भारत में 1857 में घटित क्रान्ति का दावा करने वाले लेखकों ने उसके होने के वास्तविक कारण पर चर्चा करने का प्रयास नहीं किया। सभी बड़ी धार्मिक और राजनीतिक क्रांतियों में उन सभी अंगों को एक साथ सशक्त करना असंभव है जिनकी पूरी समझ के बिना वे पूर्णतः असंगत हैं।
मैजिनी ने कार्ले द्वारा फ्रांस की क्रांति के बारे में अपने एक आलोचनात्मक लेख में कहा है कि प्रत्येक क्रांति का एक मूलभूत सिद्धांत होना चाहिए। क्रांतिकारी आंदोलन का आधार तुच्छ महत्त्वहीन और क्षणिक शिकायत नहीं हो सकता है। क्रांतिकारी युद्ध का इतिहास लिखने के क्रम में अंग्रेजी लेखकों ने किस प्रकार की गलतियाँ की है।
उनके विवरण और कथानक भ्रामक और अनुचित विचारों पर आधारित है। जिससे क्रांति की पूरी आत्मा या उसकी भावना पूर्णतः परिवर्तित हो जाती है या विरूपित हो जाती है इसकी युक्ति प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी इतिहासकार उत्तरदायी है जिन्होंने चर्बीदार कारतूस के अफवाह को विद्रोह का तात्कालिक कारण बताया। इतना ही भ्रामक यह सिद्धांत है कि अवध को अपने राज्य में मिलाए जाने के कारण विद्रोह हुआ था।
महान सिद्धांत थे स्वधर्म और स्वराज । दीन-दीन की गर्जना जो धर्म की रक्षा के लिए उत्पन्न हुई जब धर्म के विरुद्ध चालाकी, खतरनाक और विध्नकारी आक्रमण जीवन से अधिक महंगा हो गया और भयावह रूप में इसमें स्वराज प्राप्ति की पावन कामना में गुलामी की जंजीर से बंधना पड़ा। स्वराज स्थापना की घोषणा में दिल्ली के शासक का कथन है भारत के हिन्दू और मुसलमान जागो जागो भाईयों। ईश्वर के सभी उपहारों में सर्वाधिक कृपापूर्ण ईश्वर का उपहार है।
कार्ले द्वारा फ्रांस की क्रांति का आलोचनात्मक लेख कौन सा है -