन के दौरान मराठा राज्य "कटक से अटक तक" अपने प्रादेशिक विस्तार की पराकाष्ठा पर था?

Correct Answer: (c) बालाजी बाजीराव
Solution:

पेशवा बालाजी बाजीराव (1740-1761 ई.) के समय मराठा राज्य कटक से अटक तक अपने प्रादेशिक विस्तार की पराकाष्ठा पर था। उसके समय मराठा साम्राज्य का विस्तार इतना अधिक हुआ कि कहा जाने लगा कि "मराठा घोडों ने कन्याकुमारी से लेकर हिमालय के झरनों तक अपनी प्यास बुझाई।

" बालाजी बाजीराव ने मालवा, कर्नाटक, उड़ीसा, बंगाल, बिहार आदि राज्यों पर विजय प्राप्त की। उसने सिन्दखेड़ के युद्ध (1757 ई.) में निजाम को पराजित किया तथा निजाम ने 25 लाख रुपये वार्षिक कर देने योग्य प्रदेश मराठों को सौंप दिया। 14 जनवरी, 1761 ई. में पानीपत के तृतीय युद्ध में अब्दाली की सेनाओं ने मराठों को पराजित कर दिया। अतः इस हार को पेशवा बर्दाश्त न कर सका और 23 जून 1761 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।

100. निम्नलिखित में से किसने 'कृष्णा से अटक तक' मराठा के विस्तार की नीति का अनुसरण किया था?

Correct Answer: (b) बाजीराव-1
Solution:

पेशवा बाजीराव प्रथम (1720-1740 ई.)ने कृष्णा से अटक तक मराठा के विस्तार की नीति का अनुसरण किया था। बालाजी विश्वनाथ (1713-1720 ई.) के पश्चात् उसका पुत्र बाजीराव प्रथम पेशवा बनता है। उस समय उसकी आयु 19 वर्ष की थी।

पेशवा बनने के पश्चात् उसने मुख्यतः दो उद्देश्य निर्धारित किये प्रथम उद्देश्यः एक ऐसी स्थिति का निर्माण करना जिसमें विभिन्न मराठा सरदार एक-दूसरे पर निर्भर रहें और आपस में एकदूसरे का सहयोग करें। द्वितीय उद्देश्य :- गिरते हुए मुगल साम्राज्य के खण्डहरों पर भारत में मराठा राज्य की स्थापना करना था।

इस सन्दर्भ में बाजीराव प्रथम ने कहा था कि "अब समय आ गया है कि हम विदेशियों को भारत से निकाल दें और हिन्दुओं के लिए अमर कीर्ति प्राप्त कर लें। आओ हम इस पुराने वृक्ष के खोखले तने पर प्रहार करें, शाखाएं तो स्वयं गिर जायेंगी। हमारे प्रयत्नों से मराठा पताका कृष्णा नदी से अटक तक फहराने लगेंगी।

उसके समय 1728 ई. में मुंशी शिवगाँव संधि, 1731 ई. में वारना की संधि तथा 1738 ई. में दुरई सराय की संधि हुई। कोंकण प्रदेश पर पेशवा का प्रभुत्व स्थापित हुआ एवं गुजरात, मालवा, बुन्देलखण्ड तथा दिल्ली तक मराठों के आक्रमण होने लगे।