भारत में एक प्रभावी और प्रतिसंवेदी प्रशासन के लिए सभी स्तरों पर सरकारों के लिए यह अत्यावश्यक था कि वे स्वयं का पुनः आविष्कार करें और अपनी भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों को पुनः परिभाषित करें और उन सभी क्षेत्रों में सुधार करें जहां जनता का उनसे आमना-सामना होता है।
नौकरशाही की सार्वजनिक छवि अगम्यता, उदासीनता, प्रक्रिया उन्मुखी, खराब गुणवत्ता और सुस्ती, भ्रष्टाचार प्रवणता और गैर-जवाबदेही की थी। अतः समय की मांग थी कि भारत की जनता को सभी स्तरों पर एक प्रभावी, खुले, प्रतिसंवेदी, जवाबदेह, स्वच्छ और गतिशील तरीके से समायोजन करने वाले प्रशासन का आश्वासन दिया जाए।
शासन को परंपरागत नौकरशाही से आगे विस्तारित हो कर सभी स्तरों पर सक्रिय रूप से नागरिकों और उपभोक्ता समूहों को शामिल करना है ताकि जनता और वंचित समूहों को सशक्त और सूचित किया जा सके और स्वायत्त स्थानीय निकायों के माध्यम से सेवाओं और कार्यक्रम क्रियान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके।
इस प्रकार, सुधारों के तीन पक्ष थे, (i) प्रशासन में ऐसे संकट जो जनता के प्रति संवेदनशील या नागरिकों के प्रतिमित्रवत नहीं था और इसलिए सुधार करने की आवश्यकता थी, (ii) मानसिकता में परिवर्तन की आवश्यकता थी ताकि शासन करने की नए सिरे में 'शासन' के रूप में कल्पना की जा सके, और (iii) जवाबदेही को प्रोत्साहित करने वाले उपायों के माध्यम से प्रशासन का रूपांतरण। इस प्रकार सुधार का अर्थ शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामान्य कल्याण के क्षेत्र में जनता के लिए अवसरों के विस्तार के अलावा और कुछ नहीं है।
सभी स्तरों पर सरकारों को लिए स्वयं का पुनः अविष्कार करना और अपनी भूमिका को पुनःपरिभाषित करने की आवश्यकता थी ताकि
Correct Answer: (c) प्रभावकारी और प्रतिसंवेदी प्रशासन की रचना की जा सके।
Solution:सभी स्तरों पर सरकारों के लिए स्वयं का पुनः अविष्कार करना और अपनी भूमिका को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता थी ताकि 'प्रभावकारी और प्रतिसंवेदी प्रशासन की रचना की जा सके।' उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर गद्यांश की पहली पंक्ति में 'भारत में एक ...... आमना-सामना होता है' तक में निहित है।