Solution:तैत्तिरीय अरण्यक के समापन भाग में तैत्तिरीय उपनिषद और महा नारायण उपनिषद सम्मिलित है। अरण्यक ग्रंथ का संकलन एकान्त वन में रहने वाले ऋषियों तथा उनके शिष्यों द्वारा की गयी है। ये ग्रंथ, ब्राह्मणों के अंतिम अंश या उनकी परिशिष्टियाँ है। इनका सम्बन्ध दार्शनिक सिद्धान्तों, रहस्यवाद तथा यज्ञों की आध्यात्मिक व्याख्या से है।
इनका मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्राण विद्या तथा प्रतीकोपासना है। सामान्यतः ये यज्ञों तथा प्रारम्भिक काल की अनेक धार्मिक रीतियों का विरोध करते है। वर्तमान में उपलब्ध आरण्यक ग्रंथों की संख्या 7 है।
(1) ऐतरेय (2) तैत्तिरीय (3) शांखायन (4) मैत्रायणी (5) माध्यन्दिन (6) बृहदारण्यक (7) तलवकार। वाजसनेही (वाजसनेह) संहिता 40 अध्यायों में विभक्त है। जिसमें से अन्तिम अध्याय ईशों उपनिषद हैं। जिसका विषय याशिक न होकर दार्शानिक व आध्यात्मिक है। शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेय संहिता भी कहते है।
यजुर्वेद के दो भाग है- कृष्ण यजुर्वेद व शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद (काले यजुर्वेद) में छन्दोंबद्ध मंत्र तथा गद्यात्मक वाक्यों का विनियोग है जबकि शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्र ही हैं। इन दोनों की कई शाखायें हैं। कृष्ण यजुर्वेद की मुख्य शाखायें है- तैत्तिरीय, काठक, मैत्रायणी तथा कपिष्ठल ।
शुक्ल यजुर्वेद की प्रधान शाखायें माध्यन्दिन तथा काण्व हैं। कृष्ण यजुर्वेद को तैत्तिरीय संहिता के नाम से जानते है। श्वेताश्वर उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित है जबकि ईश उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित है।