"राजा के बारे में अगली महत्वपूर्ण धारणा यह थी कि वह जनता का सेवक है। एक प्रारंभिक धर्मसूत्र लेखक ने टिप्पणी की है। कि राजा वस्तुतः सेवक होता है और 16% कर उसका पारिश्रमिक है।
एक जगह कौटिल्य ने इस बात का उल्लेख किया है कि राजा किस प्रकार से अपने सैनिकों के समतुल्य था, दोनों को अलग-अलग पारिश्रमिक मिलता था और दोनों राष्ट्र की परिसम्पत्ति साझा करने के हकदार थे। नारद भी जनता की रक्षा के लिए कराधान को राजा का वेतन मानते हैं।
अपरार्क का कथन है कि कोई भी व्यक्ति प्रतिफल की उम्मीद के बिना कर अदा नहीं करता है, अतएव, करों की अदायगी- राजा से संरक्षण प्राप्त करने के बदले ही- की जाती है। चूंकि जनता राजा को उचित पारिश्रमिक अदा करती है, राजा को अनिवार्यतः एक सेवक के रूप में, यहाँ तक कि गुलाम के रूप में उनकी सेवा करनी चाहिए। निश्चित रूप से यह अतिशयोक्तिपूर्ण कथन है, यथार्थ स्थिति की झलक शुक्र के लेखन में मिलती है जहाँ उन्होंने राजा की व्याख्या जनता का स्वामी और सेवक दोनों के रूप में किया है।"
निम्नांकित में से किसमें राजा का वर्णन जनता के स्वामी और सेवक दोनों के रूप में किया गया है?
Correct Answer: (c) शुक्रनीतिसार
Solution:शुक्रनीतिसार में राजा का वर्णन जनता का स्वामी और सेवक दोनों रूपों में किया गया है। भारत के कई प्राचीन लेखकों की तरह शुक्राचार्य ने भी राजनीति को नैतिकता का एक पहलू माना है। नैतिकता के तहत जनता के स्वामी और सेवक का तात्पर्य यह है कि राजा का हर निर्णय जनता के लिए हितकारी हो साथ ही जनता भी राज्य कर अदा कर राजतंत्र को आगे बढ़ाने में योगदान दे।