Solution:मंदिर स्थापत्य की द्रविड शैली का प्रारम्भ पल्लव शासक महेन्द्रवर्मन प्रथम के समय हुआ था। चट्टानों को काटकर मंदिर बनवाने का श्रेय इसे ही प्राप्त होता है। प्रारम्भ में यह जैन मतानुयायी था, बाद में अप्पर (नयनार संत) के प्रभाव से शैव हो गया।
पुदुकोट्टई स्थित सित्तनवासल गुहा मंदिर से इसके समय की कुछ चित्रकारी (पेंटिंग) प्राप्त होती हैं। बुद्ध की प्रतिमाओं को सामान्य रूप से तीन मुख्य रूपों स्थानक, आसन और शयन में वर्गीकृत किया जाता है। गांधार शैली की प्रतिमाओं में उन्हें घुँघराले बाल, जूते, मूंछे आदि रूपों में दर्शाया गया है। बुद्ध की कांस्य प्रतिमा बिहार, भागलपुर के सुल्तानगंज से प्राप्त हुई है। अभय मुद्रा में दाहिनें हाथ को ऊपर उठाकर दिखाया जाता है, वरद मुद्रा में दाहिना हाथ दर्शकों की ओर बायां हाथ गोद में दिखाया जाता है।