NTA यूजीसी नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2022 (इतिहास) Shift- II

Total Questions: 100

91. नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़िए एवं उन पर आधारित प्रश्नों का उत्तर दीजिए

रामानुज जो कि जाति से ब्राह्मण थे, वे श्रीरंगम स्थित भव्यमंदिर में प्रवचन (शिक्षा) देते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे 1017 से 1137 तक जीवित रहें किंतु इसकी पहली तारीख अतिसंभवतः कई दशक पूर्व की है।

शंकर की तरह उन्होंने भारत के कई भागों में प्रवचन (शिक्षा) दिया और उन्होंने ब्रह्मसूत्र, भगवद् गीता और उपनिषदों पर लंबी टीका लिखने के क्रम में अपने सिद्धांतों को आदिकालीन स्रोतों पर आधारित होने का दावा किया। रामानुज का वाद (पद्धति) पांचरात्र पर आधारित था किंतु उन्होंने इससे भिन्न तत्व पर बल दिया।

उन्होंने कर्मकाण्ड के पालन की उपयोगिता को स्वीकृति तो दी किन्तु पूर्णतः नहीं, और उन्होंने ज्ञान के माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने सम्बन्धी शंकर के सिद्धान्त को भी स्वीकार किया किन्तु उन्होंने घोषणा की, कि इस युक्ति के स्नेही (अनुरागी) व्यक्तियों को परम आनन्द (सुख) से निम्नस्तर का ही आनन्द प्राप्त हो सकेगा।
रामानुज ने दर्शन (सिद्धांत) के कौन-से वाद (वेदांत) का प्रतिपादन किया?

Correct Answer: (b) विशिष्टाद्वैत वेदान्त
Solution:भारतीय दार्शनिकों में शंकराचार्य के पश्चात् रामानुज का नाम अत्यन्त महत्वपूर्ण है जिन्होंने अपने विचारों के माध्यम से अद्वैतवाद का वैयक्तिक भक्तिवाद के साथ सुन्दर समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया है। रामानुज वैष्णव धर्म के अनुयायी थे।

उन्होंने वेदान्त के विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। रामानुज का जन्म 1017 ई. में तमिलनाडु के पेराम्बटूर (परम्बुदूर) में हुआ तथा वे 120 वर्ष तक (1137 ई.) जीवित रहे। वे यमुनाचार्य के शिष्य थे। रामानुज उपनिषदों में अन्तर्निहित दार्शनिक विचारों की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं तथा बताते हैं कि यद्यपि ईश्वर ही एक मात्र पारमार्थिक सत्ता है तथापि वह अचेतन, प्राकृति तथा चेतन आत्मा से विशिष्ट अथवा समन्वित है। इस कारण उनका मत विशिष्टाद्वैत कहा जाता है।

92. रामानुज द्वारा ब्रह्मसूत्र पर लिखी गयी टीका का नाम क्या है?

Correct Answer: (b) श्रीभाष्य
Solution:

रामानुज सगुण ईश्वर के उपासक तथा प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य थे। उन्होंने अपने विचारों के माध्यम से प्राचीन भागवत (वैष्णव) धर्म की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उसे दार्शनिक आधार प्रदान किया।

रामानुज ने श्रीभाष्य नाम से ब्रह्मसूत्र पर टीका लिखी है तथा उन्होंने वेदान्तसार, वेदान्तसंगृह, वेदान्तद्वीप की रचना की है। रामानुज ज्ञान को द्रव्य मानते हैं। उनके अनुसार इनकी प्राप्ति के तीन साधन हैं प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द । अन्य कारणों को उन्होंने इन्हीं तीनों के अन्तर्गत समाविष्ट कर लिया है।

93. रामानुज ने किस नगर में अपने दर्शन की शिक्षा (प्रवचन) दिया?

Correct Answer: (c) श्रीरंगम
Solution:रामानुज सगुण ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते हैं। वे ब्रह्म को ईश्वर कहते हैं। जो एकमात्र पारमार्थिक सत्ता हैं। वे अपना प्रवचन (शिक्षा) श्रीरंगम में स्थित एक भव्यमंदिर में देते थे। रामानुज ने अपने विचारों के माध्यम से प्राचीन भागवत (वैष्णव) धर्म की परम्परा को आगे बढ़ाया और उसे दार्शनिक आधार प्रदान किया। उनके पूर्व अनेक ग्रन्थों जैसे श्वेताश्वर उपनिषद, गीता, महाभारत, विष्णुपुराण आदि में हमें सगुण ब्रह्म की उपासना से सम्बन्धित उल्लेख मिलते हैं। इन्होंने गीता पर भाष्य लिखा है।

94. रामानुज ने मोक्ष प्राप्ति के सर्वाधिक कुशल मार्ग के रूप में किस एक का प्रतिपादन किया?

Correct Answer: (b) प्रपत्ति
Solution:

रामानुज का मत है कि ईश्वर की कृपा प्राप्त करना ही मोक्ष का सर्वोत्तम साधन है और यही सभी लोगों के लिए सदा सुलभ है। इसके लिए साधन को ईश्वर में अपने को पूर्ण समर्पित करना होता है।

इस पूर्ण समर्पण को 'प्रपत्ति' अथवा शरणागति कहा गया। ईश्वर की कृपा प्राप्त करने की यह आवश्यक शर्त है। शरणागत जीव को ईश्वर सहज ही अपनी कृपा दृष्टि प्रदान करता है और ऐसे भक्त उसका परमप्रिय पात्र बन जाता है। ईश्वर साधक की भक्ति तथा प्रपत्ति से प्रसन्न होकर उसकी सभी भव-बाधाओं को दूर कर देता है तथा उसे अपनी शरण में ले लेता है और यही मोक्ष की अवस्था है।

95. रामानुजाचार्य के निम्नलिखित में से कौन-एक गुरु थे?

Correct Answer: (b) नाथमुनि
Solution:

आलवार वैष्णव भक्तों के दार्शनिक पक्ष का प्रतिपादन वैष्णव आचार्यों के द्वारा किया गया। इनमें से एक वैष्णव धर्मशास्त्री नाथमुनि हुए, जो श्री वैष्णव सम्प्रदाय के संस्थापक थे। इनका काल 10वीं सदी के अंत और 11वीं सदी की शुरुआत में था।

इनका जन्म वीरनारायणपुर में हुआ था और इनका जीवन श्रीरंगम में बीता। नाथमुनि रामानुजाचार्य के गुरू थे। रामानुजाचार्य ने अपने एक श्लोक में कहा है कि “मैं अपने उन प्रभु नाथमुनि को नमन करता हूँ जो भगवान विष्णु के पादपाद्यों की ज्ञान भक्ति से जनित परम महिमा की चरम सीमा स्वरूप हैं और जिनके चरण इहलोक तथा परलोक में मेरे नित्य आश्रय है" तत्पश्चात रामानुजाचार्य यमुनाचार्य के शिष्य बन गये।

96. नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़िए एवं उन पर आधारित प्रश्नों का उत्तर दीजिए

जब नेताजी ने इम्फाल (भारत के मणिपुर में) के विरुद्ध प्रस्तावित जापानी अभियान में आई.एन.ए. के भाग लेने संबंधी पहली बार प्रश्न उठाया तो दक्षिणपूर्व एशिया में सभी जापानी सेनाओं के कमांडर फील्ड मार्शल काउंट तेरौची ने इस प्रस्ताव का स्वीकार करने के प्रति अनिच्छा प्रकट की।

उन्होंने कहा उनके सैनिकों का मलय में पराजय से मनोबल गिर गया है, वे कड़े जापानी अभियान की कसौटी पर खरे नहीं उतर सकते और अपने पुराने मित्रों को तथा अधिक आसान स्थितियों को पार करना एक अप्रतिरोध्य विवशता होगी।

उन्होंने प्रस्ताव किया कि जापानी सेना को वह सब करना चाहिए, जो भारत की मुक्ति के लिए आवश्यक है और स्वयं बोस को भारतीय जनसंख्या का सद्भाव तथा सहयोग जुटाना चाहिए एवं आई.एन.ए. के मुख्य भाग को सिंगापुर में छोड़ देना चाहिएं
नेताजी सुभाष चंद्र बोस किस जापानी फील्ड-मार्शल के समक्ष इम्फाल के विरुद्ध जापानी अभियान में आई.एन.ए. के भाग लेने का प्रस्ताव रखा था?

Correct Answer: (c) काउंट तेरौची
Solution:

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने जापानी कमांडर फील्डमार्शल काउंट तेरौची के समक्ष इम्फाल (भारत के मणिपुर में) के विरुद्ध जापानी अभियान में आई.एन.ए. के भाग लेने का प्रस्ताव रखा था लेकिन काउंट तेरौची ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के प्रति अनिच्छा प्रकट की। मार्च और जून 1944 के बीच आजाद हिन्द फौज भारतीय भूमि पर सक्रिय रही। एक अभियान में वह जापानी टुकड़ियों के साथ इम्फाल को घेरे रही, किन्तु वह नितांत असफल रहा।

97. जापान के फील्ड मार्शल ने इम्फाल के विरुद्ध प्रस्तावित जापानी अभियान में आई.एन.ए. के भाग लेने के प्रति अनिच्छा दर्शाई थी। निम्नलिखित में से कौन सा कथन गलत है?

Correct Answer: (d) उनकी ब्रिटिश सैनिकों के अंग के रूप में आसानी से पहचान की जाएगी।
Solution:

जब नेताजी ने इम्फाल (भारत के मणिपुर में) के विरुद्ध प्रस्ताविक जापानी अभियान में आई.एन.ए. के भाग लेने संबंधी पहली बार प्रश्न उठाया तो दक्षिण पूर्व एशिया में सभी जापानी सेनाओं के कमांडर फील्ड मार्शल काउंट तेरौची ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के प्रति अनिच्छा प्रकट की।

उन्होंने कहा उनके सैनिकों का मलय में पराजय से मनोबल गिर गया है, वे कड़े जापानी अभियान की कसौटी पर खरे नहीं उतर सकते और अपने पुराने मित्रों को तथा अधिक आसान स्थितियों को पार करना एक अप्रतिरोध्य विवशता होगी। नोट - फील्ड मार्शल काउंट तेरौची ने जो अनिच्छा प्रकट की उस कथन में उनकी ब्रिटिश सैनिकों के अंग के रूप में आसानी से पहचान की जायेगी। यह शामिल नहीं है। अर्थात यह कथन असत्य है।

98. यह कथन किसका है कि “जापानी बलिदान के माध्यम से भारत की कोई मुक्ति दासता से भी बदतर है।"

Correct Answer: (c) सुभाष चंद्र बोस
Solution:

सुभाष चन्द्र बोस ने कहा कि “जापानी बलिदान के माध्यम से भारत की कोई मुक्ति दासता से भी बदतर है।" 24 अगस्त 1943 को नेताजी ने नियमित रूप से आजाद हिन्द फौज की सीधी कमान संभाली।

अपना उत्तरदायित्व संभालने के बाद उन्होंने एक महत्वपूर्ण आदेश पत्र प्रसारित करते हुए कहा मैं विश्वास दिलाता हूँ कि अंततः जीत हमारी होगी। दिल्ली चलो का नारा लगाते हुए, हमको तब तक लड़ते जाना है जब तक कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज नई दिल्ली में वायसराय भवन पर फहराने न लगे, और जब तक आजाद हिंद फौज लाल किले के भीतर विजय परेड नहीं कर लें।

99. युद्ध में भारतीयों के भाग लेने के बारे में नेताजी का क्या विचार था?

Correct Answer: (a) नेताजी ने इस पर बल दिया कि भारतीयों को रक्त और बलिदान में अधिकतम योगदान देना चाहिए।
Solution:

ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ युद्ध में भारतीयों को भाग लेने के बारे में नेताजी ने इस पर बल दिया कि भारतीयों को रक्त और बलिदान में अधिकतम योगदान देना चाहिए। 6 जुलाई 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द रेडियो पर बोलते हुए गाँधी जी को संबोधित किया, “भारत की स्वाधीनता का आखिरी युद्ध शुरू हो चुका है।

राष्ट्रपिता भारत की मुक्ति के इस पवित्र युद्ध में हमें आपका आर्शीवाद और शुभकामनाएँ चाहते हैं। आजाद हिन्द फौज की एक बटालियन शाह नवाज के नेतृत्व में जापानी फौज के साथ भारत-बर्मा सीमा पर इम्फाल के हमले में भाग लेने के लिए भेजी गई।

100. बर्मा में जापानी जनरलस्टाफ का सेनापति (मुखिया) कौन था, जिसने जनवरी 1944 में सुभाष चंद्र बोस से भेंट की थी?

Correct Answer: (b) जनरल कटकुरा
Solution:24 जनवरी 1944 में बर्मा में जापानी कमांडर इन - चीफ जनरल स्टाफ के प्रधान जनरल काताकुरा (कटकुरा) नेताजी के पास आये और उन्होंने अब तक की गतिविधियों की पूरी रिपोर्ट नेताजी को दी। जनरल ने भारत बर्मा सीमा पर अंग्रेजी सेना से होने वाली लड़ाई की सारी चालें समझाई। इस भेंट को बिल्कुल गुप्त रखा गया।

इस दौरान केवल तीन व्यक्ति ही उपस्थित थे नेताजी, जनरल शाहनवाज जनरल कटकुरा। जनरल काताकुरा ने कहा, अंग्रेजों को भयभीत करने के लिए यह आवश्यक है कि उन पर तेजी से हमला बोला जायें। इसके लिए जापानी अधिकारियों का विचार है कि कलकत्ता पर भयानक बमबारी की जाए।