NTA यूजीसी नेट जेआरएफ परीक्षा, जून-2023 (इतिहास) (Shift-I)

Total Questions: 100

91. नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़िए एवं प्रश्न संख्या के उत्तर दीजिए :

दशकों तक पल्लव चालुक्य संघर्ष चलता रहा, केवल बीच-बीच में युद्ध विराम का काल आया। पल्लवों का संघर्ष दक्षिण में पाण्ड्योंसे और उत्तर में राष्ट्रकूटों से भी हुआ। 9वीं शताब्दी की शुरुआत मेंही, पल्लवशासक दंतीवर्मन के काल में राष्ट्रकूट शासक गोविंद -III ने कांची पर आक्रमण कर दिया।

पश्चिमी गंग और चोलों की सहायता से उसने श्रीपुरमबियम के युद्ध में पाण्ड्यों को पराजित किया। 893 सं. में चोल शासक आदित्य -1 के द्वारा पल्लवों का अंत हो गया, जिसके पश्चात तोण्डईमंडलम् का नियंत्रण चोलों के हाथों मेंहस्तारित हो गया।
पल्लव एवं पश्चिमी चालुक्यों के मध्य संघर्ष का प्रारंभ निम्नलिखित में से किस पल्लव शासक के शासनकाल में हुआ?

Correct Answer: (a) महेन्द्रवर्मन प्रथम
Solution:

630 ई. में पल्लव चालुक्य संघर्ष का प्रारम्भ पल्लव शासक महेन्द्र वर्मन प्रथम तथा पश्चिमी चायुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय के मध्य हुआ था। पल्लवों एवं चालुक्यों के मध्य यह प्रथम संघर्ष था। पुलकेशिन अपनी सेना को लेकर पुल्ललुर तक घुस गया था।

यद्यपि पल्लव शासक अपनी राजधानी काँची को बचाने में सफल हुआ। पुलकेशिन ने पल्लवों से विजित उत्तरी क्षेत्र पर अपने भाई विष्णुवर्द्धन को राज्यपाल नियुक्त किया, जिसने बाद में पूर्वी चालुक्य वंश या वेंगी के चालुक्य वंश की स्थापना की।

92. निम्नलिखित में से कौन राष्ट्रकूट शासक नहीं था?

Correct Answer: (c) शक्तिवर्मन
Solution:

राष्ट्रकूट वंश की स्थापना दंतिदुर्ग ने 753 ई.में किया था। इस वंश के महत्वपूर्ण शासकों का क्रमः दंतिदुर्ग (753-758 ई.), कृष्ण प्रथम (758-772 ई.) = उपनाम शुभतुंग, गोविन्द द्वितीय (773-780 ई.), ध्रुव 'धारावर्ष' (780-794 ई.), गोविन्द तृतीय (794-814 ई.), अमोघवर्ष (814-880 ई.) = उपनामनृपतुंग, कृष्ण द्वितीय (880-915 ई.), इन्द्र तृतीय (915-927 ई.), कृष्ण तृतीय (940-968 ई.) = उपनाम अकालवर्ष, कर्क द्वितीय (972-74 ई.) अंतिम शासक ।

नोट: शक्तिवर्मन वेंगी के पूर्वी चालुक्य वंश के शासक थे। उन्होंने 1003 ई. से 1011 ई. तक शासन किया था।

93. परिच्छेद में तोण्डईमण्डलम किसे सन्दर्भित करता है?

Correct Answer: (b) उत्तरी पेन्नार एवं उत्तरी वेल्लार नदियों के मध्य अवस्थित क्षेत्र ।
Solution:'तोण्डईमण्डलम' पल्लवों का मूल स्थान था। यह क्षेत्र उत्तरी पेन्नार तथा उत्तरी वेलार नदियों के मध्य स्थित था। चोल शासक आदित्य प्रथम (871-907 ई.) ने अंतिम पल्लव शासक अपराजित (881-903 ई.) को पराजित करके तोण्डईमण्डलम पर अधिकार कर लिया और 'तौण्डैनाडु' उपाधि को धारण किया। इसका उल्लेख तिरूवालगांडु लेख में मिलता है।

94. निम्नलिखित में से कौनसा क्षेत्र पश्चिमी गंग राजवंश द्वारा शासित किया गया?

Correct Answer: (c) मैसूर
Solution:

मैसूर क्षेत्र पश्चिमी गंग वंश द्वारा शासित था। चौथी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इसका उदय मैसूर में हुआ था। इस क्षेत्र को 'गंगवाडी' कहा जाता था।

माधव प्रथम तथा कोंगनिवर्मन तिडिग इस वंश के संस्थापक थे। चोल शासक राजराज प्रथम (985-1014 ई.) ने पश्चिमी गंग शासक को पराजित कर गंगवाड़ी, नोलम्बवाड़ी व तादि वाड़ी के क्षेत्रों पर आधिकार करके 'चोलनारायण' की उपाधि धारण की।

95. निम्नलिखित में कौन-सा पल्लव शासक, चोल शासक आदित्य-प्रथम द्वारा पराजित हुआ था?

Correct Answer: (b) अपराजित
Solution:

अंतिम पल्लव शासक अपराजित (881-903 ई.) को चोल शासक आदित्य प्रथम (871-907 ई.) ने पराजित किया था। आदित्य प्रथम पहले पल्लव शासक का सामंत था। अपराजित ने आदित्य प्रथम तथा गंग नरेश पृथ्वीपति की सहायता से पाण्ड्य शासक वरगुण द्वितीय को श्रीपुरम्बियम के युद्ध (885 ई.) में पराजित कर पाण्ड्यों की शक्ति को समाप्त कर दिया।

दीर्घकालीन पल्लव-चालुक्य संघर्ष के कारण पल्लवों की शक्ति कमजोर हो गई थी जिसके कारण उसकी सेना चोलों की सेना का मुकाबला नहीं कर सकी और अंततः चोल नरेश आदित्य प्रथम ने अपराजित की हत्या कर तोण्डईमण्डलम पर अधिकार कर लिया।

96. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़िये और उससे संबंधित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

उन्नीसवीं शताब्दी में चालीस के दशक में, पंजाब पर अंग्रेजों की विजय के कुछ समय पहले संभवतः पश्चिमी पंजाब में सिआन साहिब नाम से विख्यात भगत जवाहर मल द्वारा कूका आन्दोलन की आधार शिला रखी गई थी।
सिख धर्म में पहले से विद्यमान जाति भेद, हिन्दुओं में विधवाओं पर आरोपित सख्त नियम, और मूर्तियों, मकबरों और योगियों की पूजा जैसी बुराइयों एवं अंधविश्वासों को मिटाकर सिख धर्म का शुद्धिकरण करना इस आन्दोलन का उद्देश्य था।
कूका समर्थक अपनी पगड़ी को विशिष्ट रीति से बाँधते थे, जिसे कहा जाता था :

Correct Answer: (b) सिद्धपाग
Solution:

कूका आंदोलन गुरू गोविन्द सिंह के सिद्धान्तों (राजनीतिक धर्म) को उसकी शुद्धता में पुनः लाने का एक प्रयास था। कूका नेता बालक सिंह रावलपिंडी के हजारोन में रहते थे। उनके अनुयायियों को 'सागियासिस (हबियासिस)' कहा जाता था।

उनके उत्तराधिकारी रामसिंह ने सिख धर्म में सुधार लाने के लिए अनेक प्रयास किये थे। वे स्वयं को गुरू गोविंद सिंह का अवतार बताते थे। उनके अनुयायी अपने हाथों में लाठियाँ लेकर घूमते थे तथा अपनी पगड़ी को विशिष्ट रीति से बाँधते थे जिसे 'सिद्धपाग' कहा जाता था। इसके अतिरिक्त वे गाँठों से बंधी हुई ऊनी रस्सी का हार पहनते थे तथा एक ज्ञात सूत्र रखते थे।

97. कूका आन्दोलन के प्रमुख नेता राम सिंह ने स्वयं को किस सिख गुरु के अवतार के रूप में घोषित किया?

Correct Answer: (a) गुरु गोविन्द सिंह
Solution:

कूका आन्दोलन के प्रमुख नेता रामसिंह ने स्वयं को 'गुरू गोविंद सिंह' का अवतार घोषित किया था। बालक सिंह की मृत्यु (1863 ई.) के पश्चात रामसिंह कूका आंदोलन के प्रमुख नेता बने। उन्होंने सम्प्रदाय के सिद्धान्तों के अनुसार गुरू गोविन्द सिंह को एकमात्र सच्चा गुरु घोषित किया और स्वयं को उनका अवतार बताने लगे।

उन्होंने खालसा के पुनरूद्धार और अंग्रेजी सरकार को उखाड़ फेंकने का प्रचार किया। 1869 में फिरोजपुर और 1872 में मालेर कोटला में हुए विद्रोह के पश्चात अंग्रेजी सरकार ने रामसिंह को रंगून निर्वासित कर दिया था और खालसा के 50 सदस्यों को बंदूक से उड़ा दिया गया।

98. कूका आंदोलन के संस्थापक भगत जवाहर मल के प्रमुख अनुयायी (शिष्य) निम्नलिखित में से कौन थे?

Correct Answer: (a) बालक सिंह
Solution:

कूका आन्दोलन (पंजाब, 1860-70 ई.) के संस्थापक भगत जवाहरमल थे। जिन्हें लोग 'सियान साहब' कहते थे। कुका आंदोलन वहावी आंदोलन से मिलता जुलता था। यह आंदोलन धार्मिक सुधार के लिए प्रारम्भ हुआ किन्तु बाद में यह राजनीतिक आंदोलन में बदल गया।

भगत जवाहर मल तथा उनके शिष्य बालक सिंह ने अपने अनुयायियों का एक दल गठित किया और उत्तरपश्चिम सीमा प्रांत के हजारोन में अपना मुख्यालय बनाया। कूका आंदोलन को नामधारी आंदोलन भी कहा जाता है।

99. कूका नेता रामसिंह ने किस सिख शासक की सेना में अपनी सेवाएँ दी?

Correct Answer: (c) नौनिहाल सिंह
Solution:

कुका नेता रामसिंह का जन्म 1824 में लुधियाना जिले के भैणी गाँव में हुआ था। उनके सैनिक जीवन का आरम्भ महाराजा रणजीत सिंह के समय से प्रारम्भ होता है।

रणजीत सिंह के पुत्र नौनिहाल सिंह के समय वे बाघेल रेजिमेंट में सैनिक थे। जब उनका रेजिमेंट शाही खजाना लाने के लिए पेशावर जा रहा था तब वे हजारोन में रूके थे और यहीं पर उनकी भेट कूका आंदोलन के नेता बालक सिंह से हुई थी।

100. निम्नलिखित में से कौन सा कूका आंदोलन के सिद्धांत का भाग नहीं है?

Correct Answer: (d) अन्तरजातीय विवाह पर प्रतिबंध लगाना
Solution:

कूका आंदोलन ने सिख धर्म में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने के साथ-साथ सामाजिक कुप्रथाओं को भी दूर करने का प्रयास किया। उसके सिद्धान्तों के अन्तर्गत जाति और अंन्तरजातीय विवाह पर लगे प्रतिबन्ध को समाप्त करना, माँसाहार, मदिरा और नशीली वस्तुओं का सेवन न करना, महिलाओं द्वारा पर्दा-प्रथा का त्याग करना, गो-हत्या का विरोध करना, विधवाओं पर आरोपित कठोर नियमों को समाप्त करना आदि शामिल थे। इस आंदोलन का उद्देश्य सामाजिक एवं धार्मिक बुराइयों एवं अंधविश्वासों को दूर कर सिख धर्म को शुद्ध करना था।