NTA यूजीसी नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2022 (इतिहास) Shift- II

Total Questions: 100

1. महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध (गुरू) आलार निम्नलिखित में से किस गण से संबंधित थे?

Correct Answer: (b) केसफुत्त के कलाम
Solution:

महात्मा बुद्ध के प्रसिद्ध शिक्षक (गुरू) आलार केसपुत्त के कलाम गण से संबंधित थे। आलार कलाम बुद्ध के समकालीन एक दार्शनिक एवं योगी तथा सांख्य दर्शन के विशेषज्ञ थे। बुद्ध के समय समाज में सांख्य दर्शन का काफी प्रभाव था और इससे बुद्ध भी काफी प्रभावित थे।

गृह त्याग के पश्चात् गौतम बुद्ध ने वैशाली में सांख्य दर्शन के आचार्य आलार कलाम को अपना प्रथमं गुरू बनाया तथा उनसे अंकिंचन्यायतन नाम की 'अरूपसमापत्ति' की शिक्षा ग्रहण की। लेकिन संतुष्टि न होने के कारण सत्य की खोज के लिए वे राजगृह चले गये।

2. भारत के किस दार्शनिक ने विशिष्ठाद्वैत के दर्शन का प्रतिपादन किया?

Correct Answer: (d) रामानुजाचार्य
Solution:भारत के प्रमुख दार्शनिक रामानुजाचार्य (1017-1137 ई.) ने विशिष्टाद्वैत के दर्शन का प्रतिपादन किया था। भक्ति आंदोलन के प्राचीनतम प्रचारक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य रामानुजाचार्य थे जिन्होंने सगुण ईश्वर की उपासना पर बल दिया। इन्होंने यह मत रखा कि भक्ति तथा प्रपत्ति से प्रसन्न ईश्वर स्वयं मोक्ष प्रदान करता है (भक्ति- प्रपत्तियां प्रसन्न ईश्वरेव मोक्षं ददाति)। विशिष्टाद्वैत का अर्थ है- 'ब्रह्म अर्थात् ईश्वर अद्वैत होते हुए भी जीव तथा जगत् की शक्तियों द्वारा विशिष्ट है।'
  • भक्ति तथा धार्मिक आन्दोलनों का सूत्रपात दक्षिण में आठवीं शती में महान् दार्शनिक शंकराचार्य के उदय के साथ हुआ था, जिन्होंने अद्वैतवाद का प्रचार किया।
  • मंडन मिश्र पूर्व मीमांसा दर्शन के आचार्य थे तथा ये कुमारिल भट्ट के शिष्य थे। यही बाद में शंकराचार्य द्वारा शास्त्रार्थ में पराजित होकर सन्यासी हो गए और इनका नाम सुरेश्वराचार्य पड़ा।
  • माधवाचार्य (13 वीं शताब्दी) का विश्वास द्वैतवाद में था तथा आत्मा व परमात्मा को पृथक पृथक मानते थे।

3. महाभारत परियोजना (प्रोजेक्ट) का समालोचनात्मक संस्करण निम्नलिखित में से, किसके प्रधान सम्पादकत्व में सम्पादित किया गया था?

Correct Answer: (c) वी. एस. सुक्यांकर
Solution:

विष्णु सीताराम सुक्थांकर (4 मई 1887 - 21 जनवरी 1943) जिन्हें वी.एस. सुक्यांकर के नाम से भी जाना जाता है। ये संस्कृत के एक प्रसिद्ध भाषाविद् और विद्वान थे। 1925 ई. में वी.एस. सुक्थांकर ने पुणे में भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में महाभारत परियोजना (प्रोजेक्ट) के समालोचनात्मक संस्करण के प्रधान संपादक का पद ग्रहण किया।

वर्षों के अथक श्रम और कई प्रतिलेखकों एवं साथी विद्वानों की सहायता के बाद आदि पर्व (यानी महाभारत की अठारह पुस्तकों में से पहला) का पहला खंड 1927 ई. में प्रकाशित हुआ। कुछ वर्ष बाद 1933 ई.में संपूर्ण आदि पर्व प्रकाशित हुआ। इस कार्य में महाभारत की लगभग 60 आंशिक पांडुलिपियों को दो प्रमुख पाठों (उत्तरी और दक्षिणी) से संबंधित दस अलग-अलग लिपियों में मिलाना शामिल था।

शाब्दिक आलोचना के उनके तरीकों का एक स्पष्ट और विस्तृत विवरण प्रोलेगोमेना (1933 ई.) के खंड में पाया जाता है। महाभारत पर उनके कुछ लेख सुक्यांकर स्मारक संस्करण के पहले खंड में संकलित किए गए हैं।

4. गण्डरादित्य कौन थे -

Correct Answer: (d) चोल शासक
Solution:

परांतक चोल का बड़ा बेटा राजकुमार राजादित्य तथा दूसरा पुत्र गण्डरादित्य था। तक्कोलम के युद्ध (949. ई.) में परांतक प्रथम बुरी तरह से परास्त हुआ एवं उसका पुत्र चोल युवराज राजादित्य लड़ते हुए मारा गया। परांतक प्रथम की मृत्यु के बाद 955 ई.से 985 ई. अर्थात् 30 वर्ष का समय चोल राजवंश का सर्वाधिक अशन्ति का काल माना जाता है।

चोल शासक गण्डरादित्य (949-957 ई.) अपने पिता परांतक चोल प्रथम की तरह विस्तारवादी नहीं था। उसे चोल देश में धार्मिक कार्यों और मंदिर निर्माण में रूचि थी। वह भगवान शिव का भक्त था और उसने कई शिव मंदिरों का निर्माण भी करवाया। उसके शासनकाल के दौरान कृष्ण तृतीय के नेतृत्व में टोंडिमंडलम पर राष्ट्रकूटों का कब्जा बना रहा। लेकिन गण्डरादित्य ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उसने चिदंबरम मंदिर में भगवान शिव पर एक भक्तिपूर्ण काव्य कृति 'थिरूविसैप्पा' की रचना की।

5. निम्नलिखित में से कौन-सा एक जैन ग्रंथ नहीं है?

Correct Answer: (d) यमक
Solution:

निशिथ सूत्र, तत्वार्थाधिगम सूत्र और अभिधान चिन्तामणि जैन ग्रंथ से सम्बन्धित है। जैन भिक्षुकों के लिए विधि नियमों का संकल्प (6 छेद सूत्र) निशिथ सूत्र, महानिशिथ, व्यवहार, आचार दशा, कल्प, पंचकल्प हैं।

उमास्वाती (पहली सदी) श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों सम्प्रदायों के श्रद्धेय थे तथा इनका ग्रंथ तत्वार्थाधिगम सूत्र एवं उनकी टीका जैन धर्मावलम्बियों में बहुत अधिक लोकप्रिय हुई। अभिधान-चिन्तामणि ग्रंथ के लेखक हेमचन्द्र हैं। यमक बौद्ध धर्म के अभिधम्मपिटक की छठीं पुस्तक है।

यमक को दस अध्यायों में विभाजित किया गया है जो निम्न है- मूल, खंड, आयतन, धातु, सक्का, संखरा, अनुसाय, चित्त, धम्म और इंद्रिय । दस डिवीजनों में से प्रत्येक के उपचार की विधि तीन गुना होती है। बुद्धघोष द्वारा यमक पर एक भाष्य है जो पंचप्पाकरनत्यकथा में शामिल हैं।

6. कार्दमक वंश का संस्थापक कौन था?

Correct Answer: (a) चष्टन
Solution:

पश्चिमी भारत के कार्दमक वंश का संस्थापक चष्टन था। यह पूर्व में कुषाणों के अधीन सिन्ध क्षेत्र का क्षत्रप था। कालान्तर में इसने महाक्षत्रप की उपाधि ग्रहण की तथा इसकी कुछ मुद्राओं पर उज्जैन चिह्न मिलता है। संभवतः उसने सातवाहनों से उज्जयिनी को जीत लिया था। कार्दमक वंशी शकों के शासन में ज्येष्ठ तथा कनिष्ठ शासकों का प्रचलन था एवं जिनकी उपाधियाँ

क्रमशः महाक्षत्रप तथा क्षत्रप होती थीं। टॉलमी ने इसे चष्टन टियासटेनेस नाम से सम्बोधित किया है तथा उसकी राजधानी ओजिनी (उज्जयिनी) बताई है। वृद्धावस्था में चष्टन ने अपने पुत्र जयदामन को क्षत्रप नियुक्त किया। किन्तु इसकी असामयिक मृत्यु के बाद उसने अपने पौत्र रूद्रदामन प्रथम को क्षत्रप नियुक्त किया।

• अंधो (अन्धाऊ) अभिलेख (130 ई. कच्छ क्षेत्र, गुजरात) में  चष्टन तथा रूद्रदामन को सहशासक बताया गया है।

7. जिनप्रभासूरि द्वारा रचित 'विविधतीर्थकल्प' में निम्नलिखित में से किस पवित्र शहर के बारे में एक खण्ड को शामिल किया है-

Correct Answer: (c) मथुरा
Solution:

'विविधतीर्थकल्प' एक व्यापक रूप से उद्धृत जैन ग्रंथ है जिसकी रचना 14वीं शताब्दी में जिनप्रभासूरि ने की थी। यह लगभग 60 कल्पों (खंडों) का संकलन है तथा इसके एक खण्ड में पवित्र शहर मथुरा के बारे में विवरण है।

जिनप्रभासूरि ने मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में व्यापक रूप से यात्रा की और समकालीन घटनाओं के बारे में प्रकाश डाला है। मुहम्मद बिन तुगलक जिनप्रभासूरि के साथ विचार विमर्श करता था एवं एक बार आधी रात तक बातचीत की। इनके मार्गदर्शन में वह स्वयं शंत्रुजय तथा गिरनार मंदिरों की यात्रा की थी।

8. राजा पर निम्नलिखित में किस राज्य से संबंधित है?

Correct Answer: (a) कोशल
Solution:

राजा 'पर' कोशल राज्य से सम्बन्धित थे। ऐतरेय एवं शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में उल्लेख मिलता हैं कि राजा 'पर' ने ऐन्द्र अभिषेक के साथ-साथ अश्वमेध यज्ञ भी करवाया था। 16 महाजनपदों में से एक कोशल महाजनपद की स्थापना इक्ष्वाकु वंश के राजा इक्ष्वाकु ने किया था।

रामायण में इनकी राजधानी अयोध्या थी। बुद्धकाल में यह उत्तरी कोसल तथा दक्षिणी कोसल राजधानी दो भागों में विभाजित हो गया तथा इनकी राजधानियाँ क्रमशः साकेत (अयोध्या) तथा श्रावस्ती थी। पुराणों में इक्ष्वाकु से लेकर प्रसेनजीत (पाली में पसेनदी) तक इतिहास मिलता है। प्रसेनजीत के समय कोशल महाजनपद अपने उत्कर्ष पर था।

9. अशोक के निम्नलिखित में से किस शिलालेख की प्रति (कॉपी) एक कटोरे पर उत्कीर्णित पायी गयी है

Correct Answer: (b) 7 वां दीर्घ शिलालेख
Solution:

शाहबाजगढ़ी में अशोक के 7वाँ दीर्घ शिलालेख की प्रति (कॉपी) एक कटोरे पर उत्कीर्णन किया गया है। यह मूल रूप से गांधार क्षेत्र में स्थित था लेकिन वर्तमान में बंबई के प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय में जमा है। शाहबाजगढ़ी एवं मानसेहरा अभिलेखों की लिपि खरोष्ठी है, किन्तु इन दोनों की भाषा प्राकृत है।

अशोक के सातवें शिलालेख में लोगों को धर्म श्रावण के सन्देश दिये गये हैं। अशोक के दूसरे, पाँचवें एवं तेरहवें शिलालेख में धर्म प्रचारक भेजने तथा विदेशी राजाओं राज्य का उल्लेख मिलता है। अशोक की चौदह विभिन्न राजाज्ञायें (चतुर्दश बृहद शिलालेख) हैं जो आठ भिन्न भिन्न स्थानों से प्राप्त किये गये हैं।

इनका विवरण इस प्रकार है- शाहबाजगढ़ी (आधुनिक पाकिस्तान के पेशावर जिला), मानसेहरा (पाकिस्तान का हजारा जिला), कालसी (उत्तराखंड के देहरादून जिला), गिरनार (गुजरात प्रान्त के काठियावाड़), धौली तथा जौगढ़ (उड़ीसा प्रांत के पुरी तथा गंजाम जिला में), एरंगुडि (आन्ध्र प्रदेश के कर्नूल जिला), सोपारा (महाराष्ट्र के थाना जिला)।

10. उस बौद्ध ग्रंथ का नाम बताइए जो यह दर्शाता है कि जाति, शिल्प से अनम्यतरीके (कठोरता) से सहबद्ध नहीं थी:-

Correct Answer: (d) दस-ब्राह्मण जातक
Solution:

बौद्धग्रंथ दस ब्राह्मण जातक जो यह दर्शाता है कि जाति, शिल्प से अनम्यतरीके (कठोरता) से सहबद्ध नहीं थी। इस ग्रंथ में कुरू के युधिथिला वंश के एक राजा कोरव्य तथा उसके सलाहकार विदुर के बीच वार्तालाप दिखाया गया है।

इसमें राजा के द्वारा दिये गये अतुलनीय उपहारों के बारे में तथा योग्यता के मामले को देखा गया है। बौद्धग्रंथ यह भी बतातें हैं कि जाति सख्ती से शिल्प से बंधी नहीं थी। क्षत्रियों को कुम्हार, टोकरी बनाने वाले, रसोइए और माला बनाने वाले के रूप में काम करते देखा गया, जबकि वैश्यों ने दर्जी, कुम्हार आदि के रूप में काम किया।

ब्राह्मणों ने चिकित्सकों, व्यापारियों, पुलिसकर्मियों, शिकारियों, राजाओं के सेवकों आदि के रूप में काम किया।