NTA यूजीसी नेट जेआरएफ परीक्षा, जून-2023 (इतिहास) (Shift-II)

Total Questions: 100

51. भोजप्रबंध नामक पुस्तक किसके द्वारा लिखी गयी थी?

Correct Answer: (a) बल्लाल
Solution:

भोजन प्रबंध नामक पुस्तक बल्लाल द्वारा लिखी गयी थी। इस पुस्तक में राजा भोज और कालिदास के विषय में प्रचलित दन्त कथाओं का गद्य-पद्यात्मक संग्रह है। पद्यमगुप्त ने नवसाहसांक चरित व विल्हण ने व्रिकमांकदेव चरित की रचना की है।

52. रत्नहविन्शी (आभूषण अर्पण का उत्सव) इनमें से प्राचीन भारत के किस वैदिक यज्ञ से संबंधित है?

Correct Answer: (a) राजसूय
Solution:

रत्नहविन्शी (आभूषण अर्पण का उत्सव) संस्कार प्राचीन भारत के राजसूय वैदिक यज्ञ का हिस्सा है। इसके अन्तर्गत राजन को अलग-अलग दिन रत्मिनों में से किसी एक के घर जाना पड़ता था तथा देवताओं के लिए आहूति भी देनी पड़ती था।

राजसूय यज्ञ राजा के राज्यभिषेक से जुड़ा यज्ञ था इसलिए इसे राजकीय संस्कार यज्ञ के नाम से भी जानते है। राजा (राजन) पहले वरुण तथा इन्द्र का अभिषेक करता था। हाल ही में हुए नवीन शोध के अनुसार राजसूय यज्ञ प्रतिवर्ष चलने वाला यज्ञ था|

जिसकी अध्यक्षता इन्द्रशुनासीर अर्थात हल युक्त इन्द्र करता था। जिसका उद्देश्य प्रजनन तथा उर्वरा शक्ति को पुनः जायत करना था। राजसूय यज्ञ से जुड़ी एक मान्यता यह थी कि इस सृष्टि के सृजन व विनाश की चक्रीय प्रक्रिया के केन्द्र में राजन स्थित होता है इस यज्ञ में 4 प्रमुख पुरोहितों द्वारा राजा को परम श्रेष्ठ ब्राह्मण घोषित किया जाता है।

53. सूची- I का सूची- II से मिलान कीजिए

सूची- Iसूची- II
A.हेमचन्द्र राय चौधरीI.इंडिया एन आर्कियोलाजिकल हिस्ट्री
B.दिलीप के चक्रवर्तीII.प्रीहिस्ट्री एंड प्रोटोहिस्ट्री इन इंडिया एंड पाकिस्तान
C.एच.डी. सांकलियाIII.एस्पेक्ट ऑफ अर्लीविष्णुइज्म
D.जे. गोंडाIV.मैटेरियल्स फॉर द स्टडी ऑफ द अर्ली हिस्ट्री ऑफ द वैष्णव सेक्ट

निम्नलिखित विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (b) A-IV, B-I, C-II, D-III
Solution:
क्रम सं.सूची-Iसूची-II
1हेमचन्द्र राय चौधरीमैटेरियल्स फॉर द स्टडी ऑफ द अर्ली हिस्ट्री ऑफ द वैष्णव सेक्ट
2दिलीप के. चक्रवर्तीइंडिया एन आर्कियोलाजिकल हिस्ट्री
3एच.डी.सांकलियाप्रीहिस्ट्री एंड प्रोटोहिस्ट्री इन इंडिया एंड पाकिस्तान
4जे.गोंडाएस्पेक्ट ऑफ अर्ली विष्णुइज्म

54. निम्नलिखित कौन-से कथन सही हैं:

A. तैत्तिरीय अरण्यक के समापन भाग में तैत्तिरीयउपनिषद और महा नारायण उपनिषद सम्मिलित हैं।
B. काठक उपनिषद काले यजुर्वेद से संबंधित है।
C. ईश उपनिषद वाजसनेही संहिता का समापन अध्याय है।
D. श्वेतश्वतार उपनिषद काले- यजुर्वेद से संबंधित है।
E. तैत्तिरीय संहिता को काण्व और मध्यानदिन शाखा के पाठशोधन के रूप में जाना जाता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए

Correct Answer: (b) केवल A, B, C और D
Solution:

तैत्तिरीय अरण्यक के समापन भाग में तैत्तिरीय उपनिषद और महा नारायण उपनिषद सम्मिलित है। अरण्यक ग्रंथ का संकलन एकान्त वन में रहने वाले ऋषियों तथा उनके शिष्यों द्वारा की गयी है। ये ग्रंथ, ब्राह्मणों के अंतिम अंश या उनकी परिशिष्टियाँ है। इनका सम्बन्ध दार्शनिक सिद्धान्तों, रहस्यवाद तथा यज्ञों की आध्यात्मिक व्याख्या से है।

इनका मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्राण विद्या तथा प्रतीकोपासना है। सामान्यतः ये यज्ञों तथा प्रारम्भिक काल की अनेक धार्मिक रीतियों का विरोध करते है। वर्तमान में उपलब्ध आरण्यक ग्रंथों की संख्या 7 है।

(1) ऐतरेय (2) तैत्तिरीय (3) शांखायन (4) मैत्रायणी (5) माध्यन्दिन (6) बृहदारण्यक (7) तलवकार। वाजसनेही (वाजसनेह) संहिता 40 अध्यायों में विभक्त है। जिसमें से अन्तिम अध्याय ईशों उपनिषद हैं। जिसका विषय याशिक न होकर दार्शानिक व आध्यात्मिक है। शुक्ल यजुर्वेद को वाजसनेय संहिता भी कहते है।

यजुर्वेद के दो भाग है- कृष्ण यजुर्वेद व शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद (काले यजुर्वेद) में छन्दोंबद्ध मंत्र तथा गद्यात्मक वाक्यों का विनियोग है जबकि शुक्ल यजुर्वेद में केवल मंत्र ही हैं। इन दोनों की कई शाखायें हैं। कृष्ण यजुर्वेद की मुख्य शाखायें है- तैत्तिरीय, काठक, मैत्रायणी तथा कपिष्ठल ।

शुक्ल यजुर्वेद की प्रधान शाखायें माध्यन्दिन तथा काण्व हैं। कृष्ण यजुर्वेद को तैत्तिरीय संहिता के नाम से जानते है। श्वेताश्वर उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से संबंधित है जबकि ईश उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित है।

55. नीचे दो कथन दिए गए है

कथन I : ऐलोरा स्थित कैलाश मंदिर भारतीय शैलोत्कृत स्थापत्यकला की कलाकृति और कारीगरी के कारण एक अनुपम स्मारक है।
कथन II : कैलाश मंदिर का निर्माण पचास मिलियन टन से अधिक चट्टान को काट कर बनाया गया जो उस क्षेत्र के ढलान वाले पहाड़ी क्षेत्र से लिया गया था।
उपरोक्त कथन के आलोक में, नीचे दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (a) कथन I और II दोनों सही हैं
Solution:

ऐलोरा स्थित कैलाश मंदिर भारतीय शैलोत्कृत स्थापत्य कला की कलाकृति और कारीगरी का अनुपम स्मारक है जो अपने आश्चर्यजनक शैली के लिए विश्व-प्रसिद्ध है। इसका निर्माण राष्ट्रकूट शासक कृष्ण प्रथम ने अत्याधिक धन व्यय करके करवाया था।

यह प्राचीन भारतीय वास्तु एवं तक्षण कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। कैलाश मंदिर का निर्माण पचास मिलियन टन से अधिक चट्टान को काट कर बनाया गया जो उस क्षेत्र के ढलान वाले पहाड़ी क्षेत्रों से लिया गया था। यह सम्पूर्ण मंदिर एक ही पाषाण को काटकर बनाया गया है। सर्वप्रथम एक विशाल शिलाक्षेत्र को कठोर श्रम द्वारा उत्कीर्ण कर उसके चारों ओर का एक अनुपयोगी हिस्सा निकाल दिया गया तथा बीच का भाग जहाँ मंदिर बनना था उसे छोड़ दिया गया। इस मध्यवर्ती भाग में ही मंदिर बनाया गया।

इसका निर्माण कार्य ऊपर से नीचे के ओर किया गया तथा स्थापत्य कार्य के साथ-साथ मूर्तिकारी एवं अलंकरण भी किया जाता रहा। इस प्रकार स्तूपी से जगती (आधार) तक के निर्माण की सम्पूर्ण योजना बनाकर उसे क्रियान्वित किया गया।

56. मशरुत शब्द निम्नलिखित में से किससे संबंधित है

Correct Answer: (a) सशर्त श्रेणी
Solution:

मशरूत शब्द मनसब प्रणाली में सशर्त पद या सशर्त श्रेणी से संबंधित है। मुगल काल में मनसब व्यवस्था अचानक नहीं विकसित हुई थी बल्कि यह धीरे-धीरे समय के साथ विकसित हुई थी।

मनसब शब्द का अर्थ स्थान या पद है, इस प्रकार मुगलों की मनसब शब्द का अर्थ स्थान या पद है,तथा चंगेज खाँ ने मनसबदारी व्यवस्था शुरु की थी तथा अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था अपने शासन काल के 19वें वर्ष (1575) में शुरू की थी।

अकबर द्वारा अपने सैनिक और नागरिक अधिकारियों को उनकी योग्यता या राज्य के लिए की गयी सेवाओं के आधार पर मनसब प्रदान की गयी थी। अधिकारियों का स्तर निर्धारित करने और अपने सैनिकों को वर्गीकृत करने के लिए वह चंगेज खाँ के सिद्धांतों से प्रेरित था मनसबदारों की तीन श्रेणिया थी-
1. जिनके घुड़सवारों (सवार) की संख्या जात के बराबर होती थी वे प्रथम श्रेणी के मनसबदार माने जाते थे। 2. जिनके पास जात की संख्या के आधे या आधे से अधिक घुड़सवार होते थे वे द्वितीय श्रेणी के मनसबदार माने जाते थे।
3. जिनके घुड़सवारों की संख्या उनकी जात संख्या के आधे से कम होती थी तृतीय श्रेणी के मनसबदार माने जाते थे।
मनसबदार जब कठिन क्षेत्र में विद्रोहियों के बीच कार्यरत होता था तो कई बार इस नियम का पालन नहीं किया जाता था। इस दौरान राज्य जात पद को बिना बदले सवार पद को बढ़ा देता था, निश्चित रूप से यह एक लचीली व्यवस्था थी इसमें परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन होता रहता था इस प्रकार मनसब व्यवस्था के आधारभूत ढ़ाचे को बदले बिना इसमें सुधार व परिवर्तन होते रहते थे सशर्त श्रेणी (सशर्त पद) या मशरूत का प्रचलन इसी प्रकार का एक सुधार था।

57. दिसंबर 1856 में, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) के अंतर्गत प्रथम विधवा पुनर्विवाह समारोह ____ के आवास पर मनाया गया था।

Correct Answer: (d) राजकृष्ण बंधोपाध्याय
Solution:

दिसंबर 1856 में, विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) के अंतर्गत प्रथम विधवा पुनर्विवाह समारोह राजकृष्ण बंधोपाध्याय के आवास पर आयोजित किया गया था। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के प्रयास व अपील पर विधवा विवाह कानून के लिए अंग्रेज सरकार ने 10 नवम्बर 1855 को बिल पेश किया और 26 जुलाई 1856 में विधवा पुनर्विवाह को कानूनी दर्जा प्रदान कर दिया।

अंग्रेजों को यह प्रगतिशील कदम उठाने में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने विशेष तौर पर मदद की थी। विधवा पुनर्विवाह कानून पास होने के बाद विद्यासागर बीमार पड़ गये थे, उसी दौरान उन्हें यह चिन्ता भी सता रही थी कि इस कानून के पक्ष में जनमत तैयार करना पड़ेगा। कुछ अखबारों के माध्यम से भी भी विद्यासागर से यह अपील की जा रही थी कि वह अब विधवा विवाहों को सम्पन्न कराने के लिए भी यथोचित प्रयत्न करें।

उनके ही प्रयास से कलकत्ता में दिसम्बर 1856 को प्रथम विधवा विवाह सम्पन्न हुआ। उनके संस्कृत कालेज के पुराने सहपाठी श्रीशचन्द्र विधुर थे वे ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की प्रेरणा से विवाह के लिए तैयार हुए थे और उनकी भावी पत्नी कालिमती देवी थी जो विधवा थी और उस समय उनकी आयु केवल 10 वर्ष थी।

7 दिसम्बर 1856 को प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्रवक्ता राजकृष्ण बंधोपाध्याय के घर पर यह विवाह सम्पूर्ण हिन्दू विधि- विधान से सम्पन्न हुआ था। इसमें दूल्हें की बारात को पुलिस संरक्षण प्रदान करना पड़ा और जो भारी धनराशि खर्च हुयी उसका एक बड़ा हिस्सा ईश्वर चन्द्र विद्यासागर ने खर्च की थी।

58. नायक स्थानीय सैन्य प्रमुख होते थे जिन्हें विजयनगर में मुख्य राजनीतिक व्यक्ति माना जाता था।

A.  नायकों को विजयनगर के राजा द्वारा भूमि अधिकार स्वीकृत किया जाता था जिसका वह भूमि अधिकार रखते थे।
B.  नायक साम्राज्य की सभी के स्वामी होते थे।
C. वर्ष 1565 तक नायक विजयनगर के राजाओं के निर्णयों पर पूर्णतः निर्भर होते थे, इसके बाद उन्हें अर्ध स्वतंत्र अधिकार दिए गए।
D. जब अमारन के अंतर्गत विजयनगर का 75% राज्य था, तो नायक अतिरिक्त सैन्य कार्यावधि के साथ सामंत के रूप में कार्य करते थे।
E. नायकों ने बहमनी राज्य के अफाकी और दक्खीनी कुलीनों के साथ भी युद्ध किया।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :

Correct Answer: (a) केवल A, B, C, D
Solution:

विजयनगर के नायकों ने बहमनी राज्य अफाकी और दक्खीनी कुलीनों के साथ युद्ध नहीं किया था। फिरोजशाह बहमनी के शासन काल में बहमनी राज्य के अमीर वर्ग अफाकी (पश्चिमी एशियाई विदेशी मुसलमान) और दक्खिनियों (स्थानीय मुसलमान) में विभाजित हो गया तथा उनमें विद्वेष पहले से अधिक बढ़ गया था।

अफाकी सामान्यतः शिया थे और दक्खीनी सामान्यतः सुन्नी थे। इस दलगत राजनीति को संतुलित करने के लिए फिरोजशाह द्वारा उठाया गया सर्वाधिक उल्लेखनीय कार्य प्रशासन में बड़े पैमाने पर हिन्दुओं को शामिल करना था। विजयनगर में सेनानायकों को नायक कहा जाता था।

ये नायक सामान्यतः भू-सामंत थे जिन्हें राजा वेतन के बदले अथवा उनकी अधीनस्थ सेना के रख-रखाव के लिए विशेष भू-खंड दे देता था, जो अमरम कहलाते थे। अमरम भूमि का उपभोग करने के कारण इन्हें अमर नायक भी कहा जाता था। सोलहवीं शताब्दी के मध्य में इन नायकों की संख्या 200 थी।

59. निम्नलिखित युद्धों को उनके सही कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित कीजिए।

A. अरबेला का युद्ध
B. पल्लालूर का युद्ध
C. तराइन का युद्ध
D. तक्कोलम का युद्ध
E. हाइडेस्पीस का युद्ध
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर का चयन कीजिए :

Correct Answer: (b) A, E, B, D, C
Solution:निम्नलिखित युद्धों का सही कालक्रम इस प्रकार से है-
क्रम सं.युद्ध का नामयुद्ध शुरू होने का वर्ष
1.अरबेला का युद्ध331 ई.पू.
2.हाइडेस्पीस का युद्ध326 ई.
3.पल्लालूर का युद्ध618 ई.
4.तक्कोलम का युद्ध948 ई.
5.तराइन का युद्ध I1191 ई.

60. 17वीं शताब्दी में आगरा आने वाला डच यात्री निम्नलिखित में से कौन था?

Correct Answer: (b) सिस्को पेलस
Solution:

17वीं शताब्दी में आगरा आने वाले डच यात्री फ्रेंसिक्को पेलसर्ट ने भारत में यात्रा की थी। उन्होंने बर्नियर की तरह ही वह भी लोगों में व्यापक गरीबी देखकर अंचभित हो गया था और उसने लिखा है कि लोग इतने अधिक तथा दुखद गरीबी में रहते हैं कि इनके जीवन को मात्र नितांत अभाव के घर तथा कठोर कष्ट दुर्भाग्य के आवास के रूप में चित्रित अथवा ठीक प्रकार से वर्णित किया जा सकता है। राज्य को उत्तरदायी ठहराते हुए वह कहता है कि कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।