NTA यूजीसी नेट जेआरएफ परीक्षा (निरस्त), जून-2024 (इतिहास)

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित पैराग्राफ को पढ़े और प्रश्न 91 से 95 का उत्तर दीजिए :

रामानुज के भगवान व्यक्तिगत थे, जो अपनी सर्जना के प्रेम से परिपूर्ण थे। वह कर्म की शक्ति से भी पार पाकर प्रायश्चित कर रहे पापियों को स्वयं की ओर आकृष्ट कर सकते थे। शंकर की अवैयक्तिक आत्मा, जिसने एक घड़ी में मायावी संसार बनाया, के विपरीत रामानुज के भगवान को आदमी की जरूरत थी जैसे कि आदमी को भगवान की जरूरत थी। कृष्ण के शब्दों को व्याख्यायित करते हुए रामानुज ने भावपूर्वक बताया...कि जिस प्रकार व्यक्ति, भगवान के बिना नहीं रह सकता, उसी प्रकार भगवान भी व्यक्ति के बिना नहीं रह सकते।रामानुज के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा सही नहीं है?

Correct Answer: (c) उन्होंने अपनी आत्मा पूर्णतया भगवान के हाथों में रखने, भगवान की इच्छा में विश्वास करने और भगवान की दया का विश्वासपूर्वक इंतजार करने पर बल नहीं दिया।
Solution:

रामानुज का जन्म 1017 ई.के लगभग तिरुपति (आन्ध्र प्रदेश) नामक स्थान पर हुआ था। इनका बचपन का नाम लक्ष्मण था इन्होंने अपनी आरम्भिक शिक्षा कांची से प्राप्त की थी। रामानुज एक ब्राह्मण थे जो श्रीरंगम के महान मंदिर में पढ़ाते थे। उन्होंने बहसूत्र पर लंबी टीकाएँ लिखी थी।

रामानुज सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे तथा भक्ति मार्गों को मोक्ष का साधन मानते थे। उन्होंने कर्मकांडीय अनुपालना की उपयोगिता को स्वीकार किया था। तथा शंकर के माया के सिद्धान्त का खण्डन करते हुए कहा कि एकगागृचित्त विश्वासपूर्वक इंतजार से ईश्वर की भक्ति करने से मोक्ष प्राप्त होता है।

92. निम्नलिखित में से किसका लेखन रामानुज द्वारा नहीं किया गया है?

Correct Answer: (b) वेदांत दर्शन
Solution:

रामानुज की अनेक कृतियों में वेदांतसार, वेदांतसंग्रह और वेंदातदीप शामिल है। उन्होंने भगवत्गीत और ब्रह्मसूत्र (श्री भाष्य) पर टीकाएँ लिखी। उनका दर्शन विशिष्टाद्वैत कहलाता है। जो वैष्णव भक्ति और उपनिषदीय एकेश्वरवाद का संगम है।

नोट - वेदांत दर्शन के रचयिता महर्षि वेदव्यास ऋषि है। वेदांत दर्शन का मुख्य स्त्रोत उपनिषद को माना जाता है, जो वेदों के चरम सिद्धान्तों का निदर्शन करता है।

93. रामानुज के अनुसार, मोक्ष का श्रेष्ठ उपाय है :

Correct Answer: (c) सघन/ तीव्र भक्ति
Solution:

रामानुज के अनुसार मोक्ष का श्रेष्ठ उपाय सघन एवं तीव्र भक्ति है। रामानुज ने 'विशिष्टाद्वैत दर्शन' का प्रतिपादन किया तथा वैष्णव धर्म को एक दार्शनिक आधार प्रदान किया। रामानुज सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे तथा भक्ति मार्ग को मोक्ष का साधन मानते थे। रामानुज के अनुसार जीव आनन्दमय, चैतन्यमय, स्वयं प्रकाशित तथा वैशिष्टपूर्ण है तथा जगत मिथ्या न होकर सत्य है, तथा ब्रम्ह, जीव तथा जगत तीनों में एक विशिष्ट संबंध है एवं तीनों सत्य है।

94. रामानुज ने निम्नलिखित में से किस भगवान की चर्चा की थी?

Correct Answer: (a) विष्णु
Solution:

रामानुज सगुण ईश्वर में विश्वास करते थे। श्रीरंगम (त्रिचलापल्ली) के मठ में रहते हुए उन्होंने वैष्णव धर्म (विष्णु भगवान) के प्रचार-प्रसार के लिए महान कार्य किये। उनके प्रयासों के फलस्वरूप यह धर्म समाप्त के व्यापक रूप से प्रचलित हो गया। उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा जिसे श्रीनाथ कहा जाता है। उनका मत विशिष्टा त के नाम से प्रसिद्ध है। आचार्य परंपरा में रामानुज का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है।

95. 13वीं सदी में रामानुज के सिद्धांत को विकसित करने वाले और उसे पढ़ाने वाले आचार्य कौन थे?

Correct Answer: (b) माधव
Solution:

13वीं सदी में रामानुज के सिद्धांत को विकसित करने वाले और उसे पढ़ाने वाले आचार्य माधव थे। माधवाचार्य ने द्वैतवाद मत का प्रचार किया। वे भक्ति पूर्वक विष्णु की उपासना पर बल देते थे तथा भक्ति मार्ग को मोक्ष व ईश्वर प्राप्ति का सहज मार्ग बतलाया।

माधवाचार्य ने चरित्र की शुद्धता, अंहिसा, सत्य, संतोष, सादगी, ज्ञान, अपरिग्रह, और ईश्वर की भक्ति पर विशेष जोर दिया। माधवाचार्य के उपदेशों को उनके शिष्य जयतीर्थ ने सूत्रभाष्य में संकलित किया है। इन्होंने अपने उपदेश कन्नड़ भाषा में दिये।

96. पैराग्राफ को पढ़े और प्रश्न 96 से 100 का उत्तर दीजिए।

आर्य समाज की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है शुद्धि के कार्य पर इसके द्वारा दिया गया बल।...यह तथ्य है कि आर्य समाज के इस पहलू ने आर्य समाज के बाहर के लोगों में आर्य समाज के प्रति महानतम रुचि जागृत की थी।
1875 में, दयानंद सरस्वती ने औपचारिक रूप से कहाँ पहली आर्य समाज इकाई को संगठित किया था?

Correct Answer: (c) बॉम्बे
Solution:

उत्तरी भारत में हिन्दू धर्म और समाज में सुधार का काम आर्य समाज ने किया। आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 में बंबई (बॉम्बे) में की। कुछ ही समय में उत्तरी भारत के एक बड़े भाग (पंजाब, संयुक्त प्रांत, राजस्थान, बिहार के कुछ भाग) पर इसका प्रभाव कायम हो गया। सबसे ज्यादा यह उत्तरी-पश्चिमी भारत में लोकप्रिय हुआ। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'सत्यार्थ प्रकाश' में अपने विचारों को व्यक्त किया।

97. शुद्धि से क्या अभिप्रेत है?

Correct Answer: (a) शुद्धि से अभिप्रेत है कि उन हिन्दुओं लाखों की संख्या में का पुनः धर्म परिवर्तन करना जो इस्लाम या ईसाईयत जैसे अन्य धर्मों में स्वेच्छा से या जबरन दीक्षित हो गए थे, किन्तु अब स्वेच्छा से पुनः हिन्दु धर्म में लौटना चाहते थे।
Solution:

शुद्धि से अभिप्रेत है कि उन हिन्दुओं लाखों की संख्या में का पुनः धर्म परिवर्तन करना जो इस्लाम या ईसाईयत जैसे अन्य धर्मों से स्वेच्छा से या जबरन दीक्षित हो गए थे, किन्तु अब स्वेच्छा से पुनः हिन्दू धर्म में लौटना चाहते थे। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने धर्म परिवर्तन कर चुके लोगों को पुनः हिन्दू धर्म में प्रवेश करने की प्ररेणा देकर शुद्धि आंदोलन चलाया था।

उस समय ईसाई, मुस्लिम, सिख धर्म प्रचारक हिन्दू धर्म की कुरीतियों तथा झूठे विश्वासों की खिल्ली उड़ाते थे। स्वामी दयानंद ने उनके धर्मों में भी त्रुटियां निकाली और स्थान स्थान पर शास्त्रार्थ कर प्राचीन कट्टरपंथियों तथा अन्य धर्म-प्रचारकों को परास्त किया।

फलस्वरूप हिन्दू धर्म के अनुयायियों में एक नया आत्म-विश्वास, आत्म-परीक्षण तथा आत्मशुद्धि (अर्थात् हिन्दू धर्म से झूठी परम्पराओं को निकालने) की भावना जागी। यद्यपि इसका बाह्य स्वरूप वैदिक परम्पराओं की पुनः स्थापना करता था परन्तु वस्तुतः आर्य समाज ने आधुनिक ज्ञान तथा तर्क को अपनाया।

98. आर्य समाज द्वारा शुद्धि को किस तरह देखा गया था?

Correct Answer: (a) भारत की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक एकता को लाने वाले शक्तिशाली उपकरण के रूप में
Solution:

आर्य समाज द्वारा शुद्धि को भारत की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक एकता को लाने वाले शक्तिशाली उपकरण के रूप में देखा गया था। 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने बंबई में आर्य समाज की स्थापना की जिनका मुख्य उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म की शुद्ध रूप से पुनः स्थापना करना था।

जो झूठे धार्मिक विश्वास तथा सामाजिक कुरीतियां कालान्तर में हिन्दू समाज में आ गई थीं उसको उन्होंने जड़ से उखाड़ फेंकने का प्रण किया। 1877 में आर्य समाज लाहौर की स्थापना हुई जिसके उपरान्त आर्य समाज का अधिक प्रचार हुआ। इनका उद्देश्य था कि भारत को धार्मिक सामाजिक तथा राष्ट्रीय रूप से एक कर दिया जाए।

उनकी इच्छा थी कि आर्य धर्म ही देश का समान धर्म हो। उन्हें समकालीन हिन्दू धर्म तथा समाज में अनेक त्रुटियां देखने को मिलीं। धार्मिक क्षेत्र में वह मूर्ति पूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद, पशुबलि, श्राद्ध-जंत्र,मंत्र तथा तंत्र तथा झूठे कर्मकाण्ड को स्वीकार नहीं करते थे। वह वेद को ईश्वरीय ज्ञान मानते थे और उपनिषद काल तक के साहित्य को स्वीकार करते थे।

99. किसने शुद्धि का कड़ा विरोध किया था?

Correct Answer: (b) मुस्लिम
Solution:

मुस्लिमों ने शुद्धि का कड़ा विरोध किया था। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों को हिन्दू धर्म में परिवर्तित करने के लिए शुद्धि आंदोलन शुरु किया था।

यह आंदोलन बीसवीं सदी के प्रारंभ में दयानंद के अनुयायी स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में और अधिक मजबूत हो गया। कादियान के अहमदिया जैसे मुस्लिम संगठनों ने शुद्धि आंदोलन का विरोध किया। आर.के. घई द्वारा लिखित पुस्तक 'शुद्धि मूवमेंट इन इंडिया' है।

100. दयानंद सरस्वती का राजनीतिक नारा क्या था?

Correct Answer: (a) भारतीयों के लिए भारत
Solution:स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-83) जी का राजनीतिक नारा 'भारतीयों के लिए भारत' था। ये शुद्ध वैदिक परम्परा में विश्वास करते थे और उन्होंने "पुनः वेद की ओर चलो" (Back to the vedas) का नारा लगाया। मूल शंकर जो प्रायः दयानंद के नाम से जाने जाते है तथा इनका जन्म 1824 में गुजरात की भौरवी रियासत के निवासी एक ब्राह्मण कुल में हुआ था। 1875 में इन्होंने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उनके सभी विचार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'सत्यार्थ प्रकाश' में वर्णित है।